गणेश जी की प्रथम वंदना क्यों की जाती है?

श्री गणेश

“स जयति सिन्धुरवदनो देवोत्पादस्मरणम्।

वासरमणिरिव तमसा राशीन्नाशयति विघ्नानाम् ॥

उन गजवदन देव की जय हो, जिनके चरणकमल का स्मरण सम्पूर्ण विघ्न समूह को इस प्रकार नष्ट कर देता है जैसे सूर्य अन्धकार राशि को ।

गणेश सनातन धर्म में नित्य पूजे जाने वाले मुख्य पंच देवताओं में एक हैं । गणेश साक्षात भगवान हैं वे सर्व कामनाएँ पूरी करने वाले और मोक्षदायी हैं। प्रणवाक्षर में सदैव गणेश की मूर्ति विराजमान है।

गणेशपुराण के अनुसार—

ओंकाररूपी भगवान यो वेदादौ प्रतिष्ठित:।

यं सदा मुनयोदेवा: स्मरन्तीन्द्रादयो हृदि॥

ओंकाररूपी भगवानुक्तस्तु गणनायक:।

यथा सर्वेषु कार्येष्य पूज्यतेऽसौ विनायक:॥

गणेश पुराण

अर्थात ओंकाररूपी भगवान जो वेदों के आदि में ही प्रतिष्ठित हैं जिनका सदा मुनि और इंद्रादि देवगण अपने हृदय में चिंतन करते रहते हैं वे ओंकाररूपी भगवान गणेश कहे गए हैं वे ही विनायक सभी कार्यों में पूजित होते हैं ।  

 सभी माँगलिक कार्यों, पूजा-अनुष्ठान आदि में गणेशजी का सर्वप्रथम आवाहन और पूजन किया जाता है। “गणेश” शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की जाती है-

“ ज्ञानार्थ वाचको गश्च णश्च निर्वाणवाचक:।

 तयोरीशम्  परब्रह्म गणेशं प्रणमाम्यहम् ॥“

अर्थात ’ज्ञ ’ से ज्ञानवाचक और ’ण’ से निर्वाणवाचक हैं ऐसे ज्ञानवाचक , निर्वाणवाचक गणेश  परब्रह्म हैं मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।

शास्त्रों में गणेश पूजा का अनेक जगह वर्णन आता है । गणेश जी के नाम से गणेश उपपुराण है। स्कंद पुराण , लिंग पुराण, शिव पुराण, पद्म पुराण आदि अनेक ग्रंथों में गणेश की पूजा और उसके लाभों के बारे में विशद वर्णन है।   

रामचरितमानस की प्रस्तावना पर भी में बाबा तुलसीदासजी श्रीगणेश की स्तुति करते हुए लिखते हैं

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥1॥

रामचरितमानस (बालकांड)

भावार्थ:-अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को करने वाली सरस्वतीजी और गणेशजी की मैं वंदना करता हूँ

गौरी गणेश

 सनातन धर्म में गणेश पूजा का विशेष महत्त्व है। गणेश जी को विनायक, विघ्नविनाशक, विघ्नहर्ता , गजानन, लंबोदर, एकदंत आदि नामों से भी जाना जाता हैं । गणेश शिव-पार्वती के पुत्र हैं।गणेश पुराण और स्कंद पुराण (गणेश-खंड और गणेश संहिता) तथा पद्म पुराण के अनुसार गौरीपुत्र श्रीगणेश का जन्मदिन शुक्लपक्ष की चतुर्थी के दिन मनाया जाता है, इसीलिए इस दिन को गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। एक अन्य कहानी के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन का दोष लगता है और इस दिन चंद्र दर्शन नहीं करना चाहिए।

