गद्यांश 1: पुडुकोट्टई (तमिलनाडु): साइकिल चलाना एक सामाजिक आंदोलन है? कुछ अजीब-सी बात है-है न! लेकिन चौंकने की बात नहीं है। पुडुकोट्टई जिले की हज़ारों नवसाक्षर ग्रामीण महिलाओं के लिए यह अब आम बात है। अपने पिछड़ेपन पर लात मारने, अपना विरोध व्यक्त करने और उन जंजीरों को तोड़ने का जिनमें वे जकड़े हुए हैं, कोई-न-कोई तरीका लोग निकालं ही लेते हैं। कभी-कभी ये तरीके अजीबो-गरीब होते हैं।
व्याख्या: तमिलनाडु के पुडुकोट्टई ज़िले में साइकिल चलाना महिलाओं के लिए सिर्फ़ आने-जाने का साधन नहीं रहा, बल्कि यह एक सामाजिक आंदोलन बन गया। पहले यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है, लेकिन यहाँ की हज़ारों नई पढ़ी-लिखी ग्रामीण महिलाएँ अब साइकिल चलाना आम बात मानती हैं। वे साइकिल चलाकर यह दिखाती हैं कि वे अब अपने पिछड़ेपन और बंधनों से बाहर आ रही हैं। लोग जब अपनी परेशानियों और बंधनों से निकलना चाहते हैं, तो वे कोई-न-कोई रास्ता ढूँढ़ ही लेते हैं—कभी-कभी वह तरीका हमें अजीब-सा लगता है।
गद्यांश 2: भारत के सर्वाधिक गरीब जिलों में से एक है पुडुकोट्टई। पिछले दिनों यहाँ की ग्रामीण महिलाओं ने अपनी स्वाधीनता, आज़ादी और गतिशीलता को अभिव्यक्त करने के लिए प्रतीक के रूप में साइकिल को चुना है। उनमें से अधिकांश नवसाक्षर थीं। अगर हम दस वर्ष से कम उम्र की लड़कियों को अलग कर दें तो इसका अर्थ यह होगा कि यहाँ ग्रामीण महिलाओं के एक-चौथाई हिस्से ने साइकिल चलाना सीख लिया है और इन महिलाओं में से सत्तर हजार से भी अधिक महिलाओं ने ‘प्रदर्शन एवं प्रतियोगिता’ जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में बड़े गर्व के साथ अपने नए कौशल का प्रदर्शन किया और अभी भी उनमें साइकिल चलाने की इच्छा जारी है। वहाँ इसके लिए कई ‘प्रशिक्षण शिविर’ चल रहे हैं।
व्याख्या: पुडुकोट्टई भारत के सबसे गरीब जिलों में से एक है। यहाँ की ग्रामीण महिलाओं ने अपनी आज़ादी और स्वतंत्रता दिखाने के लिए साइकिल को एक प्रतीक बना लिया है। ज़्यादातर महिलाएँ नई-नई पढ़ी-लिखी (नवसाक्षर) थीं। अगर 10 साल से कम उम्र की लड़कियों को छोड़ दें, तो गाँव की लगभग एक चौथाई महिलाएँ साइकिल चलाना सीख चुकी थीं। इनमें से 70,000 से भी ज़्यादा महिलाओं ने प्रतियोगिता और प्रदर्शन जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में गर्व से अपनी यह कला दिखाई। आज भी उनकी साइकिल चलाने की इच्छा बनी हुई है। इसी कारण वहाँ कई प्रशिक्षण शिविर (training camps) चल रहे हैं।
गद्यांश 3: ग्रामीण पुडुकोट्टई के मुख्य इलाकों में अत्यंत रूढ़िवादी पृष्ठभूमि से आईं युवा मुस्लिम लडकियाँ सडकों से अपनी साइकिलों पर जाती हुई दिखाई देती हैं। जमीला बीवी नामक एक युवती ने जिसने साइकिल चलाना शुरू किया है, मुझसे कहा-“यह मेरा अधिकार है, अब हम कहीं भी जा सकते हैं। अब हमें बस का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। मुझे पता है कि जब मैंने साइकिल कोई चलाना शुरू किया तो लोग फ़ब्तियाँ कसते थे। लेकिन मैंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।”
