नवरात्रि के पाँचवें दिन देवी के स्कंदमाता स्वरूप की आराधना की जाती है। स्कंदमाता एक पौराणिक देवी है जो मां पार्वती का पुत्रवती, संतानवती स्वरूप है। भारतीय संस्कृति में संतान प्राप्ति वैवाहिक जीवन की पूर्णता मानी जाती है, और संतानवती होना बहुत ही बड़ा सौभाग्य का प्रतीक समझा जाता है।इसीलिए जिन लोगों को संतान प्राप्ति की इच्छा हो अथवा अपनी संतान की दीर्घायु की कामना हो , उन्हें देवी स्कंदमाता की आराधना अवश्य करनी चाहिए।

स्कंदमाता युद्ध के देवता और शिव के पुत्र स्कंद को गोद में बैठाए हुए हैं। यही स्कन्द कार्तिकेय या मुरुगन भी कहलाते हैं। देवी की गोद में बैठे होने के कारण स्कंदकुमार देवी की पूजा के साथ ही स्कंदकुमार की भी स्वाभाविक ही पूजा हो जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यही स्कंदकुमार शिव और पार्वती के विवाह होने का भी एक कारण हैं।

कथा के अनुसार जब देवी सती अपने पिता के यज्ञ की अग्नि में जल गईं । शिव उनके वियोग में अत्यंत शोकातुर हो गए। इसके बाद थोड़ा स्थिर होने पर शिव गहरी तपस्या में लीन हो गए। इसी समय तारकासुर नामक राक्षस ने घोर तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया और उनसे अमर होने का वरदान माँगा। ब्रह्माजी ने अमर होने का वरदान देने में असमर्थता बताई और कहा कि मृत्यु शाश्वत सत्य है। अतः जिस भी प्राणी ्ने जन्म लिया है उसे मृत्यु अवश्य ही आएगी। यहाँ तक कि स्वयं ब्रह्मा भी इस नियम से परे नहीं हैं। तब असुर तारक ने सोचा कि भगवान शिव तो वैराग्यवश घोर तप कर रहे हैं और उनकी पत्नी ने भी आत्मदाह कर लिया है। ऐसे में उनका पुत्र होना असंभव है। इसलिए तारकासुर ने ब्रह्माजी से कहा कि यदि अमरता का वरदान नहीं दे सकते तो ऐसा वरदान दें कि मेरी मृत्यु भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो। यह सुनकर ब्रह्मा जी ने ”एवमस्तु’ कहकर उसे वरदान दिया।

वरदान पाकर तारकासुर निरंकुश होकर दीर्घ काल तक समस्तप्राणियों और देवताओं को सताने लगा। इस से देवता त्राहि,त्राहि करते हुए इधर-उधर भागने लगे। जनता की करुण पुकार सुनकर माता पार्वती ने पर्वतराज हिमालय के घर देवी मैना की कुक्षि से जन्म लिया। उन्होंने दीर्घ काल तक तप किया और भगवान शिव को पति के रूप में वरण किया। इसी के बाद उन्होंने स्कन्दकुमार या कुमारकार्तिकेय को पुत्र रूप में प्राप्त किया । स्कन्दकुमार ने देवताओं के सेनापति के रूप में तारकासुर का वध कर ब्रह्मा जी की वाणी को सत्य किया । देवताओं के दुख को दूर किया।

इन्हीं वीर स्कंदकुमार की माँ होने से देवी स्कंदमाता कहलाती हैं। देवी के आशीर्वाद से वीर और तेजस्वी संतान प्राप्ति होती है। चतुर्भुजा देवी स्कंदमाता सिंह में सवार हैं और अपने दोनों हाथों में कमल पुष्प धारण किए हैं जो सुख-समृद्धि का प्रतीक हैं। एक हाथ वरद मुद्रा में है और एक अन्य चौथे हाथ से पुत्र सकंदकुमार को पकड़े हुए हैं। देवी पीले या नारंगी वस्त्र धारण करती हैं। देवी का यह सौम्य -शांत स्वरूप अत्यंत मनमोहक है। देवी स्कंदमाता शीघ्र प्रसन्न होने वाली ममतामयी माता हैं।

ऊँ स्कन्द मात्रै नम:।

या देवी सर्व भूतेषु स्कन्द माता रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै,नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनम:॥

वन्दे वांछित कामार्थेचन्द्रार्द्धकृत शेखराम्।

सिंहारूढ़ा चतुर्भुजा स्कंदमाता यशस्विनी॥

Leave a Reply

Trending

Discover more from HindiFlorets.com

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading