NCERT Class 9 Hindi B Sparsh-1 Chapter 9 Solutions पाठ 9 अग्नि पथ (कविता )

कवि परिचय:
लेखक परिचय : हरिवंश राय ‘बच्चन’

जन्म :
27 नवंबर 1907
स्थान:
इलाहाबाद(प्रयागराज), उत्तरप्रदेश
शिक्षा:
प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद हरिवंश राय बच्चन ने सन् 1929 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से BA और अंग्रेजी साहित्य में MA किया। अंग्रेजी साहित्य के विख्यात कवि डब्लू बी यीट्स की कविताओं पर रिसर्च करने के लिए वह कैम्ब्रिज भी गए।
कार्यक्षेत्र:
1955 में इंग्लैंड से वापस आने के बाद, हरिवंश राय बच्चन ने ऑल इंडिया रेडियो में काम शुरू कर दिया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाना और हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए काम करते हुए कविता लिखना जारी किया। इसके बाद कुछ साल तक भारतीय विदेश सेवा से जुड़े रहे । इस दौरान अनेक देशों में भ्रमण किया। बाद में साहित्य से जुड़कर पूर्णकालिक साहित्य सेवा से जुड़ गए।
भाषा- शैली
हरिवंश राय की कविताएँ सहज और संवेदनशील हैं। इनकी रचनाओं में व्यक्ति-वेदना, राष्ट्र-चेतना और जीवन दर्शन के स्वर मिलते हैं। इन्होंने आत्मविश्लेषण वाली कविताएँ भी लिखी हैं। राजनैतिक जीवन के ढोंघ, सामाजिक असमानता और कुरीतियों पर व्यंग्य किया है। इनकी आत्मकथा हिंदी गद्य की बेजोड़ कृति मानी जाती है।
रचनाएँ:
कविता संग्रह: मधुशाला, निशा-निमंत्रण, एकांत संगीत,मिलन-यामिनी, आरती और अंगारे, टूटती चट्टानें , रूप -तरंगिणी।
आत्मकथा: चार खंड – 1. क्या भूलूँ, क्या याद करूँ 2. नीड़ का निर्माण फ़िर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।
पुरस्कार : बच्चन साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत भूमि पुरस्कार, नेहरू पुरस्कार और सरस्वती सम्मान। सन् 2003 में भारत सरकार द्वारा इनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया
पाठ प्रवेश: अग्नि पथ
प्रस्तुत कविता में कवि ने संघर्ष से भरे जीवन को ‘अग्नि पथ’ कहते हुए मनुष्य को यह संदेश दिया है कि हमें अपने जीवन के रास्ते में सुख रूपी छाँह की इच्छा न करते हुए अपनी मंजिल की ओर मेहनत के साथ बिना थकान महसूस किए बढ़ते ही जाना चाहिए। कविता में शब्दों की पुनरावृत्ति कैसे मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, यह देखने योग्य है।
अग्नि पथ (कविता )
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी! कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
यह महान दृश्य है-
चल रहा मनुष्य है।
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ! लथपथ!लथपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
अग्नि पथ कविता का भावार्थ
काव्यांश 1
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
शब्दार्थ :
अग्नि पथ : संघर्ष भरा रास्ता
पत्र : पत्ता
छाँह : छाया
भावार्थ 1 : अग्नि पथ का तात्पर्य संघर्षपूर्ण मार्ग से है। यहाँ पर कवि ने । संदेश दिया है कि जीवन एक संघर्षपूर्ण मार्ग है । भले ही रास्ते में अनेक वृक्ष क्यों न खड़े हों ,वे कितने ही बड़े और घने हों . किंतु पथिक तुम उनसे एक पत्र छाया भी न माँगना। जीवन एक संघर्षपूर्ण मार्ग है। यहाँ पर बड़े और घने वृक्षों की तुलना मदद करने वाले सक्षम और दयालु मनुष्यों से की गई है । कवि आत्मनिर्भर बन कर संघर्ष करने का संदेश देना चाहते हैं ।
काव्यांश 2
तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी! कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
शब्दार्थ:
थकेगा: थक जाना
थमेगा :रुक जाना
मुड़ेगा : वापस आना
शपथ: कसम,सौगंध
भावार्थ : यहाँ पर कवि पथिक को निरंतर आगे बढ़ने को कह रहे हैं। कवि पथिक कहते है कि तुम शपथ लो कि संघर्ष पथ पर चाहें कितनी भी परेशानियाँ आयें , कष्ट आ जाएँ, किंतु तुम न तो थकोगे और न रुकोगे।यहाँ पर थकने कर अर्थ हार जाने से है और थमने का आशय रुकने से, प्रगति करना छोड़ देने से समझना चाहिए। जीवन संघर्ष रूपी अग्नि पथ है।
काव्यांश 3
यह महान दृश्य है-
चल रहा मनुष्य है।
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ! लथपथ!लथपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
