छुट्टी औरत

“सुनो जी ! “मेरी पत्नी शारदा ने कहा । शारदा के लहजे से ही पता चल गया था कि मानो वह फ़िर से पास -पड़ोस के किसी घर का राज बताने वाली हो । शारदा की हमेशा से ही यही आदत रही है } पूरे मोहल्ले में घूमती फ़िरती है । कभी किसी की बीमारी का हाल पूछने तो कभी किसी जच्चा-बच्चा को देखने , कभी कीर्तन के लिए तो कभी किटी पार्टी के बहाने । इसी तरह साथ में उसे घर -घर के राज पता चल जाते थे । मोहल्ले में उसके साथ की अन्य औरतें भी आपस में सारे राज़ बताने के बाद कहतीं ” जाने दो , हमें क्या? वो तो तुम अपनी खास हो , इसलिए तुम्हें बता दिया । किसी और से मत कहना । ” यह डायलॉग कितने बार दोहराया गया होगा । सुन कर कितने ही बार हँसा था मैं ।

आज भी शारदा के “सुनो जी ! कहते ही यही सब बातें दिमाग में आ गई । एक उलझन के साथ एक जिज्ञासा भी हुई कि आज किसके बारे में बता रही होगी?

“सुनाओ !” मैंने लापरवाही से कहा ।

आपको वह सिंह साहब की बेटी याद है? वही सिंह साहब ! जो हमारे घर से दो घर छोड़कर रहते थे । उन्हीं की बेटी नीलम !नीलम सिंह !

नीलम सिंह नाम सुनते ही बड़ी-बड़ी आँखों वाली सत्रह अठारह वर्ष की सुंदर सी अल्हड़ किशोरी का चेहरा सामने आ गया ।यही उम्र थी उसकी, जब हम इस मोहल्ले में आए थे । हमारी नई -नई शादी हुई थी और तब ही नीलम और मेरी पत्नी शारदा की एक समारोह में मुलाकात हो गई थी । जल्दी ही दोनों के बीच प्रगाढ़ मित्रता हो गई । शारदा और नीलम भाभी और ननद के रिश्ते से बँध गए । अकसर नीलम हमारे घर आती -जाती रहती थी।

नीलम को गाने का बहुत शौक था। खासकर शास्त्रीय संगीत । उसकी आवाज भी बड़ी सुरीली थी । पहले यूँ ही गाती थी । जब सभी जगह उसकी तारीफ़ में पुल बाँधे जाने लगे तो उसने विधिवत शास्त्रीय शिक्षा लेने का निर्णय लिया । माता-पिता की इकलौती संतान नीलम की यह ख्वाहिश पूरी करने के लिए पिता ने शहर के प्रसिद्‍ध संगीतज्ञ पंडित लक्ष्मीनारायण शर्मा शास्त्री जी के पास उसके संगीत सीखने की व्यवस्था कर दी थी ।

नीलम रोज स्कूल के बाद पंडित लक्ष्मीनारायण शर्मा शास्त्री जी के घर संगीत सीखने जाने लगी । आवाज तो उसकी पहले से ही मधुर थी । अब उचित दिशा-निर्देशन के बाद उसकी कला और निखर आई ।छह माह में ही नीलम गुरु जी की प्रिय शिष्या बन गई । पंडित जी यदा-कदा उसे अपने साथ संगीत प्रोग्राम में ले जाने लगे ।

पंडित लक्ष्मीनारायण शर्मा शास्त्री जी का एक बेटा था आलोक ।वह उस समय डॉक्टरी कर रहा था । वह एम.बी. बी.एस के चतुर्थ वर्ष में था । वह भी गायन कला में प्रवीण था । कभी-कभी शास्त्री जी व्यस्त होते तो शाम के समय आलोक ही संगीत सिखा देता या संगीत कार्यक्रम की व्यवस्था करनी होती , तो आलोक को ही जिम्मेदारी दे देते । किशोर वय की नीलम आकर्षक और प्रतिभाशाली आलोक की ओर आकृष्ट हो गई । यह प्रेम एकतरफ़ा नहीं था। आलोक भी नीलम के प्रेम में डूब चुका था । अकसर संगीत की धुनों के साथ उन दोनों की जुगलबंदी के मधुर स्वर सुनाई देने पड़े । गीत गाते हुए वे एक दूसरे को ही देखते । नज़रों ही नज़रों में प्रणय प्रलाप चलता रहता। अनुभवी लोगों की नज़र से यह प्रेम छुप न सका। आसपास के लोगों में वे चर्चा के विषय बन गए ।

पंडित लक्ष्मीनारायण शर्मा शास्त्री जी और उनकी पत्नी तक भी यह बात पँहुची । वैसे तो शास्त्री जी नीलम की योग्यता के विशेष कायल थे और उसे बहुत प्यार करते थे । किंतु बात उनके बेटे से जुडी हुई थी । ऊपर से भिन्न जाति का भी मामला था ।अतः यह बात उन्हें बड़ी नागवार लगी ।शास्त्री जी की पत्नी ने भी बेटे को और नीलम को अलग-अलग समझाया । नीलम के माता-पिता को बुलाया गया । कुछ दिन तक इस मसले में बात-चीत हुई । इसी कारण नीलम और आलोक मिल न सके । नीलम अब तक कॉलेज जाने लगी थी । वह अपने निर्णय लेने के लिए स्वयं को स्वतंत्र समझती थी । वैसे भी उसके पिता ने आजतक उसकी सभी इच्छाएँ पूरी की थी ।उन्होंने नीलम को कभी “न ” सुनना न सिखाया था । इतने दिन के वियोग से नीलम और आलोक के लिए दूर रहना मुश्किल हो गया था । अत: उन्होंने विवाह करने का निर्णय ले लिया । आलोक को उसके पिता जी ने समझाया कि वह कम से कम डॉक्टरी पूरी करने तक तो रुक जाए । किंतु दोनों अटल रहे ।

अंततः दोनों पक्ष के माता-पिता राज़ी हो गए और एक अच्छा मुहुर्त निकाल कर दोनों का विवाह कर दिया गया । पंडित शर्मा जी तो नीलम से पहले ही लगाव रखते थे । शर्माइन भी नीलम के सेवाभाव और आत्मीय स्वभाव के कारण शीघ्र ही उससे प्यार करने लगीं । उनकी प्रेम वाटिका में संगीत के सातों सुर फ़िर से गुंजायमान होने लगे । आलोक और नीलम मानो एक दूसरे के लिए ही बने थे । उनके प्रेम भरे गीत साँझ के समय अकसर गली में सुनाई देते।

साल भर बाद ही नीलम गर्भवती हो गई । इसी बीच आलोक भी डॉक्टरी पूरी कर चुका था । उसे अमेरिका में आगे की शिक्षा का अवसर मिला । पंडित लक्ष्मीनारायण शर्मा शास्त्री जी और उनकी पत्नी दोनों के लिए यह बहुत ही सुख की बात थी । बेटे की सफ़लता और पौत्र का सुख साथ ही मिल जाने का अवसर था यह । शास्त्री जी ने अपनी पत्नी के साथ अपने कुल देवता को याद किया और अभिभूत हुए । नियत समय पर आलोक अमेरिका के लिए चल पड़ा । नीलम गर्भावस्था के अंतिम चरण में थी । अत: ऐसे समय में उसके साथ जाने की बात ही न थी । पति की प्रगति ही उसके संतोष का विषय थी । पति-पत्नी ने एक दूसरे से भाव भीनी विदाई ली और नीलम अगले मिलन की प्रतीक्षा करने लगी ।

दो माह बाद नीलम ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। सास-ससुर और माता-पिता ने बालक के लिए कोई कसर न उठा छोडी थी । खूब धूमधाम से उसका नामकरण किया गया। बस जो कमी थी वह उसके पिता की थी । नामकरण में भी पिता के स्थान पर चाचा ने ही सब कर्म कांड कराए।बालक का नाम वसंत रखा गया। सच ही तो था उनकी प्रेम बगिया में वह वसंत बनकर ही आया था । नीलम तो चाहती थी कि आलोक वहाँ होता, पर इतनी दूर से आना संभव न था । वह मन मसोसकर रह गई ।

पहले आलोक के पत्र , फोन अक्सर आते। फ़िर पत्र आने कम होने लगे । फ़िर धीरे-धीरे फोन और पत्र दोनों लगभग नहीं के बराबर ही रह गए । कई बार जब वह काम में व्यस्त होती , आलोक उस से बात किए बिना ही माता-पिता को अपने कुशल मंगल की खबर देकर इतिश्री कर लेता और इंतज़ार करती रह जाती नीलम ।

