‘अ’ के बारे में संपूर्ण जानकारी
कल्पना कीजिए — कि एक अभी-अभी जन्मा बच्चा है , वह रोता है तो उसके मुँह से निकलने वाली वह ध्वनि, जो इतनी सरल, इतनी सहज है कि नवजात शिशु को जरा भी प्रयास न करना पड़े, वह कौन सी ध्वनि होगी? वह स्वर जो पहली साँस की गूँज है, जो बताती है कि आप आ गए इस धरती पर । जो स्वर है सृष्टि के जागने की आदिम गूंज। बस मुँह खोलिए, हवा को बहने दीजिए, और जो सबसे सहज स्वर निकलेगा, वह कौन सा स्वर है? जी हाँ आप सही समझॆ वह स्वर है ‘अ’।
प्राचीन ऋषियों का मानना था कि ब्रह्मांड के प्रथम जागरण की ध्वनि ‘अ’ ही थी। न तो तेज़, न भारी — यह संतुलन का प्रतीक है। इसे बोलने के लिए न होंठ चाहिए, न दाँत, न कोई प्रयास। संस्कृत मंत्रों से लेकर आधुनिक दौर की हिंदी तक, ‘अ’ भाषा की अदृश्य डोर है, जो ध्वनि, शब्द और अर्थ को बाँधती है — आज स्वरों के इसी अनसुने, मगर अमूल्य नायक ’ अ ’ के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे।

1.देवनागरी लिपि में ’अ’ की स्थिति
1️.वर्णमाला में स्थान:
‘अ’ देवनागरी वर्णमाला का पहला स्वर (vowel) है। हिंदी में कुल 11 स्वर होते हैं, और ‘अ’ उनमें सबसे पहला और आधार स्वर है।
2️. उच्चारण:
‘अ’ का उच्चारण मुख्य रूप से कंठ (गले) से होता है। इसे कंठ्य स्वर कहा जाता है।उदाहरण: अग्नि, अमर, अनार।
3️. ध्वनि (Sound):
‘अ’ एक मध्यम और खुला स्वर है।इसका उच्चारण करते समय मुँह हल्का खुला होता है और जीभ नीचली स्थिति में रहती है।इसका उच्चारण बिना किसी विशेष प्रयास के स्वाभाविक रूप से होता है।
5️. विशेषताएँ:
‘अ’ को स्वर का राजा कहा जाता है क्योंकि यही हर शब्द और ध्वनि का आधार है।’अ’ को मूल ध्वनि भी कहा जाता है।
संस्कृत व्याकरण में कहा गया है:
“अकारः सर्ववर्णानां आदिर् एव निरूपितः।”
(अकार सभी वर्णों का आदि स्वरूप है।)
6️. ’अ ’ का उपयोग:
1.’अ’ स्वतंत्र रूप से भी प्रयुक्त होता है जैसे: अमर, अनार
2. व्यंजनों के साथ मिला कर । जैसे :
कमल = क्+अ+म्+अ+ल्+अ, मगर= म्+अ+ग्+अ+र्+अ
3. निषेध के अर्थ में प्रयोग: संस्कृत और हिंदी में कई बार ’अ ’ का प्रयोग निषेध अर्थात नहीं के अर्थ में भी होता है।
जैसे: अमृत = न मृत होने वाला , अमर = न मरने वाला, अप्राप्य= न प्राप्त होने वाला आदि।
4. उपसर्ग के रूप में : हिंदी और संस्कृत में ‘अ’ उपसर्ग का अर्थ होता है — “न” या “अभाव”।
जैसे : अशुभ , अभाव , अविश्वसनीय, अकल्पनीय, अयोग्य
7️. देवनागरी में ’अ ’ का रूप और मात्रा :
‘अ’ के लिए कोई मात्रा चिह्न नहीं होता। जब कोई व्यंजन बिना मात्रा के लिखा जाता है, तो उसमें स्वतः ‘अ’ ध्वनि जुड़ी होती है।
जैसे —
क =क्+अ , म =म् +अ
| रूप संकेत – | चिह्न् |
| स्वतंत्र | अ |
| मात्रा | (कोई चिह्न नहीं) जैसे क् + अ = |
अन्य भाषाओं में अ का स्थान :
| अ | अक्षर / प्रतीक | उच्चारण | क्रम / स्थान | नाम |
