AATMTRAAN NCERT Class 10 Hindi B Sparsh 2 Chapter 9 Solutions,पाठ 9 आत्मत्राण

कवि परिचय: रवींद्रनाथ ठाकुर

सुप्रसिद्ध कवि, लेखक, नाटककार, समाजसेवक, और शिक्षाविद ठाकुर रवींद्रनाथ जी किसी परिचय का मोहताज़ नहीं हैं। इनका जन्म 6 मई 1861 को बंगाल के एक संपन्न  ब्राह्मण  परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था। स्कूली शिक्षा के लिए इन्हें स्थानीय विद्यालय में भेजा गया। किंतु औपचारिक शिक्षा के तौर- तरीके उन्हें‍ बेहद उकताऊ लगे। अतः उन्होंने विद्यालय जाना बंद कर दिया और घर पर ही रह कर शिक्षा प्राप्त की। छोटी उम्र में ही उन्होंने अनेक विषयों में ज्ञान अर्जित कर लिया।

Thakur Ravindra Nath (pic courtesy Internet)

रवींद्रनाथ टैगोर वकील बनना चाहते थे, अतः उन्होंने लंदन के युनिवर्सिटी कॉलेज में, वर्ष 1878 में दाखिला लिया। परंतु, वे अपनी पढ़ाई पूरी न कर सके। दो साल बाद ही वे बिना किसी डिगरी के ही कलकत्ता लौट आए क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि उनकी रुचि वकालत में न हो कर साहित्य के क्षेत्र में है। आगे चल कर उन्होंने एक कवि और लेखक के रुप में लोक संस्कृति के स्वर को मुखरित किया। इंग्लैंड से लंबी समुद्री यात्रा के दौरान ही उन्होंने अपने बांग्ला रचना गीतांजलि को अंग्रेजी में अनुवादित किया। जिस वर्ष गीतांजलि का प्रकाशन हुआ था उसी वर्ष के समय उन्हें साहित्य के लिये नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने लेखन में भारतीय संस्कृति की रहस्यवाद और भावनात्मक सुंदरता को दिखाया । जिसके लिये पहली बार किसी गैर-पश्चिमी व्यक्ति को इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाज़ा गया। नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वे पहले भारतीय हैं।उन्होंने लगभग 1000 कविताएँ और 2000 गीत लिखे ।

साहित्य के अतिरिक्त रवींद्र नाथ ठाकुर की चित्रकला , संगीत और भावनृत्य में भी विशेष रुचि थी। इसी कारण रवींन्द्र संगीत नाम से एक नई विधा का जन्म हुआ। इन्होंने बचपन में अनुभव की स्कूली शिक्षा के उबाउपन को खत्म करने की इच्छा से एक विद्यालय शांति निकेतन खोला। यह अपने तरीके की अनूठी शैक्षणिक और सांस्कृतिक विश्वप्रसिद्ध संस्था है।

गीतांजलि के अतिरिक्त रवींद्रनाथ ठाकुर की अन्य प्रमुख कृतियाँ है – कविताएँ (नैवैद्य, पूरबी, क्षणिका, चित्र, सांध्य गीत आदि) कहानियाँ ( काबुली वाला, चोखेरबाली, भिखारिन , अंतिम प्यार आदि) उपन्यास- गोरा, घरे बाइरे और अनेक निबंध।

कविता ” आत्मत्राण” रवींद्रनाथ ठाकुर जी द्वारा मूल रूप से बाँग्ला में लिखी गई। इसके हिंदी अनुवादक आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी है।

कविता:आत्मत्राण

विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो (करुणामय)
कभी न विपदा में पाऊँ भय।
दुःख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर इतना होवे (करुणामय)
दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।
कोई कहीं सहायक न मिले
तो अपना बल पौरुष न हिले;
हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही
तो भी मन में ना मानूँ क्षय।। (1)

मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं
बस इतना होवे (करुणायम)
तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।
केवल इतना रखना अनुनय-
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।(2)

कविता का भावार्थ: आत्मत्राण

काव्यांश 1

विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो (करुणामय)
कभी न विपदा में पाऊँ भय।
दुःख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर इतना होवे (करुणामय)
दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।
कोई कहीं सहायक न मिले
तो अपना बल पौरुष न हिले;
हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही
तो भी मन में ना मानूँ क्षय।। (1)