व्याख्या: पुडुकोट्टई के ग्रामीण इलाकों में, जहाँ समाज बहुत रूढ़िवादी है, वहाँ की युवा मुस्लिम लड़कियाँ अब सड़कों पर साइकिल चलाते हुए दिखाई देती हैं। जमीला बीवी नाम की एक लड़की ने कहा — “यह मेरा अधिकार है। अब हम कहीं भी जा सकते हैं और हमें बस का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। मुझे पता है कि जब मैंने साइकिल चलाना शुरू किया था तो लोग ताने मारते थे, लेकिन मैंने उनकी परवाह नहीं की।”
गद्यांश 4: फातिमा एक माध्यमिक स्कूल में पढ़ाती हैं और उन्हें साइकिल चलाने का ऐसा चाव लगा है कि हर शाम आधा घंटे के लिए किराए पर साइकिल लेती हैं। एक नयी साइकिल खरीदने की उनकी हैसियत नहीं है। फातिमा ने बताया कि-“साइकिल चलाने में एक खास तरह की आज़ादी है। हमें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मैं कभी इसे नहीं छोड़ेंगी।” जमीला, फातिमा और उनकी मित्र अवकन्नी-इन सबकी उम्र 20 वर्ष के आसपास है और इन्होंने अपने समुदाय की अनेक युवतियों को साइकिल चलाना सिखाया है।
व्याख्या: फातिमा एक माध्यमिक स्कूल की अध्यापिका हैं। उन्हें साइकिल चलाने का इतना शौक है कि हर शाम वे आधे घंटे के लिए किराए पर साइकिल लेती हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि वे अपनी नई साइकिल खरीद सकें। फातिमा कहती हैं — “साइकिल चलाने से एक खास तरह की आज़ादी महसूस होती है। हमें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मैं कभी साइकिल चलाना नहीं छोड़ूँगी।”फातिमा, जमीला और उनकी मित्र अवकन्नी — ये सभी लगभग 20 साल की उम्र की युवतियाँ हैं। इन्होंने अपने समाज की कई अन्य लड़कियों को भी साइकिल चलाना सिखाया है।
गद्यांश 5: इस जिले में साइकिल की धूम मची हुई है। इसकी प्रशंसकों में हैं महिला खेतिहर मज़दूर, पत्थर खदानों में मज़दूरी करनेवाली औरतें और गाँवों में काम करनेवाली नर्से। बालवाड़ी और आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, बेशकीमती पत्थरों को तराशने में लगी औरतें और स्कूल की अध्यापिकाएँ भी साइकिल का जमकर इस्तेमाल कर रही हैं। ग्राम सेविकाएँ और दोपहर का भोजन पहुँचानेवाली सबसे बड़ी संख्या उन लोगों की है जो अभी नवसाक्षर हुई हैं । जिस किसी नवसाक्षर अथवा नयी-नयी साइकिल चलानेवाली महिला से मैंने बातचीत की, उसने साइकिल चलाने और अपनी व्यक्तिगत आज़ादी, के बीच एक सीधा संबंध बताया।
व्याख्या: इस जिले में साइकिल बहुत लोकप्रिय हो गई है। इसे चलाने वालों में महिला खेत मज़दूर, पत्थर की खदानों में काम करने वाली औरतें और गाँवों में काम करने वाली नर्सें शामिल हैं। इसके अलावा बालवाड़ी और आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, कीमती पत्थरों को तराशने वाली महिलाएँ और स्कूल की अध्यापिकाएँ भी साइकिल का खूब इस्तेमाल कर रही हैं।
ग्राम सेविकाएँ और दोपहर का भोजन पहुँचाने वाली महिलाएँ भी बड़ी संख्या में साइकिल चलाती हैं। इनमें अधिकतर वे महिलाएँ हैं जो हाल ही में पढ़ना-लिखना सीखी हैं (नवसाक्षर)। मैंने जब भी किसी ऐसी नवसाक्षर या नई साइकिल सीखने वाली महिला से बात की, तो उसने साइकिल चलाने और अपनी व्यक्तिगत आज़ादी के बीच सीधा संबंध बताया।
