नवरात्रि के नौवें दिन माता दुर्गा की उपासना सिद्धिदात्री स्वरूप में होती हैं। सिद्धिदात्री माँ पार्वती जी की नौवीं शक्ति मानी जाती हैं। महामाया, महालक्ष्मी,विजयप्रदा,विजया, सिद्धिदा, सिद्धिप्रदा, सर्वकामदा, मोक्षदा और दुर्गा आदि देवी के अन्य नाम हैं।आठ दिन तक घोर तप के बाद देवी प्रसन्न होकर साधक को उसका मनोरथ पूर्ण होने का वरदान देती हैं। देवी प्रसन्न होने पर अपने भक्तों को मन चाहे वरदान और अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियाँ प्रदान कर संतुष्ट करती हैं। इसीलिए देवी का नाम सिद्धिदात्री कहलाया।

देवी भागवत् पुराण और दुर्गा सप्तशती की कथा के अनुसार , एक समय एक राजा सुरथ , जिनको शत्रुओं ने हराकर राज-पाठ छीन कर पदहीन कर दिया था और एक अन्य वैश्य जिनके परिवार ने उन्हें धनहीन कर घर से बाहर कर दिया था, ने अत्यंत दुखी हो ऋषि मेधातिथि के पास आकर अपनी व्यथा दूर करने का उपाय पूछा। तब ऋषि मेधातिथि ने उन्हें देवी की कथा सुना कर तप करने को कहा। एक वर्ष तक कठोर तप के बाद देवी ने प्रसन्न होकर वरदान माँगने को कहा और मनोवाँछित वरदान दिया।

एक अन्य कथा के अनुसार, पूर्व में सिर्फ़ चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा में ही देवी के नौ स्वरूपों की पूजा कर नवरात्रि मनाई जाती थी। सीता हरण के बाद भगवान राम ने आपातकाल में अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में देवी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया। प्रतिदिन राम सहस्र कमल दल से देव्यार्चन किया करते थे। राम की परीक्षा लेने के लिए नौवें दिन देवी ने एक कमल पुष्प कम कर दिया। यह देख राम ने सोचा कि लोग मेरे नेत्र को कमल नयन कहते हैं । अतः पुष्प के अभाव में अब मैं अपने कमलनयन को ही देवी को अर्पण कर देता हूँ । यह विचार कर राम अपने नेत्र को तीर की नोक से निकालने को जैसे ही उद्द्यत हुए, उनके समर्पण भाव को देखते हुए देवी वहाँ प्रकट हुई और विजयी होने का आशीर्वाद दिया। राम को आपातकाल में कम समय में उपासना करने पर भी देवी सिद्ध हुई, इसीलिए देवी सिद्धिदात्री कहलाई और तभी से शरदकालीन नवरात्रि की शुरुआत हुई।

एक अन्य कथा के अनुसार , देवी पार्वती ने प्रसन्न होकर भगवान शिव को अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये अष्ट सिद्धियाँ प्रदान कीं और सिद्धिदात्री कहलाई । इस पर प्रसन्न होकर भगवान शिव ने भी अपने आधे शरीर पर देवी को स्थान दिया और अर्द्धनारीश्वर कहलाए।

सिद्धिदात्री गौर वर्ण की हैं । ये शांत स्वरूप में कमलासन पर बैठी हुई हैं । इनके वर्ण की तुलना श्वेत शंख, चन्द्र और कुंद के फूल से की जाती है। माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं । ये अपने हाथों में क्रमश: चक्र, शंख गदा और कमलधारण किए हुए हैं। ये रक्त वर्ण के वस्त्र धारण किए हुए हैं। इनका वाहन सिंह है। रक्त कमलपुष्प देवी को अत्यंत प्रिय है। लाल कमल के फूलों से इनकी आराधना करने से देवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं।

आयुर्वेद में शतावरी अथवा नारायणी को सिद्धिदात्री देवी का साक्षात औषधीय स्वरूप ही जाना जाता है। यह एक झाड़ीदार औषधीय पादप है। जिसकी सैंकड़ों माँसल जड़ें निकलती हैं। इसके सेवन से बल,बुद्धि और ओज की वृद्धि होती है। यह कफ और वात को शांत करने वाली औषधि है, इनके नियमित सेवन से अनेक व्याधियाँ दूर हो जाती हैं।

शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। देवी के प्रसन्न होने पर साधक को अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियों की प्राप्ति होती है, जिनके बल पर उसके लिए सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

दुर्गापूजा के नौवें दिन सिद्धिदात्री की उपासना का विधान है ।नवरात्रि के नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा नौ दिन दुर्गा पूजा का समापन किया जाता है और से सुख-संपत्ति, यश-ऐश्वर्य, दीर्घायु आदि की कामना की जाती है। देवी सिद्धिदात्री की पूजा करने से भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक समस्त कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। वह सभी सांसारिक इच्छाओं के संतुष्ट होने से तृप्त हुआ विषय-भोग-शून्य हो मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।

देवी भगवती की उपासना से साधक को सांसारिक सुख-भोग तो प्राप्त होते ही हैं , साधक मोक्ष का अधिकारी भी हो जाता है। अतः अपना कल्याण चाहने वाले प्रत्येक साधक को देवी भगवती दुर्गा की उपासना अवश्य करनी चाहिए।

ऊँ सिद्धिदात्री देव्यै नम:।

सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।

या देवी सर्व भूतेषु सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै,नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनम:॥

सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

Devi Bhagwath

Leave a Reply

Trending

Discover more from HindiFlorets.com

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading