नवरात्रि सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है । इस अवसर पर पूरे विश्व के सनातनी संस्कृति के अनुयायी देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना करते हैं। वास्तव में नवरात्रि शक्ति-उपासना का पर्व है। इस अवसर पर लोग देवी भगवती को प्रसन्न कर आने वाले समय की सभी विघ्न-बाधाओं को दूर करने और आगामी कष्टों -संघर्षों से लड़ने की शक्ति प्रदान करने की की प्रार्थना करते हैं ।

जिस प्रकार भारत के पूर्वी-भागों में विशेषकर बंगाल, उड़ीसा, बिहार और असम में दुर्गा- पूजा बड़े -बड़े पंडालों में देवी की मूर्ति स्थापना कर दस दिन तक पूजा की जाती है, पश्चिमी भाग गुजरात , महाराष्ट्र आदि में गरबा और डाँडियाँ नृत्य के द्वारा नवरात्रि का उत्सव मनाया जाता है। उत्तरी भाग कश्मीर, हिमाचल प्रदेश,हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, और उत्तराखंड में व्रत, उपवास , जगराते और माता की चौकी द्वारा देवी को प्रसन्न करने का प्रयास किया जाता है। उसी तरह भारत के दक्षिणी भाग के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में भी बहुत धूम-धाम से यह उत्सव मनाया जाता है। दक्षिणी भारत में नवरात्रि पर्व अन्य राज्यों की अपेक्षा भिन्न तरीके से मनाई जाता है।

शारदीय नवरात्रि पर्व दक्षिणी भारत में गोलू नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। हर घर के आगे बड़ी- बड़ी सुंदर फूलों की या कोलम रंगोली सजाई जाती है जिनमें कलश, गन्ने, पक्षियों आदि का चित्रण किया जाता है। रंगोलियों से सजे हुए साफ़-सुथरे घर बड़े ही मनोहारी लगते हैं।

नवरात्रि के अवसर गोलू गुड़िया और मूर्तियों का यह विषयानुसार (Thematic) प्रदर्शन किया जाता है। हर अवसर पर हर घर में गुड़ियों की सजावट एक मुख्य आकर्षण होता है।गोलू सजावट एक पारंपरिक तरीका है, जिसमें विभिन्न चीजों को एक पट्टी पर सजाकर प्रदर्शित किया जाता है। इसे कोलू, गोलू या ‘बोम्मै कोलू’ ,”गोम्बे हब्बा’, ’ नोम्मला कोलुवु ‘ अथवा ’बोम्मला कोलुवु ‘ कहा जाता है। यद्यपि ये नाम एक जैसे प्रतीत होते हैं किंतु इन सब नामों के अर्थ में थोड़ा सा भिन्नता है । तमिल के ’कोलु”, या ‘बोम्मै कोलू’ का अर्थ देवताओं की उपस्थिति है तो तेलुगु के ’नोम्मला कोलुवु” का अर्थ ’खिलौनों का दरबार” से है। वहीं कन्नड़ में बोम्मै कोलु का अर्थ ’खिलौनों का उत्सव’ से है।

नवरात्रि के अवसर पर घरों में गुड़ियाँ या देवताओं की प्रदर्शनी लगाई जाती हैं। जिसमें आमतौर पर नौ तलों की पट्टियां होती हैं, इनमें विभिन्न प्रकार के सजावटी सामान, गुड़ियाँ और मूर्तियां रखी जाती हैं। नवरात्रि के दौरान, कर्नाटक के घरों में इस गोलू की सजावट को बड़े आनंद से सर्वोत्तम तरीके सजाया जाता है। इसके लिए खास तरीके से तैयारी की जाती है, और घर की महिलाएं और बच्चे इसमें शामिल होते हैं।

गोलू की सजावट में विभिन्न प्रकार की मूर्तियां, गहनों, वस्त्र, और गहनों के आकर्षक आभूषण शामिल होते हैं। यह मूर्तियां अक्सर देवी दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश, और अन्य देवताओं की होती हैं। यहां तक कि कुछ लोग गोलू में सजाई गई गुड़ियों के माध्यम से विभिन्न पौराणिक कथाओं और देवताओं की पूजा का चित्रण करते हैं, जो नवरात्रि के दौरान पाठ-पूजा के लिए प्रयोग किए जाते हैं। नवरात्रि के इस समय, कर्नाटक के घरों में गोलू सजावट की सुंदरता और धार्मिक महत्व से भरपूर माहौल होता है। यह एक अद्वितीय तरीका है जिसमें लोग अपनी भक्ति और आस्था का प्रकट करते हैं

गोलू सजावट की दूसरी महत्वपूर्ण चीज गीतों और नृत्यों का कार्यक्रम होता है। नवरात्रि के इस पर्व के दौरान, घरों में बड़े ही उत्साह के साथ गीत गाए जाते हैं और लोग धार्मिक गीतों के साथ नृत्य करते हैं। इसके साथ ही, कई स्थानीय कलाकार भी शास्त्रीय नृत्य और कर्नाटका शैली के संगीत का प्रदर्शन करते हैं, जिससे इस त्योहार का माहौल और भी रंगीन होता है। कई जगहों पर मेले आदि लगाएँ जाते हैं । विभिन्न गुड़ियों या देवी-देवताओं की झाँकी इनका मुख्य आकर्षण होती है। मंदिरों और प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों को सजाया जाता हैं, उनमें रोशनी की जाती है और दीप जलाए जाते हैं। हालांकि यहाँ उपवास आदि रखने की परंपरा कम ही है किंतु कई घरों में लोग देवी स्तोत्र आदि के पाठ करते हैं।

कर्नाटक के दशहरा पर्व की बात हो और मैसूर का उल्लेख न हो तो बात अधूरी है। एक मान्यता के अनुसार पूर्व में यह शहर यम्मे नाडु या भैंसों ( महिष) की धरती माना जाता था जो बाद में मैसूर कहा गया। मैसूर शब्द की उत्पत्ति मुख्य रूप से महिष उरु शब्द के संधि से हुई है । कन्नड़ में ’उरु’ का अर्थ गाँव है। पौराणिक कहानी के अनुसार यही स्थान महिषासुर की राजधानी भी हुआ करता था।

”दशहरा’ जिसे स्थानीय लोग ”दसारा’ कह कर उच्चारित करते हैं इसका एक विशेष आकर्षण मैसूर का ’ नाडा हब्बा’ है । यहाँ इस अवसर पर मैसूर पैलेस पर एक विशेष मेले का आयोजन होता है। यह दस दिन का मेला होता है। इन दिनों रोशनी से जगमग मैसूर पैलेस की सुंदरता देखते ही बनती है। राज्य के ही नहीं अपितु बाहर के भी अनेक पर्यटक इस मेले को देखने आते हैं। दसवें दिन हाथियों का जुलूस निकलता है। एक मुख्य हाथी के ऊपर मैसूर के वुडेयार राजा की सवारी निकलती है ।जिस पर स्वर्णमयी सिंहासन पर विराजित राजा दर्शकों को मंत्र-मुग्ध करते हुए दर्शन देते हैं। यह अद्भुद अवसर होता है । इस मौके पर मैसूर में भारी भीड़ होती है ।’नाडा हब्बा ’ कर्नाटक का राजकीय उत्सव भी है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह त्यौहार अश्विन मास के दस दिनों तक मनाया जाता है, जो आम तौर पर सितंबर या अक्टूबर के महीनों में पड़ता है।इसीलिए इस अवसर पर राज्य भर के विद्यार्थियों को दस दिन की छुट्टी दी जाती है, ताकि वे इस उत्सव का पूरा आनंद उठा सकें।

