भूरी आँखों वाली

रेनू रोज़ की तरह सुबह जल्दी उठी । मुँह -हाथ धोकर चाय बनाने लगी । तभी बाबू (पिताजी) ने कहा ,”आज से अपनी ईजा(माँ) का खाना भी बाँध देना , उसे भी साथ जाना है।”

“ठीक है”. कह कर रेनू घर के काम निपटाने लगी । रेनू भूरी आँखों वाली , सुनहरे और काले मिले-जुले बालों वाली, पहाड़ी सुँदरता लिए , गुलाबी गालों वाली गोरी-चिट्टी,कोयल सी मिट्ठी आवाज़ वाली लड़की थी ,जो अपने माता-पिता, दो छोटे भाई और एक छॊटी बहन के साथ अल्मोड़े के पास एक गाँव में रहती थी । पत्थर से बना मकान और उसके आगे एक बड़ा- सा आँगन । कभी इस आँगन में दो -तीन गाय भी बँधी रहती थीं और खेती से आने वाली फ़सल भी यहीं रखी जाती थी । लेकिन पिता को शराब की लत लग गई । फ़िर पहले गायें बिकीं, बाद में पुस्तैनी खेती भी धीरे-धीरे बिकती गई । अब घर के पास ही थोड़ी सी जमीन है जिसमें रेनू और उसकी माँ थोड़ा साग-सब्जी उगा लेते हैं । छः लोगों का परिवार और घर के मुखिया को शराब की लत हो तो भुखमरी की नौबत तो आनी ही थी । घर के संचालन के लिए रेनू के माँ-बाबू मज़दूरी करने लगे । रेनू दसवीं तक ही पढ़ पाई थी ।रेनू की पढ़ाई तो छूट गई ,पर उसने सोचा था कि अपने भाइयों और छोटी बहन को वह पढ़ा कर लायक जरूर बनाएगी ।

रेनू जल्दी-जल्दी रोटियाँ सेंकने लगी । देर हुई तो ठेकेदार ईजा -बाबू को काम में न रखेगा । फ़िर बाबू के कोप का भाजन भी उसे ही बनना पड़ेगा । वैसे भी आए दिन बाबू शराब पीकर घर में कभी माँ , कभी रेनू और कभी दूसरे बच्चों के साथ मारपीट करते ही थे , किंतु काम न मिलने पर मार तो मिलेगी ही शाम का खाना भी न मिलेगा । रेनू ने टिफ़िन प्लास्टिक के बैग में पैक कर माँ के हाथ में थमा दिया । भाई -बहन पहले ही स्कूल जा चुके थे । रेनू ने अपनी चाय गरम करने रखी । चाय के साथ रोटी डुबा कर खाने लगी । अभी तो ढेर सारा काम बाकि था आज आँगन भी लीपना है , पिछली रात की बारिश ने सब कुछ बरबाद कर दिया था । रेनू पड़ोस की कविता चाची से गोबर भी माँग लाई थी । अब नौले (पहाड़ में पानी इकट्ठा होने वाली जगह,जहाँ से लोग पानी भरते हैं ) से पानी भर कर लाने लगी । तभी संजू आ गया । संजू को देखकर रेनू के मुँह में मुस्कान आ गई । संजू पास आकर उसके कंधे से कंधा मिलाते हुए बोला ,”ला,ला , यह घड़ा मुझे दे दे । बीस किलो की लड़की और इतना बड़ा घड़ा !”

