हिंदी: कितनी अपनी, कितनी पराई

भाषा के इतिहास की दृष्टि से यदि देखा जाए तो वर्तमान में लिखी -पढ़ी और बोली जाने वाली भारतीय भाषाओं यथा संस्कृत, बांग्ला, कन्नड़, तमिल,मलयालम आदि भाषाओं के मुकाबले में हिंदी बिलकुल ही अर्वाचीन भाषा है। हिन्दी भाषा लगभग एक हजार वर्ष ही पुरानी है जिसमें पुरानी हिंदी और वर्तमान हिंदी के स्वरूप और उसमें उपस्थित शब्दावली में काफ़ी भेद है । यदि वर्तमान हिंदी की तुलना प्राथमिक हिंदी से की जाए तो आसानी से अनुभव किया जा सकता है कि हिंदी अपना स्वरूप बदलती रही है और लगातार बदल रही है ।यह आश्चर्य का ही विषय है कि जिस तेज़ी से हिंदी का विकास हुआ और यह मात्र एक हज़ार वर्षों में ही विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे पायदान पर पहुंच चुकी है। इसका कारण हिंदी भाषा की सुग्राह्यता और सरसता है ।

भाषा एक नदी की तरह होती है जो अपना मार्ग खुद तय करती हैं । अपने स्वाभाविक प्रवाह में जब कोई भाषा स्वयं मार्ग तय करती है तो अपनी मौलिकता के साथ ही नए – नए स्थानों का सफर तय करती हुई भाषा उस स्थान के लोगों की भाषा-बोली के शब्दों को स्वयं में आत्मसात करती हुई आगे बढ़ती है और नए शब्दों को अपने में अपने तरीके से समाहित कर लेती है । इसीलिए हिंदी को न फारसी के ‘अचार ‘ से परहेज़ है और न संस्कृत के ‘आचार’ से। बल्कि वह तो अचार और आचार दोनों को उनके मूल अर्थों में ही संरक्षित कर लेती है। इतना ही नहीं, कई बार कुछ शब्दों को अपनेपन का जामा पहना कर अपना-सा बना लेती हैं । कभी हिंदी अंग्रेजी शब्दो के हॉस्पिटल को अस्पताल, एकेडमी को अकादमी , ऑफिसर को अफसर और बिस्किट को बिस्कुट बना कर अपना लेती है तो कभी उसी मूल रूप में इंजन, बजट, बैंक, सर्कस जैसे शब्दों में ही अपना लेती हैं। 

यह हिंदी ही है जिसने देशी विदेशी, अपने पराए में भेद नहीं रखा । इसीलिए जितनी आसानी से अंग्रेजी के शब्द ग्रहण किए, उतनी ही आसानी से अक्ल, फकीर, अदालत जैसे अरबी शब्द, अफसोस, आइना, आराम, जानवर जैसे फारसी शब्द, अलमारी, साबुन, कमरा, गोदाम जैसे पुर्तगाली शब्द और आका , कुली, कैंची, कालीन, उर्दू आदि तुर्की शब्द अपने में रचा-पचा लिये। जितनी आसानी से हिंदी ने विदेशी शब्द अपना लिये, उतनी ही सरलता और अपनेपन से हिंदी ने पंजाबी, राजस्थानी, पाली, प्राकृत, बंगाली आदि भारतीय भाषाओं से अनेकानेक शब्द ले लिये। स्वयं को डंके की चोट पर संस्कृत की बेटी कहलाने वाली हिंदी, संस्कृत के सभी शब्दों में अधिकार रखते हुए संस्कृत के सभी शब्दो को तत्सम या तद्भव रूप में ग्रहण करते हुए सकुचाती नहीं।

दक्षिण भारत में यद्यपि मुख्य रुप से हिन्दी का पदार्पण स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान ही हुआ , किंतु यहां भी दक्खिनी हिंदी के रुप में सूफियों- संतों द्वारा हिंदी का विकास पूर्व में होता रहा । दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचारिणी सभा ने हिंदी को देशभक्ति की भावना से जोड़ कर लोगों को हिंदी सीखने के लिए प्रेरित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भले ही उत्तर भारत के हिंदी भाषी दक्षिण के ‘इडली-दोसे’ को अपने विशिष्ट अंदाज़ में ‘इटली-डोसा’ कहते रहे हों, लेकिन इसके स्वाद का आस्वादन करने और इस शब्द को हिंदी में मिलाने में देर नहीं करते। हैदराबादी हिंदी और उसके विशेष लहज़े का न केवल आनन्द लिया जाता है बल्कि उसके साहित्य को हिंदी में स्वीकारा और विशिष्ट स्थान भी दिया गया।

पश्चिमी और दक्षिणी भारत के प्रभाव से हिंदी में गलाटा, रावड़ी, येड़ा, बाई, लोचा, झकास, अपुन , मेरे को, तेरेको जैसे शब्द कब प्रवेश कर गए, इसका अंदाज लगाना भी ख़ासा मुश्किल है । हिंदी की एक और खासियत नए शब्दों का स्वत: निर्माण है । जहां संस्कृत के रोटिका शब्द से हिंदी में रोटी शब्द निकल आता है वहीं मीठी और मोटी रोटी ‘रोट’ ,फूल कर कुप्पा हुई रोटी ‘फुलका’, छोटे- छोटे चपत मार कर बनाई रोटी ‘चपाती’, परत- दर-परत घी लगा कर बनाई रोटी ‘परांठे’ और आलू, गोभी या दाल भरी हुई रोटी ‘भरवां परांठे’, और तेल या घी में तली जाने पर ‘पूड़ी’, दाल भर कर तलने से ‘कचौड़ी’ कहलाती है।

एक ही वस्तु के इतने सारे नामकरण करने की विशिष्ट क्षमता हिंदी में ही है। लोटा, कटोरा, छोरा , झुग्गी जैसे सरल हिंदी शब्द निर्माण कर हिंदी ने अपने कोश में लगातार वृद्धि की है। सरलीकरण हिंदी का एक अन्य विशेष गुण हैं। कठिनता , दुर्ग्राह्यता हिंदी को पसंद नहीं । इसीलिए हिंदी ने जहां पंचम वर्णों को अनुस्वार रुप में स्वीकार किया वहीं ‘ ळ ‘ जैसे कठिन उच्चारण के वर्ण को त्याग ही दिया। इसी प्रकार उच्चारण के संशय को खत्म करने के लिए ड़ और ढ़ जैसे दो उत्क्षिप्त अक्षर बना लिये, जो कि आम तौर पर अन्य भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त नहीं होते।

सरलीकरण हिंदी का एक अन्य विशेष गुण हैं। कठिनता , दुर्ग्राह्यता हिंदी को पसंद नहीं । इसीलिए हिंदी ने जहां पंचम वर्णों को अनुस्वार रुप में स्वीकार किया वहीं ‘ ळ ‘ जैसे कठिन उच्चारण के वर्ण को त्याग ही दिया। इसी प्रकार उच्चारण के संशय को खत्म करने के लिए ड़ और ढ़ जैसे दो उत्क्षिप्त अक्षर बना लिये, जो कि आम तौर पर अन्य भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त नहीं होते। हिंदी भाषा का सौभाग्य ही रहा है कि एक मत से हमारे पूर्वज स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रुप में चुना और उसका प्रचार प्रसार किया।

गांधी जी के नेतृत्व में डा. सी.पी. रामास्वामी और श्रीमती एनी बेसेंट ने 1918 में दक्षिण भारतीय हिंदी प्रसारिणी सभा की स्थापना की । गांधी जी इस संस्था के प्रथम अध्यक्ष थे। यह संस्था तब से अभी तक निरंतर कार्यरत है। दक्षिण भारत में डॉक्टर सी. पी. रामास्वामी अरयर, टी. आर. वेंकट रामन शास्त्री जी, एन. सुंदर अय्यर आचार्य, पी.आदेश्वर आदि हिंदी लेखकों ने न केवल मौलिक लेखन से अपितु दक्षिण भारतीय भाषाओं के साहित्य को हिंदी में अनुवादित कर हिंदी भाषा को समृद्ध किया और यहां की संस्कृति और साहित्य से देशवासियों को परिचित किया।

हज़ार वर्षों के विकास के बाद यह कह पाना निश्चित रूप से कठिन है कि हिंदी में कितनी हिंदी है । लेकिन हिंदी कितनी अपनी है, यह जरूर जाना जा सकता है । इसीलिए आज हिंदी में लगभग हर भारतीय भाषा के कुछ न कुछ शब्द मिल ही जाते हैं और इन्हीं शब्दों के कारण हिंदी बिना भेदभाव के सभी को अपनेपन का अहसास कराती है। हिंदी आज विश्व पटल पर तेजी से उभर रही है ।

भारत ही नहीं, विदेशों मे भी हिंदी का प्रचार द्रुतगति से हो रहा है और विश्व के अनेकों प्रसिद्ध देशों ने हिंदी भाषा को अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है। आज हिंदी भारत की पहचान और पर्याय बन चुकी है। लेकिन आज भी कतिपय दुराग्रह और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते हिंदी राष्ट्र भाषा के रुप में संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं कर सकी है। अब वह उच्च समय आ चुका है कि हम सब हिंदी को राष्ट्र भाषा के रुप में न सिर्फ स्वीकार करें, अपितु अपनी-अपनी मातृ भाषाओं के शब्दकोश से इसे समृद्ध भी करें।

निबंध लेखिका:कुसुम लता जोशी

Leave a Reply

Trending

Discover more from HindiFlorets.com

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading