भाग्य और पुरुषार्थ पर क्या श्रेष्ठ है? इस पर विवेचन करने के लिए अनेक बार प्रश्न पूछे जाते हैं । कई बार विद्यार्थियों को भाग्य और पुरुषार्थ “पर हिंदी में अनुच्छेद लिखने को भी कहा जाता है। यहाँ पर तीन अलग- अलग अनुच्छेद दिये गए हैं । हमें विश्वास है कि ये अनुच्छेद माध्यमिक स्तर के छात्रों के लिए उपयोगी होंगे।आप इस विषय पर विचार अवश्य भेजे।
भाग्य और पुरुषार्थ पर तीन अनुच्छेद

अनुच्छेद 1
भाग्य वह है जो पूर्व से ही निर्धारित है।जो कुछ भी एक व्यक्ति अपने जीवन में बिना प्रयत्न के पाता है वह उसका भाग्य कहलाएगा। जैसे एक बच्चे का जन्म होता है तो वह किसी धनी घर में जन्म लेगा या निर्धन , यह उसका भाग्य है। लेकिन पुरुषार्थ द्वारा मनुष्य अपने जीवन को की दिशा और दशा बदल सकता है। `पुरुषार्थ मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। मनुष्य पुरुषार्थ के बिना कुछ नहीं | जो मनुष्य साहसी, दृढ़ निश्चयी और परिश्रमी होता है वह कठिन से कठिन परिस्थिती में भी मे भी अटल विश्वस रखने वाले को होते हैं।अपने बल पर निश्चित दिशा में अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रयत्न करने को पुरुषार्थ कहते हैं। भारतीय संस्कृति में पुरुषार्थ का एक उदाहरण भगवान श्री राम है। उन्होंने कठिन परिस्थिति में भी हिम्मत नहीं हारी और दुश्मन के घर से अपनी पत्नी सुरक्षित ले आए। यदि वे भी सिर्फ़ भाग्य के भरोसे रहते तो अपनी अपहृता पत्नी को कभी वापस न पाते। निठल्ले रहने से कर्म करना अधिक उचित है। एक कहावत भी है कि ’भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है जो अपना साथ खुद देते हैं ”
अनुच्छेद 2
पुरुषार्थ हमारे जीवन के महत्वपूर्ण आधार को प्रकट करता है। भाग्य हमारे जन्म के समय से तय हो जाता है और हमारे लिए निश्चित काम करता है, लेकिन पुरुषार्थ हमारी मेहनत, समर्पण, निष्ठा और साहस के साथ उच्च स्थान तक पहुंचने में मदद करता है। वह हमें अपने लक्ष्यों की दिशा में अग्रसर रहने की क्षमता प्रदान करता है और हमें कठिनाइयों का सामना करने की प्रेरणा देता है। प्रत्येक कदम पर पुरुषार्थ के बल पर हम अपने जीवन को सफलता की ऊंचाइयों तक उठाने के लिए तैयार होते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने भी भगवत गीता में ” कर्मण्ये वादिकारस्ते मा फलेसु कदाचना” कह कर निरपेक्ष हो कर्म करने को कहा है। यदि हम पुरुषार्थ करते हैं तो निश्चित रूप से भाग्य भी सहायक हो जाता है। किंतु जो लोग सिर्फ़ “दैव, दैव ” कह कर ईश्वर को ही कोसते हैं उनका भाग्य भी उनसे नाराज हो जाता है। अतः भाग्य और पुरुषार्थ दोनों ही महत्वपूर्ण हैं किंतु मनुष्य के हाथ में सिर्फ़ पुरुषार्थ ही है। अतः निरंतर काम करते रह करना चाहिए।
अनुच्छेद 3
भाग्य और पुरुषार्थ के बीच एक संतुलन स्थापित करना जीवन के लिए आवश्यक है। हमारे लिए जो भी भाग्य में नहीं है, वह पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। हालांकि, भाग्य भी हमारे जीवन का अभिन्न अंग है जिसे नष्ट करना संभव नहीं है। यदि हम सही दिशा में प्रयासरत रहते हैं और पुरुषार्थ के साथ संघर्ष करते हैं, तो हमारे भाग्य को भी प्रभावित किया जा सकता है। इसलिए, सफलता के लिए अनिवार्य रूप से भाग्य और पुरुषार्थ के संगम का आवश्यक है किंतु भाग्य तो पूर्व निर्धारित है। पुरुषार्थ हमारे हाथ है। वन में सैंकड़ों हिरन हैं किंतु अपना पेट भरने के लिये सिंह को भी शिकार करना पड़ता है। पुरुषार्थ की महिमा संस्कृत के इस श्लोक से पता चलती है-
’उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।”
अर्थात” जिस प्रकार सोते हुए सिंह के मुँह में मृग स्वयं नहीं प्रवेश करता, उसी प्रकार केवल इच्छा करने से सफलता प्राप्त नहीं होती है| अपने कार्य को सिद्ध करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है |”
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