सन् 1990 के दशक के अंत तक में और सन् 2000 के शुरुआती वर्षों मे जिस महत्त्वपूर्ण संचार साधन ने अपनी जड़ें जमाई थी, उसने पूरी दुनिया को जोड़कर एक कर दिया। इस साधनों ने पूरे विश्व को एक-दूसरे से जुड़ने , विचार प्रकट करने और अपने भावनाओं को कम से कम समय में दूसरे तक पहुंचाने में सक्षम कर दिया। वह संसाधन है सोशल मीडिया।

यह वह संसाधन था जिसने आम आदमी को वह ताकत दी कि वह अपनी बात को पूरी दुनिया तक बुलंदी से पहुंचा सके । हालांकि इसका विकास धीरे-धीरे हुआ।

सन् 1997 – सिक्स डिग्री (Six Degrees ) बना जो पहला सोशल नेटवर्किंग साइट माना जाता है। इसमें यूज़र्स प्रोफाइल बना सकते थे और दोस्तों को जोड़ सकते थे।सन् 2002 – फ़्रेंडस्टर (Friendster ) एक लोकप्रिय प्लेटफॉर्म, जिसने लोगों को अपने दोस्तों के साथ नेटवर्क बनाने की सुविधा दी। यह शुरुआत आम जनता को एक दूसरे से जोड़ती थी।

सन् 2003 में माय स्पेस और लिंक्डइन(MySpace और LinkedIn) ने युवाओं में लोकप्रियता के नए आयाम खोले और लिंक्डइन ने पेशेवर नेटवर्किंग के लिए शुरू हुआ।

2004 – Facebook: शुरुआत में यह केवल हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए था, लेकिन बाद में यह पूरी दुनिया में फैल गया।

2006 – Twitter: माइक्रो-ब्लॉगिंग को लोकप्रिय बनाने वाला प्लेटफॉर्म।

2010 – Instagram, और बाद में Snapchat (2011) और TikTok (2016, पहले Musical.ly) जैसे ऐप्स आए।

इस तरह हम देखते हैं कि यद्यपि सोशल मीडिया की शुरुआत लगभग 1997 से मानी जाती है, लेकिन इसका असली बूम 2004 के बाद आया।

अगर भारत की बात करें तो भारत में सोशल मीडिया की शुरुआत 2004–2005 के आसपास मानी जा सकती है, जब ऑर्कुट , याहू मेसेंजर, रेडिफ़ बोल जैसे चैटिंग प्लेटफ़ॉर्म भारत के युवा वर्ग के पास पहुंचे।

लेकिन इसकी वास्तविक क्रांति 2016 के बाद आई जब इंटरनेट सबके हाथ में पहुंच गया फ़ेसबुक 2006 में भारत पहुंचा और तेज़ी से लोगों के बीच मशहूर हो गया। (2012–2016) में स्मार्टफोन क्रांति और मोबाइल इंटरनेट की क्रांति के बाद से सोशल मीडिया अत्यंत लोकप्रिय हो गया है , और आज हालत यह है कि समाज के उच्चतम वर्ग से लेकर समाज के आखिरी पायदान के आदमी तक इसकी पहुंच है।

सोशल मीडिया आज के आधुनिक समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसके माध्यम से लोग दुनिया के किसी भी कोने में बैठे अपने मित्रों और परिजनों से तुरंत संपर्क कर सकते हैं। यह संचार का एक तेज़, सुलभ और प्रभावी माध्यम बन गया है। सोशल मीडिया ने न केवल लोगों को आपस में जोड़ा है, बल्कि ज्ञान, सूचना और विचारों के आदान-प्रदान को भी आसान बना दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका उपयोग विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हो रहा है। वे ऑनलाइन नोट्स, वीडियो और ट्यूटोरियल्स के माध्यम से पढ़ाई को सरल बना सकते हैं। इसके अलावा, कई लोग सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर अपने व्यवसाय, कला या हुनर को प्रदर्शित करके पहचान और आय दोनों प्राप्त कर रहे हैं। यह मंच लोगों को अपनी बात कहने, सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाने और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने का भी अवसर देता है। इस प्रकार, यदि सोशल मीडिया का उपयोग समझदारी और संतुलन के साथ किया जाए, तो यह समाज के लिए एक सशक्त और सकारात्मक उपकरण सिद्ध हो सकता है।

