रहीमदास के दोहे
लेखक परिचय :

नाम: रहीम दास पूरा नाम : अब्दुर्रहीम खानखाना
जन्म :१५५६ मृत्यु: १६२६
जन्मस्थान : लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान)
माता का नाम : सुलताना पिता का नाम : बैरम खान
रहीम अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे । वे संस्कृत , अरबी , फ़ारसी और हिन्दी के अच्छे जानकार थे। उनकी गणना भक्तिकालीन कवियों में होती है । उन्होंने मुख्यतः भक्ति श्रंगार और नीति के दोहे लिखे ।उनकी भाषा पर ब्रज और अवधी दोनों का प्रभाव दिखता है।
रचनाएँ: रहीम सतसई , श्रंगार सतसई , रास पंचाध्यायी , रहीम रत्नावली ,बरवै , भाषिक भेदवर्णन आदि । इन सभी को एकत्र क
दोहा १:
रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चटकाय ।
टूटे से फिर ना मिले , मिले गाँठ परि जाय ॥
संदर्भ : यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं । इस दोहे में वे आपसी प्रेमपूर्ण संबंध को यत्न पूर्वक बनाए रखने की शिक्षा देते हैं।
भावार्थ : रहीम दास जी कहते हैं कि प्रेम रूपी धागे को कभी भी जान-बूझ कर झटके में नहीं तोड़ना चाहिए । क्योंकि अगर एक बार यह प्रेम का धागा टूट जाता है तो फ़िर जुड़ नहीं पाता । अगर किसी प्रकार जुड़ भी जाए तो उसमें गाँठ पड़ जाती है । कवि का आशय है कि हमें आपसी मधुर संबंधों को यत्न पूर्वक बनाए रखना चाहिए , क्योंकि अगर किसी प्रकार उन संबंधों में मतभेद हो जाए तो बाद में जोड़ने का प्रयत्न करने पर भी मन में ग्रंथि बनी रह जाती है ।
काव्य सौंदर्य : १.’धागा प्रेम का’ मे रूपक अलंकार है ।
२.गाँठ परिजाय में श्लेश अलंकार है । (गाँठ मे मन के लिए ग्रंथि और धागे के लिए गाँठ अर्थ समझा जाएगा ।)
३. दोहा छंद है ।
४. भाषा सरल है ।
५. नीति का दोहा है , जिसमें दैनिक जीवन की अनुपम सीख दी गई है ।
दोहा 2:
रहिमन निज मन की बिथा , मन ही राखो गोय ।
सुनि अठिलैंहैं लोग सब , बाँटि न लैहैं कोय॥
संदर्भ : यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं । इस दोहे में कवि रहीम दास जी अपने मन के दुख-दर्द को दूसरों के सामने व्यक्त न करने की सीख देते हैं।
भावार्थ :– रहीम जी कहते हैं कि अपने मन की पीड़ा या दर्द को दूसरों से छुपा कर ही रखना चाहिए। क्योंकि जब आपका दर्द किसी अन्य व्यक्ति को पता चलता है तो वे लोग उसका मज़ाक ही उड़ाते हैं। कोई भी आपके दर्द को नहीं बाँटता। कवि का आशय यह है कि लोग दुसरों के दुख- दर्द को देख कर मन ही मन खुश होते है और दुख दूर करने का कोई प्रयास नहीं करते। इसलिए अपने दुख कभी दूसरों के सामने प्रकट नहीं करने चाहिए ।
काव्य सौंदर्य :
१.”सुख बाँटे जाते हैं,दुख नहीं“जीवन के इस सत्य से परिचित कराया गया है ।
२. दोहा छंद है ।
३.ब्रज भाषा है ।
४. नीति का दोहा है , जिसमें दैनिक जीवन की अनुपम सीख दी गई है ।
दोहा ३ :
एकै साधे सब सधै , सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबओ , फूलै फलै अघाय॥
संदर्भ : यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं । प्रसंग- इस दोहे के द्वारा रहीम दास जी ने एक मुख्य कार्य की सिदधि से अन्य सभी कार्यों की सिद्धि को महत्व दिया है।
