बच्चे कविताओं को गाते और प्रसन्न होते हैं । कविताओं से बच्चों की भावनाएँ मुखरित होती हैं और काव्य के प्रति रूझान बढ़ता है। माता- पिता और शिक्षक भी बच्चों के मुँह से कविताएँ सुनकर आनंदित होते हैं । कविता यदि बाल मन की अभिरुचि और क्रिया-कलापों के अनुरूप हो तो सोने में सुहागा हो जाता है। यहाँ पर कवि कुँवर नारायण जी की कविता प्रस्तुत है जो बच्चों को ही पसंद नही आती वरन बड़ों को भी अपना बचपना याद दिला देती है ।

मेले से लाया हूँ इसको
छोटी सी प्यारी गुड़िया
बेच रही थी इसे भीड़ में
नुक्कड़ पर बैठी बुढ़िया
मोल भाव करके लाया हूँ
ठोक बजाकर देख लिया
आँखें खोल मूँद सकती है
यह कहती है पिया पिया
जड़ी सितारों से है इसकी
चुनरी लाल रंग वाली
बड़ी भली हैं इसकी आँखें
मतवाली काली-काली ।

ऊपर से है बड़ी सलोनी
अंदर गुदड़ी है तो क्या?
ओ गुड़िया तू इस पल मेरे
शिशुमन पर विजयी माया।
रखँगा मैं तुझे खिलौनों की
अपनी अलमारी में।
कागज़ के फूलों की नन्हीं
रंगारंग फुलवारी में ।
नए-नए कपड़े गहनों से
तुझको रोज सजाऊंगा
खेल खिलौनों की दुनिया में
तुझको परी बनाऊँगा।
कवि कुँवर नारायण



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