इंतज़ार (कहानी)

  लछिमी ने फ़िर से दरवाजे से बाहर देखा । अभी तक सास वापस नहीं आई थी।  उसने एक निःश्वास लिया ! क्यों नहीं आई होगी ? धूप देख कर उसने अनुमान लगाया बारह तो बज ही गया होगा । कुछ सोचती हुई वह फिर अंदर  गई और चूल्हे में रखी झोई (कड़ी) को हिलाते हुए पकाने लगी ।

 लछिमी कोई बाइस- तेईस बरस की रही होगी । चार बरस पहले मोहनसिंह  के साथ उसका ब्याह हो गया था । मोहनसिंह फ़ौज़ में सिपाही था । पिता ने सरकारी नौकरी में काम करने वाला लड़का देखकर लछिमी की शादी मोहनसिंह से तय की थी ।उन्होंने सोचा कि बेचारी लछिमी ! बिना माँ की लड़की ! कम से कम ब्याह के बाद तो उसे सुख मिलेगा । अकेला लड़का है मोहनसिंह । उस पर फ़ौज़ में अच्छा कमाता भी है । राज करेगी लछिमी ।

 लक्ष्मी को गाँव मे सब लछिमी कहते। उत्तराखंड के रामगंगा नदी के किनारे बसे एक गाँव में अपनी सास हरुली  के साथ रहती थी । हरिप्रिया (हरुली) भी एक फ़ौजी की पत्नी थी ।उसने अपना जीवन बड़े कष्ट और त्याग से बिताया था । छोटी उम्र में विवाह और एक बच्चे का जन्म हो गया था।  जब मोहनसिंह  सात -आठ बरस का ही रहा होगा , उसी वक्त चीन के हमले में हरुली के पति भी वीर गति पा गए थे ।

हरिप्रिया पर तो मानो पहाड़ टूट पड़ा था । अब कैसे जीएगी इस वीरान जिंदगी को ? हरुली खुद को कुछ समझाती कि बेटे के दुःख में डूबी मोहनसिंह की आमा(दादी) को भी फ़ालिज़ पड़ गया । वह बिस्तर में ही पड़ी रह गई । सास की देखभाल, घर के अनगिनत काम , नौले से पानी भर कर लाना , खेती सम्हालना  आदि कामों में हरुली ऐसी फ़ँसी कि खुद के लिए कुछ सोचने का समय ही नहीं मिला ।जीवन में जो हर्ष की रेखा थी वह उसका पुत्र मोहन ही था। मोहन को देखते ही हरुली के चेहरे से मानो जन्मजन्मांतर के कष्ट दूर हो जाते और चेहरे पर संतोष छा जाता ।

  कुछ लोगों ने हरुली को दूसरी शादी करने की भी सलाह दी । कुछ लोगों ने उसे पतित करने के भी असफ़ल प्रयास किए थे । किंतु हरुली के दृढ़ निश्चय और आत्मबल के आगे सब बातें ढेर हो गई थी । उसके जीवन का एक ही लक्ष्य था मोहनसिंह को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाना ।

 मोहनसिंह के पिता की पेंशन से घर का खर्च आसानी से चल जाता।  घर के खाने -पीने लायक तो हरुली अपने खेतों में मेहनत करके ही कमा लाती । कभी- कभी ससुर जी भी खेती के कामों में उसकी मदद कर देते । घर बाहर सब सम्हालती हरुली को देख उनकी आँखे भर आती और मुँह से आशीष निकलती । कौन जाने इस पराए घर से आई ब्वारी(बहू) के न रहने से कौन उनके घर और खेतों को सम्हालता?  बीमार औरत की सेवा करता ? सोच कर ही उन्हें घबराहट होती । चार-पाँच साल की बीमारी से जूझ कर आखिर मोहनसिंह की आमा (दादी) ने भी मुक्ति पाई। बुबु(दादाजी) और हरुली के जीवन का एक मात्र लक्ष्य अब मोहन ही रह गया था । बुबु ने उसको पढ़ाने के लिए पूरी कोशिश की। पास के नज़दीकी शहर थल में ही सरकारी स्कूल था । जहाँ रोज़ उसे ले जाना और वापस लाना बुबु की ही जिम्मेदारी थी ।बुबु की मेहनत और प्रोत्साहन से मोहनसिंह भी ठीक-ठाक पढ़ गया । कॉलेज के बाद नौकरी  के लिए भाग- दौड़ भी तो उन्होंनें खूब की । वे तो चाहते थे कि बैंक में या किसी सरकारी स्कूल में मोहना लग जाता । किंतु उसके खून में तो पिता की तरह देशभक्ति की लहरें उछाल मार रहीं थी। उसके पिता का फ़ौजी वरदी में टँगा हुआ चित्र ही उसके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा था । आखिर उसकी भी रानीखेत में कुमाऊँ रेज़िमेंट में भरती हो गई । इस दिन कितने खुश थे हरुली और बुबु ! बुबु ने कहा था “जा हरुली , अपने सभी देवीथान में जाकर गुड़ की भेली तोड़ आना । तूने बहुत दुख देखे । अब सुख देखने के दिन आए है । बुबु की बात सुनकर हरुली के आँख से खुशी के आँसू बहने लगे ।  सभी देवताओं को उसने गुड़ की भेली चढ़ाई । मन भर -भर कर अपने मोहना के लिए आशीष माँगे।  

