सुदामा चरित || SUDAMA CHARIT Class 8 Chapter8 Summary, Explanation, Question Answers

‘सुदामा चरित’ कविता, व्याख्या, प्रश्नोत्तर
कक्षा 8 पाठ 8
सुदामा चरित
लेखक परिचय
नरोत्तम दाससोलहवीं सदी के कृष्ण भक्त थे । इन्होंने भगवान कृष्ण के मित्र सुदामा पर आधारित ”सुदामा चरित्र’ नामक काव्य-ग्रंथ की रचना की है। ”सुदामा चरित्र’ ब्रजभाषा में लिखा गया है। प्रस्तुत पाठ में दिए गए छंद इसी सुदामा चरित्र से लिए गए हैं। नरोत्तम दास के जन्म और मृत्यु का सही तिथि अप्राप्त है। इनका जन्मस्थान उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के बाड़ी नामक गाँव है। नरोत्तम दास के माता पिता कान्यकुब्ज ब्राहमण थे।
पाठ की पृष्ठभूमि
सुदामा और श्री कृष्ण गुरुकुल में सहपाठी और प्रगाढ़ मित्र थे। बड़े होने पर सुदामा गरीब ब्राहमण बन गए ,जबकि श्री कृष्ण द्वारिका के राजा बन गए। विपन्नता और कष्टों से जीवन गुजारते हुए सुदामा के दिन गुजर रहे थे, किंतु वे परम संतोषी ब्राहमण थे। अतः जो कुछ भी सहज प्राप्त होता , उसी से संतुष्ट हो जाते। किंतु उनकी पत्नी घर की इस दरिद्रता और अभाव से अत्यंत दुखी थी। एक दिन अकस्मात श्री कृष्ण की चर्चा चलने पर सुदामा पत्नी को अपनी और कृष्ण की गहरी मित्रता के बताते हैं। सुदामा के मित्र श्री कृष्ण हैं यह जानकर उनकी पत्नी उन्हें कॄष्ण के पास जाकर वित्तीय सहायता माँगने को प्रेरित करती है। इस पर सुदामा द्वारका जाने में आनाकानी करते हैं। जब उनकी पत्नी बहुत जोर देकर कारण पूछती है; तो वे बहाना बनाते हैं कि उनके पास कृष्ण को भेंट करने के लिए कुछ नहीं है। इस पर सुदामा की पत्नी तीन मुट्ठी तंदुल ( च्यूड़े) कहीं से लाकर एक पोटली में बाँधकर सुदामा को देती है। तब पत्नी की जिद के आगे लाचार होकर सुदामा द्वारका पहुँचते हैं और वहाँ महल के द्वार-पाल से कृष्ण के घर का पता पूछते हैं। इसकी सूचना द्वार-पाल कृष्ण को देता है। आगे का घटनाक्रम कविता के रूप में पाठ है। प्रस्तुत पाठ सुदामा चरित नामक पुस्तक से उद्धृत है। यद्यपि सुदामा और श्री कृष्ण की मित्रता का वर्णन महाभारत में भी है, किंतु सुदामा चरित में रचित घटना , सुदामा के द्वारका पहुँचने पर की स्थिति और भाव , कृष्ण का सौहार्द्र आदि कथा कवि की मौलिक कृति है।
सुदामा चरित (कविता)
सीस पगा न झगा तन में, प्रभु! जाने को आहि बसै केहि ग्रामा।
धोती फटी-सी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानह को नहिं सामा।
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक, रह्मो चकिसो वसुधा अभिरामा।
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा।
ऐसे बेहाल बिवाइन सों, पग कंटक जाल लगे पुनि जोए।
हाय! महादुख पायो सखा, तुम आए इतै न कितै दनि खोए।
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिकै करुनानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए।
