किसी भी धार्मिक ग्रंथ में प्याज या तो पलांडू की अत्यंत निंदा लिखी गई है किसी भी धार्मिक कार्य में प्याज लहसुन का प्रयोग वर्जित है इसे तामसिक खाद्य माना जाता है।हिंदुओ के छोड़ दीजिए, इस्लाम तक में कच्चा प्याज खा कर नमाज के लिए आने पर मनाही है कारण यह बताया जाता है कि फरिश्तों को इसकी गंध पसन्द नहीं है। दैत्यों का भोजन , देवताओं के लिए अरुचिकर ।
अब एक नया तर्क दिया जा रहा है कि इसका नाम कृष्णावल है जो कि दक्षिण भारत में तमिल और कन्नड़ में बोला जाता है। इसका कारण बता रहे हैं कि इसको देखने में यह गोल चक्राकार है। काटने पर कमल दल सा दिखता है। उल्टा देखने पर विष्णु की गदा समान दिखता है। मानो भगवान विष्णु की सारी शक्तियां ही इस प्याज में भर गई हों 😄😂। इतनी सुंदरता तो इनको ब्रह्म कमल में न दिखी हों उस से कई गुना ज्यादा इस प्याज में दिख गई।जहां तक दक्षिण भारत की बात है तो दक्षिण में वैष्णव या ब्राह्मण परिवारों में इसका प्रयोग नहीं किया जाता था वर्तमान समय में अब लोग खाने लगे हैं किंतु पुरानी भोजन शैली में इसका कोई प्रयोग नहीं है। संस्कृत में इसके लिए पलांडु, तमिल में प्याज के लिए वेंकायम और कन्नड़ में इरूली शब्द प्रयोग होता है। भाषा चातुर्य के लिए कही पर यदि सांकेतिक रूप से कृष्णावल लिखा जाय तो वह सही नहीं होगा। किसी को सीधा कुत्ता कहने की जगह व्यंग में ग्राम सिंह बोला जाए तो वह सच में सिंह नही कहलाता।



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