“ओणम: सांस्कृतिक धरोहर और समृद्धि का पर्व”
ओणम केरल का एक प्रमुख पर्व होता है जिसे पूरे उत्साह और आनंद के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार में विभिन्न रंग-बिरंगे उत्सव आयोजित किए जाते हैं और लोग एक-दूसरे के साथ रंग-बिरंगे परिवार समाचारों में शामिल होते हैं। इस अवसर पर पेरूक, जिसे ओणपप्पान कहते हैं, का त्योहार भी संगीत, नृत्य और खान-पान के साथ ही बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। ओणम के दौरान केरल की सड़कें, गलियां और घरों को रंग-बिरंगे पट्टियों और फूलों से सजाया जाता है। इसे माला-पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है, जिसमें लोग अपने घरों को दीपों और फूलों से सजाते हैं। ओणम का त्योहार केरल की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धारा से जुड़ा हुआ है और इसे उत्सवी आत्मा को जीने और मनाने का एक अद्भुत मौका माना जाता है।
ओणम केरल की पर्वतीय, समुद्र तटीय और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े ही उत्साह से मनाया जाता है, और इसे लोग बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। ओणम के दौरान लोग एक-दूसरे के साथ परंपरागत गाने गाते हैं, नृत्य करते हैं और विभिन्न प्रकार के खाने का आनंद लेते हैं। इस त्योहार के महत्व को समझते हुए कई विदेशी पर्यटक भी इसे देखने के लिए केरल आते हैं और इस उत्सव का आनंद लेते हैं।

ओणम की पौराणिक कथा
ओणम का त्योहार महाबली राजा की कथा से जुड़ा हुआ है, जो एक अत्यंत दयालु, प्रजापालक और महान राजा थे। केरल की लोककथाओं के अनुसार, महाबली का शासनकाल में केरल का स्वर्ण युग का समय था। इस दौरान राज्य में कोई दुःख, गरीबी या असमानता नहीं थी। सभी लोग सुखी और संतुष्ट थे। महाबली की उदारता और न्यायप्रियता की चर्चा पूरे राज्य में थी, जिसके कारण देवता भी उनके शासन से ईर्ष्या करने लगे।

भागवत पुराण के अनुसार, महाबली की शक्ति और प्रसिद्धि सभी लोकों में थी। उसने अपने गुरु शुक्राचार्य की इच्छानुसार सौ अश्वमेध यज्ञ करने का निर्णय लिया। इसके परिणामस्वरूप महाबली की कीर्ति बढ़ी। एक कथा के अनुसार, जब महाबली ने निन्यानब्बे अश्वमेध यज्ञ पूरे कर लिये और सौंवें यज्ञ का संपादन कर रहे थे तो इंद्र , जो देवताओं के राजा थे, को अपनी गद्दी खोने का भय सताने लगा। इंद्र ने विष्णु से मदद मांगी। विष्णु ने महाबली की परीक्षा लेने का विचार किया।
वे वामन अवतार लेकर महाबली के पास भिक्षा मांगने पहुंचे। महाबली ने वामन से उनकी इच्छा पूछी, और तब वामन ने तीन पग भूमि मांगी। महाबली ने इसे सहर्ष स्वीकार किया। वामन ने अपना पहला पग स्वर्ग पर और दूसरा पग पृथ्वी पर रखा। तीसरा पग रखने के लिए जब कोई स्थान नहीं बचा, तो महाबली ने अपना सिर वामन के सामने प्रस्तुत कर दिया। महाबली ने वामन ने वामन रूप धारी भगवान विष्णु की स्तुति की और उन्हें अपने सिर पर पैर रखने की जगह दी।

