VAIGYANIK CHETNA KE VAHAK CHANDRASHEKHAR VAINKAT RAMAN//वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्र शेखर वैंकट रामन्

Writer : Dhiranjan Malve

9 मार्च 1952

डुँवरावाँ गाँव, नालंदा जिला, बिहार

एम.एस.सी. (सांख्यिकी), एम. बी. ए., एल.एल.बी.

आकाशवाणी और दूरदर्शन से संबद्ध रहे। इसी क्षेत्र में कार्य करते हुए अपने लंदन प्रवास के दौरान रेडियो विज्ञान पत्रिका’ज्ञान -विज्ञान’ का संपादन और प्रसारण किया। वर्तमान में भी आप लोगों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुँचाने के काम में जुटे हुए हैं।

लेखक धीरंजन मालवे की भाषा- शैली सरल सहज है। हालांकि विज्ञान के क्षेत्र की जानकारी देने के कारण उनकी भाषा में वैज्ञानिक शब्दावली की बहुलता है। भाषा के स्तर पर लेखक एक सहज बहाव को चुनते हुए देशी-विदेशी सभी शब्दों का प्रयोग करते चलते हैं । इसी कारण वे गूढ़ विषय को भी जन-मानस को आसान शब्दावली में समझाने में सफल हुए हैं।

धीरंजन मालवे ने अनेक भारतीय वैज्ञानिकों की संक्षिप्त जीवनियाँ लिखी हैं जिनका संकलन इनकी पुस्तक ’विश्व-विख्यात भारतीय वैज्ञानिक’ में प्रकाशित है।

My 100 adventure

Chandrashekhar Venkat Raman

प्रस्तुत पाठ ‘वैज्ञानिक चेतना के वाहक रामन्’ में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक के संघर्षमय जीवन का चित्रण किया गया है। वेंकट रामन् कुल ग्यारह साल की उम्र में मैट्रिक, विशेष योग्यता के साथ इंटरमीडिएट, भौतिकी और अंग्रेज़ी में स्वर्ण पदक के साथ बी.ए. और प्रथम श्रेणी में एम.ए. करके मात्र अठारह साल की उम्र में कोलकाता में भारत सरकार के फाइनेंस डिपार्टमेंट में सहायक जनरल एकाउंटेंट नियुक्त कर दिए गए थे। इनकी प्रतिभा से इनके अध्यापक तक अभिभूत थे। इस पाठ के माध्यम से लेखक धीरंजन मालवे ने वैज्ञानिक चंद्र शेखर वेंकट रामन् के जीवन के अनछुए पहलुओं को तो सामने रखा ही है, साथ ही उनका जीवन परिचय,कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए भी लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्ष को दर्शा कर नई पीढ़ी को विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। उन्होंने इस संक्षिप्त पाठ के द्वारा चंद्र शेखरवेंकट रामन् के कार्यों और देश प्रेम को भी प्रकट किया है। सन् 1930 में जब चंद्रशेखर वेंकट रामन् को नोबेल पुरस्कार मिला तो उन्हें इस बात का दुःख हुआ कि उस समय जिस समय वह पुरस्कार उन्हें भारतीय नहीं अपितु ब्रिटिश पताका के तले मिला। इस बात का जिक्र उन्होंने अपने मित्र को एक पत्र के द्वारा किया था।

चंद्रशेखर वेंकट रामन् भारत में विज्ञान की उन्नति के चिर आकांक्षी थे तथा भारत की स्वतंत्रता के पक्षधर थे। वे महात्मा गांधी को अपना अभिन्न मित्र मानते थे। नोबेल पुरस्कार समारोह के बाद एक भोज के दौरान उन्होंने कहा था।

“मुझे एक बधाई का तार अपने सर्वाधिक प्रिय मित्र (महात्मा गांधी) से मिला है, जो इस समय जेल में हैं। ”

एक मेधावी छात्र से महान वैज्ञानिक तक की रामन् की संघर्षमय जीवन यात्रा और उनकी उपलब्धियों की जानकारी यह पाठ बखूबी कराता है।

“वैज्ञानिक चेतना के वाहक चंद्र शेखर वैंकट रामन् ” पाठ के द्वारा धीरंजन मालवे ने रामन् की जीवनी तो प्रस्तुत की ही है साथ ही उनके अभुतपूर्व कार्यों को भी बड़े ही सरल शब्दों में समझाने का प्रयास किया है।

7नवंबर को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में जन्मे रामन्‍ बचपन से ही प्रतिभाशाली थे। प्रारंभीक शिक्षा में गणित और विज्ञान की ओर रुझान में अध्यापक पिता का अपूर्व योगदान था जिस कारण यही दो विषय आगे चल कर उनका मुख्य कार्य क्षेत्र बने और उन्हें विश्वप्रसिद्धी प्राप्त हुई। छात्र जीवन से ही उन्हें शोध कार्यों में रुचि थी उनका पहला शोधपत्र फिलोसॉफिकल मैगज़ीन में प्रकाशित हुआ था। शोधकार्यों को पूर्णकालिक व्यवसाय बनाने की सुविधा और विकल्प के अभाव में रामन् ने सरकारी नौकरी करने का फ़ैसला किया और ब्रिटिश भारत के वित्त-विभाग में कलकत्ता(कोलकाता) में अफ़सर बन के तौर पर तैनात हुए।

कलकत्ता में सरकारी नौकरी के दौरान भी शॊधकार्यों में लगे रहे। ऑफ़िस से समय मिलते ही बहूबाज़ार स्थित ’ इंडियनेसोसिएशन फ़ॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस ’ की प्रयोगशाला में मामूली उपकरणो से ही शोधकार्यों में रत रहते यह प्रयोगशाला डॉ. महेंद्रलाल सरकार द्वारा वर्षों की कठिन मेहनत और लगन के बाद खड़ा किया था।  इस संस्था का उद्देश्य देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना था। इन्हीं दिनों रामन वाद्ययंत्रों की ओर भी आकर्षित हुए और रामन ने वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार पर पश्चिमी देशों के इस संदेह को तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्ययंत्र विदेशी वाद्यों की तुलना में घटिया हैं।