संदर्भ 1

प्रस्तुत काव्यांश हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘से ली गई हैं।  यह काव्यांश प्रसिद्ध साहित्यकार रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता “आत्मत्राण” का अंश है। यह कविता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा बाँग्ला से हिंदी में अनुदित की गई है। प्रस्तुत कविता में कवि ईश्वर से एक विशेष प्रार्थना कर रहे हैं । वे ईश्वर से अपने कष्ट और विपदा दूर करने के स्थान पर इन कष्टों और विपदाओं को सहने की शक्ति देने की प्रार्थ‍ना करते हैं।

भावार्थ 1

कवि रवींद्रनाथ ठाकुर भगवान से प्रार्थना करते हुए कहते हैंकि हे प्रभु! मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि आप मुझे विपादओं से बचाएँ। लेकिन इतना अवश्य करें कि जब कभी मुझ पर विपदा आए तो उनसे मुझे डर न लगे। यदि आप दुख से संतप्त (जलते हुए) हृदय को सांत्वना नहीं दे सकते तो भी कोई बात नहीं किंतु इतना आत्मविश्वास अवश्य हो कि हर दुख को मैं जीत सकुँगा। यदि कष्ट के क्षणों में कोई अन्य मरी सहायता न करे तो भी अपने बल पर , अपने साहस और पुरुषार्थ पर मेरा विश्वास न डगमगाए। यदि किसी प्रकार की हानि भी उठानी पड़े और लाभ द्वारा हमेशा छले जाते रहना पड़े अर्थात लाभ से वंचित ही रहना पड़े तो भी कोई बात नहीं , पर मेरे मन की शक्ति का कभी क्षय नहीं होना चाहिए। कवि कहना चाहते हैं कि हर परिस्थिति में मेरा मन आत्मबल से भरा रहना चाहिए।

काव्यांश 2

मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं
बस इतना होवे (करुणायम)
तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।
केवल इतना रखना अनुनय-
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।(2)

संदर्भ 2

प्रस्तुत काव्यांश हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘से ली गई हैं।  यह काव्यांश प्रसिद्ध साहित्यकार रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता “आत्मत्राण” का अंश है। यह कविता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा बाँग्ला से हिंदी में अनुदित की गई है। प्रस्तुत कविता में कवि ईश्वर से एक विशेष प्रार्थना कर रहे हैं । वे प्रार्थ‍ना करते हैं कि सुख के समय ईश्वर को न भूलूँ और दुख के समय ईश्वर पर अविश्वास न करूँ।

भावार्थ 2

कवि कहता है कि हे ईश्वर ! आप मेरे भय का निवारण करो, मेरा डर दूर करो ऐसी भी मेरी कोई प्रार्थना नहीं है। किंतु आप मुझे निरोगी रखें, जिससे मैं अपने बल- पौरुष के द्वारा संसार सागर के कष्टों को पार कर सकूँ। यदि आप मेरी समस्याओं कष्टों के भार को कम कर मुझे तसल्ली न दे सको तो भी कोई बात नहीं, किंतु मेरा इतना अनुरोध अवश्य स्वीकारें कि मैं अपने कष्टों के भार को बिना डरे सहन कर सकूँ। हे ईश्वर ! जब कभी मेरे जीवन में सुख के दिन आवें, तब आपके सम्मुख सिर झुका कर प्रतिदिन आपको याद करूँ, आपके दर्शन करूँ। यदि कभी मेरे जीवन में दुख आवें । ऐसे क्षण आ जाएँ कि भले ही सारा संसार मुझसे धोखा करे, किंतु हे दयालु प्रभु ! ऐसे कठिन समय पर भी मैं कभी आप पर अविश्वास न करूँ । मेरी इतनी ही प्रार्थना है।

प्रश्न-उत्तर

(क ) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

(क ) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1 – कवि किससे और क्या प्रार्थना कर रहा है ?

उत्तर – कवि करुणामय ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है की उसे भले ही दुःख दर्द और कष्ट दे परन्तु उन सबसे लड़ने की शक्ति भी दे। चाहे दुःख हो या सुख, वो ईश्वर को कभी न भूले। ईश्वर के प्रति उसके मन में कभी संदेह न हो कवि यही प्रार्थना कर रहा है।

प्रश्न 2 – ‘विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं’- कवि इस पंक्ति के द्वारा क्या कहना चाहता है?