रेनू को संजू का साथ अच्छा लगता था । संजू को बीस-बाइस साल की उमर का लगता था । वह पहाड़ का नहीं था । उसने बताया था कि उसके माता-पिता मेरठ में कहीं रहते हैं । वो यहाँ टैक्सी चलाता था । नीचे तिवाड़ी जी के घर वह किराएदार था । उसके पास मोबाइल था , जिसमें वह रेनू को नई -नई वीडियो दिखा देता था । उसने रेनू को भी मोबाइल दिलाने की बात की थी । पर रेनू ईजा-बाबू से डरती थी । बाबू को पता चलेगा तो मार ही डालेंगे । रेनू आँगन लीपने लगी , संजू आँगन के किनारे बनी पत्थर की दीवार पर बैठ चाय पीता रहा । संजू ने शादी के लिए पूछा । रेनू शरमा गई । बाबू नहीं मानेंगे । संजू अपनी मस्ती में बोला ,”बाबू नहीं माने तो उठा कर ले जाउंगा तुझे ।” संजू का यही अंदाज तो उसे पसंद है । संजू टैक्सी लेकर अक्सर दिल्ली जाता । वह वहाँ की बहुत सी बातें रेनू को बताता । रेनू तो अल्मोड़ा भी कभी -कभार ही जा पाती थी । दिल्ली की बातें उसे स्वप्न लोक सी लगती ।

रेनू अपने ऊपर अपने परिवार की जिम्मेदारी समझती थी । वह घर की सबसे बड़ी लड़की थी । वह चाहती थी कि कुछ काम कर पैसा कमा ले , परंतु वह ज्यादा पढ़ी -लिखी न थी । उसे कौन काम देता ? लेकिन संजू का कहना था कि अगर इंसान को कुछ दूसरा काम करना आता हो तो बड़े शहरों में पढ़ाई का इतना महत्त्व नहीं है। रेनू दिखने की बहुत सुंदर और गोरी-चिट्टी थी । साथ ही उसकी आवाज भी बहुत ही मीठी थी । गाँव में जब भी शादी-ब्याह, कीर्तन -भजन होते तो लोग उसे याद करते थे । संजू कहता था कि रेनू दिल्ली में गाने की कंपनी में ही बहुत सा पैसा कमा सकती थी । एक बार दोनों की शादी हो गई तो दोनों मिलकर दिल्ली में अपनी गृहस्थी जमा लेंगें । फ़िर रेनू अपने परिवार को भी पैसा भेज सकती है और अपने भाइयों को दिल्ली के अच्छे स्कूलों में पढ़ा सकेगी । संजू की बात सुनकर रेनू को लगा कि दुनिया इतनी कठिन नहीं है । चाहे तो इन्सान कुछ भी पा सकता है और अपने सपने पूरे कर सकता है ।

रेनू अपनी ईजा से कई बार प्रायवेट इंटर की पढ़ाई के लिए पूछ चुकी थी पर उसके पास इतने पैसे भी कहाँ होते कि वह अल्मोड़ा जा कर कॉलेज की फ़ीस जमा कर सके और किताब ला सके । वह अपने इन हालात को बदल देना चाहती थी । वह संजू से प्यार करती थी और उस पर पूरा भरोसा भी था । गाँव में भी क्या रखा है , यहाँ भी काम करने , पैसे कमाने सभी लोग बाहर ही जाने वाले हुए । मगर रेनू को अपने ईजा-बाबू से ये बात कहने की हिम्मत न थी । संजू ने कहा कि पहले मेरे साथ चल , एक बार शादी हो गई तो कुछ दिनों बाद सब ठीक हो जाएगा । फ़िर वापस आ कर माफ़ी माँग लेंगे । संजू ने दूसरे कुछ लोगों के बारे में भी बताया जिन्होंने भाग कर शादी की थी ,जब पैसे वाले होकर वापस लौटे तो परिवार ने माफ़ कर दिया । संजू की बातें तो सच्ची लगती थी पर रेनू डरती थी ।

एक सुबह ईजा ने कहा कि जरा ढंग की बनकर रहना , लड़का देखने आने वाला है । शाम को बाबू एक आदमी के साथ घर आए । बात करने से पता चला कि उसके पहले से ही दो बच्चे हैं । बीबी बीमार होकर मर गई । अब दूसरी शादी करना चाहता है । घर में भैंस है ,खेती है , दो बच्चे हैं इनको देखने के लिए भी तो कोई चाहिए ! रेनू ने आपत्ति जताई । तो माँ बोली कि अब कहाँ से लाएँ तेरे लिए सेठ दुल्हा ? एक तो वो कम पढ़ी लड़की से बिना दहेज के शादी कर रहा है । यहाँ घर में भी दो टैम का खाने का पता नहीं । कम से कम तू जाएगी तो तेरे ब्याह की चिंता तो खतम होगी ।प्रायवेट कंपनी में काम भी करता है । दस हज़ार रुपए हर महीने तन्खा है , मंदिर में ही शादी करने को तैयार है। सारा खर्च भी उठा रहा है और गहने -जेवर भी पूरे दे रहा है । तेरी तो किस्मत बन जाएगी । और क्या चाहिए तुझे ।