| अरबी | ا (अलिफ़) | ‘अ’ (हल्का) | पहला अक्षर | अलिफ़ (Alif) |
| फारसी | ا (अलिफ़) | ‘अ’ / ‘आ’ | पहला अक्षर | अलिफ़ (Alif) |
| लैटिन | A | ‘ए’ / ‘आ’ | पहला अक्षर | A |
| हिब्रू | א (Aleph) | मूक या ‘अ’ जैसा | पहला अक्षर | अलेफ़ (Aleph) |
| अंग्रेज़ी | A | ‘ए’ / ‘ऐ’ / ‘आ’ | पहला अक्षर | A (ए) |
| ग्रीक | Α (Alpha) | ‘अ’ / ‘आ’ | पहला अक्षर | अल्फ़ा (Alpha) |
इस प्रकार हम देखते हैं कि सभी प्राचीन भाषाओं — अरबी, हिब्रू, ग्रीक, लैटिन में पहला अक्षर ‘अ’ ध्वनि से जुड़ा हुआ है।यानि इंसानी भाषा का पहला भाव हमेशा मुँह खोलने की सबसे आसान आवाज़ ‘अ’ ही रही है।जो हर संस्कृति में अलिफ़, अलेफ़, अल्फ़ा, A के रूप में बचा हुआ है। हिंदी, संस्कृत, और अन्य भारतीय भाषाओं में ‘अ’ का लिप्यंतरण अंग्रेज़ी में ‘a’ के रूप में किया जाता है।
2. ‘अ’ का दार्शनिक अर्थ
‘अ’ केवल एक अक्षर नहीं, बल्कि हिंदी और संस्कृत भाषा का आधार, शुरुआत और ध्वनि का मूल स्रोत है। इसकी उपस्थिति हर शब्द, हर ध्वनि और उच्चारण की आत्मा में है। भारतीय दर्शन में ‘अ’ को प्रणव (ॐ) का प्रथमाक्षर माना गया है। इसी से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई ।
1. अकार और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
हिंदू दर्शन में कहा गया है कि सृष्टि की शुरुआत ध्वनि से हुई थी।
उस प्रथम ध्वनि को ‘अ’ कहा गया। ऋषि-मुनियों ने ध्यानावस्था में जो पहली ध्वनि सुनी, वो ‘अ’ थी। यही ‘अ’ बाद में बढ़ते-बढ़ते उ और म ध्वनियों के साथ मिलकर ॐ (ओम्) बना।
जिसे ब्रह्मांडीय ध्वनि और सृष्टि का बीज कहा जाता है।
2. ’अ ’ ईश्वर का प्रतीक
“अ” = ब्रह्मा (सृष्टि), “उ” = विष्णु (पालन), “म” = महेश (संहार)
इसलिए ‘अ’ को सृष्टि का मूल आधार कहा गया।
3. प्रणव मंत्र में ‘अ’ की महिमा
प्रणव मंत्र ॐ की व्याख्या उपनिषदों में विस्तार से की गई है।
माण्डूक्य उपनिषद में ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’ इन तीनों मात्राओं का वर्णन बहुत सुंदर ढंग से हुआ है। इसमें ‘ॐ’ (ओंकार) के तीन हिस्सों ‘अ’, ‘उ’, ‘म’ को जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं से जोड़ा गया है।
‘अ’ के बारे में जो श्लोक आता है, वह इस प्रकार है:
जागरित स्थानो वैश्वानरो अकारो वै प्रथमा मात्राप्तेरादिमत्द्वावाप्नोति ह वै सर्वकामान् आदिश्च भवति य एवं वेद।
मण्डूक्योपनिषद श्लोक सं. 9
सरल अर्थ: वैश्वानर जिसका जागरित स्थान है , आत्मा का प्रथम पाद है। यह व्याप्तित्व और आदिमत्व( प्रारंभिक) होने के कारण ॐकार की प्रथम मात्रा ’अ’कार है। जो साधक इस प्रकार जानाता है वह संपूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। तथा साधकों में श्रेष्ठ हो जाता है
‘अ’ — ॐकार का पहला अक्षर है। यह जाग्रत अवस्था का प्रतीक है।
जो इसे जानता है, वह सभी इच्छाओं की सिद्धि करता है और सब कुछ प्राप्त कर लेता है।