 मोहनसिंह की  ट्रेनिंग पूरी होते ही  बुबु ने उसकी शादी के लिए अच्छी लड़की ढूँढनी शुरु कर दी थी । बुबु नहीं होते तो हरुली कैसे कर पाती ये सब । दो साल बाद लछिमी के साथ मोहना का ब्याह हो गया । एक महीना साथ रह मोहना ड्यूटी में चला गया । घर में रह गए बुबु, हरुली और लछिमी ।

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मोहना बीच-बीच में छुट्टी ले कर आता । बाकि दिन उसके इंतजार में कटते ।मोहना समय-समय पर चिट्ठी-पत्री भेजता । उसका बस चलता तो सबको अपने पास ही बुला लेता। पर, फ़ौज़ी की जिंदगी में ये सब इतना आसान थोड़े ही है। फ़िर माँ भी तो अपने खेत -गाँव छोड़ कर कहाँ आएगी । इसी बीच बुबु दुनिया छोड़ गए । एक बार फ़िर हरुली को पिता  का साया छूटने का अहसास हुआ । अपने जवानी के सारे दिन हरुली ने इन्हीं पिता की छत्रछाया में गुजारे थे । उनका संरक्षण न होता तो अबोध पुत्र के सहारे अकेले इस कठोर दुनिया के झंझावात पार करना बहुत  मुश्किल हो जाता ।

हरुली के त्याग और कठिन जीवन की कहानियाँ लछिमी ने अपने दादाससुर और गाँव के लोगों से सुनी थीं। मोहना भी लछिमी को बार-बार कहता कि मेरी माँ ने बहुत मेहनत कर मुझे बड़ा किया । अब सेवा करने की मेरी बारी है । लछिमी बिना माँ की बेटी थी । जीवन के कष्टों को समझती थी।  उसके मन में हरुली के लिए बड़े आदर-सम्मान की भावना थी। वह हर-संभव प्रयास करती कि हरुली को आराम मिले। घर के सब काम उसने सम्हाल लिए थे । हरुली के मना करने पर भी गोरु-बाछि देखना, घास काटना, नौले से पानी सारना यह सब  लछिमी हँसते हँसते कर लेती । सासु के चेहरे पर आए संतोष को देख उसे प्रसन्नता होती। दोनों सासु-ब्वारी की अच्छी बन गई थी। सप्ताह में एक दिन थल बाज़ार जा कर हाट कर आते । बाँकि दिन जो भी घर में हो, प्रेम से मिल बैठ खाते।

 पिछले मास मोहना भी आया था । बार-बार कह रहा था कि माँ अगली बार तुम दोनों को साथ ही चलना होगा।मैंने साहब से बात भी कर ली है । मुझे क्‍वार्टर भी मिल जाएगा।खेती -बाड़ी छोड़ ।अब आराम कर । “कैसी बातें करता है ये लड़का भी? भला अपने पितरों की जमीन भी कोई बंजर छोड़ता है? मातृभूमि हुई । लौट कर तो इसी धरती पर आना हुआ । मुसीबत के दिनों में इन्हीं खेत खलिहानों ने साथ दिया ठहरा । अब तेरी बहुत इच्छा हुई तो कुछ दिन के लिए ब्वारी को ले जाना”, हरुलि ने समझाया था। पर हरिप्रिया को अच्छी तरह पता था कि उसका आज्ञाकारी बेटा उसके बिना अपनी पत्नी को नहीं ले जाएगा । माँ को गाँव में अकेला छोड़ने की तो वह सोच भी नहीं सकता ।     