बाबू ने रेनू की नाराजगी सुनी तो एकदम गुस्सा हो गये । ” ज्यादा मंढ-मंढ मत कर । चेली(लड़की) जात है , तेरा भला-बुरा हम सोचेंगे ।”

“पर बाबू उसके और मेरे उमर में भी कितना अंतर है और उसके दो बच्चे भी तो है ” रेनू ने हिम्मत कर कहा।

“कोई फ़र्क नी पड़ता उमर के अंतर से , औरत को आदमी से छोटा ही होना चाहिए , हमारे शास्त्र ऐसा ही बता गए हैं बल , तेरी माँ भी तो बारह साल छोटी हुई मुझसे , आज मेर से ज्यादा बुढ़िया लगती है । और बच्चों का क्या है , प्यार से रखेगी तो वो भी तेरे ही हुए । सौतेली माँ भी तो पालती है बच्चों को “, बाबू ने कहा । रेनू ने ईजा की तरफ़ देखा । वह सच में बाबू जितना ही बूढ़ी दिखती थी । उसके चेहरे में चिंता, संघर्ष और गरीबी ने असमय ही झुर्रियाँ ला दी थी । बाबू ने रेनू को बताया कि अगले माघ महीने में ही शादी पक्की कर दी है , पर अभी यहाँ -वहाँ बताने की जरुरत नहीं । क्या पता , कोई दूसरा भनचक न मार दे । लगन और विघन में ज्यादा दूरी नहीं होती ।

बाबू के जाने के बाद रेनू माँ को मनाने लगी । उसने अपने आगे पढ़ने की इच्छा बताई । “यहाँ तो खुद के खाने के ही लाले पड़ रखे हैं । कैसे पढ़ाई करेगी । पढ़ना है , तो शादी के बाद पढ़ ले । वो मना थोड़ी कर रहा ।गाँव की कितनी लड़कियों ने शादी के बाद पढ़ लिया । तेरी मौसी भी तो पढ़ी शादी के बाद । आज द्वाराहाट में पढ़ा रही ठहरी । फ़िर तेरे बाबू ने कौन- सा यहाँ तेरे लिए खजाने भर रखे हैं , जो तेरे लिए ढूँढें कुँवारा , सरकारी नौकरी वाला लड़का “-ईजा ने सख़्त स्वर में जवाब दिया ।

अगले दिन रेनू नौले पर पानी लेने पहुँची । आज नौले में ज्यादा भीड़ थी । गाँव की औरतें वहाँ पानी भरने आई थीं और वहीं खड़े होकर गपशप कर रही थी । आजकल खेती में ज्यादा काम नहीं है , इसीलिए बातचीत करने का वक्त मिल जा रहा । वरना तो सबने अपने -अपने घर दौड़ लगानी हुई पानी लेकर , फ़िर खेत की तरफ़ भागना हुआ ।

संजू वहाँ पहले से खड़ा था । संजू और रेनू गाँव के लोगों के सामने ज्यादा बात नहीं करते थे । गाँव के लोग लड़कों से बात करने पर लड़कियों को जल्दी से बदनाम कर देते हैं । संजू ने ईशारा कर रेनू से पूछा कि क्या घर में सब चले गए हैं ? रेनू ने भी सिर हिला कर हाँ कह दिया ।