गद्यांश6: साइकिल आंदोलन की एक अगुआ का कहना है, “मुख्य बात यह है कि इस आंदोलन ने महिलाओं को बहुत आत्मविश्वास प्रदान किया। महत्वपूर्ण यह है कि इसने पुरुषों पर उनकी निर्भरता कम कर दी है। अब हम प्रायः देखते हैं कि कोई औरत अपनी साइकिल पर चार किलोमीटर तक की दूरी आसानी से तय कर पानी लाने जाती है। कभी-कभी साथ में उसके बच्चे भी होते हैं। यहाँ तक कि साइकिल से दूसरे स्थानों से सामान ढोने की व्यवस्था भी खुद ही की जा सकती है। लेकिन यकीन मानिए, जब इन्होंने साइकिल चलाना शुरू किया तो इन पर लोगों ने जमकर प्रहार किया जिसे इन्हें झेलना पड़ा। गंदी-गंदी टिप्पणियाँ की गईं लेकिन धीरे-धीरे साइकिल चलाने को सामाजिक स्वीकृति मिली। इसलिए महिलाओं ने इसे अपना लिया।
व्याख्या: आंदोलन की एक नेता ने कहा — “इस आंदोलन से महिलाओं को बहुत आत्मविश्वास मिला है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब उनकी पुरुषों पर निर्भरता कम हो गई है। अब अक्सर महिलाएँ अपनी साइकिल पर चार किलोमीटर तक का सफर तय करके पानी भरने जाती हैं। कई बार उनके बच्चे भी साथ होते हैं। वे साइकिल से दूसरे स्थानों से सामान भी खुद ला सकती हैं।
लेकिन सच यह है कि जब महिलाओं ने साइकिल चलाना शुरू किया, तो लोगों ने उन पर बहुत आलोचना की और बुरी-बुरी बातें कहीं। गंदी टिप्पणियाँ भी की गईं। पर धीरे-धीरे समाज ने साइकिल चलाने को स्वीकार कर लिया और महिलाओं ने इसे अपना लिया।”
गद्यांश 7: साइकिल प्रशिक्षण शिविर देखना एक असाधारण अनुभव है। किलाकुरुचि गाँव में सभी साइकिल सीखनेवाली महिलाएँ रविवार को इकट्ठी हुई थीं। साइकिल चलाने के आंदोलन के समर्थन में ऐसे आवेग देखकर कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता। उन्हें इसे सीखना ही है। साइकिल ने उन्हें पुरुषों द्वारा थोपे गए दायरे के अंदर रोज़मर्रा की घिसी-पिटी चर्चा से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया। ये नव-साइकिल चालक गाने भी गाती हैं। उन गानों में साइकिल चलाने को प्रोत्साहन दिया गया है। इनमें से एक गाने की पंक्ति का भाव है-‘ओ बहिना, आ सीखें साइकिल, घूमें समय के पहिए संग…’
व्याख्या: साइकिल प्रशिक्षण शिविर देखना वाकई एक अनोखा अनुभव है। किलाकुरुचि गाँव में रविवार के दिन साइकिल सीखने वाली सभी महिलाएँ एक साथ इकट्ठा हुईं। साइकिल आंदोलन के समर्थन में महिलाओं का ऐसा उत्साह देखकर कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता। इन महिलाओं का कहना है कि उन्हें यह ज़रूर सीखना है। साइकिल ने उन्हें पुरुषों द्वारा बनाए गई सीमाओं से बाहर निकलकर, पुरानी और बार-बार दोहराई जाने वाली रूढ़िवादी बातें छोड़ने का नया रास्ता दिखाया है।
ये नई साइकिल सीखने वाली महिलाएँ गाने भी गाती हैं। उन गानों में साइकिल चलाने के लिए प्रेरणा दी जाती है। उनमें से एक गीत का भाव है — “ओ बहना, आ साइकिल सीखें, और समय के पहिए के साथ घूमें…”
