KYA NIRASH HUA JAYE -CBSE-GRADE 8TH- पाठ 5 क्या निराश हुआ जाए

Class 8 Chapter 5 KYA NIRASH HUA JAYE Explanation,Summary, Question &Answers and Difficult word meaning
क्या निराश हुआ जाए
लेखक परिचय लेखक का नाम: हजारी प्रसाद द्विवेदी
जन्म: 19 अगस्त 1907 ई०
जन्म स्थान: उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के दुबे का छपरा, ओझवलिया नामक गाँव
माता का नाम :श्रीमती ज्योतिष्मती देवी पिता का नाम:श्री अनमोल द्विवेदी

भाषा-शैली: हजारी प्रसाद जी की भाषा परिमार्जित खड़ी बोली है। उन्होंने भाषा की स्पष्टता, मात्राओं की शुद्धि पर विशेष ध्यान दिया है। उनकी भाषा मुख्य रूप से परिमार्जित संस्कृतनिष्ठ भाषा है। उन्होंने अपनी रचनाओं में मुख्य रूप से वर्णनात्मक, व्यंग्यात्मक और व्यास शैली का प्रयोग किया है। अपनी निबंध रचनाओं के लिए वे विशेष रूप से जाने जाते हैं।
मुख्य रचनाएँ: सूर साहित्य, हिन्दी साहित्य का आदिकाल , आधुनिक हिन्दी साहित्य पर विचार ,साहित्य का मर्म, मेघदूत, एक पुरानी कहानी ,लालित्य तत्त्व,साहित्य सहचर आदि उनकी कुछ रचनाएँ हैं|
क्या निराश हुआ जाए :पाठ की व्याख्या(Explanation)
गद्यांश
मेरा मन कभी-कभी बैठ जाता है। समाचार पत्रों में ठगी, डकैती, चोरी, तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचार भरे रहते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का कुछ ऐसा वातावरण बन गया है कि लगता है, देश में कोई ईमानदार आदमी ही नहीं रह गया है। हर व्यक्ति संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। जो जितने ही ऊँचे पद पर हैं उनमें उतने ही अधिक दोष दिखाए जाते हैं।
Difficult words :
| मन बैठना – उदास होना ठगी- swindle डकैती- Robbery चोरी- Theft तस्करी – smuggling भ्रष्टाचार – अनाचार , Corruption आरोप-प्रत्यारोप- दूसरे पर इल्ज़ाम लगाना, Counter charges संदेह – शक-सुबहा, doubt |
व्याख्या: पत्र-पत्रिकाओं में चोरी, ठगी, डकैती और तस्करी आदि घटनाओं को देखकर कई बार लेखक उदास हो जाते हैं जब भी कुछ ऐसी घातनाएँ होती हैं तो एक दूसरे पर आरोप और प्रत्यारोप का एक सिलसिला चल पड़ता है। लेकिन कोई परिणाम नहीं निकलता। ऐसी परिस्थिति में कई बार लगता है कि ईंआनदारी खत्म हो गई है और हर व्यक्ति पर संदेह होता है। लेखक का मानना है कि लोग आर्थिक कमी के आधार पर ऐसा नहीं करते। अपितु जो जितना अधिक उच्च पद वाला होता है उसमें उतनी ही कमियाँ दिखाई देती हैं।

गद्यांश
एक बहुत बड़े आदमी ने मुझसे एक बार कहा था कि इस समय सुखी वही है जो कुछ नहीं करता। जो कुछ भी करेगा उसमें लोग दोष खोजने लगेंगे। उसके सारे गुण भुला दिए जाएँगे और दोषों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाने लगेगा। दोष किसमें नहीं होते? यही कारण है कि हर आदमी दोषी अधिक दिख रहा है, गुणी कम या बिलकुल ही नहीं। स्थिति अगर ऐसी है तो निश्चय ही चिंता का विषय है।
Difficult words :
| दोष- कमियाँ, बुराइयाँ~ defect बढ़ा-चढ़ाकर- exaggeratedly |
व्याख्या: अपने अनुभव बताते हुए लेखक कहते हैं कि एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ने उन्हें बताया था कि आज के समय निष्क्रिय आदमी ही सबसे सुखी है। क्योंकि जो जितना अधिक काम करेगा, उसके उतने ही दोष दिखेंगे और जरा सी गलती होने पर उसके सारे अच्छाइयाँ भुला दी जाएंगी और दोषों को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है । इसी कारण आज हर व्यक्ति दोषी दिख रहा है । यह स्थिति चिंता का विषय है।
गद्यांश
