kavita

अच्छा हुआ कि वह बुद्ध न बनी
न भागी जीवन की समस्याओं से
न चुराया मुख दुखों के समुंदर से
परिवार को बाधा न माना कभी
सामना किया हर मुसीबत का पलट कर
हथियार बना लिया अपनी ममता को
न टूटी न झुकी न थकी बस आगे बढ़ी।
सुनो, एक राज बताऊं तुम्हें।
बुद्ध बन कर त्याग देना बहुत आसान है।
यशोधरा की तरह रुक जाना कठिन है बहुत।
यशोधरा के तप को दुनिया देख न सकी।
जिसने यश का भी कर दिया परित्याग।
और अंत में
इकलौते बेटे को भी दान कर दिया।
इस अलौकित तप को कब स्वीकारोगे?
बुद्ध की पूर्णता तो बहुत मना ली
कभी यशोधरा का अकेलापन भी मना पाओगे?

Written by Kusum lata Joshi

Note: बुद्ध के चले जाने के बाद यशोधरा ने पूरा जीवन एकाकी गुजारा। कई वर्षों बाद जब बुद्ध अपने पिता के राज्य में वापस आए तो द्वार पर खड़े होकर भिक्षा मांगी। उसी समय यशोधरा ने उनके भिक्षा पात्र में अपने युवा पुत्र का दान किया। अजंता की गुफाओं में यह मार्मिक चित्रण अंकित किया गया है । विश्व में इस अपरिमित त्याग का कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता।

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