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गद्यांश8: जिन्हें साइकिल चलाने का प्रशिक्षण मिल चुका है उनमें से बहुत बड़ी संख्या में साइकिल सीख चुकी महिलाएँ अभी नयी-नयी साइकिल सीखनेवाली महिलाओं को भरपूर सहयोग देती हैं। उनमें यहाँ न केवल सीखने सिखाने की इच्छा दिखाई देती है; बल्कि उनके बीच यह उत्साह भी दिखाई देता है कि सभी महिलाओं को साइकिल चलाना सीखना चाहिए।
व्याख्या: जो महिलाएँ पहले से साइकिल चलाना सीख चुकी हैं, वे अब नई-नई सीखने वाली महिलाओं की मदद करती हैं। इनमें केवल सीखने और सिखाने की इच्छा ही नहीं दिखाई देती, बल्कि यह उत्साह भी झलकता है कि सभी महिलाएँ साइकिल चलाना ज़रूर सीखें।
गद्यांश9: 1992 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के बाद अब यह जिला कभी भी पहले जैसा नहीं हो सकता। हैंडल पर झंडियाँ लगाए घंटियाँ बजाते हुए साइकिल पर सवार । 1500 महिलाओं ने पुडुकोट्टई में तुफान ला दिया। महिलाओं की साइकिल चलाने की इस तैयारी ने यहाँ रहनेवालों को हक्का बक्का कर दिया।
व्याख्या: साल 1992 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के बाद पुडुकोट्टई ज़िले का माहौल पूरी तरह बदल गया। उस दिन 1500 महिलाएँ अपनी साइकिलों पर सवार थीं। उन्होंने हैंडल पर झंडियाँ लगाई थीं और घंटियाँ बजा रही थीं। इस तरह से वे जुलूस की तरह निकलीं। उन्होंने इस रैली के बाद वहाँ का माहौल पूरी तरह बदल दिया। महिलाओं की इस तैयारी और आत्मविश्वास ने पूरे जिले को चकित कर दिया और लोगों को यह एहसास हुआ कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहेंगे।

गद्यांश 10: इस सारे मामले पर पुरुषों की क्या राय थी? इसके पक्ष में ‘आर. साइकिल्स’ के मालिक को तो रहना ही था। इस अकेले डीलर के यहाँ लेडीज साइकिल की बिक्री में साल भर के अदर काफी वृद्धि हुई। माना जा सकता है कि इस आँकड़े को दो कारणों से कम करके आंका गया। पहली बात तो यह है कि ढेर सारी महिलाओं ने जो लेडीज साइकिल का इंतजार नहीं कर सकती थी. जेंट्स साइकिलें खरीदने लगीं। दूसरे, उस डीलर ने बड़ी सतर्कता के साथ यह जानकारी मुझे दी थी उसे लगा कि मैं बिक्री कर विभाग का कोई आदमी हूँ।
व्याख्या: जब महिलाओं के साइकिल आंदोलन की बात हुई, तो सवाल उठा कि पुरुषों की इस पर क्या राय है? इसमें तो सबसे अधिक खुश ‘आर. साइकिल्स’ नामक दुकान के मालिक ही हो सकते थे। क्योंकि उनके यहाँ लेडीज़ साइकिल की बिक्री एक साल के भीतर काफी बढ़ गई थी।लेकिन असली स्थिति इस आँकड़े से भी बड़ी थी। दो कारण थे जिनसे असली संख्या कम करके गिनी गई —क्योंकि बहुत-सी महिलाएँ लेडीज़ साइकिल का इंतज़ार नहीं कर सकीं और उन्होंने जेंट्स साइकिलें खरीद लीं। दूसरी बात ,उस दुकान के मालिक ने बिक्री के आँकड़े बड़े सावधानी से बताए, क्योंकि उन्हें लगा कि शायद मैं बिक्री कर (टैक्स) विभाग का अधिकारी हूँ।
गद्यांश11: कुदिमि अन्नामलाई की चिलचिलाती धूप में एक अद्भुत दृश्य की तरह पत्थर के खदानों में दौड़ती भागती बाईस वर्षीय मनोरमनी को लोगों ने साइकिल सिखलाते देखा। उसने मुझे बताया “हमारा इलाका मुख्य शहर से कटा हुआ है। यहाँ जो साइकिल चलाना जानते हैं उनकी गतिशीलता बढ़ जाती है।”