अर्थात् ‘अ’ का अर्थ है जाग्रत अवस्था (waking state)। यह वही अवस्था है जिसमें हम अपने शरीर और इन्द्रियों के माध्यम से जगत का अनुभव करते हैं। इसलिए ‘अ’ को प्रथम अवस्था और जाग्रति का प्रतीक माना गया।
4. अ-कार का वैदिक महत्व
वैदिक यज्ञों और मंत्रोच्चारण में ‘अ’ ध्वनि का बहुत महत्त्व है। कहा जाता है कि यदि कोई मंत्र ‘अ’ के बिना बोला जाए तो उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। क्योंकि ‘अ’ ध्वनि ही मंत्रों की ऊर्जा का स्त्रोत है।
यजुर्वेद में लिखा है:
“अकारो वै सर्वा वाणी मूलम्।”
यानी ‘अ’ सभी वाणियों का मूल है।
5. ‘अ’ और शिव
कुछ शैव ग्रंथों में माना गया है कि भगवान शिव ने सृष्टि की उत्पत्ति के समय सबसे पहले ‘अ’ का उच्चारण किया और उसी ‘अ’ से संसार की ध्वनियाँ, शब्द, और वर्णमाला बनी। इसलिए ‘अ’ को आदि ध्वनि और शिवस्वरूप भी कहा जाता है। माहेश्वर सुत्रों में , जिन्हें भगवान शिव के डमरू से उद्भूत चौदह सूत्र माना जाता है, उनमें भी प्रथम सूत्र अ इ उ ण्, है । इनमें भी प्रथमाक्षर ”अ ’ है।
’अ ’ कृष्ण का स्वरूप :
भागवत गीता में , अध्याय 10 श्लोक 33 में भगवान कृष्ण ने ”अ’ को अपना स्वरूप बताया है।
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः।।10.33।।
अक्षरोंमें अकार और समासोंमें द्वन्द्व समास मैं हूँ। अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला धाता भी मैं हूँ।
अक्षरोंमें — वर्णोंमें अकार — अ वर्ण मैं हूँ। समास — समूहमें द्वन्द्व नामक समास मैं हूँ तथा मैं ही अविनाशी काल — जो क्षणघड़ी आदि नामों से प्रसिद्ध है वह समय? अथवा कालका भी काल परमेश्वर हूँ और मैं ही विधाता — सब जगत के कर्मफलका विधान करनेवाला तथा सब ओर मुखवाला परमात्मा हूँ।
अ (पुंलिंग, संज्ञा) अर्थ में विष्णु के लिए प्रयुक्त होता है। कहीं-कहीं अकार से ब्रह्मा भी बोध होता है। तंत्रशास्त्र अनुसार अ में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा उनकी शक्तियाँ वर्तमान हैं। तंत्र में अ के पर्याय सृष्टि, श्रीकंठ, मेघ, कीर्ति, निवृत्ति, ब्रह्मा, वामाद्यज, सारस्वत, अमृत, हर, ललाट, एकमात्रिक, कंठ, ब्राह्मण, वागीश तथा प्रणवादि भी पाए जाते हैं। प्रणव(ॐ) के (अ+ उ+ म) तीन अक्षरों में अ प्रथम है। योग साधना में प्रणव (ओ३म्) और विशेषतः उसके प्रथम अक्षर अ का विशेष महत्त्व है ।
निष्कर्ष:
‘अ’ कोई साधारण अक्षर नहीं, बल्कि
- ध्वनि का मूल है।
- सृष्टि का प्रथम स्वर है।
- ईश्वर की पहली वाणी है।
- और जागृति का प्रतीक है।
यह पौराणिक दृष्टि से शिव, ब्रह्मा और प्रणव का मूल है।
जो भी ध्वनि शुरू होती है — उसकी शुरुआत ‘अ’ से ही होती है।
’अ ’ के बारे में यह जानकारी यदि उपयोगी लगी हो तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए ।
लेखिका: कुसुम लता जोशी



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