रेनू पानी भर कर घर पहुँची । तब तक संजू भी वहीं आ गया । वह बहुत खुश दिख रहा था । पिछले दो सप्ताह से वह गाँव से बाहर था । उसे एक अच्छा कस्टमर मिल गया था जिसने उत्तराखंड दर्शन के लिए संजू की गाड़ी पूरे दो हफ़्ते के लिए बुक कर ली थी । संजू अच्छा पैसा कमा कर लौटा था । संजू ने लाल रंग का रेडीमेड सूट रेनू के सामने रखा और कहा -“जा, जल्दी से पहनकर आ ।” रानी लगेगी मेरी रेनू इस ड्रेस में ।” रेनू इस क्षण बहुत भावुक हो उठी ।उसकी आँखों में आँसू भर आये । उसने संजू को अपनी शादी की सब बात बता दी । संजू चिंतित हो गया । उसने रेनू से कहा कि वह जल्दी ही इस समस्या का कोई हल निकालेगा ।

दो दिन बाद संजू अपने साथ एक लड़के को लेकर रेनू के घर पहुँचा । संजू ने उस लड़के का परिचय अपने दोस्त मोहन के रूप में कराया । मोहन हल्द्वानी में रहता था ।वह आइसक्रीम का ठेला चलाता था । संजू ने कहा कि मोहन उन्हें यहाँ से भागने में मदद करेगा । रेनू घर छोड़कर भागना नहीं चाहती थी । वह चाहती थी कि संजू उसके पिता के सामने रिश्ता ले कर आये , लेकिन संजू ने कहा कि इस बारे में न तो संजू के माता-पिता और न रेनू के ईजा-बाबू कोई तैयार नहीं होगा और अगर रेनू के पिता को उनके बारे खबर भी हो गई तो उसी दिन रेनू का ब्याह उस दो बच्चों वाले बुढ्ढे से करवा देंगे ।

रेनू की शादी के मात्र पंद्रह दिन बाकी रह गए थे । बाबू ने पचास हजार रुपयों का भी किसी तरह इंतज़ाम कर लिया था । वैसे तो होने वाले दुल्हे ने ही सब खर्च उठाने की बात की थी , पर कन्यादान कर रहे हैं , उनका भी तो कुछ फ़र्ज़ हुआ । ईजा ने अपने मायके से मिला एक मात्र हार तुड़ाकर दुल्हे के लिए एक सोने की अंगूँठी और रेनू के लिए कान के झुमके बनवा दिए । चितई ग्वेल ज्यू मंदिर में ही शादी होना तय हुआ था । अपने भविष्य को बचाने का ,अपने मनपसंद आदमी से शादी करने का रेनू को कोई दूसरा रास्ता नहीं दिख रहा था । शाम को संजू आया । वह नाराज़ था । उसने रेनू से कहा कि वह जल्दी से अपना निर्णय बता दे, वरना उसे भूल जाए । आखिर थोड़ा सोच -समझ कर रेनू उसके साथ जाने को तैयार हो गई ।

दूसरे दिन जैसे ही सब घर से चले गए, संजू और मोहन वहाँ आ गए । रेनू ने रात में ही अपना बैग तैयार कर लिया था । पहले मोहन उसका बैग सिर पर उठाकर ऊपर पक्की सड़क तक ले गया । रेनू ने संजू का दिया लाल सलवार कुर्ता पहन लिया । झुमके और सोने की अँगूठी अपने पर्स में रख लिए ।आखिर ईजा ने ये उसके लिए और उसके दुल्हे के लिए ही तो बनाए थे । अब इसका असली हकदार संजू ही इसे पहनेगा । अंत में उसने काँपते हाथों से वे पचास हज़ार रुपए उठाए जो उसके पिता ने उसकी शादी में खाना खिलाने के लिए इकट्ठा कर रखे थे । उसने मन ही मन अपने ईज़ा -बाबू से माफ़ी माँगी और अपने से वादा किया कि कुछ बन कर वह इस द्वार , इस चौखट पर जरूर वापस आएगी । बाहर संजू उसे जल्दी करने के लिए बार-बार कह रहा था । कोई आ गया तो बात बिगड़ सकती थी ।