भावार्थ :- कवि कहते हैं कि एक मुख्य कार्य को सिद्ध करने पर सभी अन्य कार्य स्वतः सिद्ध हो जाते हैं ।चारों तरफ़ ध्यान भटकाने से किसी भी लक्ष्य तक नहीं पहुंचा जा सकता। कवि ने इस सत्य को एक उदाहरण के दवारा इस प्रकार स्पष्ट किया है कि जैसे किसी वृक्ष के जड़ में पानी डालने से पूरा पेड़ फलने –फूलने लगता है ।दूसरे शब्दों में , कवि यहाँ पर एकमात्र लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति की ही सिद्धि के महत्त्व पर जोर देना चाहते हैं ।एक परमात्मा को पा लेने से अन्य सभी सासारिक सुख स्वयं ही मिल जाते हैं। परंतु चारों ओर ध्यान भटकाने पर कुछ भी लाभ नहीं होता ।जैसे किसी वृक्ष के मूल को सींचने से उसका संपूर्ण भाग तृप्त हो जाता है, अतः एक मुख्य कार्य की सिद्धि अन्य सभी सिद्धियों का द्वार खोल देती है।
काव्य सौंदर्य-
१. कवि ने पौधे के उदाहरण द्वारा दृष्टांत अलंकार के माध्यम से अपनी बात को प्रमाणित किया है।
२.पहली पक्ति में “एके साधे सब सधै ,सब साधे सब जाय’ पंक्ति में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार का सौंदर्य है।
३.दोहा छंद है ।
४. ब्रज भाषा है
५.कवि ने प्रभु की भक्ति करके संसार के सभी सुख पा लेने की शिक्षा दी है।
दोहा ४ :
चित्रकूट में रमि रहे , रहिमन अवध -नरेस।
जा पर बिपदा पड़त है ,सो आवत यह देस॥
संदर्भ : यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं । इस दोहे में चित्रकूट की महिमा का वर्णन किया गया है ।
भावार्थ :इस दोहे में कवि ने बताया है कि जब भगवान राम को चौदह वर्ष का वनवास प्राप्त हुआ तो वे चित्रकूट पर्वत पर आ कर रहने लगे , और यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता में उनका मन रम गया।अब जिस पर विपत्ति आती है वही यहाँ शांति पाने के लिए चला आता है। यहाँ पर कवि का मानना है विपत्ति या कष्ट आने पर भगवान भी चित्रकूट में आए , इसीलिए जिस किसी पर विपत्ति आए उसे चित्रकूट पर आना चाहिए क्योंकि यह स्थान विपदा दूर करने वाला है और यहाँ आकर सारे दुख मिट जाते हैं।इस प्रकार रहीम दास जी ने भगवान राम का उदाहरण देकर चित्रकूट की महिमा उजागर की है ।
काव्यसौंदर्य- १.कवि ने ब्रज भाषा के सरस प्रभावशाली शब्दों का दोहाछंद में बड़े ही सुंदर ढंग से प्रयोग किया है।
२.‘रमि रहे, रहिमन‘ पंक्ति में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।
३.श्रीराम का उदाहरण देकर कवि ने दृष्टांत अलंकार का प्रयोग किया है ।
दोहा ५.:
दीरघ दोहा अरथ के , आखर थोरे आहिं ।
ज्यों रहीम नट कुंदली ,सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं॥
संदर्भ : यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं । इस दोहे के द्वारा रहीम दास जी ने दोहे की महिमा समझाई है ।
भावार्थ- रहीम दास जी का कहना है कि उनके दोहों में भले ही कम अक्षर या शब्द हैं, परंतु उनके अर्थ बड़े ही गहरे और बहुत कुछ कह देने में समर्थ हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई नट (acrobat)अपने करतब के दौरान अपने बड़े शरीर को समेटकर बड़ी कुशलता से तंग मुँह वाली कुंडली के बीच से निकल जाता है, उसी प्रकार छोटे–छोटे शब्दों में रचित दोहा एक गंभीर अर्थ की अभिव्यंजना करता है और बात की गहराई को लोगों के समक्ष व्यक्त करता है।इस प्रकार देखने में छोटे लगने वाले ये दोहे वास्तव में बड़ी गहरी बात को सीमित शब्दों में कह देते हैं।