उन्हीं दिनों प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी ने ने रामन् के सामने प्रस्ताव रखा कि वे सरकारी नौकरी छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद स्वीकार कर लें। रामन् के लिए यह एक कठिन निर्णय था क्योंकि उस ज़माने के हिसाब से वे एक अत्यंत प्रतिष्ठित सरकारी पद पर थे, जिसके साथ मोटी तनख्वाह और अनेक सुविधाएँ जुड़ी हुई थीं। उन्हें नौकरी करते हुए दस वर्ष बीत चुके थे। ऐसी हालत में सरकारी नौकरी छोड़कर कम वेतन और कम सुविधाओं वाली विश्वविद्यालय की नौकरी में आने का फैसला करना रामन के लिए बहुत हिम्मत का काम था। लेकिन रामन् ने सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को छोड़ सन् 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की नौकरी स्वीकार कर ली और अध्ययन-अध्यापन और शोधकार्यों में पूरा समय बिताने लगे। इसी दौरान सन् 1921 में रामन् को समुद्र -यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ और उनके मन में यह विचार कौंधा कि समुद्र का रंग नीला ही क्यों है कुछ अन्य क्यों नहीं। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए उन्होंने शोध शुरु किया ,जिसका परिणाम रामन् प्रभाव के रूप में हुआ। रामन् ने बताया कि जब एक रंग के प्रकाश की किरण के फोटॉन जब किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। रामन् प्रभाव की खोज ने रामन् को विश्व के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। रामन के जीवन में अब तो पुरस्कारों और सम्मानों की तो जैसे झड़ी-सी लगी रही। सन् 1954 में रामन् को देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया।

Raman Spectroscopy

रामन् के प्रयोगों ने आइंस्टाइन की धारणा का प्रत्यक्ष प्रमाण दे दिया, क्योंकि एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन यह साफतौर पर प्रमाणित करता है कि प्रकाश की किरण बहुत ही तेज़ गति के सूक्ष्म कणों के प्रवाह के रूप में व्यवहार करती है। रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज आसान हो गया। पहले इस काम के लिए अवरक्त स्पेक्ट्रम विज्ञान का सहारा लिया जाता था। यह मुश्किल तकनीक है जिसमें गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती थी। रामन् की खोज के बाद पदार्थों के अणुओं की और परमाणुओं की बनावट के अध्ययन के लिए रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाने लगा। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर, पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक सही-सही जानकारी देती है। इस जानकारी की वजह से पदार्थों का प्रयोगशाला में मिलान करना तथा अनेक उपयोगी पदार्थों का बनावटी रूप से निर्माण करना संभव हो गया है।

Raman Holding Nobel prize with other Scientists at Stockholm

रामन् की खोज के बाद उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । इनमें 1929 में सर की उपाधि, 1930 में विज्ञान के क्षेत्र का सर्वोच्च पुरस्कार नोबेल पुरस्कार और 1954 में भारत का सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न मुख्य हैं। रामन् को भारतीय संस्कृति से भी गहरा लगाव रहा। अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के बावजूद वे दक्षिण भारतीय पहनावा पहनते रहे। वे कट्टर शाकाहारी थे और अल्कोहल का सेवन नहीं करते थे। स्टॉकहोम में नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद आयोजित एक पार्टी में उन्होंने अल्कोहल पर रामन् प्रभाव का प्रदर्शन किया किंतु स्वयं अल्कोहल पीने से मना कर दिया। इस पर एक आयोजक ने मज़ाक में कहा कि अल्कोहल पर तो रामन् का प्रभाव हमने देख लिया , किंतु रामन् पर अल्कोहल का प्रभाव दिखाने पर परहेज़ क्यों ?

रामन् ने अपने जीवन में अनेक छात्रों को शोधकार्यों में मार्गदर्शन दिया। देश में शोधकार्यों की असुविधा को देखते हुए बैंगलुरु में एक शोध संस्थान “रामन् रिसर्च इंस्टीट्यु्ट’ की स्थापना की। भौतिकी में अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने ” जनरल ऑफ़ फ़िजिक्स’ नामक शोध पत्रिका आरंभ की। उन्होंने एक दीपक बन कर अनेकों छात्रों के भीतर विज्ञान के प्रति अभिरुचि के दीप को प्रज्ज्वलित किया। उनका निधन 21 नवंबर सन् 1970 के दिन 82 वर्ष की आयु में हुआ।  रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा ही यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें।  तभी हम अपने भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर सकेंगे।

शब्दार्थ:

विराट – विशालकाय grand, massive, giant

सदियों– शताब्दियों, centuries

आदिकाल– प्राचीन काल, शुरुवाती समय Initially, In the beggining

नील वर्णीय -नीले रंग की  blue color
आभा – चमक, तेज, Shine, luster

भावुक- भावनाओं से युक्त emotional
असंख्य – अनगिनत , uncountable
जिज्ञासा – जानने की इच्छा , curiosity
विश्वविख्यात – संसार में प्रसिद्ध, world famous

व्याख्या – स गद्यांश के द्वारा लेखक न्यूटन द्वारा गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत( Law of Gravition) की खोज घटना की याद दिलाते हुए कहते हैं कि पेड़ से सेब गिरते हुए तो लोग लंबे समय से देखते आ रहे थे, मगर किसी ने उसका रहस्य जानने की कोशिश नहीं की। सिर्फ़ न्यूटन ने यह सोचा कि पेड़ से गिर कर सेब नीचे ही क्यों गिरा? इस प्रकार उसका कारण जानने की कोशिश में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज हुई। इसी प्रकार अनेक घटनायें हमारे आस-पास होती हैं जिनको हम ज्यादा ध्यान नहीं देते। ठीक इसी तरह विशालकाय समुद्र के नील रंग की चमक को भी अनगिनत लोग पुराने समय से देखते आ रहे थे, मगर इस चमक पर पड़े रहस्य के परदे को सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् ने हटाया। सन् 1921 में जब रामन् एक बार समुद्री यात्रा पर थे। रामन् को जहाज के डेक पर खड़े होकर नीले समुद्र को देखना, प्रकृति को प्यार करना अच्छा लगता था। रामन् समुद्र की नीली चमक को घंटों देखते रहते थे। रामन् केवल भावुक प्रकृति-प्रेमी (nature lover) ही नहीं थे। उनके अंदर एक वैज्ञानिक की जानने की इच्छा भी उतनी ही मज़बूत थी। यही जानने की इच्छा के कारण उनके मन में सवाल उठा कि ‘आखिर समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है? कुछ और क्यों नहीं?’ रामन् सवाल का जवाब ढूँढ़ने में लग गए। समुद्र का रंग नीला होने का कारण ढूँढ़ते ही वे संसार में प्रसिद्ध हो गए।

