महागौरी:सात्विक विद्याओं की प्रदाता
नवरात्रि के आठवें दिन माता दुर्गा की उपासना उनके महागौरी स्वरूप में होती हैं। महागौरी माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति या स्वरूप मानी जाती हैं। महा- माया, महावाणी,भारती, वाक्, सरस्वती, आर्या,ब्राह्मी, कामधेनु,वेदगर्भा,धीऔर ईश्वरी आदि देवी के अन्य नाम हैं।सात दिन तक घोर तप के बाद जब साधक की बुद्धि परम शुद्ध हो जाती है तब देवी उसकी बुद्धि में सात्विक ज्ञान के रूप में प्रवेश करती हैं । इनका निवास स्थान मस्तिष्क और जिह्वा के अग्र भाग में है। इसीलिए देवी के उपासकों को अपनी वाणी की शुद्धि का ध्यान रखना चाहिए और सत्य बोलने का अभ्यास करना चाहिए। महागौरी साक्षात सरस्वती ही हैं और शुद्ध सात्विक विद्याओं की प्रदाता हैं। इसीलिए संपूर्ण दक्षिण भारत में अष्टमी के दिन मुख्य रूप से सरस्वती देवी की ही उपासना की जाती है और छोटे बच्चों का विद्यारंभ संस्कार का शुभ अवसर माना जाता है।

महागौरी देवी की कथा
नारद ऋषि की प्रेरणा पर देवी पार्वती ने भगवान् शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिये बड़ी कठोर तपस्या की थी | ‘व्रियेअहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात |’ (नारद पांचरात्र) । इस कठोर तपस्या के कारण इनका शरीर एकदम काला पड़ गया था | इनकी तपस्या से प्रसन्न और संतुष्ट होकर जब भगवान् शिव ने इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया ।तब वे विद्युत् प्रभा के समान अत्यन्त कान्तिमान गौर हो उठी | तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा |
महागौरी का स्वरूप

महागौरी अत्यंत गौर वर्ण की हैं । अत्यंत गौर वर्ण की होने के कारण ये महागौरी कहलाईं। इनके वर्ण की तुलना श्वेत शंख, चन्द्र और कुंद के फूल से की जाती है। अष्ट वर्षीय बालिका में इनके स्वरूप की कल्पना की गई है – ‘अष्टवर्षा भवेद गौरी’। इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं | इनकी चार भुजाएँ हैं | इनका वाहन वृषभ है | इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय-मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है | ऊपर वाले बायें हाथ में डमरू और नीचे के बायें हाथ में वर-मुद्रा है | इनकी मुद्रा अत्यन्त शान्त है । इन्हें श्वेत पुष्प अति प्रिय हैं।

आयुर्वेद में आँवला और ब्राह्मी को साक्षात देवी का ही औषधीय स्वरूप जाना जाता है।औषधीय गुणों के रूप में भी इन दोंनों में बुद्धि प्रखर करने की क्षमता होती है। इनके नियमित सेवन से मन शांत होता है। अनेक मानसिक व्याधियाँ दूर हो जाती हैं।
महागौरी की पूजा का फल
दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा करने से सभी पाप धुल जाते है। जिससे मन और शरीर हर तरह से शुद्ध हो जाता है। देवी महागौरी भक्तों को सद्मार्ग की ओर ले जाती है। इनकी पूजा से अपवित्र विचार भी नष्ट हो जाते हैंऔर बुद्धि शुद्ध और सात्विक हो जाती है।ज्ञान की देवी सरस्वती के सौम्य रूप में उपासना करने से की पूजा करने से मन की पवित्रता बढ़ती है। जिससे नकारात्मकता दूर हो जाती है तथा सकारात्मकता बढ़ने लगती है। देवी महागौरी की पूजा करने से मन को एकाग्र करने में मदद मिलती है। इनकी उपासना से सभी दैहिक , दैविक, भौतिक तीनों ताप- कष्ट दूर हो जाते हैं।
इनकी उपासना से भक्त जनों के असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं | अत: इनके चरणों की शरण पाने के लिये हमें सब प्रकार से प्रयत्न करना चाहिये | पुराणों में इनकी महिमा गायी गई है। ये मनुष्य की असत् वृतियों का नाश कर सत् वृतियों की ओर प्रेरित करती हैं। देवी की भक्ति सदैव शुभफलदाई है।
इनकी उपासना से भक्तों के सभी पाप भी विनष्ट हो जाते हैं और दैन्य-दु:ख उसके पास कभी नहीं आते |इस दिन कई लोग कन्याओं को पूजन व भोजन कराते हैं। मान्यता है कि कन्या पूजन से अखंड सौभाग्य प्राप्त होता हैं ।महागौरी समस्त सात्विक विद्याओं की प्रदाता हैं , इसलिए ज्ञान की इच्छा रखने वाले तथा श्री विद्या के उपासकों को महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना अवश्य करनी चाहिए।
महागौरी को प्रणाम करने का मंत्र
ऊँ महागौरी देव्यै नम:।
या देवी सर्व भूतेषु महागौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै,नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनम:॥
महागौरी देवी की स्तुति करने का मंत्र
सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी, महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
सुख शांति दात्री, धन धान्य प्रदायनीम्।
डमरूवाघप्रिया अघा महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगलात्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वरदा चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥



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