मूर्खों को ज्ञान देना व्यर्थ है’

बहुत पुरानी बात है । भारत वर्ष के किसी प्रांत के किसी गाँव में कुछ लोग रहते थे। वे दिन भर काम करते और रात भर सोते रहते । उन्हें किसी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं था। यह गाँव पूरी तरह अज्ञानी और मूर्खॊं का गाँव था। एक बार कहीं से एक अल्पज्ञ व्यक्ति यहाँ आ गया । उसने देखा कि गाँव के लोग तो बड़े सीधे-साधे और मूर्ख हैं तो क्यों न उनका लाभ उठाया जाय? अत: उसने संतों के समान वेष धरा और गाँव में रहने लगा

गाँव वालों ने कभी किसी संत को नहीं देखा था। उन्होंने उस संत का परिचय पूछा। संत ने जवाब दिया-“मूर्खों ! मैं तुम्हारा गुरु हूँ। मैं तुम्हारा कल्याण करने आया हूँ! अब से जैसा मैं कहुँगा, वैसा ही करना होगा। ” संत की बात सुनकर गाँव वाले उसे गुरु मान कर उसकी सेवा करने लगे। देखते-ही-देखते संत ने एक बड़ा सा मंदिर बनवा लिया और मज़े से रहने लगा। गाँव के लोग आते और उसकी सेवा करते। इस अल्पज्ञ संत को कुछ आता-जाता तो था नहींं, वह अपनी मनगढ़ंत विद्या गाँव वालों को सिखाता रहता और अंधों में काना राजा बना रहता।

एक दिन की बात है , काशी से एक विद्वान पंडित उस गाँव में पधारे। गाँव वालों ने उनका स्वागत किया। पंडित जी कुछ दिन गाँव में ही रुके। उन्हें पता चला कि गाँव के लोग पूजा-पाठ तो करते हैं, किंतु किसी शास्त्रीय विधि को नहीं जानते थे ।वे सेवा भाव तो रखते हैं किंतु उनके पूजा के तरीके बिल्कुल गलत थे। जब पंडित जी ने उन्हें सही तरीका बताना चाहा तो गाँव वालों ने उनकी बात न मानी । वे पंडित जी को ही मूर्ख ठहराने लगे।

पंडित जी को गाँव वालों की अज्ञानता पर दया आई । उन्होंने कहा ,” तुम लोग कुछ सीखना नहीं चाहते , इसका कारण शायद यह है कि तुम्हारे पास कोई समझाने वाला नहीं है “

गाँव वालों ने कहा-” हमारे पास एक महान गुरु हैं जो हमारा उद्धार करने के लिए ही आए हैं , हम सब सिर्फ़ उनकी बातें ही मानते हैं”

पंडित जी ने सोचा कि इन मूर्खों को समझाने से अच्छा है कि किसी समझदार व्यक्ति से ही बात की जाए। अत: वे संत का चोला पहने हुए उनके चतुर गुरु के पास आए। पंडित जी ने गुरु से अपनी बात कही। गुरु ने सोचा, अब भला ये क्या आफ़त आ गई। अपना अच्छा-भला काम चल रहा था । बैठे-ठाले मुसीबत आ गई। गुरुजी ने पंडित जी से पीछा छुड़ाने के लिए उनकी सब बातों को गलत ठहरा दिया । गाँव वाले तो पहले ही झूठे गुरु के भगत बने बैठे थे। वे अपने गुरु की जय-जयकार करते हुए चल पड़े।

अब तो पंडित जी को गुस्सा आया। उन्होंने गुस्से में गुरुजी को चुनौती दे डाली। “या तो शास्त्रार्थ कर के मेरी बातें गलत साबित करो, या फ़िर खुद हार मान लो।” गुरुजी ने पंडित जी से कहा, ’ठीक है भाई, तू अपनी भी कह ले, मैं अभी-का-अभी तेरा हिसाब कर देता हूँ। ” पंडित जी ने कहा, ” ऐसा नहीं है, शास्त्रार्थ सबके सामने होगा । उसमे शास्त्रीय मत शामिल होंगे। आप भी अच्छे से तैयारी कर आ जाइए।”