यद्युत्तमश्लोक भवान् ममेरितं वचो व्यलीकं सुरवर्य मन्यते ।
करोम्यूतं तन्न भवेत् प्रलम्भनं पदं तृतीयं कुरु शीर्ष्याि मे निजम् ।।
( भागवत पुराण ;स्कन्ध 8 अध्याय22)
वामन ने महाबली के सिर पर तीसरा पग रखा और उन्हें पाताल लोक भेज दिया। इस कथा से महाबली की अनन्य भगवत भक्ति प्रकट होती है।वे भक्ति के क्षेत्र में भी अद्वितीय साबित होते हैं । भगवान महाबलि से अत्यंत प्रसन्न थे महाबली का प्रजा से गहरा प्रेम देखते हुए, विष्णु ने उन्हें यह वरदान दिया कि वह वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने पृथ्वी पर आ सकते हैं। इसी कारण ओणम का त्योहार मनाया जाता है, जिसे महाबली के आगमन की खुशी में मनाया जाता है।
ओणम मनाने का मुख्य समय
ओणम का त्योहार मलयालम कैलेंडर के चिंगम महीने में आता है, जो आमतौर पर अगस्त-सितंबर के बीच पड़ता है। यह एक बहुत ही उत्सवपूर्ण और धार्मिक महत्व का त्योहार है जो केरल के लोग बड़े धूमधाम से मनाते हैं। इसका मुख्य दिन ‘थिरुवोणम’ कहलाता है और इस दिन पर घरों को सजाया जाता है, कोलम बनाए जाते हैं, और विभिन्न प्रकार के पूजार्चना कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस त्योहार के दौरान केरल में विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जो लोगों को एक साथ आने और एक दूसरे के साथ खुशियों को बाँटने का मौका देते हैं। यहां विभिन्न प्रकार के खास पकवान बनाए जाते हैं, और खास रंग-बिरंगे द्रोणम भी उजागर किए जाते हैं। इस उत्सव में लोग एक-दूसरे के घर जाकर खास मिठाइयों और तोहफों को भेंट करते हैं, और दिनभर गाने-भजने और रंग-बिरंगे परिवारिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं।
गूगल कलेंडर के मुताबिक ओणम का त्योहार भारतीय सभ्यता द्वारा मनाए जाने वाले श्रेष्ठ धार्मिक और पौराणिक मनाने जाने वाले पर्वों में से एक है।

ओणम की तैयारी और उत्सव
ओणम का त्योहार पूरे केरल में बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। इस त्योहार की सबसे खास बात यह है कि यह जाति, धर्म और वर्ग की सीमाओं से परे जाकर पूरे समाज को एक साथ लाता है। ओणम की तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो जाती है। घरों की सफाई, रंगाई-पुताई और सजावट की जाती है। हर घर में रंग-बिरंगी फूलों की पंखुड़ियों से ‘पुक्कलम’ (फूलों की रंगोली) बनाई जाती है। यह पुक्कलम ओणम के दिनों में प्रतिदिन तैयार की जाती है और इससे घर के मुख्य द्वार को सजाया जाता है। दस दिनों तक रोज नए कार्यक्रम किये जाते हैं जो इस प्रकार हैं-
- अथम: ओणम के पहले दिन को अथम कहा जाता है। इस दिन ओणम की तैयारी शुरू होती है और घर के आंगन में पहला पुक्कलम बनाया जाता है।
- चिथिरा: दूसरे दिन को चिथिरा कहा जाता है, और इस दिन पुक्कलम में नए फूल जोड़े जाते हैं।
- चोदी: तीसरे दिन लोग खरीदारी करते हैं, विशेष रूप से नए कपड़े और ओणम के लिए आवश्यक वस्तुएं।
- विशाखम: चौथे दिन से ओणम के उत्सव का माहौल बढ़ने लगता है। बाजारों में चहल-पहल बढ़ जाती है।
- अनिजम: पांचवें दिन नौका दौड़ (वल्लम काली) की तैयारी शुरू होती है।
- थ्रिकेता: छठे दिन लोग अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने जाते हैं।
- मूलम: सातवें दिन से ओणम के विशेष भोज (सद्य) की शुरुआत होती है।
- पूरादम: आठवें दिन महाबली की प्रतिमा की पूजा की जाती है।
- उथ्रादम: नौवें दिन को ओणम का ‘पहला ओणम’ कहा जाता है, और इसे बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
- थिरुवोणम: दसवां और मुख्य दिन होता है थिरुवोणम। इस दिन महाबली के आगमन की प्रतीक्षा की जाती है और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
ओणम के विशेष कार्यक्रम
केरल में ओणम एक विशेष आनन्द का अवसर होता है। यह वही समय है; जब लोग अपने नाते-रिश्तेदारों , दूरस्थ प्रयजनों से , मित्रों से मिलने और आनंद मनाने का अवसर पाते हैं । इसीलिए दस दिनों के इस पर्व में प्रत्येक दिन अपने आप में विशिष्ट होता है। हर दिन एक नये उत्सव का आनंद ही ओणम की विशेषता है। इन दस दिनों अलग-अलग किये जाने वाले मुख्य कार्यक्रम इस प्रकार होते हैं-
- सद्य: ओणम के दौरान जो भोज होता है, उसे ‘सद्य’ कहा जाता है। यह भोज केले के पत्ते पर परोसा जाता है और इसमें 20 से अधिक प्रकार के व्यंजन होते हैं। सद्य में खासतौर पर ‘अवियल’, ‘कूट्टु करी’, ‘पायसम’, ‘पचड़ी’, ‘इंची करी’, और ‘सांभर’ जैसे व्यंजन परोसे जाते हैं। सद्य का मुख्य आकर्षण मीठा पकवान ‘पायसम’ होता है, जो चावल, दूध और गुड़ से बनाया जाता है।
- वल्लम काली: ओणम के दौरान ‘वल्लम काली’ यानी नाव दौड़ का आयोजन किया जाता है। इस प्रतियोगिता में बड़ी-बड़ी नावें होती हैं, जिन्हें सैकड़ों लोग एक साथ चलाते हैं। नौका दौड़ देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं और इसे देखने का अपना अलग ही आनंद होता है।
- कथकली और मोहिनीअट्टम: ओणम के दौरान केरल की पारंपरिक नृत्य विधाएं जैसे कथकली और मोहिनीअट्टम प्रस्तुत की जाती हैं। ये नृत्य रूप धार्मिक और पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं और इन्हें बेहद सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।
- पुलिकली: ‘पुलिकली’ ओणम के दौरान एक और लोकप्रिय कार्यक्रम है, जिसमें लोग बाघ की तरह रंगे जाते हैं और ढोल की धुन पर नृत्य करते हैं। इसे देखने का अपना अलग ही मजा होता है।
- ओणम खेल: ओणम के अवसर पर विभिन्न प्रकार के खेलों का आयोजन भी होता है। इनमें ऊंट दौड़, बैलगाड़ी दौड़, तीरंदाजी और रस्साकशी जैसे खेल प्रमुख होते हैं।