व्याख्या: लेखक को कुदुमि अन्नामलाई नामक शहर में एक अनोखा नज़ारा देखने को मिला।बाईस वर्षीय मनोरमनी पत्थर की खानों में तेज़ धूप में ही दौडती-भागती हुई लोगों को साइकिल सिखा रही थी। उसने लेखक को बताया कि यह इलाका शहर से दूर अलग-थलग है। इसलिए साइकिल चलाने वाले जानने वाले लोग आसानी से एक जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं और उनकी गतिशीलता बढ़ जाती है।
गद्यांश 12: साइकिल चलाने के बहुत निश्चित आर्थिक निहितार्थ थे। इससे आय में वृद्धि हुई है। यहाँ की कुछ महिलाएँ अगल बगल के गाँवों में कृषि संबंधी अथवा अन्य उत्पाद बेच आती हैं। साइकिल की वजह से बसों के इंतजार में व्यय होने वाला उनका समय बच जाता है। खराब परिवहन व्यवस्था वाले स्थानों के लिए तो यह बहुत महत्वपूर्ण है। दूसरे, इससे इन्हें इतना समय मिल जाता है कि ये अपने सामान बेचने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर पाती हैं।तीसरे इससे ये और अधिक इलाकों में जा पाती हैं। अंतिम बात यह है कि अगर आप चाहें तो इससे आराम करने का काफ़ी समय मिल सकता है।
व्याख्या: साइकिल चलाने से महिलाओं को सीधा आर्थिक लाभ मिला। उनकी आय बढ़ी क्योंकि अब वे आसपास के गाँवों में जाकर कृषि से जुड़ी चीज़ें या अन्य सामान बेच सकती हैं।साइकिल होने से उन्हें बस का इंतज़ार करने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ता, जो ख़ासकर उन जगहों पर बहुत ज़रूरी है जहाँ बस आदि सामुहिक गाड़ियों की सुविधा अच्छी नहीं है। इसके अलावा, साइकिल चलाकर आने-जाने से उनके पास इतना समय बच जाता है कि वे अपने सामान बेचने पर अधिक ध्यान दे पाती हैं। साथ ही, वे पहले से ज़्यादा इलाकों में जा सकती हैं। और चाहें तो अपने लिए आराम का समय भी निकाल सकती हैं।
गद्यांश 13: जिन छोटे उत्पादकों को बसों का इंतजार करना पड़ता था, बस स्टॉप तक पहुँचने के लिए भी पिता, भाई, पति या बेटों पर निर्भर रहना पड़ता था। वे अपना सामान बेचने के लिए कुछ गिने-चुने गाँवों तक ही जा पाती थीं। कुछ को पैदल ही चलना पड़ता था। जिनके पास साइकिल नहीं है वे अब भी पैदल ही जाती हैं। फिर उन्हें बच्चों की देखभाल के लिए या पीने का पानी लाने जैसे घरेलू कामों के लिए भी जल्दी ही भागकर घर पहुंचना पड़ता था। अब जिनके पास साइकिलें हैं वे सारा काम बिना किसी दिक्कत के कर लेती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अब आप किसी सुनसान रास्ते पर भी देख सकते हैं कि कोई युवा-माँ साइकिल पर आगे अपने बच्चे को बैठाए, पीछे कैरियर पर सामान लादे चली जा रही है। वह अपने साथ पानी से भरे दो या तीन बर्तन लिए अपने घर या काम पर जाती हुई देखी जा सकती हैं।
व्याख्या:पहले छोटे किसान और कामकाजी महिलाएँ बसों पर निर्भर थीं। उन्हें बस पकड़ने के लिए स्टॉप तक पहुँचने में अपने पिता, भाई, पति या बेटों की मदद लेनी पड़ती थी। इस वजह से वे अपना सामान केवल कुछ गिने-चुने गाँवों में ही बेच पाती थीं। कुछ महिलाएँ तो पैदल ही चलने को मजबूर थीं। आज भी जिनके पास साइकिल नहीं है, वे पैदल ही जाती हैं। और फिर जल्दी-जल्दी घर लौटना पड़ता है ताकि बच्चों की देखभाल कर सकें या पानी भरने जैसे घरेलू काम कर सकें। लेकिन जिनके पास साइकिल है, उनके लिए सब कुछ आसान हो गया है। अब तो यह आम नज़ारा है कि कोई युवा माँ अपनी साइकिल पर आगे बच्चे को बिठाए, पीछे सामान लादे, और साथ में 2–3 पानी के बर्तन लेकर घर या काम की ओर जा रही है।
