‘हरिहर काका’ कहानी में अंधभक्ति और ठाकुरबारी का चरित्र को उजागर कीजिए।
‘हरिहर काका’ कहानी के माध्यम से लेखक ने समाज में फैली अंध भक्ति और धार्मिक पाखंड को प्रभावशाली ढंग से उजागर किया है। हरिहर काका एक सरल, निःसंतान और असहाय वृद्ध हैं, जिनकी संपत्ति पर गाँव के पंडित, महंत और ठाकुरबारी के लोग नज़र गड़ाए रहते हैं। वे धर्म और ईश्वर के नाम पर उनकी सेवा करने का ढोंग करते हैं, जबकि उनका वास्तविक उद्देश्य हरिहर काका की ज़मीन और संपत्ति हथियाना है।
ठाकुरबारी का चरित्र पूरी तरह स्वार्थ, लालच और छल से भरा हुआ है। वहाँ रहने वाले लोग धर्म को मानवता और करुणा से जोड़ने के बजाय उसे अपने लाभ का साधन बना लेते हैं। वे हरिहर काका को डराकर, भ्रमित करके और मोक्ष का लालच देकर अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं। हरिहर काका भी सच्चे भक्त होने के कारण इन बातों में फँस जाते हैं और सोचने-समझने की शक्ति खो बैठते हैं।
इस प्रकार कहानी यह स्पष्ट करती है कि जब भक्ति विवेकहीन हो जाती है, तब वह मनुष्य को शोषण का शिकार बना देती है। ठाकुरबारी का चरित्र समाज में फैले धार्मिक पाखंड और अंध विश्वासों का सजीव प्रतीक बनकर सामने आता है।



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