फ़िर यह इंतज़ार एक साल नहीं, दो साल नहीं पूरे पाँच साल तक चला । इधर आलोक के छोटे भाई की शादी तय हो चुकी थी । आलोक का आना निश्चित ही था। नीलम भाग-भाग कर सब तैयारियाँ कर रही थी । साथ ही अपना विशेष शृंगार भी कर लेती । क्या पता कब आलोक आ जाए ? वैसे भी उसे सरप्राइज देने की आदत है। अंतत : इंतज़ार खत्म हुआ । एक दिन एक पत्र नीलम के ससुर जी के नाम आया । पत्र आलोक ने भेजा था । उसने लिखा था पिताजी , बहुत दिनों से यह बात बताना चाह रहा था , किंतु हिम्मत न आई । यहाँ अमेरिका में मैंने एक अमेरिकन लड़की से विवाह कर लिया है । इस विवाह के वज़ह से अमेरिका की नागरिकता भी मिल गई है । दो छोटे बच्चे भी हैं । जब तक नीलम वहाँ रहेगी घर नहीं आ सकुँगा । आखिर उसका दोषी हूँ । किस तरह उसे मुँह दिखाऊँगा ? वैसे भी एमिली को यह सब पता नहीं है । उसे भी बुरा लगेगा ।नीलम को तलाक के पेपर भिजवा दुँगा । मेरी तरफ़ से उसे कोई रोक नहीं है । चाहे तो दूसरी शादी कर ले । बाकि दस लाख का यह चैक उसके लिए भेज रहा हूँ । हो सके तो माफ़ कर दे।

पिता से भी अधिक लाड़ लड़ाने वाले ससुर इस पत्र को पढ़कर हक्का -बक्का रह गए । भारतीय समाज में इस तरह तलाक , दूसरा विवाह तब मान्य न थे । माँ ने सुना तो सिर पीट लिया । इतने वर्षों से नीलम ने उनकी निःस्वार्थ सेवा की थी । दूसरी जाति की होने पर भी अब उन्हें नीलम से कोई शिकायत न थी । वे उसे बहुत स्नेह करने लगी थीं । साथ ही , नीलम ने पोते का सुख दिलाया था । वे अपने पोते वसंत के वात्सल्य में डूबी हुई थी । इस अवसर की उन्होंने कल्पना भी न की थी ।

नीलम ने पत्र पढ़ा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई । इस प्रेम में पड़कर उसने अपनी शिक्षा भी पूरी न की थी । पाँच साल तक रात- दिन जिस व्यक्ति का इंतजार किया था । जिसके कुशलता के लिए व्रत-उपवास किए । जिसके आगमन के लिए पलकें बिछाए बैठी हुई थी आज वही व्यक्ति घर इसलिए नहीं आ सकता था , क्योंकि वहाँ नीलम रहती थी ।

कुछ दिन उहापोह , सोच-विचार में गुजरे । अंत में नीलम ने पितृगृह वापस आने का निर्णय लिया । सास-ससुर ने अपने प्रेम का वास्ता दिया। पोते के प्रेम की दुहाई दी । पर नीलम ने जो निर्णय कर कर लिया था , उस पर अडिग रही । उसने सास-ससुर को समझाया कि वे कभी भी वसंत से मिल सकते हैं । लेकिन इस घर में मैं अब परित्यक्ता की हैसियत से नहीं रह सकती । यह पहले आपके बेटे का घर है । मैं भी नहीं चाहती कि वे मेरे कारण अपने माता-पिता से न मिले। स्वाभिमानी नीलम ने दस लाख की धन राशि भी लेने से इंकार कर दी । वह अपने पिता के घर आ गई ।

नीलम के लिए जीवन इतना भी सरल न था । वह पिता के संरक्षण के बूते पर वापस आई थी । लेकिन अपनी इकलौती बेटी के वैवाहिक जीवन का इस तरह समापन और उसकी उदासी ने पिता को गहरा धक्का पहुँचाया था । वह गहरी चिंता में डुब गए । एक रात ऐसे ही चिंतित हो सोए तो फ़िर कभी न उठे । पिता की आकस्मिक मृत्यु नीलम के लिए गहरा आघात थी । छह माह में ही उसने यह दूसरा सदमा झेला था । पिता की मृत्यु के साथ ही नीलम पर अपने पाँच वर्ष के बालक और माँ की देखभाल की भी जिम्मेदारी आ गई ।आखिर कब तक रोती ।नीलम ने भी परिस्थितियों से संघर्ष करने का साहस बटोरा । कम उम्र में विवाह करने के निर्णय और जल्दबाज़ी में बालक के जन्म के कारण नीलम को अपनी पढ़ाई पूरी करने का अवसर न मिला था । किंतु ससुर जी ने पूरा लाड़ दिखाते हुए उसे संगीत बहुत अच्छे से सिखाया था । उसकी आवाज़ भी मीठी थी । अत: उसने आसपास के संगीत समारोह में हिस्सा लेना शुरु किया । उसकी मधुर आवाज से श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे । लेकिन इस शहर में हर जगह उसकी यादें जुड़ी हुई थीं । लोग नीलम को उसके पिता और ससुर जी के नाम से जानते थे। अतः जहाँ भी जाती , वही बातें दोहराई जातीं । आखिर नीलम भी कब तक यादों के साये में रहती ? वह इस सब से बाहर आना चाहती थी। अत: वह बाहर जाने की कोशिश कर रही थी ।