काव्य सौंदर्य–
१.ब्रज भाषा में रचित दोहा छंद में नीति परक तथ्यों का सुंदर लयात्मक प्रयोग दर्शनीय है।
२.कवि ने अपनी प्रतिभा से छोटे से दोहे में दृष्टांत अलंकार, ‘दीरघदोहा‘ में अनुप्रास अलंकार, ‘ज्यों रहीम नट कुंडली‘ पक्ति में उत्प्रेक्षा अलंकार का बड़े ही स्वाभाविक ढंग से प्रयोग किया है।
३. कवि ने संदेश दिया है कि किसी के आकार को देख कर उसकी प्रतिभा का अंदाज़ा नहीं लगाना चाहिए।
४. दोहे की महिमा बड़े सुंदर ढंग से समझाई गई है ।
दोहा ६:
धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय॥
संदर्भ: यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं । इस दोहे मे रहीम ने किसी के विशालता की अपेक्षा परोपकार करने को अधिक महत्वपूर्ण बताया है।
भावार्थ – रहीम जी कहते हैं कि कीचड़ में पाया जाने वाला वह थोडा सा पानी ही धन्य है क्योंकि उस पानी से न जाने कितने छोटे-छोटे जीवों की प्यास बुझती है। लेकिन वह सागर का जल बहुत अधिक मात्रा में होते हुए भी व्यर्थ होता है क्योंकि उस जल से कोई भी जीव अपनी प्यास नहीं बुझा पता। इस दोहे से कवि यह भाव स्पष्ट करना चाहते हैं कि मनुष्य के जीवन की सार्थकता दूसरों की भलाई करने में हैं परोपकारी ही वास्तव में महान कहलाने का अधिकारी होता है।धनवान होते हुए भी यदि मनुष्य किसी का भला नहीं करता है तो उसकी अगाध धनराशि भी समुद्र की अपरिमित जलराशि के समान व्यर्थ होती है।
काव्य सौंदर्य- 1.परोपकार की भावना को कवि ने बड़े ही सहज एवं लोकोपयोगी उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया है।
2.दोहा छंदहै।
3. ब्रज भाषा का सहज माधुर्य दर्शनीय है।
4.दृष्टांत अलंकार द्वारा परोपकार के नीतिपरक जीवन मूल्य को बड़े ही स्वाभाविक ढंग से
बताया गया है।
दोहा७.
नाद रीझि तन देत मृग , नर धन हेत समेत ।
ते रहीम पशु ते अधिक ,रीझेहु कछू न देत॥
संदर्भ : यह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं । इस दोहे में रहीमदास जी ने मनुष्य के कृपण स्वभाव की निंदा की है।
भावार्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि संगीत की तान पर झूमते हुए मंत्रमुग्ध हिरण अपने प्राण तक न्योछावर कर देता है।इसी प्रकार किसी की कला पर मुग्ध होकर मनुष्य भी बड़े प्रेम से उस पर धन अर्पित कर देता है। परंतु वे मनुष्य तो पशुओं से भी गए गुज़रे होते हैं ,जो किसी पर प्रसन्न हो कर भी उसे कुछ नहीं देते हैं।कवि इस दोहे से यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि कला का सम्मान करना चाहिए और कलाकार को खाली हाथ लौटाना उचित नहीं है, ऐसा आचरण तो पशुओं से भी गया गुज़रा माना जाता है।
काव्य सौंदर्य-१.इस दोहे में कवि ने दृष्टांत अलंकार का प्रयोग किया है।
२.दोहा छंद में ब्रजभाषा के सरस प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग दर्शनीय है।