शब्दार्थ
भौतिकी – 
फ़िज़िक्स, Physics

अतिशयोक्ति – बढ़ा-चढ़ा कर कहने की बात,अतिरंजना, exaggeration

सशक्त नींव– मजबूत बुनियाद, Strong Foundation

शोधकार्य – अनुसंधान के कार्य, Research

प्रतिभावान – तेज़ बुद्धि वाले Talented

वित्त-विभाग – आय-व्यय से संबंधित विभाग, Income Tax Department

व्याख्या – लेखक कहता है कि रामन् का जन्म 7 नवंबर सन् 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर में हुआ था। रामन् के पिता विशाखापत्तनम् में गणित और फ़िज़िक्स के अध्यापक थे। रामन् के पिता रामन् को बचपन से ही गणित और फ़िज़िक्स पढ़ाते थे। इसमें कोई बढ़ा -चढ़ा कर कहने की बात नहीं है कि जिन दो विषयों के ज्ञान ने रामन् को संसार भर में प्रसिद्ध बनाया, उनकी मजबूत बुनियाद रामन् के पिता ने ही तैयार की थी।
कॉलेज की पढ़ाई उन्होंने पहले ए.बी.एन. कॉलेज तिरुचिरापल्ली से और फिर प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास से की। रामन् ने बी.ए. और एम.ए. दोनों ही परीक्षाएँ काफी अच्छे नंबरों से पास की। बचपन से रामन्विके दिमाग में विज्ञान के रहस्यों को सुलझाने की उत्सुकता थी।
अपने कॉलेज के समय से ही उन्होंने अनुसंधान(Research) के कार्यों में दिलचस्पी ( Interest) शुरू कर दिया था। उनका पहला शोधपत्र फिलॉसॉफिकल मैगज़ीन में प्रकाशित हुआ था। उनकी दिली इच्छा (Hearty desire) तो यही थी कि वे अपना सारा जीवन अनुसंधान के कायों को ही समर्पित (Dedicate) कर दें, मगर उन दिनों अनुसंधान के कार्य को पूरे समय के कैरियर के रूप में अपनाने की कोई खास व्यवस्था नहीं थी | इसलिए प्रतिभावान ( Talented ) छात्र सरकारी नौकरी (Government Job) की ओर आकर्षित (attract) होते थे। रामन् ने भी अपने समय के अन्य तेज़ बुद्धि वाले छात्रों की ही तरह भारत सरकार के वित्त-विभाग में अफसर बन गए। उनकी तैनाती( Posting) कलकत्ता में हुई।

शब्दार्थ:
रुझान – 
झुकाव,रुचि , Interest

फ़ुर्सत – खाली समय, आराम का समय , free Time

अनूठी संस्था – विशिष्ठ संस्था Unique Institution

साधन- सुविधाएँ, उपकरण आदि Facilities

कामचलाऊ– जुगाड़, मामूली, Temporary arrangement

साधक- अन्वेषक , खोजकर्ता Seeker

प्रयोगशाला – laboratory

नितांत अभाव – बहुत अधिक कमी, Total Scarcity

हठयोग– कठिन आसनों के द्वारा योग

वाद्ययंत्रों – संगीत की ध्वनि निकालने के यंत्र , musical instruments

व्याख्या – लेखक कहता है कि रामन ने कलकत्ता में सरकारी नौकरी करते हुए भी अपने स्वाभाव के अनुरूप खोज कार्य जारी रखा। दफ़तर से समय मिलते ही वे लौटते हुए बहू बाजार आते थे, वहाँ ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस’ की प्रयोगशाला (laboratory) थी। यह प्रयोगशाला एक अनूठी संस्था थी, इसका निर्माण कलकत्ता के एक डॉक्टर महेंद्रलाल सरकार ने वर्षों की कठिन मेहनत और लगन के बाद किया था। इस संस्था का उद्देश्य देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास(development of scientific consciousness) करना था। अपने महान् उद्देश्यों के बावजूद इस संस्था के पास अच्छी सुविधाएँ न थीं । रामन् इस संस्था की प्रयोगशाला में मामूली उपकरणों (equipment) का प्रयोग करते हुए अपने अनुसंधान के कार्य करते थे। लेखक के अनुसार यह अपने आपमें एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण (Example of Modern Hatha Yoga)था, जिसमें एक साधक दफ़तर में कड़ी मेहनत के बाद बहू बाजार की इस मामूली-सी प्रयोगशाला में पहुँचता और अपनी इच्छाशक्ति के ज़ोर से भौतिकी विज्ञान को विकसित करने के प्रयास करता।उन्हीं दिनों रामन वाद्ययंत्रों की ओर भी आकर्षित हुए। यहाँ पर भी वे अपनी खोजी प्रवृत्ति के कारण वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के पीछे छिपे वैज्ञानिक तथ्यों को जानने की कोशिश कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने देशी और विदेशी दोनों प्रकार के अनेक वाद्ययंत्रों का अध्ययन (Study) किया।

शब्दार्थ:

भ्रांति – संदेह ( misconception)

सृजित – रचा हुआ created

समक्ष – सामने in front

तुलना– मिलान, उपमा, मुक़ाबला Compare

व्याख्या – इस गद्यांश में लेखक ने बताया है कि रामन् ने विदेशी वाद्ययंत्रों यथा वायलिन, चैलो या पियानो आदि पर और भारतीय वाद्ययंत्रों वीणा, तानपूरा और मृदंगम् अनुसंधान किया । उस समय विदेशी यह मानते थे कि भारतीय वाद्य यंत्र विदेशी वाद्य यंत्रों की तुलना में कमतर या घटिया हैं। रामन ने भारतीय और विदेशी दोनों प्रकार के वाद्र्य यंत्रों की ध्वनियों के कंपन का अध्ययन किया और उनके पीछे छिपे गणित के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन(Comparative Studies) कर के इस भ्रांति ( misconception) को गलत साबित किया। इस विषय में रामन् के अनेक शोधपत्र भी प्रकाशित हुए।

