गुरु पूर्णिमा पर महर्षि वेद व्यास की स्तुति

ज्ञान और आध्यात्म के पथ पर चलने वालों के लिए गुरु पूर्णिमा विशेष महत्त्वपूर्ण है ।गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरुओं के प्रति विशेष आदर और मान-सम्मान व्यक्त किया जाता है और व्रत – दान आदि के द्वारा उनके प्रति आभार प्रकट करने का अवसर होता है। भारतीय संस्कृति में यह मान्यता है कि इस प्रकार गुरुओं के प्रति श्रद्धा प्रकट करने से जीवन-पथ पर सुगमता आयेगी और आध्यात्मिक जगत में प्रगति होगी ।

गुरु पूर्णिमा मनाने का मुख्य कारण यह है कि इसी दिन गंगा नदी के द्वीप पर महर्षि वेद व्यास प्रकट हुए थे । महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास महाभारत ग्रंथ के रचयिता है। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास महर्षि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र हैं|

इन्हीं महर्षि ने दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत की रचना की। यह महाकाव्य एक लाख से अधिक श्लोकों में लिखा गया है । महाभारत ग्रंथ का लेखन भगवान् गणेश ने महर्षि वेदव्यास से सुन सुनकर किया था। वेदव्यास महाभारत के रचयिता ही नहीं, बल्कि उन घटनाओं के साक्षी भी रहे हैं, जो क्रमानुसार घटित हुई हैं।

वेद व्यास जी ने न केवल महाभारत रची है , अपितु समस्त स्मॄति , ऋचाओं, पुराणों आदि के संकलन का महान कार्य किया है। काल क्रम के अनुरूप मनुष्य की बौद्धिक क्षमता को देखते हुए उन्होंने वेदों का न्यास कर चार भागों में बाँट कर वेदों को कलियुग के मानव के लिए सुगम बनाने का अति महनीय कार्य किया है। मान्यता के अनुसार इनसे पहले वेद एक ही था और वह भी श्रुति के द्वारा सीखा और सिखाया जाता था। । महर्षि वेद व्यास ने कलियुग में मनुष्य की अल्प आयु और अल्प बुद्धि को ध्यान में रखते हुए इसको चार भागों में लिपि बद्ध किया। तब से वेदों की चार शाखाएं ऋग वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्व वेद प्रचलित हुई।।हम सब सनातनी उनके इस उपकार के लिये अनुगृहीत हैं और उनके प्राकटोत्सव के दिन उनकी वंदना करते हैं।

व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् ।
पराशरात्मजं वंदे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ 1

व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ 2

कृष्णद्वैपायनं व्यासं सर्वलोकहिते रतम् ।
वेदाब्जभास्करं वंदे शमादिनिलयं मुनिम् ॥ 3

वेदव्यासं स्वात्मरूपं सत्यसंधं परायणम् ।
शांतं जितेंद्रियक्रोधं सशिष्यं प्रणमाम्यहम् ॥ 4

अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः ।
अफाललोचनः शंभुः भगवान् बादरायणः ॥ 5

शंकरं शंकराचार्यं केशवं बादरायणम् ।
सूत्रभाष्यकृतौ वंदे भगवंतौ पुनः पुनः ॥ 6

ब्रह्मसूत्रकृते तस्मै वेदव्यासाय वेधसे ।
ज्ञानशक्त्यवताराय नमो भगवतो हरेः ॥ 7

व्यासः समस्तधर्माणां वक्ता मुनिवरेडितः ।
चिरंजीवी दीर्घमायुर्ददातु जटिलो मम ॥ 8

प्रज्ञाबलेन तपसा चतुर्वेदविभाजकः ।
कृष्णद्वैपायनो यश्च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 9

जटाधरस्तपोनिष्ठः शुद्धयोगो जितेंद्रियः ।
कृष्णाजिनधरः कृष्णस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 10

भारतस्य विधाता च द्वितीय इव यो हरिः ।
हरिभक्तिपरो यश्च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 11

जयति पराशरसूनुः सत्यवती हृदयनंदनो व्यासः ।
यस्यास्य कमलगलितं भारतममृतं जगत्पिबति ॥ 12

वेदविभागविधात्रे विमलाय ब्रह्मणे नमो विश्वदृशे ।
सकलधृतिहेतुसाधनसूत्रसृजे सत्यवत्यभिव्यक्ति मते ॥ 13

वेदांतवाक्यकुसुमानि समानि चारु
जग्रंथ सूत्रनिचयेन मनोहरेण ।
मोक्षार्थिलोकहितकामनया मुनिर्यः
तं बादरायणमहं प्रणमामि भक्त्या ॥ 14

भगवान् श्रीकृष्ण द्वैपायन वेद व्यास जी के पावन प्राकट्योत्सव, गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं ।

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