अनुच्छेद: करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

संकेत बिंदु
- सूक्ति का आशय
- अभ्यास का महत्व
- सफलता का मूल मंत्र
अनुच्छेद 1
(100 से 150 शब्दों तक )
वृंद कवि के एक दोहे से ली गई यह सूक्ति अभ्यास के महत्व का बोध कराती है। इस सूक्ति का आशय है कि लगातार प्रयास करने से मूर्ख भी ज्ञानी हो जाता है। बार -बार घिसने से तो पत्थर पर भी रेखा बन जाती है तो भला कोई व्यक्ति निरंतर अभ्यास से क्यों न अपने काम में निपुण बनेगा? अभ्यास ही वह कुंजी है जो किसी को भी अपने कार्य में कुशलता प्रदान कराती है। वर्षों के रियाज से ही कोई गायक श्रेष्ठ बनता है। किसी चित्रकार की कूची से निकले सजीव चित्र देख वाह! वाह! तो सभी कर उठते हैं पर उस चित्रकारी के पीछे उस चित्रकार की वर्षों की साधना छिपी होती है। अतः जीवन में सफलता पाने की इच्छा रखने वाले हर व्यक्ति को लगातार अभ्यास कर अपनी कार्य-कुशलता बढ़ानी चाहिए।
करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात से सिल पर परै निसान।
अनुच्छेद 2
(200 से 250 शब्दों तक)
यह सूक्ति वृंद कवि के एक दोहे की है। यह निरंतर अभ्यास के महत्त्व को दर्शाती है।अभ्यास का अर्थ है, ‘निरंतर और बार-बार प्रयत्न करते रहना। हमें तब तक प्रयास करने रहना चाहिए जब तक इच्छित कार्य में सफलता न मिल जाए। निरंतर अभ्यास से मूर्ख भी सुजान अर्थात् विद्वान हो जाते हैं और जो सुजान होते हैं; वे अपनी कला में निपुण हो जाते हैं। संसार में कोई व्यक्ति जन्म से ही विद्वान नहीं होता। प्रारम्भ में सभी अयोग्य और अज्ञानी ही होते हैं। लगातार अभ्यास ही उन्हें विद्वान बनाता है। निरंतर अभ्यास से ही व्यक्ति कुछ भी कर पाने में समर्थ होता है। शिशु गिर-गिरकर ही चलना सीखता है। सवार गिर-गिरकर ही घोड़े पर सवारी करना सीखता है। बिना अभ्यास के सिद्धि प्राप्त नहीं होती। उसे बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयत्न करना पड़ता है।अभ्यास के बल पर अर्जुन महान धनुर्धर बने; कालिदास कवि्श्रेष्ठ कहलाए; , अमिताभ बच्चन सदी के महान अभिनेता और महेंद्र सिंह धोनी महान क्रिकेटर’ बन सके। निरंतर अभ्यास जीवन में साधना का एक रूप है, जिसका सुख साधक को स्वतः मिलता है अभ्यास आत्म-विश्वास बढ़ाता है। कार्य में निपुण बनाता है। इसलिए यह सफलता का सर्वोत्तम साधन है।सफलता की कुंजी है। अत: हमें अपने कार्य क्षमता बढ़ाने के लिए अभ्यास करते रहना चाहिए।
यह भी देखें:
अनुच्छेद: प्रातःकालीन सैर का दृश्य



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