हाथी के दो बच्चे थे
दिल के बड़े ही सच्चे थे
अभी अकल के कच्चे थे।
क्योंकि वे तो बच्चे थे।
कभी सूंड से सूंड लड़ाएं
कभी दौड़ के आगे आएं
पेडों से वे यों टकराएं
गिर कर फिर सम्हल न पाएं।
टुकुर टुकुर रहे वे ताक
बड़े कान और छोटी आंख
लंबी देखो इनकी नाक
पेडों की खाते थे शाख।
ईख इन्हें बहुत ही भाती
मीठा रस मुख में घुलाती
ईख जहां कहीं दिख जाती
जोड़ी इनकी पंहुच ही जाती ।
एक दिन आए दो मेहमान
लेकिन वे थे शठ इंसान
पकड़ ले गए नन्हीं जान
जंगल हो गया सुनसान।




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