Manushyata NCERT Class 10 Hindi B Sparsh Chapter 4 Solutions,पाठ 4मनुष्यता

विषय सारणी

  1. मनुष्यता-कवि परिचय:
  2. मनुष्यता(कविता)
  3. मनुष्यता कविता का भावार्थ:
  4. मनुष्यता कविता के पाठ पर आधारित प्रश्न -उत्तर:

मनुष्यता-कवि परिचय:

मैथिलीशरणगुप्त जी का जन्म 3 अगस्त 1886 में झाँसी के पास चिरगाँव, उत्तरप्रदेश में हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमति काशीबाई और पिता का नाम रामचरण गुप्त था। इनके भाई सियाराम शरण गुप्त भी जाने-माने सुप्रसिद्ध कवि थे। पिता भी भगवान राम के भक्त थे और कनकलता नाम से कविताएँ भी लिखते थे। मैथिलीशरणगुप्त जी की शिक्षा -दीक्षा घर पर ही हुई। हिंदी के अतिरिक्त इन्हें संस्कृत, बांग्ला, मराठी और अंग्रेज़ी का भी अच्छा ज्ञान था। परिवार के राम भक्ति का प्रभाव मैथिलीशरण गुप्त जी पर भी पड़ा । उनकी राम का कीर्तिगान करने की अभिलाषा रही । मैथिलीशरणगुप्त जी द्वारा लिखी गई “साकेत” इसी चिर संचित इच्छा का परिणाम था।इन्होंने अपने कवित्त में भारतीय दर्शन और जीवन की समग्रता को प्रस्तुत करने की कोशिश की। भारतीय पौराणिक साहित्य के चरित्रों से प्रभावित थे। इनकी प्रमुख कृतियाँ साकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध, अर्जुन की प्रतिज्ञा,नहुष का पतन आदि हैं। इनकी कविता की भाषा खड़ी बोली है । इनकी भाषा पर संस्कृत का अच्छा प्रभाव दिखता है। मैथिलीशरणगुप्त अपने जीवनकाल में ही प्रसिद्ध हो गए थे। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू इनसे बहुत प्रभावित थे। महात्मा गाँधी ने इनके काव्य से प्रभावित होकर इन्हें 1936 में ही इनको राष्ट्रकवि की उपाधि दी थी। 1954 में इन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 12 दिसंबर 1968 में अपने पैतृक गाँव चिर गाँव झाँसी में ही इनकी मृत्यु हो गई।

मनुष्यता(कविता)

मनुष्यता—मैथिली शरण गुप्त

Ranti deva giving food to begger

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती¸
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे।।

क्षुधार्थ रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

सहानुभूति चाहिए¸ महाविभूति है वही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरूद्धवाद बुद्ध का दया–प्रवाह में बहा¸
विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहा?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे¸
वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में|
अनाथ कौन हैं यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबन्धु के बड़े विशाल हाथ हैं|
अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े¸
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े–बड़े।
परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी¸
अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

“मनुष्य मात्र बन्धु है” यही बड़ा विवेक है¸
पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है¸
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए¸
विपत्ति विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ¸ बढ़े न भिन्नता कभी¸
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

मनुष्यता कविता का भावार्थ:

पद: विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

प्रसंग -: प्रस्तुत कविता “मनुष्यता” हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। इन पंक्तिओं में कवि बताना चाहता है कि मनुष्यों को कैसा जीवन जीना चाहिए।

व्याख्या -: कवि कहता है कि हमें यह जान लेना चाहिए कि मृत्यु का होना निश्चित है, हमें मृत्यु से नहीं डरना चाहिए। हमें मरने से पहले हमें ऐसे कार्य करने चाहिए कि हमारी मृत्यु के बाद भी लोग हमें याद रखे। अगर हमारी मृत्यु ऐसी सुमृत्यु न हुई तो हमारा जीना और मरना दोनों बेकार है । कवि के अनुसार जो व्यक्ति परोपकार युक्त जीवन नहीं जीता और सिर्फ़ अपने उदर पूर्ति में ही लगा रहता है वह पशुवत है क्योंकि पशु सिर्फ़ अपने पेट भरने तक ही सीमित रहते हैं। कवि के अनुसार मनुष्य वही है जो दूसरे मनुष्यों के लिए मरे अर्थात जो मनुष्य दूसरों की चिंता करे वही सच्चा मनुष्य है।