कछु भाभी हमको दियो, सो तुम काहे न देत।
चाँपि पोटरी काँख में, रहे कहो केहि हेतु।।
आगे चना गुरुमातु दए ते, लए तुम चाबि हमें नहिं दीने।
स्याम कह्याउे मुसकाय सुदामा सों, ‘‘चोरी की बान में हौं जू प्रवीने।।
पोटरी काँख में चाँपि रहे तुम, खोलत नहिं सुधा रस भीने।
पाछिलि बानि अजौ न तजो तुम, तैसई भाभी के तंदुल कीन्हें।।
वह पुलकनि, वह उठि मिलनि, वह आदर की बात।
वह पठवनि गोपल की, कछू न जानी जात।।
घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज।
कहा भयो जो अब भयो, हरि को राज-समाज।
हौं आवत नाहीं हुतौ, वाही पठयो ठेलि।।
अब कहिहौं समुझाय कै, बहु धन धरौ सकेलि।।
वैसोई राज समाज बने, गज, बाजि घने मन संभ्रम छायो।
कैधों परयो कहुँ मारग भूलि, कि फैरि कै मैं अब द्वारका आयो।।
भौन बिलोकिबे को मन लोचत, सोचत ही सब गाँव मँझायो।
कै वह टूटी-सी छानी हती, कहँ कंचन के अब धाम सुहावत।
कै पग में पनही न हती, कहँ लै गजराजहु ठाढे़ महावत।।
भूमि कठोर पै रात कटै, कहँ कोमल सेज पर नींद न आवत।
कै जुरतों नहिं कोदी-सवाँ, कहँ प्रभु के परताप ते दाख न भावत।।
-नरोत्तम दास
सुदामा चरित कविता का भावार्थ

पद-1 सीस ……………………………सुदामा।
भावार्थ : ऊपर लिखे पद में कवि कहते हैं कि जब सुदामा कृष्ण के महल के सामने खड़े थे, तब द्वारपाल ने महल के अंदर जा कर श्री कृष्ण को बताया कि हे प्रभु! बाहर महल के द्वार पर एक गरीब व्यक्ति खड़ा हुआ है। बहुत ही दयनीय अवस्था में है और वह आपके बारे में पूछ रहा है। उसके सिर पर न तो पगड़ी है और न ही शरीर पर कोई अंगोछा है। पता नहीं वो कौन से गाँव से यहाँ आया है और किस ग्राम का निवासी है। वह फटी हुई धोती पहने हुए है। उसके पैरों में जूते भी नहीं हैं। वह चकित सा हो कर पृथ्वी और महल के को देख रहा है। वह दीनदयाल अर्थात आप (कृष्ण) का निवास स्थान पूछ रहा है और अपना नाम सुदामा बता रहा है।
पद-2 ऐसे बेहाल ……………………………………सों पग धोए।
भावार्थ : उपुर्युक्त पंक्ति में कवि कहते हैं कि कृष्ण सुदामा के विषय में सुनकर दौड़कर बाहर आए तथा सुदामा को बेहाल देखा। सुदामा के बिवाइयों से भरे पैर से श्री कृष्ण ने कांटे खोजकर निकाले और प्रेम से बोले कि मेरे परम मित्र तुमने इतना कष्ट पाया तुम इतने क्यों न आए? तुमने इतने दिन क्यों खो दिए? अर्थात इतना समय कष्ट सहने में क्यों बिता दिया?। सुदामा का ऐसा हाल देख कर दयानिधि श्री कृष्ण दया से रो पड़े। उन्होंने सुदामा के पैर धोने के लिये मंगाई गई परात को हाथ भी नहीं लगाया बल्कि अपने आँसूओं से ही पैर धो डाले।
पद-3 कछु भाभी ……………………………………तंदुल कीन्हें।।