इसी बीच हरुली की तबीयत थोड़ा खराब रहने लगी। हाँलांकि उसकी उमर अभी बहुत ज्यादा नहीं थी। किंतु उसने अपनी जिंदगी मेहनत कर गुजारी थी । पहाड़ में वैसे ही जीवन कठोर होता है किंतु स्त्रियों को तो विशेषरूप से कठोर श्रम करना पड़ता है। इसी कारण हरुली को भी हमेशा पीठ दर्द की शिकायत रहने लगी। साथ ही उसे कभी-कभी चक्कर से भी आते ।उसने सोचा था कि इस बार मोहना घर आएगा तो  कुछ दिन के लिए दोनों सासु-ब्वारी साथ चले जाएंगे ।फ़ौज़ी हस्पताल में दिखा भी आएगी । सुना है वहाँ डॉक्टर बहुत अच्छे से इलाज करते  हैं । वैसे तो वह खुद भी फ़ौज़ी की औरत हुई , पर दूरस्थ गाँव में रहने के कारण फ़ौज़ी महिलाओं को मिलने वाली सभी सुविधाओं से वंचित ही रही थी।

इसी बीच लछिमी ने भी पैर भारी होने की  खबर सुना दी । हरुली के तो खुशी का ठिकाना न रहा। गाँव के सभी देवी थानों में बच्चे  के लिए मन्नत माँगी गई । तुरंत मोहना को भी खबर भेजी । वह घर आना चाहता था किंतु उसकी पोस्टिंग बोर्डर पर पड़ गई थी । अब हरुली ब्वारी(बहू) का विशेष ध्यान रखने लगी । हालांकि सास की तबियत देख कर ना-ना कहने पर भी लछिमी सब काम करती रहती ।

 घर से बाहर -भीतर जाते हुए लछिमी अकसर डाकबाबू से मोहना की चिट्ठी के बारे में पूछ लेती । फोन का कोई जरिया नहीं था । एक मात्र सहारा चिट्ठी ही थी । पर इस टाइम मोहन सिंह की ड्यूटी बोर्डर पर लग गई थी । यहाँ तो चिट्ठी-पत्री भी भेजने का कोई जरिया नहीं था । फ़ौज की ओर से एक हवाई जहाज हफ़्ते में एक बार आता । उसी में सबकी चिट्ठियाँ आती । वापसी में वही जहाज फ़ौजियों की चिट्ठियाँ लेकर चला जाता ।लछिमी जानती थी कि सास की तबियत ठीक नहीं है । उसके मायके में भी कोई उसकी देखभाल के लिए नहीं था इसलिए वह चाहती थी कि बच्चे के जन्म के अवसर पर मोहना घर आ जाए।

धीरे-धीरे समय बीत रहा था । बॉर्डर पर भी हालात ठीक न थे ।सैनिकों की छुट्टियाँ कैंसिल हो गईं थीं । कुछ समय से मोहनसिंह का भी कोई पत्र न आ पाया था । लछिमी और हरुली दोनों कई  बार डाक बाबू से पूछ चुके थे । लछिमी के चेहरे पर चिंता की लकीर अकसर दिखाई देती । वहीं हरुली कहीं किसी देवता के मंदिर में बैठ अपने बेटे की कुशल-मंगल की कामना करती दिखाई देती ।

हरुली की तबीयत दिन ब दिन खराब हो रही थी । हालांकि उसने किसी को कुछ कहा नहीं था पर उसके चेहरा उसके हाल का बयाँ कर रहा था । पिछले दिनों से उसके खेत में फ़सल पक कर कटने को तैयार खड़ी थी ।  एक दो दिन और न काटी तो फ़सल खुद ही टूट कर गिर जाएगी । पिछली शाम  हरुली अपने हलिया(हल जोतने वाला) को भी फ़सल काटने के लिए पूछने गई थी  किंतु वह अपनी बीमार बेटी को दिखाने हल्दवानी चला गया था । हरुली चिंता में पड़ गई ।

पहाड़ में उस दौर में मज़दूरी का कोई प्रचलन नहीं था । लोग मिल-जुल कर एक दूसरे की खेती काट देते थे। किंतु हरुली अपने खराब स्वास्थ्य के कारण पिछले दो-तीन सालों से दूसरे के खेत काटने नहीं गई थी लछिमी को तो गोरु-बाछी से ही फ़ुरसत न होती, अत: वह भी नहीं जा पाती थी।ऐसे में किस मुँह से दूसरों को अपने खेत में फ़सल काटने को कहती?