पद: उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती¸
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे।।

प्रसंग -: प्रस्तुत कविता“मनुष्यता” हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। इन पंक्तिओं में कवि बताना चाहता है कि जो मनुष्य दूसरों के लिए जीते हैं उनका गुणगान युगों – युगों तक किया जाता है।

व्याख्या -: कवि कहता है कि जो मनुष्य अपन जीवन में दूसरों की चिंता करता है, परोपकार करता है उस महान व्यक्ति की कथा का गुण गान सरस्वती अर्थात पुस्तकों में किया जाता है। धरती उस महान व्यक्ति के प्रति आभारी रहती है। उस दयालु व्यक्ति की कीर्ति सदैव जीवित रहती है और पूरी सृष्टि ुसका यशोगान करती है कि जो व्यक्ति पुरे संसार में एकता और अपनेपन की भावना में बाँधता है और मनुष्यता के लिए कार्य करता है , वही सही शब्दों में मनुष्य है।

पद: क्षुधार्थ रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। 

Read this :

राजा रंतिदेव की कथा

राजा शिबि

 प्रसंग -: प्रस्तुत कविता“मनुष्यता” हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। इन पंक्तिओं में कवि ने महान पुरुषों के उदाहरण दिए हैं जिनकी महानता के कारण उन्हें याद किया जाता है।

व्याख्या -: कवि कहता है कि पौराणिक कथाएं ऐसे व्यक्तिओं के उदाहरणों से भरी पड़ी हैं जिन्होंने अपना जीवन दूसरों की भलाई के लिए त्याग दिया इसी कारण उन्हें आज तक याद किया जाता है। भूख से पीड़ित राजा रंतिदेव ने अपने हाथ की आखरी थाली भी दान कर दी थी और महर्षि दधीचि ने तो अपने पूरे  शरीर की हड्डियाँ वज्र बनाने के लिए दान कर दी थी। उशीनर देश के राजा शिबि ने कबूतर की जान बचाने  के लिए अपना पूरा मांस दान कर दिया था। वीर कर्ण ने अपनी ख़ुशी से अपने शरीर से चमड़ी की तरह जुड़ा हुआ कवच-कुंडल तक दान कर दिया था। इन सब उदाहरणों के द्वारा कवि कहना चाहता है कि शरीर तो नाशवान है उसके मोह में फ़ँस कर नित्य जीव को डरना नहीं चाहिए।मनुष्य वही है जो परोपकार पूर्ण जीवन जीता है ।

(नोट: सनातन शास्त्रों के अनुसार जीव अर्थात आत्मा अमर-अजर है जबकि शरीर नष्ट हो सकता है। नैनं छिन्दन्ति शास्त्रिाणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्तापो न शोषयति मारूतः।।

पद: सहानुभूति चाहिए¸ महाविभूति है वही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरूद्धवाद बुद्ध का दया–प्रवाह में बहा¸
विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहा?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे¸
वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

प्रसंग -: प्रस्तुत कविता” मनुष्यता “ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। इन पंक्तिओं में कवि ने महात्मा बुद्ध का उदाहरण देते हुए दया ,करुणा को सबसे बड़ा धन बताया है।

व्याख्या -: कवि कहता है कि मनुष्य के मन में प्राणीमात्र के प्रति सह अनुभूति अर्थात उनके सुख में सुखी होना और दुःख में दुखी होने की अनुभूति होनी चाहिए। दया व करुणा का भाव होना चाहिए ,यही सबसे बड़ी विभूति अर्थात धन है। ऐसे दयालु लोगों पर पृथ्वी भी सदैव धन्य रहती है और उस पर कृपा करती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महात्मा बुद्ध हैं जिनसे लोगों का दुःख नहीं देखा गया तो वे लोक कल्याण के लिए वेद – विरुद्ध चले गए।(माना जाता है कि यज्ञादि के अवसर पर अतिशय पशु-बलि देखकर भगवान बुद्ध ने वैदिक-हिंसा का निषेध किया था ।) फ़िर भी क्या पूरा संसार उनके सामने नहीं झुकता अर्थात उनके दया भाव व परोपकार के कारण आज भी उनको याद किया जाता है।कवि के अनुसार वही उदार है, जो परोपकार करता है |वही मनुष्य कहलाने योग्य है

पद: रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में|
अनाथ कौन हैं यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबन्धु के बड़े विशाल हाथ हैं|
अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