उत्तर – कवि इस पंक्ति में ईश्वर से प्रार्थना करता है कि मैं ये नहीं कहता की मुझ पर कोई विपदा न आये और कोई दुःख न आये। बस मैं ये चाहता हूँ कि मुझे उन विपदाओं और कष्टों को झेलने की ताकत देना।

प्रश्न 3 – कवि सहायक के न मिलने पर क्या प्रार्थना करता है ?

उत्तर – कवि  प्रार्थना करता है कि यदि दुःख के समय कोई सहायक न मिले तो भी उसके पुरुषार्थ में कोई कमी न आये । यदि संसार में उसे हानि हो और लाभ भी ना हो तो भी मन में उसे नुकसान न मानूँ। कवि अपने मनोबल बनाए रखने की ईश्वर से प्रार्थना करता है ।

प्रश्न 4 – अंत में कवि क्या अनुनय करता है ?

उत्तर – अंत में कवि अनुनय करता है कि अपने दुःखों और कष्टों को मैं निर्भय होकर सहन कर सकूँ । सुख के समय ईश्वर को न भूलूँ और उनके सम्मुख नत-मस्तक रहूँ। दुख के समय ईश्वर पर अविश्वास न करूँ।

प्रश्न 5 – ‘आत्मत्राण ‘ शीर्षक की सार्थकता कविता के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘आत्मत्राण’ का अर्थ है स्वयं के भय का निवारण अथवा भय से मुक्ति। कवि न तो ईश्वर से दुःखों को दूर करने की प्रार्थना कर रहा है और न यह प्रार्थना नहीं कर रहा है कि उसे दुःख ना मिले । बल्कि वह मिले हुए दुःखों को सहन करने की शक्ति ईश्वर से मांग रहा है। अतः यह शीर्षक पूर्णतया सार्थक है।

प्रश्न 6 – अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना के अतिरिक्त आप और क्या – क्या प्रयास करते हैं ? लिखिए।

उत्तर – अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना के अतिरिक्त हमें आत्मबल और पुरुषार्थ पर भरोसा करना चाहिए। धैर्य और परिश्रम से लगातार कार्य करते हुए हम अपनी इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न 7 – क्या कवि की यह प्रार्थना आपको अन्य प्रार्थना गीतों से अलग लगती है। यदि हाँ, तो कैसे ?

उत्तर – यह प्रार्थना गीत अन्य प्रार्थना गीतों से भिन्न है क्योंकि अन्य गीतों में ईश्वर से दुःख दर्द ,कष्टों को दूर करने और सुख शांति की कामना की जाती है। परन्तु इस गीत में ईश्वर से दुःख दर्द और कष्टों को दूर करने के लिए नहीं बल्कि उन दुःख दर्द और कष्टों को सहने की और झेलने की शक्ति देने के लिए कहा है।

(ख ) निम्नलिखित अंशों के भाव स्पष्ट कीजिए –

(1) नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।

उत्तर – इन पंक्तियों में कवि  प्रार्थना कर रहे हैं कि हे ईश्वर ! जब कभी मेरे जीवन में सुख के दिन आवें, तब आपके सम्मुख सिर झुका कर प्रतिदिन आपको याद करूँ, आपके दर्शन करूँ। सुख के दिनों में भी वे ईश्वर को एक क्षण के लिए भी ना भूलें अर्थात हर क्षण ईश्वर को याद करता रहें।

(2) हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही

उत्तर – इन पंक्तियों में कवि  कह रहे हैं कि उन्हें अगर इस संसार में हानि भी उठानी पड़े और लाभ से हमेशा वंचित ही रहना पड़े अथवा बेशक उसे किसी से धोखा हो जाए तो भी कोई बात नहीं पर उनके मन की शक्ति का कभी नाश नहीं होना चाहिए अर्थात उनका मन हर परिस्थिति में आत्मविश्वास से भरा रहना चाहिए।

(3) तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।

उत्तर – इन पंक्तियों में कवि ईश्वर से कह रहे हैं कि वे संसार रूपी सागर को स्वयं ही पार करना चाहता है । वह ईश्वर से अपने दायित्वों को हल्का या कम नहीं कराना चाहता और न ही भगवान से सांत्वना रूपी उपहार पाने का इच्छुक है। वह सिर्फ़ इतनी प्रार्थना करता है कि उसके भीतर संसार सागर की सभी बाधाओं को पार करने की अपार शाक्ति व संघर्ष करने का साहस आ जाए।

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