गद्यांश 14: अन्य पहलुओं से ज्यादा आर्थिक पहलू पर ही बल देना गलत होगा। साइकिल प्रशिक्षण से महिलाओं के अंदर आत्मसम्मान की भावना पैदा हुई है यह बहुत महत्वपूर्ण है। फातिमा का कहना है “बेशक, यह मामला केवल आर्थिक नहीं है।” फातिमा ने यह बात इस तरह कही जिससे मुझे लगा कि मैं कितनी मूर्खतापूर्ण ढंग से सोच रहा था। उसने आगे कहा “साइकिल चलाने से मेरी कौन सी कमाई होती है। मैं तो पैसे ही गँवाती हूँ। मेरे पास इतने पैसे नहीं है कि मैं साइकिल खरीद सकूँ। लेकिन हर शाम में किराए पर साइकिल लेती हूँ ताकि मैं आजादी और खुशहाली का अनुभव कर सकूँ।” पुडुकोट्टई पहुँचने से पहले मैंने इस विनम्र सवारी के बारे में कभी इस तरह सोचा हो नहीं था। मैंने कभी साइकिल को आजादी का प्रतीक नहीं समझता था।
व्याख्या : लेखक का मानना है कि साइकिल आंदोलन को सिर्फ़ पैसों से जोड़कर देखना गलत है। साइकिल सीखने से महिलाओं में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास आया है, और यही सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। फातिमा कहती हैं कि यह सिर्फ़ पैसों की बात नहीं है। साइकिल चलाने से फातिमा की कोई कमाई नहीं होती, बल्कि वे तो पैसे खर्च करती हूँ। मेरे पास अपनी साइकिल खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, इसलिए हर शाम किराए पर साइकिल लेती हैं। लेकिन वे ऐसा इसलिए करती हैं क्योंकि इससे उन्हें आज़ादी और खुशी का अनुभव होता है।” लेखक स्वीकार करता है कि पुडुकोट्टई आने से पहले उसने कभी साइकिल जैसी सस्ती सवारी को इस नज़रिये से नहीं देखा था। उसने कभी साइकिल को आज़ादी का प्रतीक नहीं माना था।
गद्यांश 15: एक महिला ने बताया “लोगों के लिए यह समझना बड़ा कठिन है कि ग्रामीण महिलाओं के लिए यह कितनी बड़ी चीज है। उनके लिए तो यह हवाई जहाज उड़ाने जैसी बड़ी उपलब्धि है। लोग इस पर हँस सकते हैं लेकिन केवल यहाँ की औरतें ही समझ सकती हैं कि उनके लिए यह कितना महत्वपूर्ण है। जो पुरुष इसका विरोध करते हैं. वे जाएँ और टहलें क्योंकि जब साइकिल चलाने की बात आती है. वे महिलाओं की बराबरी कर ही नहीं सकते।”
—पी. साईनाथ
व्याख्या:एक महिला ने कहा — “लोगों के लिए यह समझना आसान नहीं है कि ग्रामीण महिलाओं के लिए साइकिल चलाना कितना बड़ा काम है। उनके लिए यह हवाई जहाज़ उड़ाने जैसी बड़ी उपलब्धि है। लोग भले ही इस पर हँसें, लेकिन असल में केवल यही महिलाओं के लिए यह बहुत बड़ी महत्वपूर्ण है। इसका विरोध करने वाले पुरुष चाहें तो महिलाओं का मज़ाक उड़ाएँ या टहल लें, लेकिन सच्चाई यह है कि वे भी साइकिल चलाने के मामले में महिलाओं की बराबरी नहीं कर सकते। अर्थात साइकिल चलाने में महिलाओं ने पुरुषों को भी मात दे दी है।”

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