प्रसंग -: प्रस्तुत कविता  ” मनुष्यता “ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। इन पंक्तिओं में कवि कहता है कि सम्पति पर कभी घमण्ड नहीं करना चाहिए और किसी को अनाथ नहीं समझना चाहिए क्योंकि ईश्वर सबके साथ हैं।

व्याख्या -: कवि कहता है कि भूल कर भी कभी धन संपत्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए। क्योंकि सांसारिक धन-संपत्ति अत्यंत तुच्छ‍ वस्तु है।न ही कभी इस बात पर कभी गर्व नहीं करना चाहिए कि हमारे अपने हमारे साथ है क्योंकि यहाँ कोई भी व्यक्ति अनाथ नहीं है क्योंकि तीनों लोकों के स्वामी ईश्वर सब के साथ है। वह बहुत दयावान है सर्वसमर्थ है। कवि कहता है कि वह व्यक्ति अत्यधिक भाग्यहीन है जो किसी प्रकार का उतावलापन रखता है, जो कुछ पाने के लिए जल्दबाज़ी करता है। मनुष्य वही व्यक्ति कहलाता है जो परोपकारपूर्ण जीवन जीता है।

पद: अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े¸
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े–बड़े।
परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी¸
अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

प्रसंग -: प्रस्तुत कविता“मनुष्यता” हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। इन पंक्तिओं में कवि कहता है कि कलंक रहित रहने व दूसरों का सहारा बनने वाले मनुष्य का देवता भी स्वागत करते हैं।

व्याख्या -: कवि कहता है कि असीम आकाश में असंख्य देवता अपने विशाल भुजाओं को फैलाकर स्वागत कर हैं। हे मनुष्यो तुम एक दूसरे का सहारा लेकर ऊपर उठो और आगे बढ़ो। तुम सभी कलंक रहित हो कर मृत्यु रहित देवताओं की गोद में बैठो अर्थात पापरहित जीवन जी कर ईश्वर की प्राप्ति करो।हमें दूसरों का कल्याण व उद्धार करना चाहिए न कि किसी के कार्य में बाधा डालनी चाहिए। मनुष्य वही है जो मनुष्यों का कल्याण करे व परोपकार करे।

पद: मनुष्य मात्र बन्धु है” यही बड़ा विवेक है¸
पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है¸
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

प्रसंग -: प्रस्तुत कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। इन पंक्तिओं में कवि कहता है कि हम सब एक ईश्वर की संतान हैं। अतः हम सभी मनुष्य एक – दूसरे के भाई – बन्धु हैं।

व्याख्या -: कवि कहता है कि प्रत्येक मनुष्य एक दूसरे के भाई – बन्धु हैं ।यह सबसे बड़ी समझ है। पुराणों में जिसे स्वयं उत्पन्न पुरुष माना गया है, वह परमात्मा या ईश्वर हम सभी का पिता है, अर्थात सभी मनुष्य उस एक ईश्वर की संतान हैं। बाहरी  कारणों के अनुसार अर्थात भले ही कर्मफ़ल अलग अलग दिखाई देते हों ,परन्तु हमारे वेद इस बात के साक्षी है कि सभी के मूल में एक ईश्वर ही व्याप्त है। कवि कहता है कि यदि भाई ही भाई के दुःख व कष्टों का नाश नहीं करेगा तो उसका जीना व्यर्थ है।मनुष्य वही है जो मनुष्यों का कल्याण करे व परोपकार करे।

पद: चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए¸
विपत्ति विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ¸ बढ़े न भिन्नता कभी¸
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

प्रसंग -: प्रस्तुत कविता “मनुष्यता” हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। इन पंक्तिओं में कवि कहता है कि यदि हम ख़ुशी से,सारे कष्टों को हटाते हुए ,भेदभाव रहित रहेंगे तभी संभव है की समाज की उन्नति होगी।

व्याख्या -: कवि कहता है कि मनुष्यों को अपनी इच्छा से चुने हुए मार्ग में ख़ुशी ख़ुशी चलना चाहिए,रास्ते में कोई भी संकट या बाधाएं आये, उन्हें हटाते  चले जाना चाहिए। मनुष्यों को यह ध्यान रखना चाहिए कि आपसी समझ न बिगड़े और भेदभाव न बढ़े। सभी को बिना किसी तर्क- वितर्क के इस बात पर सम्मत होना चाहिए कि सभी का लक्ष्य एक ही ईश्वर की प्राप्ति है और सतर्क होकर ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चलना चाहिए।यह तभी यह संभव होगा कि मनुष्य दूसरों की उन्नति और कल्याण करते हुए स्वयं का कल्याण या भला भी करे। मनुष्य वही है जो मनुष्यों का कल्याण करे व परोपकार करे।