३. लोक व्यवहार की नीति बताई है।
दोहा८:
बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय ।
रहिमन फाटै दूध को , मथे न माखन होय॥
संदर्भःयह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं ।इस दोहे में कवि द्वारा व्यवहारिक ज्ञान दिया जा रहा है ।
भावार्थ– रहीम जी कहते हैं कि कोई बात जब एक बार बिग़ड़ जाती है तो लाख कोशिश करने के बावजूद उसे ठीक नहीं किया जा सकता। यह वैसे ही है जैसे जब दूध एक बार फट जाये तो फिर उसको मथने से मक्खन नहीं निकलता। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें किसी भी बात को करने से पहले सौ बार सोचना चाहिए क्योंकि एक बार कोई बात बिगड़ जाए तो उसे सुलझाना बहुत मुश्किल हो जाता है।बिगड़ी बात आसानी से नहीं बनती ।
काव्य सौंदर्य : १ दोहा छंद है ।
२, ब्रज भाषा में प्रभावशाली शब्दों में लोक व्यवहार का ज्ञान दिया गया है ।
३. फटे दूध का उदाहरण देकर दृष्टांत अलंकार का प्रयोग किया गया है ।
४. ’बिगरी बात बने नहीं’ और ’करौ किन कोय’ में अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग है ।
दोहा ९ :
रहिमन देख बढ़ेन को , लघु न दीजै डारि ।
जहाँ काम आए सूई , कहा करै तरवारि ॥
संदर्भःयह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं ।इस दोहे में कवि ने समाज में छोटे – बड़े सभी की समान उपयोगिता को स्पष्ट किया है ।
भावार्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि छोटे और बड़े दोनों की समान उपयोगिता है । बड़े उच्च पद और मान –सम्मान वाले व्यक्ति के सामने छोटे और सामान्य व्यक्ति की उपेक्षा नही करनी चाहिए ।छोटे पद के व्यक्ति का तिरस्कार नहीं करना चहिए ,क्योंकि समाज में प्रत्येक व्यक्ति का अपना महत्व होता है। रहीम दास इसके लिए सूई और तलवार का उदाहरण देते हैं । वे कहते हैं कि जिस जगह सूई की आवश्यकता होती है , वहाँ तलवार काम नहीं आ सकती है । अतः प्रत्येक व्यक्ति का अपना स्वतंत्र महत्त्व है और उस मह्त्त्व को स्वीकार करना चाहिए ।
काव्य सौंदर्य : १ दोहा छंद है ।
२, ब्रज भाषा में प्रभावशाली शब्दों में लोक व्यवहार का ज्ञान दिया गया है ।
३.सूई और तलवार का उदाहरण देकर दृष्टांत अलंकार का प्रयोग किया गया है ।
४, नीति का दोहा है ।
दोहा१०:
रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय ।
बिनु पानी ज्यों जलज को ,नहिं रवि सके बचाय॥
संदर्भःयह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं कवि ने व्यक्ति को निजी संपति की महिमा समझाई है।
भावार्थ – कवि रहीम कहते हैं कि अपनी संपत्ति के अलावा मुसीवत या दुख-दर्द में कोई दूसरा सहायक नहीं होता है। संकट के समय अपना संचित धन ही काम आता है। कवि ने इस सत्य को प्रमाणित करने के लिए कमल का उदाहरण देते हुए कहा है कि पानी के बिना कमल के फूल को सूर्य की किरणें भी नहीं खिला पाती हैं। जल ही कमल का आंतरिक धन है ।जल कमल का भीतर से पोषण करता है । सूर्य की किरणें कमल का वाह्य पोषण करती हैं, परंतु जल के अभाव में कमल सूख जाता है, उसी प्रकार बाहरी सहायता मिलने पर भी निजी संपत्ति न होने से मनुष्य की कोई भी रक्षा नहीं कर सकता। इस उदाहरण द्वारा कवि स्पष्ट करना चाहते हैं कि निजी धन-संपत्ति ही मुसीवत की घड़ी में व्यक्ति की सहायक है।
