संकेत बिंदु :

*अभिप्राय

*सुख-शांति का मूलमंत्र 

*असंतोष से हानियाँ ।

अनुच्छेद 1

(100 से 150 शब्दों तक )

मानव एक संवेदनशील प्राणी है। वह सदैव अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने में लगा रहता है, लेकिन इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। इच्छाओं का क्रम निरंतर चलता ही रहता है। संतोष मनुष्य की वह दशा है, जिसमें वह अपनी वर्तमान स्थिति में प्रसन्न है, तृप्त है। अधिक की कामना उसे नहीं है। संतोष जीवन में सुख-शांति प्रदान करता है। इससे मन में ईर्ष्या, कुंठा, द्वेष, घृणा जैसे विकार नहीं उत्पन्न होते। इसके विपरीत असंतोष दुख, वैमनस्य, द्वेष आदि का जनक बनता है। वह इंसान की भावनाओं को संतुष्ट नहीं होने देता। जो कुछ मिल जाता है, उससे खुश न रहकर वह व्यक्ति को और अधिक पाने के लिए बेचैन करता है। इसीलिए हमारे धर्म और दर्शन में संतोष को सबसे बहुमूल्य धन माना गया है, जिसे पाकर व्यक्ति को और कोई कामना नहीं रहती।

अनुच्छेद 2

(200 से 250 शब्दों तक )

इच्छा का मतलब किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिणाम की चाहत। कामना,लालसा, चाहत , मनोकामना, अभिलाषा आदि इसके पर्यायवाची हैं। इच्छाएँ अनंत होती हैं। ये एक बढ़ती हुई नदी की भाँति निरंतर बहती चली आती हैं। इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। इच्छाओं का क्रम निरंतर चलता ही रहता है।मनुष्य इन इच्छाओं को पूरा करने में ही जुटा रहे तो वह कभी भी संतुष्ट और सुखी नहीं रह सकेगा।  यदि सच में सुखी रहना है तो इन अनंत इच्छाओं , वासनाओं पर नियंत्रण कर संतोषी बनना आवश्यक है। संतोषी व्यक्ति न तो बहुत अधिक की इच्छा रखता है और न किसी से मान-सम्मान -आदर की अपेक्षा। वह जैसी भी परिस्थितियाँ हों अपने आप में ही संतुष्ट रहता है। संतोषी व्यक्ति कम में ही सुखी रहता है। अपने संतोष के कारण वह राजाओं से भी अधिक सुखी जीवन जीता है। भले ही उसके पास खाने को सूखी रोटी ही क्यों न हो, किंतु जीवन में शांति और आनंद होता है।जबकि असंतोषी व्यक्ति वासनाओं के वशीभूत हमेशा दुखी और असंतुष्ट रहता है। कई बार तो वह असंतोष के चलते वह मानसिक तनाव , भ्रष्टाचार, लड़ाई-झगड़े और गलत राह में भी पड़ जाता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया –

गोधन, गजधन, बाजिधन, सब सुख धूरि समान ।

जब आए संतोष धन सब धन धूरि समान।।

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