पर्यावरण दिवस पर कविता

शहरीकरण की अंधी दौड़ में ,

बढ़ता ही जा रहा है प्रदूषण

गाड़ियों से निकलता धुआँ है

आओ ढूँढे इसका हल कहाँ है ?इसका हल कहाँ है ?

साँस लेना भी हुआ मुश्किल।

आदमी कुदरत का बना कातिल॥

साथ मिल कर इसे बचाना है ।

आओ ढूँढे, इसका हल कहाँ है ?इसका हल कहाँ है ?

कारखानों और इमारतों ने घेर कर।

पेड़ पौधे औ’ जंगल लिए निगल॥

पशु-पक्षियों के आसरे भी खतम हैं।

आओ ढूँढे, इसका हल कहाँ है ?इसका हल कहाँ है ?

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