एक बार बंबई की एक नामी म्युजिकल बैंड का विज्ञापन आया । वे एक महिला गायिका ढूँढ रहे थे । उस बैंड को किसी ने नीलम का नाम सुझाया । झटपट नीलम को अच्छे ऑफ़र के साथ बंबई आने का अवसर मिला । अंधे को क्या चाहिए , दो आँखें? नीलम भी इस अवसर को खोने नहीं दे सकती थी । अतः उसने पिता का मकान बेच दिया और हमेशा -हमेशा के लिए बंबई चली गई थी । सुना था कि वहीं उसने शादी भी कर ली थी । उसी नीलम का आज अचानक पत्नी के मुँह से जिक्र सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ ।

“हाँ बताओ! क्या हुआ उसे ? “मैंने पूछा।

“उसे कुछ नहीं हुआ । आज उसका फोन आया था । उसने फ़िर से शादी कर ली।” पत्नी ने कहा ।

“शादी तो उसने पहले ही कर ली थी ना!” मैंने पत्नी से कन्फ़र्म करते हुए पूछा।

” अरे नहीं! यह उसकी तीसरी शादी है । ” पत्नी ने कहा ।

“हे भगवान ! इस औरत को कोई शर्म -लिहाज है या नहीं ! तीसरी शादी ? मानो शादी नहीं हो गई ,कोई खेल हो गया । पचास साल की तो हो ही गई होगी वह और उसका बेटा वसंत ? वह तो अब तक गबरू जवान हो गया होगा ! उसने भी अपनी माँ को रोका नहीं ? बेटे की शादी की उम्र में माँ शादी कर रही है । क्या जमाना आ गया है ? धिक् धिक् ।”मैंने कहा।

“सुनो जी ! पूरी बात सुने बिना ही कुछ ज्यादा ही ओवर रिएक्ट कर रहे हो आप ।” पत्नी ने टोका ।

“क्या पूरी बात सुनुँ ? ” मैंने पत्नी से कहा ।

“देखो जी ! आज नीलम से बहुत बातें हुई । उसने कहा कि भाभी ! अब मायके की तरफ़ से आपके सिवा किसी की याद नहीं । यहाँ से जाने के बाद नीलम ने उस बैंड में ही काम किया । साथ में वसंत और माँ की भी जिम्मेदारी थी । दो तीन साल में ही नीलम ने अच्छी पहचान बना ली थी । साथ ही उसकी आमदनी भी अच्छी खासी हो गई । अपने नाम पर एक घर भी ले लिया ।उसे रात को प्रोग्राम करने के लिए आना-जाना पड़ता था । तो बैंड का ही एक आदमी हरीश उसे लाता और छोड़ता था । धीरे-धीरे उस से नज़दीकी बढ़ गई । हरीश माँ और वसंत की भी देखभाल करता था । नीलम को लगा कि यह सही होगा कि लोग उसे बदचलन कहें , इस से बढ़िया वह हरीश से शादी कर सुरक्षित जिंदगी जी ले । अतः उसने हरीश से शादी कर ली ।

शादी करते ही हरीश ने रंग दिखाने शुरू कर दिए । वह शराब पी कर रहता । दिन भर घर में पड़ा रहता । कोई काम न करता ।बूढ़ी माँ को भी अपशब्द बोलता था । वसंत के साथ उसके रिश्ते बुरे से बुरे होने लगे । वसंत ने तो कभी उसे अपना पिता माना ही नहीं । तकरार बढ़ने लगी । वसंत दस वर्ष का था । वह हमेशा फोन द्वारा अपने दादा -दादी के संपर्क में रहा था । अब थोड़े समय से उसके पिता आलोक ने भी वसंत से संपर्क शुरु कर दिया था । घर की स्थिति तनावपूर्ण हो गईं । हरीश वसंत को पिता कह कर बुलाने को कहता , जिसे वसंत हमेशा नकार देता । वह उद्दंड होने लगा । नानी के सिवा वह किसी की न सुनता । इधर जब वह हरीश को नानी के लिए भी अपशब्द कहते सुनता तो वह आग बबूला हो उठता ।

