हिंदी स्वर / स्वरों की मात्राएँ/Hindi Vowels

स्वर वे ध्वनियाँ हैं जो स्वाभाविक हैं । इन्हें उच्चारित करने के लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता। इन्हें उच्चारित करने में किसी अन्य वर्ण की सहायता नहीं ली जाती है। 

हिंदी वर्ण माला में कुल ग्यारह स्वर और एक अनुस्वार और एक विसर्ग होता है । इस प्रकार कुल मिला कर तेरह अक्षर स्वर के सिखाए जाते हैं जिनमें अंतिम दो शब्द अयोगवाह हैं । 

 यहाँ पर हिंदी वर्णमाला के सभी स्वर लिखे गए हैं। 

स्वर 

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ अं अः

हिंदी स्वरों की मात्राएँ  [Dependent Vowels Simbols]:

हिंदी में स्वरों को दो रूपों में लिखा जाता है। एक तो इनके मूल चिह्न के रूप में जैसे : अमरूद, आम, इमली ईख, उदास, ऊपर, ऋषि आदि । दूसरे जब किसी स्वर को किसी व्यंजन के साथ संयुक्त कर लिखा जाता है तो सिर्फ़ उसकी मात्रा का प्रयोग होता है । मात्रा के रूप में स्वरों  का प्रयोग  का उदाहरण : किसान, कोमल, कमल, कीड़ा, कुदाल ,कृपण आदि । स्वरों की मात्राएँ नीचे दी गईं हैं। 

अ     [   ]       [ा ]       इ   [  ि  ]       ई   [ ी ]       उ [  ु ]       ऊ [   ू  ]      ऋ [  ृ  ]

ए  [ े ]        ऐ  [  ै ]        ओ  [ ो  ]      औ  [  ौ ]       अं  [ ं  ]     अःँ [ :     ]

हस्व स्वर – अ, इ, उ, ऋ, 

दीर्घ स्वर – आ, ई, ऊ, 

संयुक्त स्वर – ए, ऐ, ओ, औ हैं।

1.हृस्व स्वर इ ( ि) की मात्रा व्यन्जन के पहले लगाई जाती है। जैसे -किताब , किसान, किसलय ।

2.  हृस्व स्वर ऋ (ृ), उ (ु) और दीर्घ स्वर ऊ (ू) की मात्राएँ नीचे लगाई जाती हैं।जैसे -कृति, कृपाण, कृपया। इसी तरह उऔर ऊ की मात्राएँ भी नीचे लगती हैं जैसे- कुतुबमीनार, कुबड़ा, कुदाल, कूड़ा, कूदना, कूटना, कूपन आदि।

3.दीर्घ स्वरों की मात्राएँ आ (ा), ई (ी ), और संयुक्त स्वरों की मात्राएँ ओ (ो ), और औ ( ौ) व्यन्जन के बाद जोड़ी जाती हैं। जैसे- का, की, को, कौ। संयुक्त स्वर ए (े) और ऐ (ै) की मात्राएँ व्यन्जन के ऊपर लगाई जाती हैं ।जैसे : काम , काला, कीमत, खीर, कोयला, कौन  आदि ।

4. अनुस्वार (ं) चिह्न – अनुस्वार का चिह्न (ं) इस तरह का होता है। यह शिरोरेखा पर बिंदु (ं) है। यह पञ्चमाक्षर के बदले प्रयुक्त किया जाता है।
जैसे – कङ्कण = कंकण, चञ्चल = चंचल, इसे  ‘नासिक्य ध्वनि’ भी कहते हैं।

5. अयोगवाह विसर्ग (ः) चिह्न – विसर्ग का चिह्न (ः) इस तरह का होता हैइसमे दो बिंदु  होते हैं। इसकी ध्वनि ह् के समान सुनाई पड़ती है। इसका अधिकाँश प्रयोग संस्कृत से आये शब्दों में होता है। 
जैसे –  पुनः = पुनह्, प्रातः = प्रातह् आदि।

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