कुष्माण्डा देवी नवदुर्गा के नौ रूपों में से एक हैं और उनका पूजन नवरात्रि के चौथे दिन किया जाता है।ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदि-शक्ति हैं। कुष्माण्डा देवी का नाम संस्कृत में “कुष्म” और “अण्ड” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है : अपने स्मित हास्य से जगत रूपी अंड का निर्माण करने वाली। देवी भागवत के अनुसार जब सृष्टि के सृजन से पहले जब न आकाश, हवा, पानी ,अग्नि और धरा के निर्माण से पहले भी जब कुछ न था तब देवी भगवती देवी ने अपने मंद हास्य से ही इस संपूर्ण ब्रहाण्ड की रचना की थी। तभी से उन्हें कुष्माण्डा अथवा कुष्माण्डी देवी के रूप में जाना जाने लगा।

कुष्माण्डा देवी का रूप बहुत ही अद्वितीय होता है। वे एक मृदु मुस्कान वाली देवी हैं जिनका स्वरूप शांत है। इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में प्रकट तेज इन्हीं की छाया है।वे सिंह वाहिनी ,अष्टभुजा वाली देवी हैं जिन्होंने अपने हाथों में भक्तों की रक्षा के लिए शंख, चक्र, खड्ग,वज्र,धनुष-वाण धारण किया है।उनके एक हाथ में कमल का फूल और एक हाथ में कमंडलु हैं, और उनका दूसरा हाथ वरदान देने के लिए ऊपर उठा होता है। कुष्माण्डा देवी का ध्यान और पूजन करने से भक्तों को सफलता, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
कुष्माण्डा देवी का स्थान अनाहत चक्र अथवा हृदय चक्र में होता है। इसीलिए इनका ध्यान हृदय में करना चाहिए। कुष्माण्डा देवी की उपासना करने से मन की चंचलता दूर होती है एकाग्रता और शांति प्राप्ति होती है।
कुष्माण्ड का एक अन्य अर्थ कुम्हड़ा या सफ़ेद कद्दू( पेठा) भी होता है। बलि के रूप में देवी को इसी कुष्माण्ड की बलि चढ़ाने से वे शीघ्र प्रसन्न होती हैं। यहीं एक औषधीय या आयुर्वेदि्क तथ्य भी छिपा हुआ है। कुम्हड़ा संसार के सबसे क्षारीय वस्तुओं में एक है। प्रतिदिन इस कुम्हड़े के ताज़े रस के सेवन से शरीर में अम्ल और पित्त की विकृति दूर हो जाती है। शरीर स्वस्थ और मन शांत होता है।
कुष्माण्डा देवी अत्यंत सरल और दयालु होने से अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न हो कर भक्तों का कल्याण करती हैं। इनकी भक्ति करने पर शीघ्र ही इनके कृपा का अनुभव साधक को होने लगता है। इसीलिए कल्याण के इच्छुक साधको को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनोयोग पूर्वक देवी की सेवा , उपासना और अर्चन करना चाहिए।
देवी कुष्माण्डा को प्रणाम करने का मंत्र :
या देवी सर्वभूतेषु कुष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
दुर्गा देवी के कुष्माण्डा स्वरूप के दर्शन , पूजन से हमारे भीतर सात्विक गुणॊं की वृद्धि होती है मन स्थिर होता है और जप, तप के प्रति स्थिरता उत्पन्न होती है और मानसिक एकाग्रता और शांति प्राप्ति होती है।
देवी कुष्माण्डा की स्तुति का मंत्र:
वन्दे वांछित कामार्थे चंद्रार्द्धकृत शेखराम् ।
सिंह रूढ़ा अष्टभुजा कुष्माण्डा यशस्वीनीम् ॥




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