आत्म दीप भव
अक्सर जब लोग आध्यात्म की राह में चलते हैं तो वे विभिन्न मार्गों की खोज करते हैं। कोई अनेकों धार्मिक पुस्तकें पढ़ने लगता है तो कोई अन्य किसी गुरु की शरण में चला जाता है। कलियुग के इस कठिन सम्सय में सही मार्ग दर्शन दुर्लभ ही है। यहाँ चमत्कार दिखाने वाले की महत्ता है पर ज्ञानी की नहीं । हाथ से भभूत निकालने वाला महान योगी की तरह प्रसिद्धि पाता है जब्कि योग मार्ग पर कठिन तप करने वाला सम्मान नहीं पाता। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि व्यक्ति भ्रमित हो जाए। स्वयं का उद्धार करने निकला योगी न तो अपना मार्ग दर्शन कर पाता है और न दूसरे का। आज सच्चे साधक त्रिशंकु की तरह भ्रमित और किंकर्तव्यविमूढ़ दिखते हैं। इस संदर्भ में भगवान श्री कृष्ण के मार्ग का अनुसरण उचित जान पड़ता है।
“श्रीकृष्ण अपने भक्तों और अर्जुन जैसे शिष्यों से कहते हैं – ‘तुम मुझे माधव, गोविंद, योगेश्वर कहते हो — मुझसे प्रेम करते हो, मुझे सर्वश्रेष्ठ मानते हो, और अपने जीवन का हर कर्म मेरे चरणों में समर्पित करना चाहते हो। यह उचित है। परन्तु, जो भी कर्म बुद्धिपूर्वक किया जाता है — चाहे वह किसी के लिए भी हो — उसका फल सदा उस करने वाले को ही प्राप्त होता है। जब तुम सच्चे भाव से किसी के कल्याण के लिए कार्य करते हो, तो वह कल्याण तुम्हारी आत्मा को ही प्रकाशित करता है।

जैसे कोई दर्पण में अपनी छवि देखता है, और उसमें सौंदर्य अनुभव करता है — वह सौंदर्य किसी और का नहीं, स्वयं का ही होता है। उसी प्रकार जब कोई अपने भीतर श्रीहरि का दर्शन करता है, तो वह अनुभूति आत्मा की दिव्यता की झलक होती है। दूसरों को श्रेष्ठता दिखाना केवल वही कर सकता है, जिसने भीतर श्रीकृष्ण के गुणों को आत्मसात कर लिया हो।
धर्म के पथ पर बढ़ाया गया हर कदम, आत्मा की यात्रा को श्रीकृष्ण के निकट ले जाने वाला होता है। कोई भी सेवा, कोई भी त्याग, जो दूसरों के लिए किया जाता है — वह वास्तव में परमात्मा की सेवा का ही एक रूप होता है। अन्य प्राणियों के प्रति न्याय करना अपने आत्मस्वरूप के प्रति न्याय करना है। मनुष्य अपने अंतरात्मा को धोखा नहीं दे सकता — क्योंकि वही तो परमात्मा का ही अंश है।
दूसरों के प्रति समझौता करना, जब वह अधर्म का पोषण करता हो, तब वह आत्मा के साथ द्रोह होता है। श्रीकृष्ण ने स्वयं युद्ध भूमि में अर्जुन को यही सिखाया कि क्षमा और त्याग वहीं तक ठीक हैं, जहाँ धर्म की रक्षा बनी रहे। अन्यथा वह कायरता है, करुणा नहीं।
दूसरों को प्रसन्न करना वास्तव में अपने ही हृदय की प्रसन्नता का विस्तार है। जब कोई जीव कर्तव्य करता है — तो वह अपने भीतर की शक्ति को जाग्रत करता है। उसी प्रकार जब हम सेवा करते हैं, तो वह किसी और पर उपकार नहीं, बल्कि अपने आत्मबल की वृद्धि होती है।
हर कर्म, चाहे वह लघु हो या महत, अपने परिणाम को साथ लेकर आता है। श्रीकृष्ण ने कहा — ’कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ — अर्थात तू केवल कर्म कर, फल की चिंता मत कर, क्योंकि कर्म स्वयं ही फल बनकर लौटता है।”
जिस हृदय में करुणा है — जो पिछड़े हुए को आगे बढ़ाने को उत्सुक है, जो अज्ञानी को ज्ञान देने को तत्पर है, जो अशांत को शांति देने के लिए प्रयत्नशील है — वह सच्चा भक्त है। ऐसा सेवक वास्तव में श्रीकृष्ण की पूजा कर रहा होता है। जब तुम किसी पीड़ित की सेवा करते हो, तो समझो कि तुम श्रीकृष्ण के ही किसी रूप की सेवा कर रहे हो।
जीव की सार्थकता तब है जब वह परमात्मा में विलीन होने की लालसा रखता है। जब वह श्रीकृष्ण को जीवन के प्रत्येक अणु में अनुभव करना चाहता है — जब वह केवल उसका होकर जीना चाहता है — तब वही भक्ति की पराकाष्ठा होती है। सच्ची भक्ति में ‘लेने’ की कोई भावना नहीं होती — वहाँ केवल ‘देने’ का भाव होता है। आत्म समर्पण लेना नहीं, सम्पूर्ण अर्पण है।
ईश्वर पर विश्वास तब सार्थक होता है जब वह आचरण में झलकता है। श्रीकृष्ण के मार्ग पर चलने वाला वही सच्चा भक्त है जो उनके उपदेशों को अपने जीवन में उतारता है। श्रद्धा और आचरण का मेल ही सच्ची भक्ति है।
जब हम अपने हृदय को पवित्र कर प्रेम से भर देते हैं, जब हमारे कर्मों में आत्मभाव प्रकट होता है, तभी हम श्रीकृष्ण के निकट पहुँचते हैं। प्रभु का प्रेम उन्हीं को प्राप्त होता है, जो स्वयं दीपक की भाँति जलकर दूसरों को प्रकाश देने को तैयार होते हैं। ऐसे ही भक्त पर ही श्रीकृष्ण की कृपा अवतरित होती है।
इसीलिए यदि हमें ईश्वर की कृपा चाहिए तो खुद दीपक बनकर जलना होगा। स्वयं के और दूसरे के पथ को प्रकाशित करने के लिए दूसरे के भरोसे बैठे नहीं रहना है अपितु , आत्म दीप बन कर जलने की भावना अत्यावश्यक है, तभी मुक्ति का मार्ग संभव है।




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