उस ज़माने के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री सर आशुतोष मुखर्जी को प्रतिभाशाली युवक रामन के बारे में जानकारी मिली । उन्हीं दिनों कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद निकले हुए थे। मुखर्जी महोदय ने रामन् के सामने प्रस्ताव रखा कि वे वित्त -विभाग की सरकारी नौकरी छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद स्वीकार कर लें। वित्त -विभाग की सरकारी नौकरी की तुलना में प्राध्यापक के पद पर कम वेतन और कम सुविधाएँ थी। रामन् के लिए यह एक कठिन निर्णय था साथ ही उस ज़माने के हिसाब से वे एक अत्यंत प्रतिष्ठित (very prestigiousसरकारी पद पर थे, जिसके साथ अच्छा वेतन और अनेक सुविधाएँ जुड़ी हुई थीं। इस नौकरी में उन्हें दस वर्ष बीत चुके थे अर्थात वे वरिष्ठ पद( senior position) पर थे। ऐसी हालत में सरकारी नौकरी छोड़कर कम वेतन और कम सुविधाओं वाली विश्वविद्यालय की नौकरी में आने का फैसला करना रामन् o के लिए बहुत हिम्मत का काम था।

शब्दार्थ :

अध्ययन  अध्यापन– पढ़ना  पढ़ाना

शैक्षणिक माहौल  पढ़ाई की उपयुक्त परिस्थिति educational environment

परिणति – परिणाम Culmination, Result

ठोस रवों – बिल्लौर, Solid  Crystal

तरल- द्रव ,liquid

टकराव – संघर्ष, मुठभेड़, टक्कर, collision

प्रोटोन – अणु का एक छोटा भाग

परिणामस्वरूप – फलतः , the resulting

क्रमशः – क्रम के अनुसार, graduall

व्याख्या – सन् 1917 में रामन् सरकारी नौकरी की सुख-सुविधाओं को छोड़ कलकत्ता विश्वविद्यालय की नौकरी में आ गए थे। इसका मुख्य कारण यह था कि वे अपना अधिकतम समय छात्रों को पढ़ाने और स्वयं पढ़ने तथा शोध कार्यों को देना चाहते थे। इसी को लेखक ने सरस्वती की साधना कहा है। रामन् के लिए अनुसंधान कार्य सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थे। इस तरह रामन् कलकत्ता विश्वविद्यालय के शिक्षा के माहौल में अपना पूरा समय पढ़ने ,पढ़ाने और शोध अनुसंधान के कार्य में बिताने लगे। चार साल बाद यानी सन् 1921 में जब रामन समुद्र-यात्रा कर रहे थे तो उस समय जब रामन् ने समुद्र के नीले रंग पर ध्यान दिया और यह प्रश्न उनके मस्तिष्क में बार-बार उठने लगा कि आखिर समुद्र का नीले रंग ही क्यों है? रामन् ने इस दिशा में कई प्रयोग किए, जिसका परिणाम रामन् प्रभाव की खोज के रूप में सभी के सामने आया। रामन् ने अनेक ठोस रवों और तरल पदार्थों पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया। इस अध्ययन में उन्होंने पाया कि जब एक रंग के प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके रंग में परिवर्तन आता है। इसकी वजह यह बताते हैं कि एकवर्णीय प्रकाश की किरण के अंश जब तरल या ठोस रवे से गजरते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो इस टकराव के परिणामस्वरूप वे या तो ऊर्जा (energy) का कुछ अंश खो देते हैं या ऊर्जा का कुछ अंश को पा जाते हैं। दोनों ही स्थितियाँ प्रकाश के वर्ण (रंग) में बदलाव लाती हैं। एकवर्णीय प्रकाश की किरणों में सबसे अधिक ऊर्जा बैंजनी रंग के प्रकाश में होती है। बैंजनी के बाद क्रम के अनुसार नीले, आसमानी, हरे, पीले, नारंगी और लाल रंग का नंबर आता है। इस प्रकार लाल-रंग की प्रकाश की ऊर्जा सबसे कम होती है। रामन ने यह भी पाया कि एकवर्णीय प्रकाश तरल या ठोस रवों से गजरते हुए जिस परिमाण में ऊर्जा खोता या पाता है, उसी हिसाब से उसके रंग में परिवर्तन आ जाता है।

शब्दार्थ
प्रायोगिक प्रमाण – 
प्रयोग सम्बंधित सत्यापन experimental evidence
पूर्ववर्ती – 
पहले के,पूर्वाधिकारी, predecessor ,Previous,
तीव्र धारा – 
तेज़ धारा , fast current
इंफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी – 
अवरक्त स्पेक्ट्रम विज्ञान
आणविक – 
अणु का
परमाणविक – 
परमाणु का
सटीक – 
सही
संरचना – 
बनावट, structure
संश्लेषण – 
मिलान करना synthesis
कृत्रिम –
 बनावटी नकली artificial

व्याख्या – लेखक कहता है कि रामन् की खोज भौतिकी के क्षेत्र में एक क्रांति के समान थी। इसका पहला परिणाम तो यह हुआ कि प्रकाश की प्रकृति के बारे में आइंस्टाइन के विचारों का प्रयोगिक प्रमाण मिल गया। आइंस्टाइन से पहले के वैज्ञानिक प्रकाश को तरंग के रूप में मानते थे, मगर आइंस्टाइन ने ही सबसे पहले यह बताया था कि प्रकाश बहुत ही छोटे छोटे कणों की तेज़ धारा के समान है। इन बहुत ही छोटे छोटे कणों की तुलना आइंस्टाइन ने बुलेट से की और इन्हें ‘प्रोटोन’ नाम दिया। लेखक कहता है कि रामन् के प्रयोगों ने आइंस्टाइन की धारणा का प्रत्यक्ष प्रमाण दे दिया, क्योंकि एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन यह साफ-तौर पर प्रमाणित करता है कि प्रकाश की किरण बहुत ही तेज़ गति के सूक्ष्म कणों के प्रवाह के रूप में व्यवहार करती है। लेखक कहता है कि रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना internal structure का अध्ययन आसान हो गया। पहले इस काम के लिए अवरक्त स्पेक्ट्रम विज्ञान का सहारा लिया जाता था। जो कि एक मुश्किल तकनीक थी और इसमें गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती थी । रामन् की खोज के बाद पदार्थों के अणुओं की और परमाणुओं की बनावट के अध्ययन के लिए रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाने लगा। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर, पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक सही-सही जानकारी देती है। इस जानकारी की वजह से पदार्थों का प्रयोगशाला में मिलान करना तथा अनेक उपयोगी पदार्थों का प्रयोगशाला में कृत्रिम निर्माण करना संभव हो गया है।