भावार्थ : श्री कृष्ण सुदामा के बाजू में दबी हुई पोटली को देखकर उनसे परिहास करते हुए कहते हैं कि मेरी भाभी ने जो मेरे लिए भेजा है। वह तुम मुझे क्यों नहीं दे रहे? मेरे लिए लाई पोटली को बगल में क्यों छिपा रहे हो। कृष्ण उस पर ताना मारते हुए कहते हैं कि जैसे उसने बचपन में उनकी गुरु माँ द्वारा दिए चने उसे न देकर खुद खा लिए थे, वैसे ही वह अब भी भाभी के प्रेम रूपी अमृत रस में भीगे हुए चावल ( चेवड़े अथवा च्यूड़े) क्यों नहीं दे रहें है? वह अपने मित्र सुदामा से मज़ाक करते हुए कहते हैं कि चोरी करने में तो तुम कुशल ही हो! पिछली बार की तरह तुम अब भी भाभी के दिये हुए चेवड़े अथवा च्यूड़े नहीं दे रहे हो ! (ऐसा कहते हुए कॄष्ण सुदामा के द्वारा काँख में छिपाए हुए चेवड़े खींच लेते हैं और आनंद से खाते हैं।)
पद-4 वह पुलकनि………………………………………….. धन धरौ सकेलि।।
भावार्थ : उपरोक्त पंक्तियाँ सुदामा के कृष्ण से मिलने के बाद के विचार दर्शा रही हैं। जब कृष्ण बहुत प्रेम से उदामा से मिलने के बाद उन्हें बिना कुछ धन-धान्य दिए ही विदा कर देते हैं और सुदामा सोच में डूब जाते हैं कि अब अपनी पत्नी को क्या उत्तर दुँगा। इन परिस्थितियों में सुदामा सोच रहे हैं कि जब वे कृष्ण के यहाँ पहुँचे थे, तब तो उन्होंने बड़ी प्रसन्नता दिखाई थी, वे उठकर गले मिले थे और सुदामा को बहुत आदर भी दिया था। पर विदाई के अवसर पर इस तरह खाली हाथ भिजवाने की बात सुदामा को कुछ समझ नहीं आ रही थी। (वास्तव में कृष्ण ने सुदामा को उनके लाए हुए चावल खाते ही दो लोकों की धन-दौलत दे डाली थी, जिससे सुदामा बिल्कुल अनजान थे।) सुदामा कृष्ण के बचपन को याद करके सोचते हैं कि यह वही कृष्ण है जो थोड़ी सी दही माँगने के लिए घर-घर हाथ फैलाया करता था, भला वह उन्हें क्या देंगे? सुदामा तो पहले ही से माखनचोर कृष्ण को जानते थे, पर उनकी पत्नी ने ही उन्हें जिद्द करके यहाँ भेजा था। सुदामा बहुत नाराज थे और सोच रहे थे कि अब जाकर वे अपनी पत्नी से कहेंगे कि (व्यंग्य में) लो! बहुत धन मिल गया है अब इसे सँभालकर रखो। (वे यहाँ आना नहीं चाहते थे। अब हालत यह थी कि जो चावल वे माँग कर लाए थे, वह भी कृष्ण ने खा लिए थे। बदले में खाली हाथ वापसी हुई।)
पद-5 वैसोई राज ……………………. खोज न पायो।।
भावार्थ – कवि बताते हैं कि कहाँ तो सुदामा के पास टूटी- फुटी सी फूस की झोंपड़ी थी और कहाँ अब स्वर्ण-महल सुशोभित हो रहे हैं। पहले तो सुदामा के पैरों में जूतियाँ तक नहीं होती थीं और कहाँ अब उनके महल के द्वार पर महावत के साथ हाथी खड़े रहते हैं अर्थात् अब पैदल चलने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि सवारी के साधन उपलब्ध हैं। पहले कठोर धरती पर रात काटनी पड़ती थी, कहाँ अब कोमल सेज पर नींद नहीं आती है। कहाँ पहले तो यह हालत थी कि उन्हें खाने के लिए कोदों और सावाँ (मोटे चावल millets ) भी उपलब्ध नहीं थे और कहाँ अब प्रभु की कृपा से उन्हें द्राक्ष( किशमिश) उपलब्ध हैं। फिर भी वे अच्छे नहीं लगते।
सुदामा चरित कविता का सारांश
प्रस्तुत पाठ में भगवान श्रीकृष्ण और उनके बचपन के मित्र सुदामा की मित्रता और प्रेम पर आधारित कथा लिखी गई है। सुदामा, जो कि अत्यंत निर्धन ब्राह्मण थे, श्रीकृष्ण से सहायता मांगने के उद्देश्य से द्वारका पहुंचे।
