कवि का नाम:सुमित्रानंदन पंत

जन्म  :    20मई 1900   मृत्यु:28 दिसंबर 1977

जन्म स्थान:कौसानी –अल्मोड़ा, उत्तराखंड

काव्य की विधा और लेखन की विशेषता:छायावाद के प्रमुख स्तंभ रहे।

प्रमुख रचनाएँ: कला और बूढ़ा चाँद,  चिदंबरा , वीणा, पल्लव , युगवाणी , ग्राम्या स्वर्णकिरण लोकायतन ।

पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,
पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।

मेखलाकर पर्वत अपार
अपने सहस्‍त्र दृग-सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार-बार
नीचे जल में निज महाकार,

-जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण सा फैला है विशाल!

गिरि का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस-नस उत्‍तेजित कर
मोती की लडि़यों सी सुन्‍दर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!

गिरिवर के उर से उठ-उठ कर
उच्‍चाकांक्षायों से तरूवर
है झॉंक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष, अटल, कुछ चिंता पर।

उड़ गया, अचानक लो, भूधर
फड़का अपार वारिद के पर!
रव-शेष रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अंबर!

धँस गए धरा में सभय शाल!
उठ रहा धुऑं, जल गया ताल!
-यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल

कवि ने इस कविता में प्रकृति का ऐसा वर्णन किया है कि लग रहा है कि प्रकृति सजीव हो उठी है। कवि कहता है कि वर्षा ऋतु में प्रकृति का रूप हर पल बदल  रहा है कभी वर्षा होती है तो कभी धूप निकल आती है। पर्वतों पर उगे हजारों फूल ऐसे लग रहे है, जैसे पर्वतों की आँखे हो और वो इन आँखों के सहारे अपने आपको अपने चरणों में फैले दर्पण रूपी तालाब में देख रहे हों। पर्वतों से गिरते हुए झरने कल- कल की मधुर आवाज कर रहे हैं, जो नस- नस को प्रसन्नता से भर रहे हैं। पर्वतों पर उगे हुए पेड़ शांत आकाश को ऐसे देख रहे हैं, जैसे वो उसे छूना चाह रहे हों।  बारिश के बाद मौसम ऐसा हो गया है कि घनी धुंध के कारण लग रहा है मानो पेड़ कही उड़ गए हों अर्थात गायब हो गए हों,चारों ओर धुँआ होने के कारण लग रहा है कि तालाब में आग लग गई है। ऐसा लग रहा है कि ऐसे मौसम में इंद्र भी अपना बादल रूपी विमान ले कर इधर- उधर जादू का खेल दिखाता हुआ घूम रहा है।

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श – भाग 2’ से लिया गया है। इसके कवि ‘सुमित्रानंदन पंत जी ‘हैं। इसमें कवि ने वर्षा ऋतु का सुंदर वर्णन किया है।

व्याख्या -: कवि कहता है कि पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु का प्रवेश हो गया है। जिसकी वजह से प्रकृति के रूप में बार बार बदलाव आ रहा है अर्थात कभी बारिश होती है तो कभी धूप निकल आती है।

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श – भाग 2’ से लिया गया है। इसके कवि ‘सुमित्रानंदन पंत जी ‘हैं। इसमें कवि ने पर्वतों का सजीव चित्रण किया है।

व्याख्या –: इस पद्यांश में कवि ने चारों तरफ़ फ़ैली हुई र्पवत शृंखला की तुलना करधनी अर्थात कमर में बांधने वाले आभूषण से की है । कवि कहता है कि विशाल पर्वत शृंखला करधनी के आकार में फ़ैली हुई हैं। पहाड़ पर हज़ारों  फूलों खिले हुए हैं जिन्हें देखकर ऐसा लग रहा है कि मानो पर्वत अपनी फूलों रूपी अपनी हजारों आंखें फाड़ कर तलहटी में फ़ैले हुए तालाब के जल में अपने विशाल आकार को देख रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो तालाब एक विशाल दर्पण है।

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श – भाग 2’ से लिया गया है। इसके कवि ‘सुमित्रानंदन पंत जी ‘हैं। इसमें कवि ने झरनों की सुंदरता का वर्णन किया है।