क्या यही भारतवर्ष है जिसका सपना तिलक और गांधी ने देखा था? रवींद्रनाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय का महान संस्कृति-सभ्य भारतवर्ष किस अतीत के गह्वर में डूब गया? आर्य और द्रविड़, हिंदू और मुसलमान, यूरोपीय और भारतीय आदशों की मिलन भूमि ‘मानव महा-समुद्र’ क्या सूख ही गया? मेरा मन कहता है ऐसा हो नहीं सकता। हमारे महान मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा।
Difficult words :
| संस्कृति – Culture सभ्य – Civilized मनीषियों – mystics |
व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि तिलक, गांधी, रवींद्रनाथ ठाकुर और मदन मोहन मालवीय जैसे हमारे स्वतंत्रता संग्रां सेनानी नेताओं ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था, जहाँ सभी धर्म, जाति, और संप्रदाय के लोग एक साथ मिलकर रहते, एकजुट और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होते।लेकिन आज के भारत की स्थिति देखकर यह सवाल उठता है कि क्या हम उस सपने की ओर बढ़ रहे हैं या कहीं भटक गए हैं। भारत को “मानव महासागर” कहा जाता था, क्योंकि यहाँ विभिन्न सभ्यताओं और विचारधाराओं का मेल होता था, क्या वह खत्म हो गया है?
लेखक का मन कहता है कि ऐसा नहीं हो सकता। वे मानते हैं कि भारत आज भी महान मूल्य और नैतिकता पर भरोसा रहा है और हमेशा बना रहेगा। यह देश अपने मनीषियों के सपनों को साकार करेगा, चाहे कितनी भी चुनौतियाँ सामने क्यों न आएं।
गद्यांश
यह सही है कि इन दिनों कुछ ऐसा माहौल बना है कि ईमानदारी से मेहनत करके जीविका चलानेवाले निरीह और भोले-भाले श्रमजीवी पिस रहे हैं और झूठ तथा फ़रेब का रोजगार करनेवाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है, सचाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। ऐसी स्थिति में जीवन के महान मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था ही हिलने लगी है।
Difficult words :
| जीविका -livelihood श्रमजीवी – मेहनतकश, मजदूर ,wage earner फ़रेब – धोखेबाज़, deception भीरु-कायर, डरपोक, timid |
व्याख्या:
इस समय ऐसा माहौल बन गया है कि जो लोग ईमानदारी से काम करते हैं, मेहनत करते हैं, वे संघर्ष कर रहे हैं, जबकि जो लोग झूठ और धोखा देकर काम कर रहे हैं, वे सफल हो रहे हैं। ईमानदार लोगों को अब मूर्ख समझा जाने लगा है, और माना जा रहा है कि सत्य कमजोर और असहाय लोगों के अभ्यास में लाने के लिए है। इस तरह की स्थिति में लोग जीवन के अच्छे और महत्वपूर्ण मूल्यों में विश्वास खोने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि सच्चाई और ईमानदारी से कुछ हासिल नहीं होता, जबकि झूठ और धोखा देने वाले लोग आगे बढ़ रहे हैं।लेखक कहते है कि इन सबसे समाज में नैतिक मूल्यों को कमजोर हो रहे हैं और लोगों की इन पर से आस्था डगमगा रही है।
गद्यांश
भारतवर्ष में कभी भी भौतिक वस्तुओं के संग्रह को बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया है. उसको दृष्टि से मनुष्य के भीतर जो महान आंतरिक गुण स्थिर भाव से बैठा हुआ है, वही चरम और परम है। लोभ-मोह, काम-क्रोध आदि विचार मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते हैं, पर उन्हें प्रधान शक्ति मान लेना और अपने धन तथा बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर छोड़ देना बहुत बुरा आचरण है। भारतवर्ष ने कभी भी उन्हें उचित नहीं माना, उन्हें सदा संयम के बंधन से बाँधकर रखने का प्रयत्न किया है। परंतु भूख की उपेक्षा नहीं की जा सकती, बीमार के लिए दवा की उपेक्षा नहीं की जा सकती, गुमराह को ठीक रास्ते पर ले जाने के उपायों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
Difficult words :
| भौतिक वस्तुओं – सांसारिक वस्तुएँ, Materialistic Things आंतरिक गुण- अंदरूनी सामर्थ्य , Intrinsic Instinct उपेक्षा- अनदेखा करना, negligence |
व्याख्या:
