प्रश्न: क्षमा किसे कहते हैं? क्षमा की क्या आवश्यकता है?
उत्तर:
क्षमा:धर्म का दूसरा अंग क्षमा है। क्षमा मुक्ति का महान साधन है । किसी को उसके गलत कृत्य/ व्यवहार के लिए बिना शर्त, बिना सजा अथवा बिना बदले की भावना रखे दोष से मुक्त कर देना ही क्षमा है।
क्षमा में दो व्यक्तियों का हित निहित है , क्षमा मांगने वाले का और क्षमा देने वाले का। क्षमा मांगने से व्यवहार में नम्रता आती है और सामने वाले से झुक कर अपने किए के प्रति प्रायशचित से दैन्य भाव प्रकट होता है जिससे व्यक्ति के अहंकार का नाश होता है । साथ ही ऐसा दोबारा न करने का बोध होता है।
क्षमा मांगने से कोई पद प्रतिष्ठा में छोटा सिद्ध नही होता। क्षमा मांगना आपके चरित्र की विशालता को तो दर्शाता ही है साथ ही क्षमा मांगने से आप अधिक समझदार, जिम्मेदार और मानसिक रूप से मजबूत साबित होते हैं। इसलिए क्षमा मांगने में देर नहीं करनी चाहिए।
क्षमा करने वाला व्यक्ति अपने हृदय की विशालता प्रकट करता है लेकिन यदि वह व्यक्ति अपने क्षमा करने की घटना को याद रखता है, दूसरे के सामने दोहराता है , प्रकट करता है तो सिर्फ़ अपने अहंकार का ही पोषण करता है ।
कई बार लोग प्रकट में क्षमा कर देते हैं किंतु मन में गांठ बनाए रखते हैं तो वे लोग कभी स्वयं का कल्याण नही कर सकते। ऐसी स्थिति में व्यक्ति मुक्त न हो सकेगा, क्योंकि वह इस मानसिक ग्रंथि को मन ही मन बढ़ाता रहेगा और यही मुक्ति में बाधक है। जब हम किसी के प्रति कटुता रखते हैं तो बार बार उनके किए व्यवहार आदि के द्वारा उनको अधिक याद करते हैं और धीरे धीरे यह ग्रंथि बढ़ती जाती है और मानसिक अवसाद का कारण बनती है। आज विज्ञान ने भी माना है अधिकांश मानसिक अवसाद ही बाद में विभिन्न रोगों का कारण बनते हैं। इसलिए क्षमा मांगने से भी अधिक महत्त्व क्षमा करने का है ।
क्षमा मौखिक न हो कर मानसिक होनी ज्यादा जरूरी है। एक बार क्षमा करने के बाद उस व्यक्ति के प्रति प्रकट में या पीठ पीछे भी गलत विचार न लाएं। निंदा न करें। बदले की भावना न रखें । अपने क्षमा करने के कृत्य को दूसरे के सामने न दोहराएं और न मन ही मन अपने आप को महान समझें।
वास्तव में दुनियां में सभी लोग इतने सरल और भले नहीं है। कुछ लोग जानबूझ दूसरे को नीचा दिखाते हैं। कुछ दूसरे को अपमानित करने में ही सुख अनुभव करते हैं । कुछ लोगों का बोलने का तरीका ही इतना अभद्र होता है कि उन्हें स्वयं भी पता ही नहीं चलता कि उन्होंने कब किसके हृदय को चोट पंहुचाई है । ऐसे लोगों से क्षमा मांगने की आशा ही नहीं की जा सकती। तो क्या ऐसे लोगों के कारण व्यक्ति स्वयं को कुंठित कर ले? अवसाद ग्रस्त करें? तनाव ग्रस्त करें? अथवा बदले की भावना में घुलता रहे और अपने मूल्यवान समय को उनसे बदला लेने में बर्बाद कर दे?
बिल्कुल नहीं! दूसरे के व्यवहार के कारण स्वयं को बंधन में नही रख सकते । स्वयं को मुक्त कीजिए। एकांत में कहें – “मैंने तुम्हें क्षमा किया ।” यह बात आपको उस व्यक्ति से कहने की आवश्यकता नहीं है। आप स्वयं से कहें और आगे बढ़ें। स्वयं को बुरे भावों से क्रोध से, तनाव से मुक्त करें।
अपने प्रति गलत सोच/ व्यवहार/ कर्म करने वाले को अज्ञानी समझ कर क्षमा कीजिए।
अपने से छोटे को नादान समझ कर क्षमा कीजिए।अपने से बड़े को अग्रज समझ कर क्षमा कीजिए।
प्रत्येक व्यक्ति जिसने कभी जाने अनजाने आपको किसी भी तरह का दुःख पंहुचाया हैं उसे क्षमा करें और स्वयं भी दुर्भावना से मुक्त होवें।
” हे मनुष्य तुम दूसरे की गलतियों/ दोषों के लिए उन्हें उसी तरह क्षमा कर दो जैसे ईश्वर हमें हमारी बड़ी बड़ी गलतियों/ दोषों के लिए क्षमा कर देते हैं ।
“क्षमा_मुक्ति_का_महान_साधन_है।”

चित्र: सोशल मीडिया से साभार
लेखिका: Kusum Lata Joshi


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