जहाँ एक ओर सोशल मीडिया समाज के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है, वहीं दूसरी ओर इसका दुरुपयोग भी तेजी से बढ़ रहा है। आजकल कई लोग सोशल मीडिया का प्रयोग गलत सूचनाएं फैलाने, अफवाहें फैलाने, और दूसरों को मानसिक रूप से परेशान करने के लिए कर रहे हैं। फर्जी समाचार (Fake News) और भ्रामक जानकारी समाज में भय और भ्रम की स्थिति पैदा कर देती है। इसके अलावा, कुछ लोग अशोभनीय भाषा, साइबर बुलीइंग, और ट्रोलिंग जैसी गतिविधियों में लिप्त होकर दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं। किशोरों और युवाओं में इसकी लत लगने से उनका पढ़ाई से ध्यान भटक जाता है और मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग समय की बर्बादी का कारण भी बनता है। व्यक्तिगत जानकारी साझा करने से निजता (privacy) भी खतरे में पड़ जाती है।

राजनैतिक दलों ने भी सोशल मीडिया को अपने प्रचार का माध्यम बना लिया है। इसके माध्यम से समर्थकों की भीड़ बड़ाना, लोगों को अपने पक्ष में करना, दूसरे दल के प्रति घृणा और गलत मानसिकता भरना आदि कार्य सोशल मीडिया के माध्यम से किया जाना आसान हो गया है। इसमें भी जब अपरिपक्व उम्र के बच्चों को दूसरे पक्ष के बारे में भड़काऊ बयानबाज़ी, झूठे चित्र और समाचारों को तोड़-मोड़कर पेश किया जाता है तो वे अनायास ही बिना पड़ताल के इसे सच मान लेते हैं और जाल में फ़ंस जाते हैं।

सोशल मीडिया आज जहां लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, वहीं कुछ लोग इस स्वतंत्रता का गलत उपयोग करते हुए अभद्र भाषा और अशोभनीय टिप्पणियों का प्रचार कर रहे हैं। यह एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर लोग बिना सोच-विचार के गाली-गलौच, कटु भाषण, तथा अपमानजनक टिप्पणियाँ करते हैं, जिससे दूसरों की भावनाएं आहत होती हैं और समाज में नफरत और तनाव फैलता है। विशेष रूप से राजनैतिक, धार्मिक या सामाजिक मुद्दों पर लोग भाषा की मर्यादा भूल जाते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल मानसिक तनाव बढ़ाती है, बल्कि युवाओं और बच्चों पर भी बुरा प्रभाव डालती है। सोशल मीडिया कंपनियाँ इस पर नियंत्रण के लिए नियम तो बना रही हैं, लेकिन तब तक हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि हम भाषा की गरिमा बनाए रखें और शालीनता से संवाद करें। यदि सोशल मीडिया का उपयोग शिष्ट और सकारात्मक भाषा में किया जाए, तो यह समाज में सद्भाव और समझ को बढ़ावा दे सकता है।

सोशल मीडिया आज के युग में अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन चुका है। इसके द्वारा लोग अपने विचार साझा करते हैं, बहस करते हैं और एक-दूसरे से जुड़ते हैं। परंतु इस मंच पर अभद्र भाषा और अपशब्दों का बढ़ता प्रयोग एक चिंताजनक प्रवृत्ति बन गया है। इस समस्या के अनेक कारण हैं।

सबसे प्रमुख कारण है गुमनामी। लोग फर्जी प्रोफ़ाइल बनाकर बिना डर या जिम्मेदारी के कुछ भी कह देते हैं। जब जवाबदेही नहीं होती, तो भाषा की मर्यादा टूट जाती है। दूसरा कारण है अभिव्यक्ति की आज़ादी का गलत अर्थ। कुछ लोग इसे अनुशासनहीनता का लाइसेंस समझ बैठते हैं, जबकि यह अधिकार जिम्मेदारी के साथ प्रयोग करने हेतु है।