शब्दार्थ
जाग्रत – 
जगाना awaken

सम्मानित– honoured

व्याख्या –  रामन् प्रभाव की खोज ने रामन् को विश्व के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। रामन के जीवन में अब तो पुरस्कारों और सम्मानों की तो जैसे झड़ी-सी लगी रही। उन्हें सन् 1924 में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता से सम्मानित किया गया। सन् 1929 में उन्हें ‘सर’की उपाधि प्रदान की गई। ठीक अगले ही साल सन् 1930 में उन्हें विश्व के सबसे बड़े पुरस्कार-भौतिकी में नोबेल पुरस्कार-से सम्मानित किया गया। उन्हें और भी कई पुरस्कार मिले, जैसे रोम का मेत्यूसी पदक, रॉयल सोसाइटी का ह्यूश पदक, फिलाडेल्फिया इंस्टीट्यूट का फ्रेंकलिन पदक, सोवियत रूस का अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार आदि। सन् 1954 में रामन् को देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया।
लेखक कहता है कि रामन् नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक थे। उनके बाद यह पुरस्कार भारतीय नागरिकता वाले किसी अन्य वैज्ञानिक को अभी तक नहीं मिल पाया है। लेखक कहता है कि सबसे बड़ी हैरान करने वाली बात यह है कि उन्हें अधिकांश सम्मान उस दौर में मिले जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था। उन्हें मिलने वाले सम्मानों ने भारत को एक नया आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास दिया। विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने एक नयी भारतीय चेतना को जगाने का काम किया।

शब्दार्थ
अक्षुण्ण – 
अखंडित intact,
कट्टर – 
दृढ़ fanatic ,staunch
परिहास –
 हँसी-मज़ाक fun
आह्वादित – 
आनंदित, Happy
आलोकित – 
प्रकाशित, lightened up
प्रतिमूर्ति – 
अनुकृति, चित्रा, प्रतिमा, Replica
नोबेल पुरस्कार – 
यह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार है

व्याख्या – भारतीय संस्कृति से रामन् को हमेशा ही गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी भारतीय पहचान को हमेशा बनाए रखा और अपनी भारतीय पहचान नष्ट नहीं होने दी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि पाने के बाद भी उन्होंने अपने दक्षिण भारतीय पहनावा ही पहनते रहे। वे कट्टर शाकाहारी थे और शराब से तो वे सख्त परहेज़ रखते थे। लेखक कहता है कि जब वे नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने स्टॉकहोम गए तो वहाँ उन्होंने अल्कोहल पर रामन् प्रभाव का प्रदर्शन किया। बाद में आयोजित पार्टी में जब उन्होंने शराब पीने से इनकार किया तो एक आयोजक ने हँसी-मज़ाक में उनसे कहा कि रामन् ने जब अल्कोहल पर रामन् प्रभाव का प्रदर्शन कर हमें आनंदित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, तो रामन् पर अल्कोहल के प्रभाव का प्रदर्शन करने से परहेज क्यों?

रामन् का वैज्ञानिक व्यक्तित्व प्रयोगों और अनुसन्धान के पत्र-लेखन तक ही सिमटा हुआ नहीं था। उनके अंदर एक राष्ट्रीय चेतना थी और वे देश में वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन के विकास के प्रति समर्पित थे। अपने शुरुआती दिनों में शोधकार्य करने के लिए उपकरणों के अभाव में बहुत संघर्ष करना पड़ा था। ये दिन उन्हें हमेशा याद रहे। नई भारतीय युवा पीढ़ी को इस असुविधा का सामना न करना पड़े इसलिए उन्होंने एक अत्यंत उन्नत प्रयोगशाला (advanced laboratory) और शोध-संस्थान(research institute) की स्थापना बंगलोर में की जो उन्हीं के नाम पर ‘रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट’ नाम से जानी जाती है। भौतिकी शास्त्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने इंडियन जरनल ऑफ़ फ़िज़िक्स नामक शोध-पत्रिका (Research Magazine) प्रारंभ की। रामन् ने अपने जीवनकाल में सैकड़ों शोध-छात्रों का मार्गदर्शन किया। जैसे एक दीपक से अन्य कई दीपक जल उठते हैं, उसी प्रकार उनके शोध-छात्रों ने आगे चलकर काफी अच्छा काम किया। उनके कई छात्र उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हुए और विज्ञान को आगे ले गए। रामन विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए करेंट साइंस नामक एक पत्रिका का भी संपादन करते थे। रामन् प्रभाव केवल प्रकाश की किरणों तक ही सिमटा नहीं था; उन्होंने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से पूरे देश को प्रकाशित और प्रभावित किया। उनकी मृत्यु 21 नवंबर सन् 1970 के दिन 82 वर्ष की आयु में हुई।

रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति ( True Replica) थे। उन्होंने हमें हमेशा ही यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें। तभी तो उन्होंने संगीत के सुर-ताल और प्रकाश की किरणों की चमक के अंदर से वैज्ञानिक सिद्धांत खोज निकाले। हमारे आसपास ऐसी न जाने कितनी ही चीज़े बिखरी पड़ी हैं, जो अपने पात्र की तलाश में हैं।अर्थात अनेक प्राकृतिक रहस्य अभी भी खोजे जाने के इंतज़ार में हैं, हमें केवल रामन् के जीवन से प्रेरणा लेने कर प्रकृति के बीच छुपे वैज्ञानिक रहस्य का खोजने की ज़रूरत है ।

