#हिंदी_भाषा_उन्मूलन कन्नड़ भाषा शिक्षण अधिनियम, 2015 के तहत, बेंगलुरु के कई केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और भारतीय माध्यमिक शिक्षा प्रमाणपत्र (ICSE) स्कूलों ने इस शैक्षणिक वर्ष से कन्नड़ को छात्रों के लिए दूसरी भाषा बना दिया है।राज्य सरकार ने कन्नड़ भाषा शिक्षण अधिनियम, 2015 को लागू किया है, जिसके तहत कर्नाटक के स्कूलों में कन्नड़ को अनिवार्य रूप से पहली या दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाना जरूरी है। यदि कोई स्कूल इस नियम का पालन नहीं करता है, तो उसे दंडित किया जाएगा। स्कूलों को 2017-2018 के शैक्षणिक वर्ष से इन बदलावों को लागू करने के लिए कहा गया था, लेकिन कई प्रबंधन अब जाकर इस मुद्दे पर ध्यान दे रहे हैं। वर्तमान सरकार द्वारा जारी नियमों से अब कन्नड़ या तो प्रथम भाषा या फिर द्वितीय भाषा के रूप में पढ़ाई जाएगी। इस प्रकार हिंदी या संस्कृत या अन्य वैकल्पिक भाषा का स्थान सिर्फ तृतीय भाषा के रूप में ही रह जाएगा। ध्यान दें, सीबीएसई बोर्ड में कक्षा दसवीं में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाएं वैकल्पिक रूप से चुनी जा सकती हैं। लेकिन कन्नड़ को प्रथम भाषा या फिर द्वितीय भाषा के रूप में अनिवार्य करने के बाद उन छात्रों के पास जो ऐच्छिक रूप से हिंदी चुनते हैं अथवा जो दूसरी भाषा ( मातृ भाषा कन्नड़ नहीं) के हैं विकल्प रहित हो जाएंगे।इस निर्णय से आगामी वर्षों में क्या समस्याएं आ सकती हैं ? 1. कर्नाटक में अनेक छात्र हिंदी सीखने के लिए जागरूक हैं उनका हिंदी सीखने का अवसर समाप्त हो जाएगा।2. कर्नाटक के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों द्वारा हिंदी भाषा सीखने सिखाने और देश को एकता की ओर ले जाने के लिए विभिन्न प्रयासों में हिंदी सीखना भी एक मुख्य मुद्दा था । इस निर्णय के बाद उनके वर्षों के प्रयास में पानी फिर जाएगा। 3. CBSE board द्वारा वैकल्पिक भाषा चुनने का छात्रों का अधिकार समाप्त हो जाएगा।4. इस नियम के लागू होने के कारण राज्य में हिंदी शिक्षकों के रोजगार की समस्या बढ़ जाएगी।5. सबसे मुख्य समस्या उन छात्रों को होगी जो किसी कारण से जैसे माता या पिता के तबादले के कारण सातवीं या आठवीं कक्षा के दौरान राज्य बदलते हैं , उन्हें अचानक से कन्नड़ सीखने को मजबूर होना पड़ेगा । जो कि इस नाजुक समय में जब अन्य छात्र गणित और विज्ञान जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, कन्नड़ सीखने का अतिरिक्त भार पड़ेगा। 6. दूसरे राज्य से आने वाले छात्रों को ही समस्या नहीं होगी अपितु कर्नाटक राज्य से बाहर जाकर पढ़ने वाले बच्चों को भी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा क्योंकि उन्होंने तृतीय भाषा के रूप में हिंदी का मामूली स्तर का ही ज्ञान होगा और ऐसे में दूसरे राज्य जाने पर उन्हें अचानक से हिंदी/अन्य राज्यीय भाषा एक पूर्ण विषय के रूप में पढ़ने का संघर्ष करना होगा जो कि जिससे छात्र के अन्य शैक्षिक विषयों पर ध्यान कम हो जाएगा। और शिक्षा प्रभावित होगी। 7. कर्नाटक में वर्तमान में कट्टरपंथी ताकतें हिंदी कन्नड़ भाषा विवाद पैदा करने में आमादा हैं जिससे आए दिन उत्तर भारतीयों को परेशानी उठानी पड़ रही है। इस प्रकार के निर्णय से कट्टरपंथियों को बल मिलेगा और आने वाले समय में भाषा विवाद और भी बुरी स्थिति में आ जाएगा। और अंतरराज्यीय संबंधों में बुरा असर पड़ेगा।8. कर्नाटक से प्रेरित हो कर तेलंगाना सरकार ने भी इसी तरह तेलुगू को प्रथम या द्वितीय भाषा के रूप में अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। तमिलनाडु पहले से ही हिंदी विरोधी है। इस प्रकार आगामी वर्षों में हम भाषा विवाद के कारण भारत को उसी तरह टूटते हुए देखेंगे जैसे पहले धर्म विवाद से भारत और पाक और बाद मे भाषा विवाद से पाकिस्तान और बंगलादेश विभाजित हुए। यदि भाषा नीति पर केंद्र सरकार लगाम नहीं लगाती है और इसी तरह हिंदी विरोधी ताकतें मज़बूत हों कर देश टूटने के बुरे दूरगामी परिणाम संभव है।9. कन्नड़ को अनिवार्य रूप से प्रथम या द्वितीय भाषा बनाने की नीति का प्रभाव सिर्फ CBSE BOARD में ही विशेष रूप से पड़ेगा । कर्नाटक राज्य बोर्ड में पहले से ही बारहवीं कक्षा तक हिंदी भाषा पढ़ाई जाती है। जबकि CBSE BOARD में आठवीं के बाद तृतीय भाषा बंद हो जाती है ।10. पोस्ट का उद्देश्य कन्नड़ भाषा का विरोध नहीं है किंतु आगामी वर्षों में छात्रों को मिलने वाली वैकल्पिक भाषा चुनने के अधिकार की समाप्ति की ओर ध्यान दिलाना है।

10. कन्नड़ एक प्राचीन और प्रचलित भाषा है जो वैश्विक धरोहर भी है इसका प्रचार भारत के अन्य राज्यों में भी हो ऐसे प्रयास अवश्य किए जाएं, लेकिन छात्र के भाषा चुनने के अधिकार के हनन पर नहीं।

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3 responses to “क्या आपका बच्चा सातवीं या आठवीं में है और आप देश के किसी अन्य हिस्से से कर्नाटक राज्य में तबादला ले रहे हैं तो जरा सोचिए”

  1. I don’t know how Kanada language helps students in future

    1. All languages are valuable and form an important part of our cultural heritage.However, language learning should not be forced, as compulsion can create stress and resistance in children.In the early years, three to four languages may be introduced in a natural and exploratory way. As children grow, they should be given the freedom to choose the languages they wish to continue learning. This approach respects both cultural preservation and individual interest.
      Thank you for your valuable comment

      1. Of course. Every languages have some value .

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