भागवतम में कृष्ण लीला के अंतर्गत में कुब्जा दासी का वर्णन मिलता है। हालांकि कुब्ज़ा की अति लघु कथा कही गई है किंतु मेरी दृष्टि में कुब्जा का चरित्र अत्यंत प्रेरणा दाई है। कुब्जा अत्याचारी राजा कंस की सेविका थी किंतु भगवान पर बड़ी आस्था रखती थी। कृष्ण जब मथुरा पहुंचे तो कुब्जा ने भगवान को बिना संकोच, बिना शर्त, निर्भय हो कर बड़े प्रेम से चंदन प्रस्तुत किया, जिसे वह कंस के अंगराग के लिए ले जा रही थी। उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर भगवान कृष्ण ने उसकी कुबड़ी पीठ तो ठीक की ही थी , साथ ही उसके घर आने का वचन भी निभाया । संसार में रहते हुए कई बार ऐसी परिस्थिति भी आ सकती है कि हमें अन्यायी,अत्याचारी या अधर्मी व्यक्ति की भी सेवा करनी पड़ जाए । कुब्जा के चरित्र से प्रेरणा मिलती है कि ऐसी स्थिति में भी हमें धैर्य पूर्वक भगवान का नाम जप करना चाहिए और हरि आश्रित होकर कर्तव्य निर्वाह करना चाहिए। ईश्वर अवश्य कृपा करेंगे।
यहां पर मैंने इसी कल्पना पर एक गीत लिखा है । जब कृष्ण अकस्मात कुब्जा के घर पहुंचे होंगे तो कुब्जा की मन: स्थिति कैसी हुई होगी। भगवान की सेवा सत्कार किस प्रकार करूं, उसके इस विचार को प्रकट करता एक सरल गीत प्रस्तुत है

मैं तो बांवरी हो गई ।

कृष्ण आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।
कान्हा आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।।
आसन बिछाऊं कि मैं झूला झुलाऊं।
कैसे करूं सत्कार, मैं तो बांवरी हो गई।
कृष्ण आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।
कान्हा आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।।
चंदन घिसूं मै ,तिलक लगाऊं।
माखन के रख दूं भंडार , मैं तो बांवरी हो गई।
कृष्ण आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।
कान्हा आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।।
भोजन बनाऊं, छप्पन भोग लगाऊं।
आज मनाऊं त्योहार, मैं तो बांवरी हो गई।
कृष्ण आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो
नृत्य करूं कि संगीत सुनाऊं।
कैसा करूं व्यवहार, मैं तो बांवरी हो गई।
कृष्ण आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।
कान्हा आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।।
बेला सजाऊँ और चम्पा सजाऊं।
कर लूं मैं सोलह श्रृंगार, मैं तो बांवरी हो गई।
कृष्ण आए मेरे द्वार, मैं तो बांवरी हो गई ।
कान्हा आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।।
बलि बलि जाऊं ,कान्हा जी प्यारे।
आज किया चमत्कार,मैं तो बांवरी हो गई ।
कृष्ण आए मेरे द्वार, मैं तो बांवरी हो गई ।
कान्हा आए मेरे द्वार,मैं तो बांवरी हो गई ।।
कवयित्री: कुसुम लता जोशी

गीत के माध्यम से हम भगवान की प्रीति और आस्था को व्यक्त करते हैं। यह कुब्जा प्रसंग हमें एक ऊंचे आदर्श और धार्मिकता के पथ में चलने का दिशा-निर्देश देता है। भक्ति और प्रेम का जरिया बनाकर, हम अपने चिन्हित पथ पर चलते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। इसे सुनकर हमारे मन और आत्मा में एक शांति और संतोष की भावना उत्पन्न होती है। गीत के माध्यम से ईश्वर के प्रति प्रेम स्फुरण का प्रयास किया गया है। बार-बार इन प्रसंगों का गाकर, सुनकर आनंद आता है और भक्ति स्थिर होती है। आशा है यह प्रयास आपको पसंद आएगा। गीत के प्रति अपनी दृष्टि, विचार कमेंट बॉक्स में लिखकर हम तक पहुँचाए। आपके द्वारा दिए गए प्रशंसा-आलोचना दोनों का स्वागत है। हमें सुधारने और बेहतर बनाने में दिशा देगा।

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