  1. प्रस्तुत पाठ में वैज्ञानिक चंद्र शेखर वैंकट रामन् का संक्षिप्त परिचय दिया गया है।
  2. सन् 1921 में चंद्र शेखर वैंकट रामन् ने समुद्री यात्रा की थी उस समय उनके मन में उठे प्रश्न ने विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी।
  3. चंद्र शेखर वैंकट रामन् एक भावुक प्रकृति प्रेमी थे , इसलिए समुद्री यात्रा के दौरान वे जहाज के डेक पर खड़े होकर घंटों समुद्र को निहारते रहते थे।
  4. इस यात्रा के दौरान चंद्र शेखर वैंकट रामन् के भितर यह जिज्ञासा उठी कि आखिर समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है कुछ और क्यों नहीं।
  5. खोज के दौरान उन्होंने जाना कि जब एक रंग के प्रकाश की किरण के फोटॉन जब किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो गुजरने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है। इसी को रामन् प्रभाव के नाम से जाना गया।
  6. इस खोज से आइन्स्टीन के विचारों का प्रायोगिक प्रमाण मिल गया।
    • इस खोज से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सरल हो गया।
    • इस से पहले अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन करने के लिए इंफ़्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाता था। जिसमें गलतिया होने की संभावना अधिक थी।
    • रामन् स्पेक्ट्रोस्कोपी के परिणाम सटीक थे और इसके द्वारा प्रयोगशाला में पदर्थों का सश्लेषण आसान हो गया और उपयोगी पदार्थों का कृत्रिम निर्माण संभव हो सका।
  7. इस कार्य ने रामन को विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की श्रेणी में खड़ा कर दिया। उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । इनमें 1929 में सर की उपाधि, 1930 में विज्ञान के क्षेत्र का सर्वोच्च पुरस्कार नोबेल पुरस्कार और 1954 में भारत का सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न मुख्य हैं।
  8. रामन् ने देश में शोधकार्यों की असुविधा को देखते हुए बैंगलुरु में एक शोध संस्थान “रामन् रिसर्च इंस्टीट्यु्ट’ की स्थापना की।
  9. भौतिकी में अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने ” जनरल ऑफ़ फ़िजिक्स’ नामक शोध पत्रिका आरंभ की।
  10. उनका निधन 21 नवंबर सन् 1970 के दिन 82 वर्ष की आयु में हुआ।
  11. अपने जीवन में उन्होंने अनेक छात्रों को शोधकार्यों में मार्गदर्शन दिया और अपने कार्यों से युवाओं में वैज्ञानिक चेतना का विकास करने का प्रयास किया।  
  12. चंद्र शेखर वैंकट रामन् ने हमें हमेशा ही यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें।  तभी हम अपने भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर सकेंगे।

प्रश्न 1.रामन् भावुक प्रकृति प्रेमी के अलावा और क्या थे?

उत्तर: भावुक प्रकृति प्रेमी के अलावा रामन् एक जिज्ञासु वैज्ञानिक भी थे। उन्हें प्रकृति के रहस्यों को जानने की स्वाभाविक जिज्ञासा रहती थी।

प्रश्न 2 . रामन् समुद्र को देखकर रामन् के मन में कौन सी दो जिज्ञासाएँ उठीं ?

उत्तर: समुद्र को देखकर रामन् के मन में यह जिज्ञासा उठी कि समुद्र का रंग नीला ही क्यों होता है? कुछ और रंग क्यों नहीं ?

प्रश्न 3 . रामन् के पिता ने उनमें किन विषयों की सशक्त नींव डाली थी?

उत्तर : रामन् के पिता ने उनमें गणित और भौतिकी की सशक्त नीव डाली थी।

प्रश्न 4 . वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के अध्ययन के द्वारा रामन क्या करना चाहते थे?

उत्तर : वाद्य यंत्रों की ध्वनियों के अध्ययन द्वारा रामन् वाद्ययंत्रों की ध्वनियों के पीछे छिपे वैज्ञानिक रहस्यों की परतें खोलने का प्रयास कर रहे थे। इसके द्वारा वे पश्चिमी देशों की इस भ्रांति को दूर करने का प्रयास कर रहे थे कि भारतीय वाद्य यंत्र विदेशी वाद्ययंत्रों की तुलना में घटिया हैं।

प्रश्न 5. सरकारी नौकरी छोड़ने के पीछे रामन् की क्या भावना थी?

उत्तर : सरकारी नौकरी छोड़ने के पीछे रामन् की भावना यह थी कि वह अपना पूरा समय अध्ययन, अध्यापन और शोधकार्यों को दे सकें।

प्रश्न 6. रामन् प्रभाव ’ की खोज के पीछे कौन सा सवाल हिलोरें ले रहा था?

उत्तर: रामन् प्रभाव खोजने के पीछॆ समुद्र के नीले रंग होने के रहस्य का प्रश्न हिलोरे ले रहा था। सन्‍1 1921 में समुद्री यात्रा के दौरान रामन् के दिमाग में यह प्रश्न उठा कि आखिर समुद्र का रंग नीला ही क्यों है कोई अन्य रंग क्यों नहीं? इसकी परिणति रामन् प्रभाव के रूप में हुई।

प्रश्न 7. प्रकाश तरंगों के बारे में आइंसस्टीन ने क्या बताया?

उत्तर: प्रकाश तरंगों के बारे में आइंसस्टीन ने बताया कि प्रकाश अति सूक्ष्म कणों की सूक्ष्म धारा के समान है।

प्रश्न 8. रामन् की खोज ने किन अध्ययनों को सहज बनाया?

उत्तर: रामन् की खोज ने अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज बनाया ।

प्रश्न 1. ‘कॉलेज के दिनों में रामन् की दिली इच्छा क्या थी?

उत्तर ; कॉलेज के दिनों में रामन् की दिली इच्छा थी कि सारा जीवन शोध कार्यों को ही समर्पित कर दें।

प्रश्न 2. वाह्ययंत्रों पर की गई खोजों से रामन् ने कौन-सी भ्रांति तोड़ने की कोशिश की?

उत्तर: वाह्ययंत्रों पर की गई खाजो से रामन् ने विदेशियों की यह भ्रांति तोड़ने की कोशिश की कि भारतीय वाद्य यंत्र विदेशी यंत्रों की तुलना में घटिया हैं।

प्रश्न 3. रामन के लिए नौकरी संबंधी कौन-सा निर्णय कठिन था ?

उत्तर: रामन के लिए मोटी तनख्वाह और सुख- सुविधाओं वाली सरकारी नौकरी छोड़ कर कम वेतन और कम सुविधाओं वाली विश्वविद्यालय की नौकरी में आने का निर्णय करना कठिन था।

प्रश्न 4.सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् को समय-समय पर किन-किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया ?

उत्तर: सन् 1929 को उन्हें सर की उपाधि प्रदान की गई। सर चंद्रशेखर वेंकट रामन् को सन् 1930 में विश्व के सर्वोच्च पुरस्कार – भौतिकी में नोबेल पुरस्कार -से सम्मानित किया गया था । वे नोबेल पुरस्कार पानेवाले पहले भारतीय वैज्ञानिक थे। उनके बाद भारतीय नागरिकता वाले किसी भी अन्य भारतीय वैज्ञानिक को यह पुरस्कार अभी तक नही मिल पाया है। इसके अलावा उन्हें कई पुरस्कार मिले, जैसे रोम का मेट्यूसी पदक, रॉयल सोसाइटी का हयूज पदक, फ़िलोडेल्फिया इंस्टीट्यूट का फ्रैंकलिन पदक, सोवियत रूस का अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार और भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।

प्रश्न 5.रामन् को मिलनेवाले पुरस्कारों ने भारतीय चेतना को जाग्रत किया। ऐसा क्यों कहा गया है?