सुदामा और श्रीकृष्ण दोनों गुरुकुल में साथ पढ़े थे और गहरे मित्र थे। परंतु समय के साथ सुदामा गरीब हो गए और कृष्ण द्वारका के राजा बन गए। सुदामा की पत्नी ने यह जानकर कि सुदामा कॄष्ण के मित्र हैं, परिवार की दरिद्रता हटाने के लिए, उनसे आग्रह किया कि वे अपने मित्र कृष्ण से सहायता लें। हालांकि, सुदामा अपने मित्र से कुछ मांगने में संकोच कर रहे थे, परन्तु अंततः वे द्वारका जाने के लिए राजी हो गए।
सुदामा ने श्रीकृष्ण के लिए थोड़े से चिउड़े (पोहे) लेकर द्वारका की यात्रा की। जब सुदामा कृष्ण के महल पहुंचे, तो भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बड़ी प्रेमपूर्वक अपनाया और उनकी पुरानी मित्रता को याद किया। सुदामा को देखकर कृष्ण इतने भावुक हो गए कि वे उनके पैर धोकर उनकी सेवा में लग गए।
कृष्ण का वैभव देखकर, सुदामा अपने कष्टों के बारे में कुछ नहीं कह पाए, लेकिन श्रीकृष्ण ने उनकी भावनाओं को समझ लिया। बिना सुदामा से कुछ सुने, कृष्ण ने उनके घर में अपार धन-संपत्ति प्रदान कर दी। जब सुदामा अपने घर लौटे, तो उन्होंने अपने छोटे से कुटिया को समस्त सुख-सुविधाओं से युक्त एक भव्य महल में परिवर्तित पाया।
इस कहानी में कृष्ण ने मित्र को उसकी गरीबी का आभास दिलाए बिना ही मित्रता निभाई और साथ ही उन्हें बिना छोटा महसूस कराए ही आर्थिक मदद की । अतः यह कथा निःस्वार्थ प्रेम, मित्रता और भगवान की करुणा को उजागर करती है।साथ ही मित्रता के उच्च आदर्श को प्रदर्शित करती है।
सुदामा चरित कविता के पाठ पर आधारित प्रश्न उत्तर
प्रश्न 1 – सुदामा की दीनदशा देखकर श्रीकृष्ण की क्या मनोदशा हुई? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर – सुदामा की हालत देखकर श्रीकृष्ण को बहुत दुख हुआ। दुख के कारण श्री कृष्ण की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने सुदामा के पैरों को धोने के लिए पानी मँगवाया। परन्तु उनकी आँखों से इतने आँसू निकले कि उन्ही आँसुओं से सुदामा के पैर धुल गए।
प्रश्न 2 – “पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए।” पंक्ति में वर्णित भाव का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर – प्रस्तुत दोहे में यह कहा गया है कि श्रीकृष्ण ने अपने बालसखा सुदामा के आगमन पर उनके पैरों को धोने के लिए परात में पानी मंगवाया, परन्तु सुदामा की दुर्दशा देखकर उनको इतना कष्ट हुआ कि आँसुओं से ही सुदामा के पैर धुल गए। अर्थात् परात में लाया गया जल व्यर्थ हो गया।
प्रश्न 3 – “चोरी की बान में हौ जू प्रवीने।”
(क) उपर्युक्त पंक्ति कौन, किससे कह रहा है?
(ख) इस कथन की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिए।
(ग) इस उपालंभ (शिकायत) के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा है?