व्याख्या –: इस पद्यांश में कवि कहता है कि पहाड़ पर झरने झर -झर करते हुए नीचे गिर रहे हैं । झरनों में झाग भरे पानी की बूँदें मोतियों की लड़ियों के समान सुंदर दिख रहीं हैं ,ऐसा लग रहा है मानों वे पहाड़ों का गुणगान कर रहे हों। झरनों के गिरने की मधुर ध्वनि नस-नस में उत्साह अथवा प्रसन्नता भर देती है।

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श – भाग 2’ से लिया गया है। इसके कवि ‘सुमित्रानंदन पंत जी ‘हैं। इसमें कवि ने झरनों की सुंदरता का वर्णन किया है।

व्याख्या –: इस पद्यांश में कवि कहता है कि मोतियों की लड़ियों के समान सुंदर झरने झर-झर की आवाज करते हुए बह रहे हैं ,ऐसा लग रहा है की वे पहाड़ों का गुणगान कर रहे हों। उनकी करतल ध्वनि नस नस में उत्साह अथवा प्रसन्नता भर देती है।
पहाड़ों के हृदय से उठ-उठ कर अनेकों पेड़ ऊँचा उठने की इच्छा लिए एक टक दृष्टि से स्थिर हो कर शांत आकाश को इस तरह देख रहे हैं, मानो वो किसी चिंता में डूबे हुए हों। अर्थात वे हमें निरन्तर ऊँचा उठने की प्रेरणा दे रहे हैं।

प्रसंग -: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श – भाग 2’ से लिया गया है। इसके कवि ‘सुमित्रानंदन पंत जी ‘हैं। इसमें कवि ने बारिश के कारण प्रकृति का बिल्कुल बदला हुआ रूप दर्शाया है।

व्याख्या -: इस पद्यांश में कवि मूसलाधार बारिश का वर्णन कर रहे हैं वे कहते हैं बरसात के मौसम में चारों ओर घने बादल लगे हुए हैं तभी अचानक बादलों के बीच पारे के समान धवल व चमकीली बिजली चमक उठती है और बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट सुनाई देती है अब सब तरफ़ तेज़ मूसलाधार पानी बरस रहा है मानो पूरा आकाश ही धरती पर टूट पड़ा हो है मूसलाधार बरसात के कारण सिर्फ़ पानी गिरने की आवाज़ ही सुनाई दे रही है ऐसा लगता है कि चारों तरफ़ सिर्फ़ झरने ही शेष रह गए हों।

प्रसंग -: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श – भाग 2’ से लिया गया है। इसके कवि ‘सुमित्रानंदन पंत जी ‘हैं। इसमें कवि ने बारिश के कारण प्रकृति का बिल्कुल बदला हुआ रूप दर्शाया है।

व्याख्या -: इस पद्यांश में कवि कहता है कि मूसलाधार बारिश के कारण प्रकृति का भयानक रूप प्रकट होता है बादल इतने नीचे आ गए हैं कि देख कर शाल के पेड़ डर कर धरती के अंदर धंस गए हैं। अथवा भूस्खलन की घटना होने के कारण विशाल शाल के पेड धरती के अंदर धँस गए हैं । ताल के ऊपर बादल इस तरह तैरते हुए घूम रहे हैं कि लग रहा है कि मानो तालाब में आग लग गई है। प्रकृति के नित बदलते हुए रूप को देखकर लगता है कि इंद्र बादलों रूपी विमान में बैठकर जादू बिखेरते हुए इधर-से उधर घूम रहा है।

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उत्तर-: वर्षा ऋतु में मौसम हर पल बदलता रहता है। कभी तेज़ बारिश आती है तो कभी मौसम साफ हो जाता है। पर्वत अपनी पुष्प रूपी आँखों से अपने चरणों में स्थित तालाब में अपने आप को देखता हुआ प्रतीत होता है।पर्वतों से झरते हुए झरने मोतियों की लड़ियों की तरह प्रतीत हो रही हैं। बादलों के धरती पर आ जाने के कारण ऐसा लग रहा है कि जैसे आसमान धरती पर आ गया हो और कोहरा धुएं की तरह लग रहा है ,जिसके कारण लग रहा है कि तालाब में आग लग गई हो।

प्रश्न  2-: ‘मेखलाकार ‘ शब्द का क्या अर्थ है ?कवि ने इस शब्द का प्रयोग यहाँ क्यों किया है?

