वाल्मिकी और तुलसीदास जी का स्मरण//Valmiki aur Tulasidas ji ka Smaran
मित्रो! अकसर राम भक्त जब प्रार्थना करते हैं तो वे हनुमान जी को अवश्य याद करते हैं। लेकिन राम की कथा दुनिया के सामने प्रगट तक पहुँचाने वाले महानुभावों में महर्षि वाल्मीकि का प्रथम स्थान है तो वहीं इसे जन-जन तक पहुँचाने का महान कार्य गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया है।

यह एक अकथित नियम ही है कि किसी भी महान ग्रन्थ के अध्ययन , पठन -पाठन से पूर्व उसके रचनाकार का स्मरण -चिंतन कर लिया जाए , ताकि वह सद् ग्रंथ उनके आशीर्वाद के फलस्वरूप ठीक से समझ आ जाए। ऐसे में जब कभी भी रामायण या राम चरित मानस के पाठन का अवसर आए तो इन महान विभूतियों का स्मरण करने की इक्षा भक्तों के हृदय में रहती है , जिन्होंने ने राम भक्ति की अजस्र धारा बहा कर अनन्त लोगों का कल्याण किया है।
वाल्मीकि और तुलसी दास जी को अलग-अलग स्मरण के श्लोक या दोहे तो प्राप्य हैं ही किंतु यहाँ प्रयास किया है कि एक ही श्लोक में इन दोनों महाकवियों को स्मरण -वंदन किया जा सके ताकि समय अभाव से जो लोग उनको प्रणाम नहीं कर पाते हैं वे भी उन्हें याद कर सकें ।
साधको ! मैं तो मात्र एक माध्यम हूँ जिसके द्वारा यह श्लोक प्रकट हुआ और न तो मुझ मूढ़ को इसकी छंद रचना का ही कोई विशेष ज्ञान हैं। एक आश्चर्य जनक घटना हुई थी । एक प्रातः सुबह चार बजे जब मैं उठी ,तो अनायास ही यह पंंक्तियाँ मस्तिष्क में घुमड़ने लगी। यह विचार इतना स्पष्ट था कि मैंने उसे जस का तस लिख लिया । इसके पश्चाद एक संस्कृत के जानकार संन्यासी बाबा जी को भेज दिया। उन्होंने आश्वासन दिया कि समय पर वह इसे संशोधिक करने की कोशिश करेंगे। किंतु समयाभाव से वे कुछ प्रतिक्रिया न दे सके।
अत: यह कहीं खो न जाए , अथवा विस्मृत न हो इस लिए यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ।
श्लोक:
भक्तिरूपेण वृक्षाणि रामरसाल रसानुभावमाने द्वौ कोकिला:।
एका गायति नामामृत अन्या पुनरावर्तते च ।
धन्यौ तौ पिकौ अद्भुदौ वाल्मीकिश्चतुलसी ।
प्रणमामि शिरसा तेन् भक्तिप्रदायिने निवसत: सदा राघवकुञ्जम् ॥
श्लोक रचना: कुसुम लता जोशी
भावार्थ: भक्तिरूपी वृक्ष पर दो कोयलें ने राम रसाल का रसास्वादन करती हैं।एक नाम का अमृत गाता है और दूसरा उसे दोहराता है।धन्य हैं ये दो अद्भुत कोयलें, वाल्मिकी और तुलसी। मैं भक्ति के दाता इन दोनों को, जो सदा राम कुञ्ज मे निवास करते हैं सिर झुका कर प्रणाम करता हूँ/ करती हूँ ॥
Meaning: On the tree of devotion, two cuckoos taste the nectar of Ram. One sings the nectar of Thy name and the other repeats it. Blessed are these two wonderful cuckoos, Valmiki and Tulsidas. I bow my head and pay my respects to these two, the givers of devotion, who always reside in Ram Kunj.
आपको यह श्लोक कैसा लगा? अपनी प्रतिक्रिया भेजें। अगर कुछ संशोधन की आवश्यकता है तो संज्ञान में लाएँ। संभव हो तो इसे दैनिक प्रार्थना में शामिल कर दोनों राम कथा के महाकवियों को अपना प्रणाम प्रस्तुत करें।
एडिट:३/७/२४
श्रीराम!
राम भक्ति के दो महत्त्वपूर्ण स्तंभ है आदि कवि वाल्मीकि जिन्होंने श्री रामायण जी की रचना की और दूसरे गोस्वामी तुलसीदास जी जिन्होंने कलिकाल में राम भक्ति रस की अजस्र धारा बहाई।
यद्यपि इनकी वंदना करने के लिए अलग अलग कई श्लोक है तथापि एक साथ कोई एक श्लोक दुर्लभ है । इसी तरह का एक विचार एक प्रातः मन में आया और उसको छंद बद्ध करने के लिए मैंने स्वामि राघवेन्द्रदास जी से अनुरोध किया था ।
आज अवसर पाकर उन्होंने इसे छंद बद्ध किया है और यह एक अदभुद सुंदर और गेय श्लोक सामने आया है । राम भक्त श्री रामायण अथवा श्री रामचरित मानस के पाठ से पूर्व इस श्लोक को पढ़कर दोनों महाकवियों को एक साथ ही नमन कर सकते हैं ।
प्रस्तुत है
श्रीराम!
भक्तिबृक्षसमासीनौ,
द्वौ पिकौ परमाद्भुतौ।
कुरुतो रसस्यास्वादं,
नित्यं रामरसालतः।।
एको नामामृतं गाय
त्यपरोऽनुकरोति ह।
धन्यौ तावद्भुतौ लोके
वाल्मीकितुलसी पिकौ।।
भक्तिप्रदाविमौ नित्यं
रामकुञ्जनिवासिनौ।
प्रणमामिमुहर्द्वौ तौ
शिरोऽवनमय्य सर्वदा।।
अथवा
भक्तिबृक्षसमासीनौ,
द्वौ पिकौ परमाद्भुतौ।
कुरुतस्तौ रसास्वादं,
नित्यं रामरसालतः।।
एको नामामृतं गाय
त्यपरोऽनुकरोति ह।
धन्यौ तावद्भुतौ लोके
वाल्मीकिस्तुलसी पिकौ।।
भक्तिप्रदाविमौ नित्यं
रामकुञ्जनिवासिनौ।
प्रणमामिमुहर्द्वौ तौ
नतेन शिरसा सदा।।
श्रीराम




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