पितरों के निमित्त श्रद्धा के साथ विधि पूर्वक किया गया कर्म श्राद्घ कहलाता है। श्राद्घ के द्वारा जल तर्पण, भोजन आदि के द्वारा पितरों को तृप्ति मिलती हैं और वे श्राद्ध करने वाले को आशीर्वचन आदि देते हैं। इस प्रकार श्राद्घ से आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

भाद्रपद मास की पूर्णिमा से पितृपक्ष की शुरुआत हो जाती है. हिन्दू धर्म में पितृपक्ष का बहुत महत्व माना जाता है. पितृपक्ष को श्राद्ध के नाम से भी जानते है श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है. मान्यता है कि श्राद्ध के समय पूर्वज धरती पर आते हैं और श्राद्ध पक्ष के 15 दिन तक धरती पर ही वास करते हैं. श्राद्ध में विधि विधान से पितरों से सम्बंधित कार्य करने पर पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है और पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्राद्घ और तर्पण (pic courtesy social media)

आज कल अनेक लोग विभिन्न तरह की पोस्ट सांझा कर श्राद्ध कर्म का विरोध दिखा रहे हैं । कुछ लिख रहे हैं कि मैं ने अपनी जीवित माता की सेवा कर उनका श्राद्ध किया । कुछ श्राद्ध कर्म और पितर पक्ष के नियमों को कोस रहे हैं और कुछ अन्य पोस्ट डाल रहे हैं कि ऐसी कोई डायरेक्ट कोरियर सर्विस नही जो पितरों को स्वर्ग में खाना पंहुचा दे ।

ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि श्राद्ध और श्रद्धा दोनों अलग अलग है ठीक है कि व्याकारणिक रुप से श्रद्धा शब्द से ही श्राद्ध शब्द की उत्पत्ति हुई, पर इनके अर्थ अलग अलग है।
श्राद्ध मृतक पूर्वजों का होता है जबकि श्रद्धा अपने से श्रेष्ठ के प्रति होती है । श्रद्धा एक भावना है और श्राद्ध एक कर्म। आप अपने से श्रेष्ठ किसी के भी प्रति श्रध्दा रख सकते हैं किंतु श्राद्ध अपने परिवार के पूर्वजों के ही करते हैं । किसी के प्रति श्रद्धा रखना अनिवार्य कर्तव्य नहीं है (देवताओं और माता पिता के अतिरिक्त)। किंतु माता पिता की मृत्यू के बाद उनका श्राद्ध करना अनिवार्य कर्तव्य है।

जीवित रहते माता पिता और दादा दादी आदि की सेवा करनी चाहिए । लेकिन मृत्यु उपरांत श्राद्ध भी अनिवार्य है। श्राद्ध पक्ष का अपना महत्व है। जिनसे किसी कारण वश पूर्व में सेवा न हो पाई हो, वे भी श्राद्ध पक्ष में पितरों को जल, भोजन आदि दे कर तृप्त कर सकते हैं श्राद्ध सिर्फ माता पिता तक ही नहीं सीमित है पूर्वजों की सात पीढ़ियों तक इसका अंश पहुंचता है। जिनको अपने पुत्र पौत्र और उसके आगे के वंश परंपरा का भी कल्याण चाहिए, वे श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करें । जिन्हें अपने बच्चो और आगे के वंश की कोई चिंता नहीं है वे यहीं श्राद्ध जैसी उत्कृष्ट परंपरा का खण्डन करते रहें और वेद विरोधी, धर्म विरोधी, जिस शाखा में बैठें हों उसी को काटने वाले मति मूढ़ बने रहें ।

पितरों को संतुष्ट करना आसान है । वे पिंड दान , गौ ग्रास , कौवे को भोजन खिलाने और ब्राह्मण को भोजन कराने से संतुष्ट होते हैं। श्राद्घ से एक दिन पूर्व अपने पुरोहित ब्राह्मण को भोजन हेतु आमंत्रित करें। माना जाता है कि भोजन करने वाले ब्राह्मण के शरीर में पितर स्थान लेते हैं अतः ब्राह्मण को शुद्ध आचरण व ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए। श्राद्घ कर्ता को भी श्रध्दा भक्ति भावना से प्रेरित होकर ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए। श्राद्ध कर्म और भोजन न तो सुबह बहुत जल्दी और न सायं देर से करना चाहिए। भोजन पर बहुत अधिक ब्राह्मण बुला कर दिखावा नहीं करना चाहिए। एक ब्राह्मण को श्रध्दा से भोजन कराना पर्याप्त है भोजन करने वाले ब्राह्मण को शाम को दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए। सात्विक फलाहार करना चाहिए।

यदि ब्राह्मण को भोजन कराने की सामर्थ्य न हो तो गाय को हरी घास खिला दें। यह भी संभव नहीं हो तो किसी जलाशय में जाकर दक्षिणाभिमुख हो कर पितरों के निमित्त हरी घास या जल तर्पण करते हुए अपनी आर्थिक अक्षमता बताते हुए संतुष्ट होने की प्रार्थना करनी चाहिए। पितृ गण इतने से ही संतुष्ट हो जाते हैं।

पितृपक्ष में पितृस्तोत्र का पाठ पितरों को प्रसन्न करने वाला है। इसके अधिकाधिक पाठ करके पितृकृपा प्राप्त की जा सकती है।

पितृ स्तोत्र

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि:।।

प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।

तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज:।।

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