आजादी के 78 साल : क्यों गर्व करें हम?

दोस्तों ! आज 15 अगस्त 2024 को भारत ने आजादी पाए 78 वर्ष पूरे कर लिए। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी विद्यालयों में झंडा रोहण किया गया, धूम -धाम से बाज़ार सजाए गए। जगह -जगह पोस्टर, झंडे , रैलियाँ और बाजारों को तिरंगी पताकाओं से सजा देखकर मन उत्साहित हो जाता है । लेकिन ये उत्साह मात्र एक दिन तक ही सीमित रह जाता है। जब हम वर्तमान भारत की हालत देखते हैं तो एक प्रश्न उठता है कि क्या आज स्वतंत्रता दिवस मनाने का कोई औचित्य बचा है?
आज भारत की स्थिति देखती हूँ तो खेद होता है देश की आजादी के 78 वर्ष बाद भी हमारे पास बच्चों की शिक्षा के उचित साधन नहीं हैं एक तरफ़ तो ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों मे स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, शिक्षकों की कमी, और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी से बच्चों का समग्र विकास बाधित होता है;दूसरी तरफ़ शहरी क्षेत्रों में प्रायवेट स्कूलों के द्वारा अच्छी शिक्षा के नाम पर अभिभावकों का आर्थिक शोषण हो रहा है। लाखों बच्चे कुपोषण, भुखमरी , स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं। आज आजादी के 78 वर्ष बाद भी हम बाल श्रम के कोढ़ को अपने समाज से मिटा नहीं पाए हैं । बच्चों के असुरक्षित भविष्य के कारण उन पर सर्वश्रेष्ठ बने रहने का दबाव इतना हो गया कि अल्पायु में ही बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ जैसे कि तनाव, चिंता, और अवसाद बढ़ती जा रही हैं। परीक्षाओं के दबाव, अभिभावकों और सामाजिक अपेक्षाएँ की अत्यधिक अपेक्षाओं ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया हैं। क्या ऐसे भारत पर गर्व करें हम?
युवाओं की समस्याएँ तो और भी महत्वपूर्ण व जटिल हैं। ये समस्याएँ उनके व्यक्तिगत विकास, सामाजिक स्थिरता, और देश के भविष्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं। पढ़ा-लिखा युवा बेरोजगारी से जूझ रहा है या फिर अल्प मानदेय पर अपने कौशल को बेचने पर मज़बूर गुलाम बना हुआ है। प्रतियोगिता, सामाजिक दबाव, और भविष्य की अनिश्चितता के कारण ये समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।आर्थिक समस्याओं के चलते कुछ युवा मानसिक संतुलन खो बैठते हैं । कुछ अवसाद ग्रस्त और आत्महत्या के विचार से जूझ रहे हैं तो दूसरे निराशा में नशे की ओर झुक जाते हैं । सामाजिक , पारिवारिक दबाव और अपेक्षाओं और दिशाहीनता के कारण आज का युवा अपना मानसिक संतुलन खो रहा है। जहाँ एक ओर कड़ी प्रतियोगिताओं का सामना कर खुद को साबित करना होता है, वहीं संवैधानिक रूप से भी जन्मजात वर्गीकरण और योग्यताओं को आरक्षण की बेड़ियों से जकड़ कर आगे बढ़ने से रोक दिया जाता है। ऐसे भारत पर क्यों गर्व करें हम?
एक तरफ़ हम ’बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे बुलंद करते हैं , दूसरी तरफ़ आए दिन बेटियों से छेड़-छाड़, बलात्कार की घटनाएँ आम हैं। पत्रकारिता का स्तर इस हद तक घट गया है कि जब एक महिला के साथ बलात्कार जैसी घटनाएँ होती है , तो उसको कवर-अप भी उस महिला के जाति-धर्म के आधार पर किया जाता है। इन बिके हुए पत्रकारों की नज़र में सामान्य वर्ग के साथ हुए अत्याचार का कोई अर्थ ही नहीं है । टी आर पी के लालच में सिर्फ़ चुनिंदा घटनाओं को ज्यादा जोर दिया जाता है । ऐसे में अपनी अजन्मी बेटी की भी सुरक्षा के लिए चिंतित हो उन्हें दुनिया में लाने से पहले ही डरते है। आजादी के लगभग अस्सी वर्षों बाद भी देश अपनी आधी आबादी महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा न प्रदान कर पाया है। स्वास्थ्य सुविधाएँ, प्रसव -मातृत्व आदि के दौरान उचित स्वास्थ्य सुविधाएँ न मुहैया कर पा रहा है। आज भी अनेक माताएँ प्रसव के दौरान अपना या अपनी संतान के जीवन से हाथ धो बैठती हैं। आधुनिक विकसित भारत में भी जब स्त्री-पुरुष का लिंग के आधार पर योग्यताओं और जिम्मेदारियों का विभाजन जारी है ; तब ऐसी आजादी पर क्यों गर्व करें हम?