गणेश के स्वरूप को देखते हैं तो वे हाथी के सिर वाले और मूषकवाहन पर विराजमान दिखाई देते हैं । गजमस्तक बुद्धि और विवेक का प्रतीक है वहीं चूहा ऐंद्रिक अथवा मन की चंचलता का प्रतीक है। गणेश के इस विशिष्ट स्वरूप से यह पता चलता है कि हमें मन रूपी चंचल मूषक को ज्ञान और विवेक द्वारा नियंत्रित किए रहना चाहिए। गणेश विद्या और विवेक के दाता हैं । समस्त कलाओं में प्रवीण हैं। अपना कल्याण चाहने वाले लोगों को , विशेषकर विद्यार्थियों को नित्य गणेश वंदना करनी चाहिए।

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गणेश स्तुति

जब भी कोई शुभ कार्य होता है तो सर्व प्रथम गणेश पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि गणेश जी का पूजन कर किसी कार्य का आरंभ करने पर गणपति सारी बाधाएँ दूर देते हैं और कार्य निर्विघ्न संपन्न हो जाता है। इसीलिए किसी काम का शुभारंभ करना गणेश पूजा का पर्याय ही बन चुका है । आम बोल-चाल की भाषा में भी किसी कार्य को शुरु करने को लोग ’श्रीगणेश करना’ कहते हैं । इसके पीछे एक पौराणिक कथा है।  

शिव परिवार

एक बार की बात है देवताओं में इस बात पर विवाद हो गया कि सबसे प्रथम पूजन किस देवता का होना चाहिए। सभी देवता अपने-अपने मत प्रकट कर रहे थे। ज्यादा विवाद होने पर सभी देवता मिलकर भगवान शिव के पास पहुँचे। सबकी बात सुनकर भगवान शिव ने कहा-“तुम सब इस ब्रह्मांड का एक चक्कर लगाकर वापस आओ। जो सबसे पहले वापस आएगा, वही प्रथम पूजनीय होगा।“

भगवान शिव की बात सुनकर सभी देवता अपने-अपने वाहन पर बैठकर ब्रह्मांड का चक्कर लगाने चले गए। शिव -पार्वती एक शिला पर बैठकर उनका इंतजार करने लगे।यह देखकर गणेश भी अपने वाहन चूहे पर बैठकर भगवान शिव और माता पर्वती की परिक्रमा करने लगे। उन्होंने बहुत जल्दी ही सात परिक्रमा पूरी कर ली और हाथ जोड कर माता-पिता के सामने खडे हो गए।

गणेश को वहाँ खड़ा देखकर माता पार्वती ने पूछा-“ गणेश ! क्या तुम प्रथम पूजनीय नहीं बनना चाहते? तुम ब्रह्मांड की परिक्रमा करने क्यों नहीं गए? गणेश ने उत्तर दिया-“ माँ ! एक संतान के लिए उसके माता-पिता ही ब्रह्मांड से बढ़कर होते हैं मेरा ब्रह्मांड, मेरी दुनिया तो आप और पिताजी ही हैं, इसीलिए मैंने आपकी और पिताजी की एक नहीं, वरन् सात प्रदक्षिणा कर ली हैं ।“

गणेश जी की प्रथम वंदना क्यों की जाती है?

गणेश का उत्तर सुन कर भगवान शिव और देवी पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। जब देवता ब्रह्मांड का चक्कर लगा कर वापस लौटे तो भगवान शिव ने गणेश को प्रथम पूजनीय घोषित कर दिया। इस पर देवता अचंभित होते हुए कहने लगे कि गणेश तो इस  स्थान को छोड़ कर कहीं गए ही नहीं, फिर वे कैसे विजयी घोषित हुए। भगवान शिव ने कहा-“माता-पिता को समस्त लोकों और ब्रह्मांड में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। गणेश ने भी इसी सत्य को आधार मान कर अपने माता -पिता की प्रदक्षिणा की है । अतः वे विजयी घोषित हुए।“ सभी देवता इस बात पर संतुष्ट हो गए। तभी से हर कार्य में सबसे पहले गणेश पूजा होने लगी।

दोस्तों ! इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि हमें सदैव अपने माता-पिता और बडों का आदर करना चाहिए। उनके आशीर्वाद से ही हम सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं ।  कहा भी गया है कि ” सर्व तीर्थ मयी माता, सर्व देव मयः पिता’ ।

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राजा शिबि

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