उत्तर –
(क) यहाँ श्रीकृष्ण अपने बालसखा सुदामा से कह रहे हैं कि तुम्हारी चोरी करने की आदत या छुपाने की आदत अभी तक गई नहीं। लगता है इसमें तुम पहले से अधिक कुशल हो गए हो।
(ख) सुदामा की पत्नी ने श्रीकृष्ण के लिए भेंट स्वरूप कुछ चावल भिजवाए थे। संकोचवश सुदामा श्रीकृष्ण को यह भेंट नहीं दे पा रहे हैं; क्योंकि कृष्ण अब द्वारिका के राजा हैं और उनके पास सब सुख-सुविधाएँ हैं। परन्तु श्रीकृष्ण सुदामा को व्यंग्य करते हुए इसे चोरी कहते हैं और कहते हैं कि चोरी में तो तुम पहले से ही निपुण हो।
(ग) इस शिकायत के पीछे एक पौरोणिक कथा है। जब श्रीकृष्ण और सुदामा आश्रम में अपनी-अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उस समय एक दिन वे जंगल में लकड़ियाँ चुनने जाते हैं। गुरूमाता ने उन्हें रास्ते में खाने के लिए चने दिए थे। सुदामा श्रीकृष्ण को बिना बताए चोरी से चने खा लेते हैं। उसी चोरी की तुलना करते हुए श्रीकृष्ण सुदामा पर व्यंग्य कसते हैं।
प्रश्न 4 – द्वारका से खाली हाथ लौटते समय सुदामा मार्ग में क्या-क्या सोचते जा रहे थे? वह कृष्ण के व्यवहार से क्यों खीझ रहे थे? सुदामा के मन की दुविधा को अपने शब्दों में प्रकट कीजिए।
उत्तर – द्वारका से खाली हाथ लौटते समय सुदामा का मन बहुत दुखी था। वे कृष्ण द्वारा अपने प्रति किए गए व्यवहार के बारे में सोच रहे थे कि जब वे कृष्ण के पास पहुँचे तो कृष्ण ने आनन्दपूर्वक उनका आतिथ्य सत्कार किया था। क्या वह सब दिखावटी था?
वे कृष्ण के व्यवहार से खीझ रहे थे क्योंकि केवल आदर-सत्कार करके और उनकी स्थिति जानकर भी श्रीकृष्ण ने सुदामा को खाली हाथ भेज दिया था। वे तो कृष्ण के पास जाना ही नहीं चाहते थे। परन्तु उनकी पत्नी ने उन्हें जबरदस्ती मदद पाने के लिए कृष्ण के पास भेजा। उन्हें इस बात का पछतावा भी हो रहा था कि माँगे हुए चावल जो कृष्ण को देने के लिए भेंट स्वरूप लाए थे, वे भी हाथ से निकल गए और कृष्ण ने उन्हें कुछ भी नहीं दिया।
प्रश्न 5 – अपने गाँव लौटकर जब सुदामा अपनी झोंपड़ी नहीं खोज पाए तब उनके मन में क्या-क्या विचार आए? कविता के आधर पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर– द्वारका से लौटकर सुदामा जब अपने गाँव वापस आएँ तो अपनी झोंपड़ी के स्थान पर बड़े-बड़े भव्य महल को देखकर पहले तो वे भ्रमित हो गए कि कहीं वे रास्ता भूल कर फिर वापस द्वारका ही तो नहीं चले आए। फिर सबसे पूछते फिरते हैं तथा अपनी झोपड़ी को ढूँढ़ने लगते हैं।
प्रश्न 6 – निर्धनता के बाद मिलने वाली संपन्नता का चित्रण कविता की अंतिम पंक्तियों में वर्णित है। उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर – निर्धनता के बाद श्रीकृष्ण की कृपा से सुदामा को धन-सम्पदा मिलती है। जहाँ सुदामा की टूटी-फूटी सी झोंपड़ी हुआ करती थी, वहाँ अब स्वर्ण भवन शोभित है। कहाँ तो पहले पैरों में पहनने के लिए चप्पल तक नहीं थी और अब पैरों से चलने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि अब घूमने के लिए हाथी घोड़े हैं, पहले सोने के लिए केवल यह कठोर भूमि थी और आज कोमल सेज पर भी नींद नहीं आती है, कहाँ पहले खाने के लिए चावल भी नहीं मिलते थे और आज प्रभु की कृपा से खाने को द्राक्ष (किशमिश) उपलब्ध हैं, परन्तु वे भी अच्छे नहीं लगते। इस सब से पता चलता है कि मनुष्य को निर्धनता में जिन वस्तुओं की कामना रहती है, संपन्नता होने पर वे वस्तुएँ भी महत्व नहीं रखती।



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