लेखक परिचय:

सुमित्रानंदन पंत

Sumit

सुमित्रानंदन पंत का जन्म-20मई, 1900  को अल्मोड़ा के कौसानी नामक गाँव में हुआ था । जन्म के छः घंटे बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया । इसलिए उनकी दादी ने ही उनका पालन पोषण किया ।बचपन का नाम गुंसाई दत्त था । वे अपने पिता गंगाधर पंत की आठवीं संतान थे। बाल्यकाल कुंमाऊँ की सुरम्य पहाड़ियों में ही बीता । बड़े होने पर शिक्षा के लिए काशी और तत्पश्चाद् इलाहाबाद चले गए। गाँधी जी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े रहे । अंग्रेजी तंत्र का बहिष्कार करने के लिए महाविद्यालयी शिक्षा छोड़ घर पर ही हिंदी , अंग्रेजी, बांग्ला और संस्कृत का  अध्ययन करने लगे ।प्रकृति के गोद में पले- बड़े पंत छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं । छोटे से छोटे विषय पर कवि की पैनी लेखनी छायावाद के दर्शन करवा देती है । उन्होंने चींटी , सेम की फ़लियाँ जैसे साधारण विषय चुनकर भी काव्य के माध्यम से संदेश दिया । इनकी प्रमुख  रचनाएँ चिदंबरा, पल्लव, गुंजन, ग्राम्या, स्वर्णकिरण,युगांत ,कला और बूढ़ा चाँद आदि हैं । पंत जी को सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार,  पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ पुरस्कार(1968)  आदि से भी सम्मानित किया गया ।1950 से 1957 तक आकाशवाणी से भी जुड़े रहे ।28दिसंबर 1977 हिंदी साहित्य के आकाश का यह सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया, किंतु उनकी अमर रचनाओं से वे आज भी अपनी महान विचारधारा की अलख जगा रहे हैं।

कविता :

मानवता ही विश्‍व सत्य

चंद्रलोक और अंतरिक्ष में

मानव ने किया पदार्पण

छिन्‍न हुए लो, देश-काल के

दुर्जय बाधा-बंधन।

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चाँद पर मानव के प्रथम कदम

दिग्विजयी मनु-सुत निश्चय

कितना महत्त्वपूर्ण यह क्षण,

भेद-भाव विरोध शांत कर

निकट आएँ सब देशों के जन ।

युग-युग का पौराणिक स्वप्‍न

हुआ मानव का संभव,

शुभ समारंभ’ नए चंद्र-युग का

भू को दे गौरव!

फहराए ग्रह-उपग्रह में

धरती का श्यामल अंचल,

सुख-संपद-संपन्न जगती में

बरसे जीवन-मंगल !

देश सभी मिल बनें

नव दिक् रचना के वाहन,

जीवन पद्धतियों के भेद

समन्वित हों विस्तृत मन !

अणु-युग बने धरा-जीवन हित

स्वर्ग-सृजन का साधन,

मानवता ही विश्व सत्य

भू-राष्ट्र करें आत्मार्पण !

  • सुमित्रानंदन पंत

कविता का भावार्थ :

काव्यांश1 . चंद्रलोक…………… बाधा बंधन।

संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश ’मानवता ही विश्व सत्य’ नामक कविता से लिया गया है । इस कविता के रचयिता छायावाद के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत हैं ।चाँद पर जब मनुष्य के प्रथम पद पड़े, उस अवसर पर कवि द्वारा इस कविता की रचना की गई ।

भावार्थ : चंद्रलोक और अंतरिक्ष में मनुष्य ने अपना प्रथम कदम रखा है । इसी के साथ देश और काल के बंधन टूट गए । अर्थात चंद्र लोक पर मानव के कदम रखने के साथ ही मनुष्य ने समय और पृथ्वी की सीमा के बंधन तोड़ दिए।

काव्यांश2. दिग्विजयी…………………….जन।

संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश ’मानवता ही विश्व सत्य’ नामक कविता से लिया गया है ।छायावाद के प्रमुख कवियों में से एक कवि सुमित्रानंदन पंत जी द्वारा मानव के चांद पर पँहुचने के अवसर पर यह कविता लिखी गई थी ।

 भावार्थ : कवि कहते हैं कि मनु के पुत्र अर्थात मनुष्य के चाँद पर पँहुचने के अवसर निश्चित रूप से महत्‍त्‍वपूर्ण है ।कवि ने इस अवसर को मनुष्य की दिग्विजय (दिशाओं पर विजय) बताया है । कवि का कहना है कि इस महत्‍त्‍वपूर्ण अवसर पर विश्व के सभी देशों  को आपसी भेदभाव मिटाकर एकजुट होना चाहिए।

काव्यांश 3: युग-युग…………….. गौरव।

संदर्भ : प्रस्तुत काव्यांश ’मानवता ही विश्व सत्य’ नामक कविता से लिया गया है ।इसके कवि सुमित्रानंदन पंत जी चाँद पर मानव पद पहुँचने पर उत्साहित हैं।

भावार्थ : चाँद पर मनुष्य के कदम पहुँचते ही मानव का युग-युग का एक पुराना स्वप्न पूरा होना संभव हुआ है ।चंद्रयुग का यह सुखद उद्घाटन धरती को गौरव प्रदान करे।

 काव्यांश 4: फ़हराए…… जीवन–मंगल।

संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश ’मानवता ही विश्व सत्य’ नामक कविता से लिया गया है । इसके रचयिता कवि सुमित्रानंदन पंत जी छायावाद के चतुष्तंभों में से एक हैं । चंद्र-विजय के अवसर पर वे धरती के सुखद भविष्य की कामना करते हैं।

भावार्थ : कवि सुमित्रानंदन पंत जी  मनुष्य के चाँद पर पँहुचने पर कामना करते हैं कि पृथ्वी के हरे-भरे आँचल की तरह ही हम इन ग्रह-उपग्रहों में भी हरियाली फ़ैला दें। इसी प्रकार सुख-सम्पति से सम्पन्न इस धरती पर भी मंगलमय जीवन का विस्तार हो।

काव्यांश 5:  देश…………मन।

संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश ’मानवता ही विश्व सत्य’ नामक कविता से लिया गया है ।इस कविता के रचयिता कवि सुमित्रानंदन पंत जी मानव के चांद पर सभी देशों को साथ आने का आह्वान करते हैं।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि इस अवसर पर सभी देश साथ आएं और इस नवीन दिक् रचना( नवीन क्षेत्र)  के विकास के सहयोगी बनें। विभिन्न देशों के लोग अपनी-अपनी जीवन पद्धति के भेद भुला कर साथ आएँ और एक विशाल मन के रूप मे एक साथ कार्य करें।

काव्यांश 6:  अणु-मन ……………… आत्मार्पण।

संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश ’मानवता ही विश्व सत्य’ नामक कविता से लिया गया है ।इस कविता के रचयिता कवि सुमित्रानंदन पंत जी आणविक शक्ति को मानव हित में प्रयोग करने की आशा व्यक्त करते हैं ।

भावार्थ :  आणविक शक्ति के प्रयोग के साथ ही धरती पर  अणु-युग की शुरुआत हुई है ।कवि कहते हैं कि इस अणु-शक्ति का प्रयोग धरती पर जीवन के हित के लिए हो। सभी साधनों का मानव हित के लिए प्रयोग कर धरा को स्वर्ग बनाएं। कवि धरती के सभी राष्ट्रों को आग्रह करते हैं कि मानवता ही विश्व-सत्य है, अतः सभी राष्ट्र मानवता के लिए स्वयं को अर्पित करें।    

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