कविता सड़क
बहुत पहले
कभी,
एक उक्ति थी।
नदी
अपना रास्ता
खुद चुन लेती है
पहाड़ों को चीर कर,
रोक नहीं सकते उसको
कोई बांध या बन्धन।
आज यह
उक्ति थोडा सा बदल गई।
नदी की जगह
सड़क आ गई।
सड़क
निकाल लेती है
अपना रास्ता।
कोई पहाड़ या जंगल या नदी
सड़क को नही किसी से वास्ता।
चाहें तोड़ने पड़े हों
हिमालय के शिखर
या कि नदियों के ऊपर
या कोई दुर्गम स्थल
सड़क के भी ऊपर
सड़क बन गई
कहीं ओवर ब्रिज
कही अंडरग्राउंड हो गई
सड़क न जाने कैसे
प्रगति की पर्याय बन गई
सब जगह सब तरफ
सड़क बिछ गई ।

©copy right ©सर्वाधिकार सुरक्षित
कवयित्री :कुसुम लता जोशी
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