काव्य सौंदर्य-१.इस दोहा छंद में कवि ने व्यक्ति को निजी संपत्ति की महिमा बताई है ।
२. सरस ब्रजभाषा है।
३. सूर्य और जल के द्वारा दृष्टांत अलंकार का प्रयोग है।
४. बिनु पानी ज्यों जलज’ पक्ति में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
दोहा ११:
रहिमन पानी राखिए , बिनु पानी सब सून ।
पानी गए न ऊबरै , मोती, मानुष, चून॥
संदर्भःयह दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक स्पर्श-१ के पाठ दोहे से लिया गया है । इस दोहे के रचयिता रहीम हैं । इस ‘दोहे’ में कवि रहीम ने पानी के महत्त्व को विभिन्न संदर्भो में स्पष्ट किया है।
भावार्थ : कवि रहीम कहते हैं कि पानी बहुत ही महत्त्वपूर्ण तत्व है, इसे हमेशा संचित करके रखना चाहिए। यदि पानी समाप्त हो जाए तो मोती, मनुष्य और आटे का भी महत्त्व समाप्त हो जाता है। ‘पानी’ अर्थात चमक के बिना मोती व्यर्थ है पानी’ अर्थात सम्मान के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ है। ‘पानी अर्थात जल के बिना आटा नहीं गूंधा जा सकता। इस प्रकार पानी बिना आटा बेकार है। इसलिए पानी को हमेशा सहेज कर रखना चाहिए।
काव्य सौंदर्य-१. ‘पानी गए न ऊबरै मोती मानुष चून’ इस पंक्ति में श्लेष अलंकार है।
२. पानी शब्द के तीन अर्थ हैं- चमक, इज्जत और जल । कवि ने छोटे से दोहे में गहन विचारों को समाहित किया है।
३ ब्रज भाषा का प्रयोग किया गया है ।
४. दोहा छंद में नीति का सुंदर ज्ञान दिया गया है ।
प्रश्न अभ्यास
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
प्रश्न 1 – प्रेम का धागा टूटने पर पहले की भाँति क्यों नहीं हो पाता?
उत्तर – जिस प्रकार जब कोई धागा टूट जाता है और उस टूटे हुए धागे को जोड़ने के लिए उसमें गाँठ लगानी पड़ती है। जिसके कारण वह पहले की तरह नहीं हो पाता। उसी तरह अगर किसी वजह से प्रेमपूर्ण संबंधों में मतभेद हो जाए तो बाद में जोड़ने का प्रयत्न करने पर भी मन में ग्रंथि बनी रह जाती है।
प्रश्न 2 – हमें अपना दुख दूसरों पर क्यों नहीं प्रकट करना चाहिए? अपने मन की व्यथा दूसरों से कहने पर उनका व्यवहार कैसा हो जाता है?
उत्तर – जब हम अपना दुख दूसरों को बताते हैं तो दूसरे हमारा दुख बाँटने की बजाय उसका मजाक ही उड़ाते हैं। इसलिए हमें अपना दुख दूसरों पर प्रकट नहीं करना चाहिए। अपने मन की व्यथा दूसरों से कहने पर हम सिर्फ़ उपहास के पात्र ही बनते हैं । सच्ची सहानुभूति कोई नहीं जताता ।अतः हमें अपना दुख दूसरों पर व्यक्त नहीं करना चाहिए ।
प्रश्न 3 – रहीम ने सागर की अपेक्षा पंक जल को धन्य क्यों कहा है?
उत्तर: रहीम ने सागर की अपेक्षा पंक जल को धन्य इसीलिए कहा है क्योंकि सागर पानी से लबालब भरा होने के बावजूद उसके जल को कोई पी नहीं पाता, क्योंकि वह खारा होता है। लेकिन पंक जल कम होने के बावजूद भी जीव-जंतु, पेड़-पौधे तथा लोगों की प्यास को बुझा देता है। धन्य वही होता है जो दूसरों की सहायता करता है।
प्रश्न 4 – एक को साधने से सब कैसे सध जाता है?