ओणम का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
ओणम न केवल धार्मिक त्योहार है, बल्कि यह समाज में भाईचारे, एकता और सामंजस्य को भी बढ़ावा देता है। इस त्योहार के दौरान केरल के लोग जाति, धर्म और वर्ग की सीमाओं को पार करके एक साथ मिलते हैं और त्योहार का आनंद लेते हैं। ओणम के माध्यम से लोग अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संजोने का प्रयास करते हैं। यह त्योहार हमें यह सिखाता है कि समृद्धि और सुख केवल भौतिक संपत्ति से नहीं, बल्कि प्रेम, सौहार्द और एकजुटता से प्राप्त होता है। ओणम एक विशेष अवसर है जो सामाजिक समरसता , आनंद और संस्कृति का अद्भुद मेल है।
निष्कर्ष
ओणम केरल का प्रमुख तथा लोकप्रिय त्योहार है, जो न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। इस त्योहार का मुख्य संदेश है कि अच्छे कर्म और उदारता हमेशा प्रशंसा के पात्र होते हैं। ओणम सिखाता है कि कोई कितना भी उच्च पद पर क्यों न हो, तो भी अपने मित्रों और प्रियजनों का साथ ही सबसे अधिक आनंद देता है। ओणम की सीख लेते हुए हमें मिल-जुलकर सभी कार्य करने चाहिए और विनम्रता और प्रेम से एक-दूसरे का साथ निभाना चाहिए, क्योंकि इनके बिना सच्ची समृद्धि और खुशी संभव नहीं है।
जैसा कि आप जानते हैं, ओणम एक धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व होता है जो समाज में एकता, समरसता, और बनाए रखने के लिए संदेश देता है। इसके अलावा, यह त्योहार लोगों को एक-दूसरे के साथ सामाजिक समरसता दयालुता और प्रेमपूर्ण संबंध बनाने के लिए प्रेरित करता है।



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