एक ओर हमारी सरकारें देश की बढ़ती औसत आयु को अपनी सफलता बता कर डंका पीट रहीं हैं वहीं बुजुर्गों के लिए कोई योजनाएँ नहीं बनती । बढ़ती उम्र में स्वास्थ्य समस्याओं के चलते वे डॉक्टरों के लिए मात्र दुधारू गाय ही बने रह जाते हैं , जिनका निरंतर दोहन और शोषण किया जाता है। सरकार द्वारा बुजुर्गों को कोई विशेष स्वास्थ्य सुविधाएँ मुफ़्त नहीं दी जाती । मौजूदा समय में गरीब तबके के बुजुर्गों को आर्थिक सहायता के नाम पर मात्र एक -दो हज़ार रुपए देकर सरकारें ढिंढोरा पीटती हैं; जबकि दूसरी तरफ़ जीवन भर काम कर समाज और देश को सेवाएँ देने वाले कर्मियों की पेंशन बंद की जा रही है। जबकि सांसदों को लाखों रुपए पेंशन पर लुटाए जा रहें हैं । जिस देश का बुजुर्ग अपनी छोटी-बड़ी आवश्यकताओं के लिए दूसरों की दया पर निर्भर हो, जिस देश के भिन्न-भिन्न नागरिकों के लिए भिन्न -भिन्न कानून हों ,ऐसे भेद-भावपूर्ण देश की आजादी के लिए किस बात पर गर्व करें हम?
आज समाज की स्थिति दयनीय होती जा रही है। भारतीय राजनीति में धार्मिक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण एक गंभीर समस्या बन गया है। राजनीतिक दल अक्सर वोट बैंक की राजनीति के लिए धार्मिक और जातिगत भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं, जिससे समाज में विभाजन और तनाव बढ़ता है। नेताओं द्वारा भ्रष्टाचार को प्रत्यक्ष या परोक्ष में बढ़ावा दिया जाता है।भ्रष्टाचार, छल,कपट, और बेईमानी भारतीय राजनीति में गहरी जड़ें जमा चुका है। देश के विकास को दाँव पर रखकर सांप्रदायिकता , वोटबैंक की राजनीति को बढ़ावा देना, सेलेक्टिव सेक्युलरिज्म और धन-दल-बल के दुरुपयोग भारतीय राजनीति का पर्याय हो चुका है आजादी के 78 वर्ष बाद भी जब पत्रकारिता नेताओं के चाटुकारिता में जुटी हो ।अन्याय, शोषण और न्याय में देरी और लोकतंत्र के नाम पर भेड़तंत्र का विकास हो रहा हो उस देश की आजादी पर किस बात पर गर्व करें हम?
जहाँ नदियों को दूषित किया जा रहा हो , वन्य-संपदाओं को उद्योगपतियों के लाभ हेतु नष्ट किया जा रहा हो। जहाँ प्रकृति को कथित विकास के नाम पर बेरोक-टोक नष्ट किया जा रहा हो, जहाँ नागरिकों के हितों को दाँव पर लगा कर खिलवाड़ किया जा रहा हो, ऐसे स्वतंत्रता दिवस पर किस बात पर गर्व करें हम?
क्या इसीलिए हमें आजादी का जश्न मनाना चाहिए कि हमारे साथ जाति -धर्म के नाम पर अलगाव होता रहे। सिर्फ़ वोट देने के लिए समानता और अन्य स्थान पर साम्प्रदायिकता और दल-गत राजनीति के नाम पर भारतीय छले जाते रहें । एकता में अनेकता सिर्फ़ मुहावरा बना रहजाए और देश अनेक स्तरों पर खंडित-वंचित बना रहे।आतंकवाद से अब तक हम जूझ रहे हैं । क्या यही है भारत माता की जय !क्या यही था हमारे सपनों का भारत ? जिसके लिए हमारे लाखों-लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लाठियाँ खाई , जेल गए और यहाँ तक कि अपने प्राणों की आहुति भी देने से पीछे न हटे । क्या इसीलिए कि हमारी आने वाली पीढियाँ हमेशा-हमेशा संघर्ष करती रहें? जब तक भारत इन सब समस्याओं से जूझता रहेगा, हर साल झंडे फ़हराना, गीत गाना सिर्फ़ औपचारिकता ही रहेगी और धीरे-धीरे देश की व्यवस्था और कानून के प्रति आम जनता का विश्वास उठता जायगा। जब तक इन समस्याओं का कोई हल नहीं निकाला जाता, क्या आजादी का उत्सव कोई मायने रखता है?
मेरे मन बता! आजादी के इतने वर्षों बाद भी यदि हम सिर्फ़ आँकड़ों में ही विकसित हुए हैं तो फ़िर किस बात पर गर्व करें हम?



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