उत्तर:, कवि का मानना है कि हमें निष्ठापूर्वक एकमात्र परमात्मा की साधना करनी चाहिए । अगर हम एक ईश्वर का ध्यान करते हैं, तो हमारे सारे काम सफल हो जाते हैं। परमात्मा की प्राप्ति से हमारे लौकिक और पारलौकिक सभी काम स्वतः सफल हो जाते हैं ।कवि पौधे का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जैसे पौधे की जड़ में पानी देने से पूरा पौधा फ़लने- फूलने लगता है वैसे ही एक को साधने से सब काम सध जाते हैं।अतः एक लक्ष्य लेकर काम करना चाहिए ।
प्रश्न 5 – जलहीन कमल की रक्षा सूर्य भी क्यों नहीं कर पाता?
उत्तर – कमल के लिए जल ही संपत्ति है। क्योंकि जल के बिना कमल को जरूरी पोषण नहीं मिलेगा। जल के बिना कमल का जीवन असंभव है। जल ही वह आंतरिक शक्ति है जो कमल का पोषण करती है । सूर्य के प्रकाश में कमल खिल उठता है ,किंतु बिना जल के कमल की सूर्य भी रक्षा नहीं कर पाएगा। इसके विपरीत जलहीन कमल सूर्य की गर्मी के कारण झुलस कर मर जाएगा।
प्रश्न 6 – अवध नरेश को चित्रकूट क्यों जाना पड़ा?
उत्तर : अवध नरेश श्री राम चंद्र जी को अपने माता-पिता की आज्ञा के कारण चित्रकूट जाना पड़ा ।चित्रकूट में उन्होंने कुछ समय बिताया। चित्रकूट के मनोरम सौंदर्य में उनका मन रम गया और उन्होंने वनवास का यह समय आनंद से व्यतीत किया।
प्रश्न 7 – ‘नट’ किस कला में सिद्ध होने के कारण ऊपर चढ़ जाता है?
उत्तर – नट को कुंडली मारने में महारत हासिल होती है। वह अपने शरीर को सिकोड़कर अर्थात कुंडली मारकर अपने शरीर को किसी भी मुद्रा में मोड़ सकता है। इसी कारण वह आसानी से ऊपर चढ़ जाता है।
प्रश्न 8 – ‘मोती, मानुष, चून’ के संदर्भ में पानी के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: मोती के संदर्भ में पानी का अर्थ है चमक, मानुष के संदर्भ में सम्मान और चून के संदर्भ पानी आटा गूंथने के काम आता है। कवि का कहना है कि पानी के बिना मोती पर चमक नहीं आती है और चमक न होने से मोती का कोई मूल्य नहीं होता। उसी प्रकार पानी सम्मान रहित मनुष्य का भी कोई मूल्य नहीं होता है।इसलिए मनुष्य को समाज में अपना सम्मान बना कर रखना चाहिए । इसी प्रकार पानी के अभाव में आटा गूंथ कर रोटी नहीं बनाई जा सकती, इसलिए मोती, मानुष, चून के संदर्भ में पानी का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है।
निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए-
प्रश्न 1 – टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।
उत्तर – जब कोई धागा एक बार टूट जाता है तो फिर उसे जोड़ा नहीं जा सकता। जोड़ने की कोशिश में उस धागे में गाँठ पड़ जाती है। किसी से प्रेम का भाव जब एक बार टूट जाता है तो फिर उस रिश्ते को दोबारा जोड़ा नहीं जा सकता। उसमे पहले जैसा प्रेम और विश्वास का भाव नहीं रहताअर्थात ग्रंथि पड़ जाती है ।
प्रश्न 2 – सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।
उत्तर – अपने दर्द को दूसरों से छुपा कर ही रखना चाहिए। जब आपका दर्द किसी अन्य को पता चलता है तो लोग उसका मजाक ही उड़ाते हैं। कोई भी आपके दर्द को बाँट नहीं सकता। अतः अपने मन के कष्ट को अपने मन में ही रखें।