अब गुरुजी को तो खुद ही संस्कृत का कुछ ज्ञान ही नहीं था। वे क्या शास्त्रार्थ की तैयारी करते। नियत समय पर मंदिर पर भीड़ जमा हो गई। एक तरफ़ पंडित जी और दूसरी तरफ़ गुरुजी बैठे। शास्त्रार्थ शुरु हुआ। पंडित जी ने गुरु जी से कहा,” आप बड़े हैं अत: प्रश्न पूछने का पहला अवसर आपको देता हूँ। ” ठीक इसी समय कहीं से एक कुत्ता वहाँ आ गया । गुरुजी ने पंडित जी से कहा- ठीक है, बताओ कुत्ते को संस्कृत में क्या कहते हैं ?” पंडित जी अचकचाए। भला ये कैसा प्रश्न ? ये कैसा शास्त्रार्थ?शास्त्रार्थ तो शास्त्रों के आधार पर होते हैं, और यहाँ गुरु जी भाषा का साधारण सा प्रश्न पूछ रहे हैं। फिर भी उन्होंने सोचा कि चलो जवाब दे ही देता हूँ। पंडित जी ने कहा , कुत्ते को संस्कृत में श्वान: और कु्क्कुर: कहते हैं। गुरु जी ठठा कर हँस पड़े । ताली बजाते हुए कहने लगे-” गलत जवाब! कुत्ते को संस्कृत में “कुत्त” कहते हैं इसी से आगे चल कर यह शब्द कुत्ता बन गया। गुरुजी की मूर्खता देखकर तो पंडित जी की आँखें आश्चर्य में बड़ी-बड़ी हो गई। यह देखकर गाँववालों को लगा कि हमारे गुरुजी जीत गए। वे खुशी से तालियाँ बजाने लगे।

तभी कौओं का एक झुंड ऊपर से गुजरा। गुरु जी ने पूछा-“अच्छा ! बताओ कौए को संस्कृत में क्या कहते हैं? पंडित जी गाँव वालों के बौद्धिक स्तर को जान ही चुके थे। उन्होंने सोचा, अगर जवाब न दुँगा तो ये मूर्ख गाँव वाले तो मुझे हारा हुआ ही समझेंगे । अतः इसके उत्तर देने में ही भलाई है। पंडित जी ने जवाब दिया ,” कौए को संस्कृत में काक: कहते हैं ।” गुरुजी बोले ,”जरा ध्यान से सुनो! कौआ बोलते समय ’क्रा‍ऽऽऽव’, क्रा‍ऽऽऽव’ की आवाज निकालता है। अत: इसे संस्कृत मे ’क्राव: बोलते हैं। गाँव वालों को अपने गुरु का मत बहुत ही तर्कसंगत लगा। उन्होंने अपने गुरुजी को विजयी घोषित कर दिया और उनको कंधे में उठा कर जय-जयकार करते हुए चल पड़े।

यह देखकर पंडित जी मे माथा पीट लिया। उन्हें समझ आ गया कि मूर्खों के समक्ष शास्त्रार्थ करना और ज्ञान देना व्यर्थ है। उन्हें समझ आ गया कि शास्त्रों में इसीलिए लिखा गया है कि मूर्ख, हठी, दुष्ट और दुराग्रही से शास्त्रार्थ नहीं करना चाहिए।

दोस्तों , मूर्ख को गुरु बनाने वाले अज्ञान के गर्त में ही पड़े रहते हैं । शास्त्रार्थ के भी नियम होते हैं । विद्वानों के बीच शास्त्रों के वचन को प्रमाण मान कर ही शास्त्रार्थ किए जाते हैं । जो व्यक्ति शास्त्र वचन को ही न माने , उस से शास्त्रार्थ करने का कोई लाभ नहीं। मूर्खों के समक्ष शास्त्रार्थ करना और ज्ञान देना व्यर्थ है। हठी, दुष्ट और दुराग्रही से शास्त्रार्थ नहीं करना चाहिए।

Writer : KUSUM LATA JOSHI

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