धीरे-धीरे हरीश ने नीलम पर पैसे की माँग बढ़ानी शुरु कर दी । न देने पर वह मार-पीट भी करता । एक तरफ़ नीलम दुनिया के सामने सफ़ल गायिका बन उभर रही थी , दूसरी तरफ़ घर के तनाव से पीड़ित थी । इसी दौरान एक सड़क दुर्घटना में माँ की मौत हो गई । अब घर में वसंत की देखभाल करने वाला कोई न रहा । एक शाम जब नीलम एक जगह वैवाहिक कार्यक्रम के संगीत प्रोग्राम में परफोरमेंश देकर लौटी तो उसने देखा कि हरीश वसंत की पिटाई कर रहा है । अपने ऊपर अत्याचार को नीलम ने सहन कर लिया था , पर बेटे के ऊपर यह सब होते वह देख न सकी । उसी वक्त पुलिस बुलाकर हरीश को जेल भिजवा दिया । बाद में तलाक ले कर हमेशा के लिए छुटकारा पा लिया था ।

इधर वसंत ने भी पढ़ाई पूरी कर ली । उसके पिता आलोक ने उसे अमेरिका आने को कहा । हालंकि वसंत माँ के साथ ही पला-बढ़ा था किंतु पिता के संपर्क में भी था । अब पिता की राह में वह भी अमेरिका में ही सैटल हो गया था । पीछे रह गई थी उसकी यादें लिए अकेली नीलम । वह नीलम को बार- बार अमेरिका आने को कहता है, पर नीलम को न जाने क्यों इस नाम से ही चिढ़ है ।

अब नीलम ने अपना खुद का भजन ग्रुप बना लिया है । अच्छी आमदनी है।समाज में अपना नाम और खुद की पहचान है । बस नहीं है तो कोई साथ रहने वाला । विनोद, नीलम का तीसरा पति, एक व्यवसायी हैं ।व्यवहार से बहुत सरल आदमी है । एक मित्र के यहाँ दोनों की मुलाकात हुई थी । उनके कोई बच्चे नहीं हैं । पत्नी थी , जो तीन वर्ष पहले स्वर्ग सिधार गई । उन्हें भी सहारे की जरुरत थी । दो लोगों ने अपने सुख-दुःख बाँट लिए और एक हो गए ।” पत्नी ने बात पूरी करते हुए कहा।

मेरी पत्‍नी शारदा बहुत ही संस्कारी भारतीय नारी है । हमेशा वह व्यर्थ के नारीवाद का विरोध करती रहती है । उसकी नज़रों में पति परमेश्वर है । उसके मुँह से तीन-शादियाँ करने वाली अत्याधुनिक विचारों वाली नीलम का समर्थन सुन मैं आश्चर्यचकित रह गया । मैंने कहा -“शारदा ! ठीक है कि नीलम तुम्हारी अच्छी दोस्त रही । पर उसके खुले विचारों का समर्थन कर तुम कुछ ज्यादा ही लिबरल नहीं हो रही ?”

” देखो जी ! मर्द को अपनी बीबी को सम्हाल कर हमेशा सहारा देना चाहिए । एक विधवा औरत अपने पति की यादों के सहारे जीवन गुजार लेती है । किंतु प्रेम में धोखा खाई एक छुट्टी औरत (छोड़ी हुई औरत) ! उसे तो अपने को बनाए रखने के लिए, खुद को जीवित रखने के लिए कोई ठौर तो चाहिए ही न ! ” शारदा ने कहा । मैं पत्नी के चेहरे को देखता रह गया । एक स्त्री की पीड़ा उसके चेहरे और स्वर से गूँज रही थी ।

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original content © copyright ; All rights reservere

Author : © Kusum Lata Joshi

5 responses to “छुट्टी औरत (कहानी)”

  1. Surendar Agarwal avatar
    Surendar Agarwal

    Some people life is complicated.

  2. कहानी अच्छा लगा

  3. Nepal 🇳🇵👋

  4. Beautifully crafted story.
    Loved the way you narrated the story moving from Present to past and back.
    Keep writing, stay blessed.

    1. Thank you very much.

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