 सुबह की चाय पी कर कुछ देर तक हरुली सोचती रही।उसने लछिमी की ओर देखा। उसके पेट के घेरे से पता चल रहा था कि दिन पूरे हो गए हैं। “बस आठ दस दिन और लगेंगे शायद’, हरुली ने मन ही मन सोचा । कुछ हिम्मत कर उस ने हाथ में दातुली उठा ली और रस्सी लेकर खेतों की ओर जाने लगी । लछिमी ने उसे  रोकते हुए कहा कि एक दिन और रुक जाते है । हल जोतने वाला हलिया कल तक आ जाएगा । हरुली रुकी नहीं । आज धूप है तो टाइम पर कट जाएगा । बारिश आ गई तो सब बेकार हो जाएगा ।बढ़ती धूप में हरुली अपनी फ़सल काट रही थी । पीठ का दर्द अलग परेशान कर रहा था रह-रह कर उसे सिर घूमता हुआ लग रहा था । हरुली ने सोचा कि थोड़ी देर और फ़सल काटकर जल्दी ही वापस चली जाएगी । सुबह बिना कुछ खाए जल्दीबाज़ी में सिर्फ़ चाय पी कर निकल आई थी ।  यह लछिमी भी बड़ी पागल है । बिना मेरे एक दाना भी नहीं खाती। जल्दी जाना चाहिए।दिन तक वह बहुत काम कर चुकी थी । उसने उठने का प्रयत्न किया । किंतु ठीक से उठ भी न पाई । वहीं लहराती हुई हमेशा के लिए गिर गई।

लछिमी देर से सासु का इंतज़ार कर रही थी । झोई भात बनकर  ठंडा हुआ जा रहा था । घर के सब काम भी निपट गए , पर ये न आईं । सुबह से किसी ने भी भोजन नहीं किया था । एक तरफ़ पति की चिंता ने उसे खा रखा था । वहाँ से अभी तक कोई संदेश न आया था । वह तो कल पोस्ट ऑफ़िस तक जा आई थी । पोस्ट बाबू ने कह दिया कि ऐसी हालत में यहाँ मत आ । कोई चिट्ठी पत्री होगी तो मैं खुद घर दे आउंगा ।  

धूप आगे बढ़ रही थी । लछिमी को सास की चिंता हुई । शारीरिक रूप से लछिमी भी अत्यधिक कमजोर थी ।सुबह से घर के काम , गोरु-बाछी का गोबर निकालते , पानी लाते हुए वह बहुत थक चुकी थी । धूप भी तो बहुत तेज़ हो रही है। ऐसे में बुढ़िया पता नहीं कहाँ चली गई । धूप के समय पहाड़ी रास्ते सब खाली थे । मन में सोचती जा रही थी कि जाते ही सासु को वापस आने को कहेगी । धूप , थकान , भूख से उसे अत्यधिक कमज़ोरी हो रही थी। चक्कर आने लगे थे। किसी प्रकार ढूँढती हुई वह उस खेत में जा पहुँची, जहाँ सास गिरी पड़ी थी । घबराहट में उसके मुँह से एक स्वर फूटा ,”माँ …… ।” और उसी क्षण वहीं गिर गई । उसके प्राण पखेरू उड़ गए ।

 ठीक इसी समय डाकबाबू अपनी चिट्ठियाँ खंगाल रहे थे ।लछिमी के नाम का एक पत्र उन्हें हाथ लगा । प्रसन्नतावश वह लछिमी को पत्र पहुँचाने उसके घर की ओर चल दिए। घर की कुंडी बंद थी । बाहर से कई बार आवाज देने पर भी कोई बाहर न आया । थक-हार कर डाक बाबु ने पत्र को दरवाज़े की झिर्री से भीतर की ओर डाल दिया ।

 पत्र के अंदर  मोहन सिंह के युद्ध में खेत रहने का समाचार सेना की तरफ़ से भेजा गया था, किंतु इस पत्र का इंतेज़ार करने वाला वहाँ कोई नहीं था ।    

मौलिक रचना : लेखिका कुसुम जोशी copyrights reserved © All Rights reserved

सभी चित्र: साभार गूगल

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