भाषा, लिपि और व्याकरण

भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। मनुष्य जो कुछ भी सोचता विचारता है उसे बोलकर अपने भावों को व्यक्त करता है । यदि सुनने वाला अथवा वह व्यक्ति जिससे वह अपनी भावनाएं सांझा करना चाहता है वह दूर है तो वह उस बात को आवश्यकता लिखकर भी मन की बात को स्पष्ट करता है। इन दोनों का मूल आधार ‘भाषा’ ही है। भाषा शब्द भाष धातु से बना है। इसका अर्थ है-बोलना।
स्पष्ट है कि
“भाषा मन के भावों या विचारों को आदान – प्रदान करने का साधन है।“
भाषा के रूप:
भाषा के दो रूप हैं- लिखित और मौखिक रूप
मौखिक भाषा –
जब व्यक्ति अपने मन के भावों को बोलकर व्यक्त करता है, तो वह भाषा का मौखिक रूप कहलाता है।
लिखित भाषा –
जब व्यक्ति अपने मन के भावों को लिखकर व्यक्त करता है, तो वह भाषा का लिखित रूप कहलाता है।
जब लिख कर अपनी भावनाओं को व्यक्त किया जाता है, तो कुछ चिह्नों की आवश्यकता पड़ती है; जिनके द्वारा भाषा को स्वरूप प्रदान किया जा सके। ऐसे चिह्न ही लिपि कहलाते हैं।
दूसरे शब्दों में,
“भाषा का प्रयोग करते समय हम जिन ध्वनियों का उपयोग करते हैं। उन्हीं मौखिक ध्वनियों को जिन चिह्नों द्वारा लिखकर व्यक्त किया जाता है, वे ही लिपि कहलाते हैं।”
संक्षेप में, किसी भी भाषा के लिखने की विधि को लिपि कहा जाता है।प्रत्येक भाषा के भिन्न भिन्न लिपि-चिह्न होते हैं तथा उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है।
किसी भी भाषा को सीखने और उसके शुद्ध व्यवहार के लिए हमें भाषा के नियमों को समझने-सीखने की आवश्यकता होती है। हर भाषा के अपने अलग-अलग नियम होते हैं। इन नियमों की जानकारी हमें व्याकरण से मिलती है। व्याकरण के द्वारा हमें शब्द, पदों , पदबंधों, वाक्यों की संरचना और गठन के बारे में जानकारी मिलती है। व्याकरण से हमें पता चलता है कि कौन सा वाक्य या उच्चारण सही या गलत है। दूसरे अर्थ में, व्याकरण के नियमों की जानकारी हमें अशुद्धियों के प्रति जागरूक करती है साथ ही उन अशुद्धियों को दूर करने के अवार प्रदान करती है।




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