मनुष्यता कविता के पाठ पर आधारित प्रश्न -उत्तर:

 (क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
प्रश्न 1.कवि ने कैसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है?
उत्तर-जो मनुष्य मानवता को सर्वोपरि धर्म मानता है ।जो परोपकार पूर् जीवन जीये।जिस मनुष्य को उसकी मृत्यु के बाद भी लोग उसके अच्छे कार्यों के कारण याद रखते हैं ऐसे व्यक्ति की मृत्यु को ही कवि ने सुमृत्यु कहा है।

प्रश्न 2. उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?
उत्तर-उदार व्यक्ति की पहचान यह है कि वह इस असीम संसार में आत्मीयता का भाव भरता है। सभी प्राणियों के साथ अपनेपन का व्यवहार करता है, नित्य परोपकार के कार्य करता है, जिसके हृदय में दूसरों के प्रति सहानुभूति और करुणा का भाव होता है। उदार व्यक्ति दूसरों की सहायता के लिए अपने तन, मन और धन को किसी भी क्षण त्याग सकता है, जो दूसरों की प्राणरक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहता है। वह जाति, देश, रंग-रूप आदि का भेद किए बिना सभी को अपना मानता है। वह स्वयं हानि उठाकर भी दूसरों का हित करता है। प्रेम, भाईचारा और उदारता ही उसकी पहचान है।

प्रश्न 3. कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है?
उत्तर- कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर मनुष्यता के लिए यह संदेश दिया है कि प्रत्येक मनुष्य को परोपकार करते हुए अपना सर्वस्व त्यागने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। इन व्यक्तियों ने दूसरों की भलाई हेतु अपना सर्वस्व दान कर दिया था। दधीचि ने अपनी अस्थियों का तथा कर्ण ने कुंडल और कवच का दान कर दिया था। हमारा शरीर नश्वर है इसलिए इससे मोह को त्याग कर दूसरों के हित-चिंतन में लगा देने में ही इसकी सार्थकता है। यही कवि ने संदेश दिया है।

प्रश्न 4. कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व-रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?
उत्तर– कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में व्यक्त किया कि हमें गर्व –रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए-

 “ रहो न भूल के कभी , मदांध तुच्छ वित्त में ,

सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।“

प्रश्न 5. ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- इस कथन का अर्थ है कि संसार के सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई हैं इसलिए हमें किसी से भी भेद-भाव नहीं करना  चाहिए। सभी एक ईश्वर की ही संतान हैं। अगर कुछ भेद दिखाई देते भी हैं, तो वे सभी बाहरी भेद हैं और वे भी अपने-अपने कर्मों के अनुसार दिखाई पड़ते हैं। मनुष्य मात्र बंधु हैं इसलिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का नारा बुलंद किया जाता है। प्रत्येक मनुष्य को हर निर्बल मनुष्य की पीड़ा दूर करने का प्रयास करना चाहिए। सभी आपस में भाई-चारे की भावना से रहें तथा सभी में प्रेम एवं एकता का संचार हो।

प्रश्न 6. कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है?
उत्तर– कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा इसलिए दी है क्योंकि इससे आपसी मेल-भाव बढ़ता है तथा हमारे सभी काम सफल हो जाते हैं। यदि हम सभी एक होकर चलेंगे तो जीवन मार्ग में आने वाली हर विघ्न-बाधा पर विजय पा लेंगे। जब सबके द्वारा एक साथ प्रयास किया जाता है तो वह सार्थक सिद्ध होता है। सबके हित में ही हर एक का हित निहित होता है। आपस में एक-दूसरे का सहारा बनकर आगे बढ़ने से प्रेम व सहानुभूति के संबंध बनते हैं तथा परस्पर शत्रुता एवं भिन्नता दूर होती है। इससे मनुष्यता को बल मिलता है। कवि के अनुसार यदि हम एक-दूसरे का साथ देंगे तो, हम प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकेंगे।

प्रश्न 7.व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर- व्यक्ति को सदा दूसरों की भलाई करते हुए, मनुष्य- मात्र को बंधु मानते हुए तथा दूसरों के हित-चिंतन के लिए अपना सर्वस्व त्यागकर अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसे अपने अभीष्ट मार्ग की ओर निरंतर सहर्ष बढ़ते रहना चाहिए।