शब्दार्थ:
दृश्य- जो दिखाई देता है, Scene
अश्रु- आँसू ,
स्वेद- पसीना
रक्त -खून
लथपथ- भीगा हुआ
भावार्थ : यहाँ पर कवि उस दृश्य को महान कहते हैं जिसमें पथिक निरंतर प्रगति करते हुए आगे बढ़ रहा हैं।कवि कहते है कि यह महान दृश्य है जिसमें मनुष्य कर्तव्य पथ पर अपने आँसू , पसीने और खून से लथपथ हो आगे बढ़ रहा है। यहाँ अश्रु का अर्थ पीड़ाओं को सहने से, स्वेद और रक्त का अर्थ कठिन परिश्रम करने से है।
अग्नि पथ कविता के मुख्य बिंदु
1.इस कविता के माध्यम से कवि लोगों को अपने बल-बूते पर मेहनत और लगन के साथ अपनी प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने को कहते हैं ।
2. इस कविता में जीवन को संघर्ष से भरा अग्निपथ बताया है। जहाँ हर समय हमारी कठिन परीक्षा होती रहती है और हमें खरा उतरना होता है।
3. मेहनती मनुष्य की प्रसंशा की है। क्योंकि वह अपने अश्रु-स्वेद-रक्त अर्थात खून पसीना एक कर कर्तव्य पथ पर अग्रसर है।
प्रश्न – अभ्यास :
प्रश्न 1.निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए—
प्रश्न 1 – कवि ने ‘अग्नि पथ’ किसके प्रतीक स्वरूप प्रयोग किया है?
उत्तर – अग्नि पथ शाब्दिक अर्थ आग से भरा हुआ रास्ता है। यहाँ पर अग्नि पथ शब्द को कठिनाइयों से भरे हुए रास्ते के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है ।
प्रश्न 2 – ‘माँग मत, ‘कर शपथ, ‘लथपथ’ इन शब्दों का बार-बार प्रयोग कर कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर – ‘माँग मत, ‘कर शपथ, ‘लथपथ’ इन शब्दों का बार बार प्रयोग करके कवि ने उन शब्दों में जोर देने के लिए किया है। इन शब्दों को दोहराने से कवि उन भावनाओं पर जोर देना चाहता है जिससे पथिक को मंजिल को हासिल करने की तीव्र प्रेरणा मिले।। ’माँग मत’ कह कर कवि कार्य को अपने बल-बूते पर करने की दृढ़ इच्छाशक्ति और लाख गिरने के बावजूद किसी से मदद न माँगने की प्रेरणा दी है साथ ही वे पथिक को न थकने , न थमने और न मुड़ने का संदेश देते हैं। अश्रु- श्वेद,रक्त से लथपथ व्यक्ति ही अंत में सफलता प्राप्त करता है।
प्रश्न 3 – ‘एक पत्र छाँह भी माँग मत’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – हो सकता है कि कठिन दौर में आपकी मदद के लिए कई लोग आगे आएँ। जो हर तरह से आपकी मदद के लिए सक्षम हो , लेकिन ‘एक पत्र छाँह भी माँग मत’ कह कर कवि ने पथिक को कार्य अपने बल-बूते पर करने की दृढ़ इच्छाशक्ति रखने और लाख गिरने के बावजूद किसी से मदद न माँगने की प्रेरणा दी है कवि का मानना है कि कठिन परिश्रम द्वारा स्वयं ही जीवन में सफलता प्राप्त करनी चाहिए।
प्रश्न 2.निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए –
प्रश्न 1 – तू न थमेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी
उत्तर – जब कठिन रास्ते पर चलना हो तो मनुष्य को एक प्रतिज्ञा करनी चाहिए। वह कभी नहीं थकेगा, कभी नहीं रुकेगा और कभी पीछे नहीं मुड़ेगा।
प्रश्न 2 – चल रहा मनुष्य है, अश्रु, स्वेद, रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ
उत्तर – जब कोई किसी कठिन रास्ते से होते हुए अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ता है तो उसका वह संघर्ष देखने योग्य होता है अर्थात दूसरों के लिए प्रेरणा दायक होता है। कवि उस क्षण को महानतम बताते हुए कहते हैं कि आँसू, पसीने और खून से सने हुए अर्थात कड़ी मेहनत कर के आगे बढ़ते हुए व्यक्ति को देखना गौरव की बात हैं।
प्रश्न 3 – इस कविता का मूलभाव क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – इस कविता का मूलभाव यह है कि जीवन पथ एक कठिनाइयों भरा रास्ता है । अग्नि पथ का एक अर्थ परीक्षा की घड़ी भी होता है। जब जीवन में कठिन समय आता है तभी मनुष्य की असली परीक्षा होती है। ऐसे में उसे किसी से मदद नहीं माँगनी चाहिए। कवि पथिक को सौगंध खाने को कहता है कि मुश्किल समय में उसे न तो थकना चाहिए, न ही रुकना चाहिए और न ही अपने काम को अधूरा छोड़ कर वापस मुड़ना चाहिए।कवि ने उस मनुष्य की प्रसंशा की जो अपने पीड़ा -कष्ट को सहता हुआ खून-पसीने से लथपथ अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर मंजिल की ओर अग्रसर है।




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