उत्तर -: ‘मेखलाकार ‘ शब्द का अर्थ है – करधनी अर्थात कमर का आभूषण। कवि ने यहाँ इस शब्द का प्रयोग इसलिए किया है क्योंकि पर्वतों की श्रृंखला करधनी की तरह टेड़ी- मेड़ी लग रही है। ये पर्वत  संपूर्ण प्रदेश को करधनी की तरह से चारों ओर से घेरा बना कर खड़े हुए प्रतीत होते  दिख रहे हैं अतः कवि ने पर्वतों की श्रृंखला की तुलना करधनी से की है।

प्रश्न 3-: ‘सहस्र दृग – सुमन ‘ से क्या तात्पर्य है ?कवि ने इस पद का प्रयोग किसके लिए किया होगा ?

उत्तर-: ‘सहस्र दृग – सुमन ‘ से कवि का तात्पर्य पहाड़ों पर खिले हजारों फूलों से है। कवि को ये फूल पहाड़ ही आंखों के समान लग रहे हैं अतः कवि ने इस पद का प्रयोग किया है।

प्रश्न 4-: कवि ने तालाब की समानता किसके साथ दिखाई है और क्यों ?

उत्तर-: कवि ने तालाब की समानता आईने के साथ दिखाई है क्योंकि तालाब पर्वत के लिए आईने का काम कर रहा है वह स्वच्छ और निर्मल दिखाई दे रहा है।

प्रश्न 5 -: पर्वत के ह्रदय से उठ कर ऊँचे ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर क्यों देख रहे थे और वे किस बात को प्रतिबिंबित करते हैं ?

उत्तर-: पर्वत पर खड़े ऊँचे –ऊँचे वृक्ष पर्वत की ऊँची अभिलाषाओं के प्रतीक हैं । पर्वत इन्हीं ऊँची आकांक्षाओं से आकाश को छूना चाहते हैं । किंतु बरसात के दिनों में आकाश बादलों से घिरा होता है ।अपने लक्ष्य को सामने न पाकर वृक्ष थोड़ा चिंतित भी दिख रहे हैं मालूम   होता है, मानो वे शांत आकाश को छूना चाहते हों।  उनका इस प्रकार चिंतित होते हुए अपलक आकाश को निहारना इस बात का संदेश देता है कि जब भी मनुष्य को जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने  पर कठिनाइय़ाँ या बाधाएँ आती दिखें, तब भी हमें अपने लक्ष्य से दृष्टि नहीं हटानी चाहिए। ये वृक्ष मनुष्यों को सदा ऊपर उठने और आगे बढ़ने की और संकेत कर रहे हैं।

प्रश्न 6 -: शाल के वृक्ष भयभीत हो कर धरती में क्यों धँस गए हैं ?

उत्तर-: वर्षा  ऋतु में पर्वतीय क्षेत्रों में बादल काफी नीचे तक आ जाते हैं । बादल नीचे आ जाने से सब तरफ़ धुंध छा जाती है ।घनी धुंध के कारण लग रहा है ,मानो पेड़ कहीं उड़ गए हों अर्थात गायब हो गए हों। ऐसा लग रहा है कि पूरा आकाश ही धरती पर आ गया हो।सब तरफ़ नीरवता (सुनसानी) है । केवल झरने की आवाज़ ही सुनाई दे रही है। वर्षा की बूँदों के तीव्र प्रहार से मानो शाल के वृक्ष भयभीत हैं । प्रकृति का ऐसा रूप देख कर शाल के पेड़ डर कर धरती के अंदर धंस गए प्रतीत होते हैं। यहाँ पर कवि ने पर्वतीय प्रदेश में पावस ऋतु में दिखने वाले अप्रतिम सौंदर्य का वर्णन किया है ।

प्रश्न 7-: झरने किसके गौरव का गान कर रहे हैं ? बहते हुए झरने की तुलना किस से की गई है ?

उत्तर-:पर्वतों की ऊँची चोटियों से झरते हुए झरने देख कर यह प्रतीत होता है मानो वे पर्वतों के गौरव का गान कर रहे हैं । वे पर्वतों की उच्चता और महानता की गौरव गाथा गा रहे हैं ।कवि ने  बहते हुए झरनों की तुलना चमकदार मोतियों की लड़ियों  से की है।

1-: है टूट पड़ा भू पर अम्बर !