प्रश्न 8.‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर– मानव जीवन एक विशिष्ट जीवन है, क्योंकि मनुष्य के मन में प्रेम, त्याग, बलिदान, परोपकार का भाव होता है। अपने से पहले दूसरों की चिंता करते हुए अपनी शक्ति, अपनी बुधि और अपनी वैचारिक शक्ति का सदुपयोग करना मानव का कर्तव्य है। प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि मानवीय एकता, सहानुभूति, सद्भाव, उदारता और करुणा का संदेश देना चाहता है। वह चाहता है कि मनुष्य समस्त संसार में अपनत्व की अनुभूति करे। वह दीन-दुखियों, जरूरतमंदों के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहे। वह पौराणिक कथाओं के माध्यम से विभिन्न महापुरुषों जैसे दधीचि, कर्ण, रंतिदेव के अतुलनीय त्याग से प्रेरणा ले। ऐसे सत्कर्म करे जिससे मृत्यु उपरांत भी लोग उसे याद करें। उसका यश रूपी शरीर सदैव जीवित रहे। निःस्वार्थ भाव से जीवन जीना, दूसरों के काम आना व स्वयं ऊँचा उठने के साथ-साथ दूसरों को भी ऊँचा उठाना ही मनुष्यता’ का वास्तविक अर्थ है।

(ख) निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए-


1. सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?
उत्तर– इन पंक्तियों का भाव है कि प्रत्येक मनुष्य को प्रत्येक मनुष्य के जीवन में समय-असमय आने वाले हर दुख-दर्द में सहानुभूति होनी चाहिए, क्योंकि एक-दूसरे के दुख-दर्द का बोझ सहानुभूति की प्रवृत्ति होने से कम हो जाता है। वास्तव में सहानुभूति दर्शाने का गुण महान पूँजी है। पृथ्वी भी सदा से अपनी सहानुभूति तथा दया के कारण वशीकृता बनी हुई है। भगवान बुद्ध ने भी करुणावश उस समय की पारंपरिक मान्यताओं का विरोध किया। विनम्र होकर ही किसी को झुकाया जा सकता है। उदाहरणार्थ-फलदार पेड़ तथा संत-महात्मा हमेशा अपनी विनम्रता से ही मनुष्य जाति का उपकार करते हैं।

2.रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।
उत्तर: कवि के अनुसार समृद्धशाली होने पर भी कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। धन और परिजनों से घिरा हुआ मनुष्य स्वयं को सनाथ अनुभव करता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह अभिमानी हो जाता है। कवि कहता है कि यहाँ कोई भी अनाथ नहीं है क्योंकि ईश्वर ही परमपिता है। भगवान सारी सृष्टि के नाथ हैं, संरक्षक हैं, उनकी शक्ति अपरंपार है। वे अपने अपार साधनों से सबकी रक्षा और पालन करने में समर्थ हैं। अतः व्यक्ति को अपने तुच्छ धन पर मदांध नहीं होना चाहिए और समृद्ध होने पर भी कभी अहंकार नहीं करना चाहिए।

3. चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़े उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
उत्तर-  इन पंक्तियों का अर्थ है कि मनुष्य को अपने निर्धारित उद्देश्य रूपी मार्ग पर प्रसन्नतापूर्वक विघ्न-बाधाओं से जूझते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। इस मार्ग पर चलते हुए परस्पर भाई-चारे की भावना उत्पन्न करो, जिससे आपसी भेद-भाव दूर हो जाए। इसके अतिरिक्त बिना किसी तर्क के सतर्क होकर इस मार्ग पर चलना चाहिए, अर्थात वैचारिक भिन्नता होते हुए भी  आपसी टकराव न हो और लोग विभिन्न कष्टों और विघ्नों को हटाते हुए  , परिश्रम के  साथ   उन्नति के पथ पर अग्रसर हों  । तभी मनुष्य जीवन सार्थक होगा ।

3 responses to “Manushyata NCERT Class 10 Hindi B Sparsh Chapter 4 Solutions,पाठ 4मनुष्यता”

  1. Have you ever studied purana, upnishad, Ramayana, Mahabharata, bhagvatgita?

  2. Very Nice 👌

Leave a Reply to KusumJoshiCancel reply

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