लंका विजय के बाद माता सीता अग्नि परीक्षा के बाद पुनः अग्नि से प्रकट हुई तो उनके साथ अग्निदेव भी पिता की भाँति सीता देवी को भगवान राम को सौंपने साथ आए। उस समय माता सीता जी सहित प्रभु श्री का दर्शन करने ब्रह्माजी और समस्त देवता आये।उस समय जगतपिता श्री ब्रहाजी ने बड़े ही भावविभोर हो गए और उन्होंने पुलकित होकर प्रभु श्री राम जी की स्तुति की। यहाँ पर वही स्तुति है। इसका वर्णन श्री तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के लंकाकांड के १११ वें छंद में किया है। यह स्तुति निश्चित ही भाव विभोर कर देने वाली और नित्य स्तुत्य है। यहाँ पर इस स्तुति को भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है-

जय राम सदा सुखधाम हरे l Jai Ram Sada Sukhdham Hare

भावार्थ: आपके शरीर की अनेकों कामदेवों के समान, परंतु अनुपम छवि है। सिद्ध, मुनीश्वर और कवि आपके गुण गाते रहते हैं। आपका यश पवित्र है। आपने रावणरूपी महासर्प को गरुड़ की तरह क्रोध करके पकड़ लिया।

भावार्थ: (किंतु अवतार लेने पर भी) आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक (अद्वितीय) और अनादि हैं। हे करुणा की खान श्रीरामजी! मैं आपको बड़े ही हर्ष के साथ नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुल के आभूषण! हे दूषण राक्षस को मारने वाले तथा समस्त दोषों को हरने वाले! विभिषण दीन था, उसे आपने (लंका का) राजा बना दिया ।

भावार्थ: हे गुण और ज्ञान के भंडार! हे मानरहित! हे अजन्मा, व्यापक और मायिक विकारों से रहित श्रीराम! मैं आपको नित्य नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदंडों का प्रताप और बल प्रचंड है। दुष्ट समूह के नाश करने में आप परम निपुण हैं।

भावार्थ: हे बिना ही कारण दीनों पर दया तथा उनका हित करने वाले और शोभा के धाम! मैं श्रीजानकीजी सहित आपको नमस्कार करता हूँ। आप भवसागर से तारने वाले हैं, कारणरूपा प्रकृति और कार्यरूप जगत् दोनों से परे हैं और मन से उत्पन्न होने वाले कठिन दोषों को हरने वाले हैं।

भावार्थ: आप मनोहर बाण, धनुष और तरकस धारण करने वाले हैं। लाल कमल के समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं। आप राजाओं में श्रेष्ठ, सुख के मंदिर, सुंदर, श्रीलक्ष्मीजी अर्थात सीता जी (सीता जी लक्ष्मी ही हैं) के वल्लभ तथा मद (अहंकार), काम और झूठी ममता के नाश करने वाले हैं।

भावार्थ: आप अनिन्द्य या दोषरहित हैं, अखंड हैं, इंद्रियों के विषय नहीं हैं। सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं। यह (कोई) दंतकथा (कोरी कल्पना) नहीं है। जैसे सूर्य और सूर्य का प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी है, वैसे ही आप भी संसार से भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं।

भावार्थ: हे व्यापक प्रभो! ये सव वानर कृतार्थ रूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं। हे हरे! हम देवताओं के दिव्य जीवन और दिव्य शरीर को धिक्कार है, जो हम आपकी भक्ति से रहित सांसारिक विषयों में आपको भूले हुए हैं।

भावार्थ: आप दीनों पर दया करने वाले हैं। मेरी विभेदकारी बुद्धि हर लीजिए। अर्थात मेरी बुद्धि भेद रहित हो अर्थात अनन्य भक्ति का आशीर्वाद दें।वह बुद्धि हरण कर लीजिए , जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दुःख है, उसे सुख मानकर आनंद से विचरता हूँ।( भक्त के लिए ईश्वर की भक्तिरहित जीवन दुःख स्वरूप है।)

भावार्थ: आप दुष्टों का खंडन करने वाले और पृथ्वी के रमणीय आभूषण हैं। आपके चरणकमल श्री शिव-पार्वती द्वारा सेवित हैं। हे राजाओं के महाराज! मुझे यह वरदान दीजिए कि आपके चरणकमलों में सदा मेरा अनन्य प्रेम हो ।

भावार्थ: इस प्रकार ब्रह्माजी ने अत्यंत प्रेम-पुलकित शरीर से विनती की। शोभा के समुद्र श्रीरामजी के दर्शन करते- करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे। ॥

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