भाव-: वर्षा ऋतु में पर्वतीय क्षेत्रों में बादल काफी नीचे तक आ जाते हैं । बादल नीचे आ जाने से सब तरफ़ धुंध छा जाती है ।घनी धुंध के कारण लग रहा है मानो पूरा आकाश ही धरती पर आ गया हो । इसी को कवि ने आकाश का धरती पर टूट पड़ना बताया है ।

2-:         

यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजा

भाव-: वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश में प्राकृतिक दृश्य पल-पल बदलते हैं । इन प्रतिक्षण बदलने वाले अलौकिक दृश्यों को देख ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो इन्द्र ने अपना इंद्रजाल (जादू) सर्वत्र फ़ैला रखा है। ताल के ऊपर तैरते हुए आते-जाते  बादलों को देखकर ऐसा लग रहा है मानो इंद्र भी अपना बादल रूपी विमान ले कर इधर -उधर जादू का खेल दिखाते हुए घूम रहे है।

3-:       

गिरि का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस-नस उत्‍तेजित कर
मोती की लडि़यों सी सुन्‍दर
झरते हैं झाग भरे निर्झर! 

भाव-: पहाड़ों के हृदय से उठ-उठ कर अनेकों पेड़ ऊँचे उठने की इच्छा लिए एक टक दृष्टि से स्थिर हो कर शांत आकाश को इस तरह देख रहे हैं मानो वो किसी चिंता में डूबे हुए हों। अर्थात वे हमें निरन्तर ऊँचा उठने की प्रेरणा दे रहे हैं। ये वृक्ष मनुष्यों की सदा ऊपर उठने और आगे बढ़ने की और संकेत कर रहे हैं।

1-: इस कविता में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किस प्रकार किया गया है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-: इस कविता में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग जगह जगह किया गया है जिसके कारण प्राकृति सजीव प्रतीत हो रही है। जैसे – पहाड़ अपनी हजार पुष्प रूपी आंखें फाड़ कर नीचे जल में अपने विशाल आकार को देख रहे हैं। और पहाड़ों के हृदय से उठ-उठ कर अनेकों पेड़ ऊँचा उठने की इच्छा लिए एक टक दृष्टि से स्थिर हो कर शांत आकाश को इस तरह देख रहे हैं मानो वो किसी चिंता में डूबे हुए हों।

2-: आपकी दृष्टि में इस कविता का सौन्दर्य इसमें से किस पर निर्भर करता है ?
(क ) अनेक शब्दों की आवृति पर
(ख ) शब्दों की चित्रमयी भाषा पर
(ग ) कविता की संगीतात्मकता पर

उत्तर- इस कविता क सौंदर्य निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है –

 (क) कविता में अनेक शब्दों की आवृत्ति होने के कारण पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार की छटा है , जो कविता में नाद सौंदर्य , गति व उमंग पैदा करती है ।

(ख) इस कविता में चित्रात्मक शैली का प्रयोग करते हुए प्रकृति का सुंदर और सजीव वर्णन किया गया है।यथा मोती की लड़ियों से सुंदर , झरते हैं झाग भरे झरने आदि । यह सब वर्णन आँखों के समक्ष पर्वत प्रदेश में पावस ऋतु का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है

(ग) कविता में लय , तुक, आदि के कारण संगीतात्मकता का पुट है ।

  उत्तर- मेरे विचार से उपरोक्त सभी बातों के  उचित समन्वय  पर ही इस कविता का सौंदर्य निर्भर करता है ।

3-: कवि ने चित्रात्मक शैली का प्रयोग करते हुए पावस ऋतु का सजीव चित्र अंकित किया है ऐसे स्थलों को छाँट कर लिखिए।

उत्तर- 1- अपने सहस्र दृग- सुमन फाड़,
               अवलोक रहा है बार बार ,
         2- गिरि का गौरव गाकर झर- झर

         3-  धँस गए धरा में सभय शाल !
         4-   गिरिवर के उर से उठ -उठ कर

          5. मोती की लड़ियों से सुंदर

               झरते हैं झाग भरे झरने |

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