क्या आपने कभी किवांच , कवांछ या कौंच फली का नाम सुना है? गाँवों में रहने वाले बच्चे अकसर इस किवांच फली से एक दूसरे को परेशान कर शरारत करते ही रहते हैं लेकिन इस कम जानी जाने वाली औषधि की भंडार फली को वह प्रसिद्धि या स्थान कभी नही मिला, जिसकी वह हकदार है। इसका मुख्य कारण इसके छिलके के काँटेदार या चुभनशील होना है। आइए आज जानकारी लेते हैं कि किवांच के बारे में जानकारी लेते हैं और इसके गुणों -अवगुणों की चर्चा करते हैं।

कौंच, कवाछ या किवांच एक प्रकार की फली या बीन्स ( beans) होती हैं इसकी सब्जी काफी स्वादिष्ट होती है । इसकी सूखी और तरीदार दोनों प्रकार से सब्ज़ी बनाई जाती है। यह प्रोटीन का उत्तम स्रोत है।यह मूल रूप से एशियाई पादप है जो भारत , पाकिस्तान , नेपाल, बांग्लादेश , श्रीलंका में आसानी से मिल/उगाया जाता है ।इस पादप की फली, पत्ते ,बीज , और कभी-कभी जड़ भी दवा के रूप में उपयोग में लाई जाती है। मुख्य रूप से इसकी फलियों की सब्ज़ी बना कर उपयोग में लाया जाता है।

मुख्य रूप से यह उष्णकटिबंधीय मौसमी सब्ज़ी है , जो आम तौर पर गर्मियों के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में अथवा जंगलों में अपने आप उग आती हैं । यह एक बेलदार वनस्पति है जिसकी लताएँ आस-पास के पेड़ों पर काफ़ी ऊँचाई तक चढ़ जाती है। इस लता में बहुत से गुच्छों में फलियाँ लगती हैं।फलियों के ऊपरी परत पर महीन चुभनशील काँटे या रेशे जैसे होते हैं जो त्वचा के संपर्क में आने पर खुजली सी उत्पन्न करते हैं।

जब बेलों में किवांच की फलियाँ तोड़ने लायक हो जाती हैं तो इसे तोड़ा जाता है इसकी सब्जी बनाने की विधि भी काफी अनूठी होती है तोड़ने के बाद इसे गर्म पानी में उबाला जाता है जिसके कारण इसके ऊपरी परत के खतरनाक रेसे समाप्त हो जाते हैं उबालने के बाद इसे दो फाँकों में बांट लिया जाता है फिर लहसुन -प्याज़ और मसालों के साथ इसे तैयार किया जाता है ।इसकी सब्जी को गर्म तासीर का माना जाता है यानी यह शरीर में गर्मी को बढ़ा देती है।स्वाद के दृष्टिकोण से इसकी सब्ज़ी काफी स्वादिष्ट होती है ।

किवांच की फलियाँ आमतौर पर अप्रैल से जून के महीने में खूब मिलती है कई इलाकों में कई नाम से क्वाछ जाना जाता है। इसकी भी कई प्रजातियां होती हैं इनमें से कुछ जंगली प्रजातियां काफी खतरनाक होती है और उन्हें खाया नहीं जाता। इसके पौधे की खासियत यह है कि यह बहुत तेज़ी से बढ़ता है और मात्र 3 महीने में फल देना शुरू कर देता हैं।

वैज्ञानिक नाम :

इसका वैज्ञानिक नाम म्युकुनिया प्रुरियेन्स (Mucuna pruriens) और यह फ़बेसी(Fabaceae) नाम की बॉटेनिक परिवार (Botanical Family)का हिस्सा है।

उपयोग:

इसके बीजों और फलियों का उपयोग खाने के लिये किया जाता है।वेलवेट बीन जो कि एक उष्णकटिबंधीय पादप है जिसका उपयोग पारंपरिक रूप से भारत में कई बिमारियों को दूर करने के लिये किया जाता है ।प्राचीन भारतीय चिकित्सा में, पौधे का उपयोग रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए ,पुरुष बांझपन दूर करने हेतु , तंत्रिका संबंधी विकारों के प्रबंधन के लिये और कामोत्तेजक के रूप में किया जाता है। इसके बीजों में औषधीय गुण होते हैं और कई सदियों से भारत की प्रमुख पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों यथा आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी-तिब्बत चिकित्सा में इसे प्रयोग में लाया जाता रहा है।

इसके बीज एल-डीओपीए नामक यौगिक पदार्थ से भरपूर होते हैं, जो मुख्य रूप से बीजों में ही नही, बल्कि फली, पत्तियों और जड़ों में भी पाया जाता है। इसकी पत्तियों का अर्क और बीज पार्किंसंस रोग, पुरुषों में बांझपन के इलाज के लिए और तंत्रिका संबंधी विकारों के इलाज के लिए किया जाता रहा है। इसके बीजों में उनके एंटीऑक्सीडेंट (मुक्त कण सफाई) काफ़ी होते हैं , जो स्वास्थ्य के लिये लाभदायक है। पौधे के हिस्से कामोत्तेजक के रूप में भी काम कर सकते हैं। इसकी सब्ज़ी खाने से वात विकार, गठिया आदि रोगों में लाभ होता है।

यह खून में शर्करा के स्तर को भी नियंत्रित करता है, इसलिये इसका सेवन मधुमेह के रोगियों के लिये भी लाभदायक है। इसके बीजों का काढ़ा महिलाओं के मासिक चक्र को भी नियंत्रित करने में सहायक है और रुकी हुई माहवारी को खोल देता है । हालांकि गर्भावस्था में इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

यह कीटनाशक है और इसके कुछ दिन लगातार खाने से पेट के कीड़े या चुनचुने नष्ट होते है। इसलिये इसकी बेल को पशुओं के चारे और गुड़के साथ मिलाकर खिलाने से पशुओं के पेट के कीड़े भी दूर होते हैं और पशु वात संबंधी रोगों से भी मुक्ति पाते हैं। इसकी ्पत्तियाँ ढोर-डंगरों के लिये भी पौष्टिक चारे के तौर पर एक अच्छा विकल्प है।

सुरक्षा और सावधानियाँ (Safety / Precautions):

1.गर्भावस्था के दौरान उपयोग से बचें 
2.स्तनपान के दौरान उपयोग की सुरक्षा स्थापित नहीं की गई है।
3.मधुमेहरोधी दवाएं लेने वाले मरीजों को किवांच फली(Velvet Beans)युक्त दवा लेने से पहले एक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता से परामर्श करना चाहिए।
4.बीज की फलियाँ बालों से ढकी होती हैं जो त्वचा में खुजली और गंभीर जलन (त्वचाशोथ) पैदा कर सकती हैं
5. अत्यधिक सेवन शरीर में उष्णता उतपन्न कर सकता है जिससे शारीर में फ़ोड़े-फुंशी की शिकायत हो सकती है।

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