सांध्य गीत
नव वर्ष की सांध्य बेला पर
हे हरि ! बस यही प्रार्थना
राम नाम रहे रसना पर
सुमिरन की अमिट वासना
जीवन में छूटे न कभी हरि नाम
होते रहे जगत के सब काम
मन में यही एक सम्बल हो
हरि नाम का अतुलित बल हो।
मेरी संतानों में भरना इतना प्रेम
निभा देना उनसे भी योग क्षेम
सांझ ढले जब उनका हो घर आना
भूलें न प्रभु स्मरण कर दीप जलाना।
आशाओं के विराट समुंदर में।
अनवरत हम डूबते उतराते चलें।।
हे हरि तुम पोत बन जाना
भव सागर पार करा देना।
स्वरचित: कुसुम लता जोशी
लड़कों वाला घर है ।
मां आज घर पर नहीं है
होटल से खाना मंगा लिया है।
भाई के साथ मिल कर पार्टी मना लिया है
शाम को बन जाएगी मैगी।
लड़कों वाला घर है ।
मां आज देर से उठी है ।
चूल्हे पर चाय नहीं चढ़ी है।
आंगन अब तक बुहारा नहीं है।
मंदिर का दीपक बुझा पड़ा है।
लड़कों वाला घर है।
मां आज बीमार पड़ी है।
लड़का रात भर जगा हुआ है ।
अस्पताल की चौखट पर खड़ा हुआ है।
घर और बाहर दोनों निभा रहा है।
लड़कों वाला घर है
स्वरचित: कुसुम लता जोशी
तीन लघु कविताएं
मेरे तेरे में
सुख दुःख का अन्तर
हंसते बिंदु
😂😂
**
प्रेम की आशा
स्वप्न से यथार्थ में
दुःख सुख में
**
नीले आकाश
आओ बनो सारथी
आनंद की खोज तक
स्वरचित : कुसुम लता जोशी
युद्ध का उद्घोष

यह प्रेम के गीत गाने का समय नही
यह विरह के टेसू बहाने का समय नहीं
तीन दिन की प्रतीक्षा ही काफी है राम
अब शस्त्र ऊपर उठा लो तमाम
दुश्मन के घमंड को करे चूर चूर
आतताई सिर झुकाने को हो मजबूर
छिप के करे जो वीरों पर प्रहार
कापुरुष वे जाएंगे युद्ध में हार
समवेत स्वर में करें उद्घोष
वीर प्रसविनी धरा का जय घोष
व्यर्थ न होगा वीरों का बलिदान
शत्रुजित बनेगा भारत महान
छत्तीस गढ़ में वीरगति को प्राप्त वीरों को समर्पित
स्वरचित कविता_ कुसुम लता जोशी
दुपट्टा

खासी वाहियात चीज़ है ये दुपट्टा भी।
बेटी पर हो तो बोझ और दकियानुसी लगता है
बहु पर हो तो संस्कार।
माँ पर हो दुपट्टा तो ममता लगता हैं,
खुद पर हो तो बंधन और भार।
नई नवेली दुल्हन के चेहरे का कभी नूर लगता हैं ,
कभी औरत की बदहाली को मजबूर लगता हैं
इस दुपट्टे के दोहरे मापदंड ।
कभी परम्परा की दुहाई ,
कभी फैशन का पूर्णांक लगता हैं ।
स्वरचित कविता_ कुसुम लता जोशी


Leave a Reply