चामुंडेश्वरी देवी

मैसूर से 13 किलोमीटर दक्षिण में स्थित चामुंडा पहाड़ी मैसूर का एक प्रमुख पर्यटक स्थल है। इस पहाड़ी की चोटी पर चामुंडेश्वरी मंदिर है जो देवी दुर्गा को समर्पित है।यह मंदिर बारहवीं सदी का निर्मित माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार यही वह स्थान है जहाँ चामुंडा देवी ने दो असुर सेनापति चंड-मुंड को मारा और चामुंडा कहलाईं। बाद में देवी ने यहाँ के असुर राजा महिषासुर को भी मार कर सायुज्य मोक्ष प्रदान किया और महिषासुर मर्दिनी कहलाईं। यह मंदिर देवी दुर्गा की राक्षस महिषासुर पर विजय का प्रतीक है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में देवी की शुद्ध सोने की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर की इमारत सात मंजिला है जिसकी कुल ऊँचाई 40 मी. है। मुख्य मंदिर के पीछे महाबलेश्वर को समर्पित एक छोटा सा मंदिर भी है जो 1000 साल से भी ज्यादा पुराना माना जाता है। चामुंडा पहाड़ी की चोटी से मैसूर शहर का विहंगम दृश्य दिखाई पड़ता है। मंदिर के पास ही महिषासुर की विशाल प्रतिमा रखी हुई है। पहाड़ी के रास्ते में काले ग्रेनाइट के पत्थर से बने नंदी जी के दर्शन भी होते हैं। वैसे तो वर्ष भर चामुंडा देवी के भक्तों की भीड़ रहती ही है किंतु दशहरा के दसों दिन यहाँ भारी संख्या में भक्त देवी का आशीर्वाद लेने आते हैं।

वैसे तो नवरात्रि और दशहरा का यह पर्व पूरे भारत में दुर्गा देवी के उपासना का अवसर समझा जाता है। किंतु खास बात यह है कि कर्नाटक में यह मुख्य रूप से सरस्वती उपासना का समय माना जाता है। इसी लिए यहाँ के संगीत और कला से जुड़े लोगों के लिए यह बहुत ही मुख्य और विशेष अवसर होता है। वे अपनी कला और संगीत के माध्यम से सरस्वती देवी को अपने श्रद्धा पुष्प अर्पित करते हैं। कई लोग इस अवसर पर अपने बच्चों का विद्यारंभ संस्कार करा कर विद्याध्ययन की शुरुआत कराते हैं।

दसारा सामाजिक मेल-जोल का भी अवसर होता है। लोग अपने घरों में सजाई गई गोलू प्रदर्शनी को देखने के लिए आमंत्रित करते हैं। एक दूसरे के गोलू सजावट की तारीफ़ें करते हैं। शुभकामनाओं और मिठाइयों का आदान-प्रदान होता है। नए वस्त्र खरीदे जाते हैं और अपने प्रियजनों को कपड़े और अन्य उपहार बाँटे जाते हैं। कई लोग इस अवसर पर अपने पैतृक गाँव जाते हैं और अपने कुल-देवी या देवता के दर्शन कर पारंपरिक तरीके बंधु-बाँधवों के साथ इस पर्व को मनाते है। पर्व की समाप्ति पर दसवें दिन गोलु गुडियाँ और देवी-देवता सम्मानजनक तरीके पैक कर अगले वर्ष की प्रदर्शनी के लिए सुरक्षित सम्हाल दिए जाते हैं।

नवें और दसवें दिन आयुध पूजन का दिन होता है , जिसमें सभी लोग अपने -अपने रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुओं यथा- लोहे की वस्तुओं, हथियार, मशीनें, औज़ार, अस्त्र-शस्त्र, वाहन आदि की पूजा करते हैं। इस दिन इन सभी वस्तुओं को धोकर फूलों से सजाया जाता है। पूजा के बाद एक दिन के लिए वाहन चलाने का निषेध रहता है। कुम्हड़े (पेठे) की बलि दी जाती है।इनके भीतर कुमकुम रखकर इन्हें दुकानों या घरों के मुख्य द्वार पर रखा जाता है और माना जाता है कि इससे कुदृष्टि का प्रभाव नष्ट होगा।

आयुध पूजन

दशहरा के अंतिम दिन कई स्थानों पर जुलूस, और धार्मिक यात्रा निकाली जाती है। इन यात्राओं में कुछ लोग विभिन्न देवताओं , राक्षसों के रूप रखकर स्वांग रचते हैं। कई जगह में यक्षगणा नाम का पारंपरिक नृत्य भी आयोजित होता है। दशहरा के यह दस दिन कर्नाटक में विशेष उत्साह के दिन माने जाते हैं। दशहरा मनाने का यह अद्भुद तरीका है ,जिसमें पारंपरिकता और नवीनता दोनों का समावेश है । जो अनावश्यक कोलाहल से दूर शांति और उत्साह के साथ देवी सरस्वती की उपासना कर ज्ञान-विज्ञान से जोड़ता है। दक्षिण भारत में नवरात्रि या दशहरा मनाना अपने-आप में विशिष्ट अनुभव है।


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