उत्तर: उन्हें अधिकांश सम्मान उस दौर में मिले जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था। उन्हें मिलनेवाले सम्मानों ने भारतीयों को एक नया आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास दिलाया। विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने एक नयी भारतीय चेतना को जाग्रत किया

प्रश्न 1.रामन् के प्रारंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग क्यों कहा गया है?

उत्तर: एक हठयोगी कठिन आसनों में योग कर अपने इच्छित सिद्धि पाता हैं। उसी प्रकार रामन ने भी अपने कलकत्ता में इंडियन एसोसिशन ऑफ साइंस की प्रयोगशाला में कामचलाऊ उपकरणों और कम साधनों के साथ सीमित समय में अपने शोधकार्य किए। इन कठिन परिस्थितियों में अपने शोधकार्य करने के कारण लेखक ने इसे हठयोग की संज्ञा दी ।

प्रश्न 2. रामन् की खोज ‘ रामन प्रभाव ‘ क्या है? स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर:  रामन् ने अनेक ठोस रवों और तरल पदार्थो पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि जब एकवर्णीय प्रकाश की किरण किसी तरल या ठोस रवेदार पदार्थ से गुजरती है तो उस पदार्थ से गुजरने के बाद उसके वर्ण में परिवर्तन आता है।वजह यह होती है कि एकवर्णीय प्रकाश की किरण के फोटॉन जब तरल या ठोस रवे से गुज़रते हुए इनके अणुओं से टकराते हैं तो इस टकराव के परिणामस्वरूप वे अपनी ऊर्जा का कुछ अंश खो देते है या पा जाते हैं। दोनों ही स्थितियाँ प्रकाश के वर्ण (रंग) में बदलाव लाती हैं एकवर्णीय प्रकाश तरल या ठोस रवों से गुजरते हुए जिस परिमाण में ऊर्जा खोता या पाता है, उसी हिसाब से उसका वर्ण परिवर्तित हो जाता है। इसको रामन् इफेंक्ट कहा जाता है।

प्रश्न 3.”रामन प्रभाव’ की खोज से विज्ञान से विज्ञान के क्षेत्र में कौन-कौन से कार्य संभव हो सके?

उत्तर: रामन् की खोज की वजह से पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज हो गया। पहले इस काम के लिए इंफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाता था। गया। इफ्रा रेड स्पेक्ट्रोस्कोपी एक मुश्किल तकनीक है और गलतियों की संभावना बहुत अधिक रहती है। रामन की खोज के बाद पदार्थों की आणाविक और परमाणिविक संरचना के अध्ययन के लिए रामन स्पेक्ट्रोस्कोपी का सहारा लिया जाने लगा। यह तकनीक एकवर्णीय प्रकाश के वर्ण में परिवर्तन के आधार पर पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की संरचना की सटीक जानकारी देती है। इस जानकारी की वजह से पदार्थों का संश्लेषण प्रयोगशाला में करना तथा अनेक उपयोगी पदार्थों का कृत्रिम रूप से निर्माण संभव हो गया है। 

प्रश्न 4. देश को वैज्ञानिक दृष्टि और चिंतन प्रदान करने में सर चंद्रशेखर वेंकट रामन के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: रामन् को अपने शुरुवाती दिनों में अच्छी ढंग से प्रयोगशाला और उपकरणों के अभाव मे काफी संघर्ष करना पड़ा था। इसलिए उन्होने एक संस्थान अत्यंत उन्नत प्रयोगशाला और शोध -संस्थान की स्थापना की जो बंगलोर में स्थि्त है और उन्हीं के नाम पर ‘रामन रिसर्च इंस्टीट्र नाम से जानी जाती है। भौतिक शास्त्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने इंडियन जरनल ऑफ फिजिक्स नामक शोध- पत्रिका प्रारंभ की। अपने जीवनकाल में उन्होंने सैकड़ों शोध-छात्रों का मार्गदर्शन किया। जिस प्रकार एक दीपक से अन्य कई दीपक जल उठते हैं, उसी प्रकार उनके शोध- छात्रों ने आगे चलकर काफ़ी अच्छा काम किया । उन्हीं में कई छात्र बाद में उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हुए। विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने करेंट साइंस नामक एक पत्रिका भी प्कारकाशित की जिसका संपादन भी वे करते थे। रामन प्रभाव केवल प्रकाश की किरणों तक ही सिमटा नहीं था; उन्होंने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश की किरणों से पूरे देश को आलोकित और प्रभावित किया।

प्र्श्न5. चंद्रशेखर वेंकट रामन् के जीवन से प्राप्त होनेवाले संदेश को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: रामन् वैज्ञानिक चेतना और दृष्टि की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा ही यह संदेश दिया कि हम अपने आसपास घट रही विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं की छानबीन एक वैज्ञानिक दृष्टि से करें । तभी तो उन्होने संगीत के सुर-ताल और प्रकाश की किरणो की आभा के अंदर से वैज्ञानिक सिद्धांत खोज निकाले। हमारे आसपास ऐसी न जाने कितनी ही चीजें बिखरी पड़ी है, जो अपने पात्र की तलाश में हैं। हमें रामन् के जीवन से प्रेरणा लेकर प्रकृति के बीच छुपे वैज्ञानिक रहस्य का भेदन करना चाहिए।

(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए —

कथन 1 : उनके लिए सरस्वती की साधना सरकारी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।

आशय: इस कथन के द्वारा चंद्रशेखर रामन् के विशिष्ट व्यक्तित्व और वैज्ञानिक चेतना के प्रति उनके आकर्षण का पता चलता है। रामन् ने कठिन परिस्थितियों में भी अपना शोध कार्य जारी रखा ।ऐसे में जब उन्हें उनके पसंद का कार्य अध्ययन -अध्यापन और शोध का अवसर मिला तो बावजूद कम सुविधाओं के बावजूद उन्होंने इसे स्वीकार किया। 

कथन 2: हमारे पास ऐसी न जाने कितनी ही चीजें बिखरी पड़ी हैं, अपने पात्र की तलाश में हैं ।

आशय: यह कथन हमें रामन् के जीवन से प्रेरणा ले्कर प्रकृति के विभिन्न कार्यकलापों और घटनाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देता है। आज भी हमारे पर आस-पास अनेक प्राकृतिक रहस्य्पछिपे पड़े हैं जो अपने खोजे जाने के इंतजार में हैं। आवश्यकता है कि इन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाय, व्यवस्थित तौर से शोध किया जाए तभी इन घटनाओं के रहस्य से पर्दा उठेगा ।