रेनू अपना हैंडबैग लेकर घर से बाहर को निकली । फ़िर एक क्षण को ठिठक गई ।वह अपने घर के मंदिर में वापस गई ।उसने अपना सिर वहाँ देबताओं के सामने झुका दिया । सब ठीक होने की प्रार्थना की । फ़िर तेज़ी से घर का द्वार भिड़ा कर निकल पड़ी । ये परिवार, भाई-बहन, ये घर, ये आँगन, ये गाँव , ये गलियारे , ये पहाड़ छोड़ने में उसे उतना ही दुःख हो रहा था , जितना किसी दूसरी लड़की को शादी के अवसर पर अपनी विदाई में होता, किंतु इस क्षण अपने सपने पूरे करने के लिए उसे हिम्मत तो करनी ही होगी। यही सोचकर वह तेज़ कदमों से पगडंडियाँ पार करती ऊपर पक्की सड़क की ओर चल पड़ी ।योजना के अनुसार उसके थोड़े देर बाद संजू गाँव से निकलेगा ताकि उनको साथ-साथ जाते हुए कोई देख न सके ।

संजू ने अपनी टैक्सी गाँव के मोड़ से थोड़ा दूर पार्क कर रखी थी । वहाँ तक सबको चलकर पहुँचना था । एक -एक कर तीनों टैक्सी के पास पहुँच गए । संजू के बैठते ही टैक्सी हवा से बातें करने लगी । संजू बड़ी कुशलता से टैक्सी ड्राइव कर रहा था और उसके बाजू की सीट पर बैठी रेनू के आँखों मे भले ही घर छूटने के दुःख में आँसू भरे थे, किंतु मन एक नए जीवन जीने के उत्साह से उछालें मार रहा था ।

शाम को रेनू के घर पर न मिलने पर उसकी माँ ने सोचा कि शायद किसी सहेली के पास या गाँव में किसी के घर किसी काम से गई होगी । लेकिन जब अँधेरा ढलने पर भी रेनू न लौटी तो आस-पड़ोस में उसकी खोज हुई । लेकिन रेनू कहीं न मिली । आखिर थक-हार कर माता-पिता और पड़ोसियों ने उसके गुमशुदा होने की खबर पुलिस में दर्ज़ करा दी ।

एक दो दिन बीतने पर किसी ने ध्यान दिया कि तिवाड़ी जी का किराएदार संजू भी वहाँ नहीं है । शक की सूई संजू पर घूम गई । संजू की खोज शुरू हुई । एक -डेढ़ सप्ताह बाद पुलिस संजू का पता लगाते हुए मेरठ के पास उसके गाँव तक पहुँच गई । संजू वहाँ आराम से रह रहा था । पूछताछ के दौरान संजू ने रेनू के बारे में अनभिज्ञता जताई । उसने कहाँ कि सर्दियों के समय ज्यादा सवारी नहीं मिलती और ठंड भी ज्यादा थी इसलिए वह कुछ दिनों के लिए अपने गाँव आराम करने आ गया । संजू की बातों पर शक का कोई कारण न था । वैसे भी वह हमेशा पहाड़ में नहीं रहता था। अल्मोड़ा से सवारी लेकर वह अकसर दिल्ली आता-जाता रहता था और कई बार कुछ दिनों के लिए रास्ते में पड़ने वाले अपने गाँव ही रुक जाता था । पुलिस वापस लौट आई और दूसरे बिन्दुओं से रेनू के बारे में पता करने की बात कही ।

पहाड़ पर सर्दियाँ बीत गईं । रौनक वापस आ गई । संजू वापस आ गया । वह फ़िर से सैलानियों को उत्तराखंड दर्शन कराने लगा । आइसक्रीम वाला मोहन भी हल्द्वानी में पहले की तरह ही आइसक्रीम बेचने लगा । पुलिस ने रेनू के केस को ठंडे बस्ते में डाल दिया । रेनू का परिवार भी अब अपनी समस्याओं से जूझता हुआ वापस अपनी दैनिक दिनचर्या में लग गया है , लेकिन भूरी आँखों वाली , सुनहरे और काले मिले-जुले बालों वाली, पहाड़ी सुँदरता लिए , गुलाबी गालों वाली गोरी-चिट्टी, कोयल सी मिट्ठी आवाज़ वाली लड़की रेनू फ़िर कभी वहाँ दिखाई नहीं दी ।

मौलिक रचना : लेखिका कुसुम जोशी

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