प्रश्न 3 – रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै, फलै अघाय।
उत्तर – एक बार में कोई एक कार्य ही करना चाहिए। एक काम के पूरा होने से कई काम अपने आप हो जाते हैं। यदि एक ही साथ आप कई लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश करेंगे तो कुछ भी हाथ नहीं आता। यह वैसे ही है जैसे जड़ में पानी डालने से ही किसी पौधे को सभी सार तत्व मिल जाते हैं और वह फूलने और फलने लगता हैं।
प्रश्न 4 – दीरघ दोहा अरथ के, आखर धीरे आहिं।
उत्तर – किसी भी दोहे में कम शब्दों में ही बहुत बड़ा अर्थ छिपा होता है। यह वैसे ही है जैसे नट कुंडली में सिमट कर तरह तरह के आश्चर्यजनक करतब दिखा देता है।इस पंक्ति से कवि का आशय है कि लघुता होने पर भी दोहा अपने भीतर गहरा भाव छिपाए रखता है ।
प्रश्न 5 – नाद रीझि तन देत मृग, नर धन देत समेत।
उत्तर – हिरण किसी के संगीत से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उस धुन को सुनते हुए अपने सुध-बुध खोकर शिकारी के जाल में फँसकर अपने प्राण तक न्योछावर कर देते हैं। इसी प्रकार प्रसन्न होने पर मनुष्य प्रेम सहित धन अर्पित कर देता है।प्रसन्नता की स्थिति में व्यक्ति धन आदि देकर अपनी उदारता व्यक्त करता है। यहाँ पर मनुष्यों द्वारा कला के सम्मान किए जाने का भाव है ।
प्रश्न 6 – जहाँ काम आवे सुई, कहा करै तरवारि।
उत्तर – जहाँ छोटी चीज की जरूरत होती है वहाँ पर बड़ी चीज बेकार हो जाती है। जैसे जहाँ सुई की जरूरत होती है वहाँ तलवार का कोई काम नहीं होता। अतः किसी को छोटा समझ कर उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
प्रश्न 7 – पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।
उत्तर – इस पंक्ति से यह भाव स्पष्ट होता है कि ‘पानी’ का जीवन में विशेष महत्व है। ‘पानी’ अर्थात चमक के बिना मोती की कोई उपयोगिता नहीं होती। ‘पानी’ अर्थात सम्मान के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ है। ‘पानी’ के बिना आटा नहीं गूंथा जा सकता, इसलिए मनुष्य को जीवन में ‘पानी’ के महत्त्व को समझना चाहिए।
निम्नलिखित भाव को पाठ में किन पंक्तियों द्वारा अभिव्यक्त किया गया है-
प्रश्न 1 – जिस पर विपदा पड़ती है वही इस देश में आता है।
उत्तर – जा पर बिपदा पड़त है, सो आवत यह देस
प्रश्न 2 – कोई लाख कोशिश करे पर बिगड़ी बात फिर बन नहीं सकती।
उत्तर – बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
प्रश्न 3 – पानी के बिना सब सूना है अत: पानी अवश्य रखना चाहिए।
उत्तर – रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून।
4. उदाहरण के आधार पर पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप लिखिए:
उत्तर: ज्यों – जैसे , कछु– कुछ , नहिं – नहीं , कोय– कोई, धनि– धन्य, आखर– अक्षर, जिय– हृदय
थोरे– थोड़े, होय– होता है , माखन- मक्खन, तरवारि- तलवार, सींचिबो- सींचना, मूलहिं- मूल, (जड़),
पियत- पीते ही , पियासो-प्यासा, बिगरी – बिगड़ी, आवे-आए, सहाय- सहायक ,
ऊबरै- उबरे(बाहर निकलना), बिनु– बिना, बिथा- व्यथा (कष्ट), अठिलैंहें –हंसना(इठलाना), परि जाय- पड़ जाय|
******************


Leave a Reply