इसके अतिरिक्त, आवेग में प्रतिक्रिया देना भी एक बड़ा कारण है। सोशल मीडिया पर तात्कालिक प्रतिक्रियाएँ प्रचलन में हैं, जिससे लोग बिना सोचे-समझे कटु और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर बैठते हैं।

कुछ लोग जातीयता, राजनैतिकता या धार्मिकता के जंजाल में इतना अधिक गहरे डूब चुके हैं कि उन्हें इस के अलावा अन्य कुछ सूझता ही नहीं है। ऐसे में वे साधारण सी पोस्ट पर भी अभद्र, गंदे कमेंट लिखते हैं। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं कि सामने पढ़ने वाला बच्चा है या वृद्ध! इन्हें बस बक कर चले जाना है। इन्हें किसी के मानसिक स्थिति, समय , देश, काल, पद, प्रतिष्ठा, परिस्थितियों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

युवाओं पर नकारात्मक डिजिटल प्रभाव और कुछ सोशल मीडिया प्रभावशालियों (Social Media Influencers) की भाषा शैली भी अनुकरणीय बन जाती है, जिससे यह समस्या और भी अधिक गंभीर हो जाती है। इन इन्फ़्लुएंसर्स की वजह से नई पीढ़ी के लोगों को लगता है कि शायाद यही बात-चीत का तरीका है और वे भी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने से संकोच नहीं करते।

अपशब्द बोलना, गालियां देना, दूसरे को ट्रोल करना जो कुछ लोगों को स्वाभाविक प्रतिक्रिया लगती है,दरअसल, उतनी स्वाभाविक है नहीं। इस प्रकार का व्यवहार व्यक्ति की मानसिक कुंठा, व्यवहारिक बुद्धि का अभाव , मानसिक विकास की कमी और सोचने की क्षमता के अपूर्ण विकास और समझदारी के अभाव को प्रकट करती है। जिस व्यक्ति का मानसिक विकास सही हुआ हो वह संतुलित शब्दों में अपनी असहमति को व्यक्त करने सक्षम होता है , किंतु कमज़ोर और अविकसित मस्तिष्क का व्यक्ति किसी भी बात से असहमत होने पर उसे सही शब्दों में व्यक्त करने में असमर्थ होता है और गाली -गलौच का सहारा लेता है।

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। यह केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि सूचना, विचार और भावनाओं के आदान-प्रदान का एक प्रभावशाली मंच बन गया है। परंतु इसकी व्यापकता के साथ-साथ इसके दुरुपयोग की घटनाएँ भी तेजी से बढ़ी हैं। फर्जी खबरें, अफवाहें, अभद्र भाषा और घृणा फैलाने वाली पोस्टें इस मंच की विश्वसनीयता को चुनौती दे रही हैं। ऐसे में सोशल मीडिया का सही उपयोग करना एक सामूहिक जिम्मेदारी बन जाता है।

सोशल मीडिया की शक्ति बहुत बड़ी है। इसके माध्यम से शिक्षा, जन-जागरूकता, सहायता, रोजगार और नवाचार को बढ़ावा दिया जा सकता है। परंतु यह तभी संभव है जब प्रत्येक उपयोगकर्ता अपने कर्तव्यों और नैतिक सीमाओं को समझे। भ्रामक जानकारी को फैलाने से बचना, असंवेदनशील टिप्पणियों से परहेज करना, और दूसरों के विचारों का सम्मान करना – ये कुछ ऐसे मूलभूत सिद्धांत हैं जो एक स्वस्थ डिजिटल समाज की नींव रख सकते हैं।

केवल सरकार या सोशल मीडिया कंपनियाँ ही नहीं, बल्कि हम सभी नागरिकों को जागरूक और ज़िम्मेदार बनना होगा। यदि हम सोशल मीडिया को संवाद, सहयोग और समावेशिता का माध्यम बनाएँ, तो यह न केवल व्यक्तिगत विकास का साधन बनेगा, बल्कि समाज के उत्थान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

अतः आवश्यक है कि सोशल मीडिया पर संवाद करते समय शिष्टता, संयम और संवेदनशीलता का ध्यान रखा जाए, ताकि यह मंच सकारात्मक विचारों और स्वस्थ चर्चा का माध्यम बना रह सके।

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