कथन 3 : यह अपने आप में एक आधुनिक हठयोग का उदाहरण है।

आशय: रामन् ने कठिन परिस्थितियों में एवं समयाभाव में भी शोध कार्य जारी रखा ।एक योगी कठिन आसनों और योगासन द्वारा साधना कर अपने लक्ष्य प्राप्त करता है । रामन् ने भी कलकत्ता में वित्त- विभाग में काम के दौरान अपने शोध को नहीं छॊड़ा। कम समय और कामचलाऊ उपकरणों ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ साइंस की प्रयोगशाला में मामूली उपकारणों की सहायता से शोधकार्य जारी रखा। इसी को लेखक थे ‘आधुनिक हठयोग’ कहा है

  1. प्रमाण ………….
  2. प्रणाम …………….
  3. धारणा ……………
  4. धारण …………..
  5. पूर्ववर्ती ………….
  6. परवर्ती …………
  7. परिवर्तन ………..
  8. प्रवर्तन …………..

उत्तर-

  1. प्रमाण – प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
  2. प्रणाम – हमें अपने बड़ों से प्रणाम करना चाहिए।
  3. धारणा – किसी बात को पूरी तरह जाने बिना कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए।
  4. धारण –  आज हम सबने नए वस्त्र धारण कर लिए हैं।
  5. पूर्ववर्ती –  यह कोई नया काम नहीं हैं। पूर्ववर्ती सरकार के काम को ही इस सरकार ने आगे बढ़ाया है।
  6. परवर्ती – एक सौ आठ की परवर्ती संख्या एक सौ नौ है।
  7. परिवर्तन – परिवर्तन प्रकृति का एक शाश्वत नियम है।
  8. प्रवर्तन – महात्मा बुद्ध, महावीर और गुरु नानक जैसी महान आत्माएँ ही नए पथ प्रवर्तन कर सकते हैं ।
  1. मोहन के पिता मन से सशक्त होते हुए भी तन से ………………… हैं।
  2. अस्पताल के अस्थायी कर्मचारियों को ……………….. रूप से नौकरी दे दी गई है।
  3. रामन् ने अनेक ठोस रवों और ………………… पदार्थों पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया।
  4. आज बाज़ार में देशी और ………………. दोनों प्रकार के खिलौने उपलब्ध हैं।
  5. सागर की लहरों का आकर्षण उसके विनाशकारी रूप को देखने के बाद ……………………. में परिवर्तित हो जाता है।

उत्तर-

  1. मोहन के पिता मन से सशक्त होते हुए भी तन से अशक्त हैं।
  2. अस्पताल के अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी रूप से नौकरी दे दी गई है।
  3. रामन् ने अनेक ठोस रवों और द्रव पदार्थों पर प्रकाश की किरण के प्रभाव का अध्ययन किया।
  4. आज बाजार में देशी और विदेशी दोनों प्रकार के खिलौने उपलब्ध हैं।
  5. सागर की लहरों का आकर्षण उसके विनाशकारी रूप को देखने के बाद विकर्षण/प्रतिकर्षण में परिवर्तित हो जाता है।
  1. सुख-सुविधा ………..
  2. अच्छा-खासा …………
  3. प्रचार-प्रसार ………….
  4. आस-पास ………….

उत्तर

  1. सुख-सुविधा- आज इतनी सुख-सुविधा होने पर भी लोग खुश नहीं हैं।
  2. अच्छा-खासा-  वह हमेशा स्वयं को बीमार कहता था जबकि वह अच्छा -खासा है।
  3. प्रचार-प्रसार-  शिक्षा का प्रचार-प्रसार बहुत जरूरी है।
  4. आस-पास- हमें अपने आस-पास साफ़-सफ़ाई रखनी चाहिए।
अनुस्वारअनुनासिक
(क) अंदर(क)ढूँढते
(ख)(ख)
(ग)(ग)
(घ)(घ)
(ङ)(ङ)

उत्तर:

अनुस्वारअनुनासिक
(क) अंदर(क) ढूँढते
(ख) अंगद(ख) चाँद
(ग) सुंदर(ग) मूँग
(घ) यंत्र(घ) काँपना
(ङ) आशंका(ङ)साँप


घंटों खोए रहते, स्वाभाविक रुझान बनाए रखना, अच्छा-खासा काम किया, हिम्मत का काम था, सटीक जानकारी, काफ़ी ऊँचे अंक हासिल किए, कड़ी मेहनत के बाद खड़ा किया था, मोटी तनख्वाह।
उत्तर

  • घंटों खोए रहते- बहुत देर तक एकाग्रचित्त होकर ध्यान में डूब जाना।
  • स्वाभाविक रुझान बनाए रखना- बिना किसी बाहरी दबाव के रुचिपूर्वक कार्य करते रहना।
  • अच्छा-खासा काम किया- बहुत काम किया।
  • हिम्मत का काम था-  कठिन काम, जिसके लिए साहस की जरूरत ह
  • सटीक जानकारी- एकदम सही एवं तथ्यपूर्ण प्रामाणिक जानकारी।
  • काफ़ी ऊँचे अंक हासिल किए- बहुत अच्छे अंक पाना।
  • कड़ी मेहनत के बाद खड़ा किया था- अत्यंत परिश्रम से कोई काम किया जाना।
  • मोटी तनख्वाह- बहुत अच्छा वेतन होना।

प्रश्न 6.
पाठ के आधार पर मिलान कीजिए-

नीलाकामचलाऊ
पिता रव
तैनातीभारतीय वाद्य यंत्र  
उपकरणवैज्ञानिक रहस्य
घटियासमुद्र
फोटॉननींव
भेदनकलकत्ता

उत्तर

नीलासमुद्र
पिता नींव
तैनातीकलकत्ता
उपकरणकामचलाऊ
घटियाभारतीय वाद्य यंत्र  
फोटॉनरव
भेदनवैज्ञानिक रहस्य

उत्तर-

  • मेहमानों के आने पर परेशानी तो होती ही है।
  • इन लड़कियों में सिर्फ़ कमला ही समझदार लड़की है।
  • मैंने मोहन की ही मदद ली है।
  • शाम तक हम सब घर लौट ही जाएँगे।
  • हम सब विज्ञान की ही पढ़ाई कर रहे हैं ।

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