भारत में हमेशा से भौतिक वस्तुओं का अधिक महत्व नहीं दिया गया है। यहाँ यह माना जाता है कि मनुष्य के भीतर जो अच्छे और आंतरिक गुण होते हैं, वही सबसे श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण हैं। लालच, मोह, काम, और क्रोध जैसे भाव मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होते हैं, लेकिन उन्हें जीवन में सबसे बड़ी ताकत मान लेना गलत है। अपने धन और बुद्धि को इन भावों के अधीन कर देना अनुचित माना गया है। भारत ने हमेशा इन भावनाओं को संयम में रखने का प्रयास किया है। हालाँकि, यह भी सच है कि भूख को अनदेखा नहीं किया जा सकता, बीमार व्यक्ति को दवा की ज़रूरत होती है, और गुमराह व्यक्ति को सही रास्ते पर लाने की कोशिश की जानी चाहिए।
लेखक के अनुसार, यद्यपि भारत ने हमेशा आंतरिक गुणों को प्राथमिकता दी है, लेकिन जीवन की मूलभूत जरूरतों की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। संयम और संतुलन का महत्व हर स्थिति में बना रहना चाहिए।
गद्यांश
हुआ यह है कि इस देश के कोटि-कोटि दरिद्रजनों की हीन अवस्था को दूर करने के लिए ऐसे अनेक कायदे-कानून बनाए गए हैं जो कृषि, उद्योग, वाणिज्य, शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति को अधिक उन्नत और सुचारु बनाने के लक्ष्य से प्रेरित हैं, परंतु जिन लोगों को इन कार्यों में लगना है, उनका मन सब समय पवित्र नहीं होता। प्रायः वे ही लक्ष्य को भूल जाते हैं और अपनी ही सुख-सुविधा की ओर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं।
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
देश के करोड़ों गरीब लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए सरकार ने कई नियम और योजनाएँ बनाई हैं। इनका उद्देश्य कृषि, उद्योग, व्यापार, शिक्षा, और स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है। लेकिन जिन लोगों को इन योजनाओं को लागू करना होता है, उनका इरादा हमेशा सही नहीं होता। वे अक्सर अपने काम के असली उद्देश्य को भूल जाते हैं और अपने फायदे और आराम पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं, जिससे असली लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता।
गद्यांश
भारतवर्ष सदा कानून को धर्म के रूप में देखता आ रहा है। आज एकाएक कानून और धर्म में अंतर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता. कानून को दिया जा सकता है। यही कारण है कि जो लोग धर्मभीरु हैं, वे कानून की त्रुटियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते।
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
भारत में हमेशा से कानून को धर्म की तरह माना जाता था, यानी कानून का पालन उतना ही जरूरी था जितना धर्म का। लेकिन अब कानून और धर्म को अलग-अलग कर दिया गया है। धर्म को धोखा देना गलत माना जाता है, जबकि कानून को धोखा देना कुछ लोग ठीक समझते हैं। इसलिए जो लोग धर्म से डरते हैं, वे भी कानून की कमजोरियों का फायदा उठाने में संकोच नहीं करते, क्योंकि वे इसे धर्म का उल्लंघन नहीं मानते। पहले कानून और धर्म एक जैसे माने जाते थे, लेकिन अब उनके बीच फर्क आ गया है, जिससे लोग कानून को हल्के में लेने लगे हैं।
गद्यांश
इस बात के पर्याप्त प्रमाण खोजे जा सकते हैं कि समाज के ऊपरी वर्ग में चाहे जो भी होता रहा हो, भीतर-भीतर भारतवर्ष अब भी यह अनुभव कर रहा है कि धर्म कानून से बड़ी चीज है। अब भी सेवा, ईमानदारी, सचाई और आध्यात्मिकता के मूल्य बने हुए हैं। वे दब अवश्य गए हैं लेकिन नष्ट नहीं हुए हैं। आज भी वह मनुष्य से प्रेम करता है, महिलाओं का सम्मान करता है, झूठ और चोरी को गलत समझता है, दूसरे को पीड़ा पहुँचाने को पाप समझता है। हर आदमी अपने व्यक्तिगत जीवन में इस बात का अनुभव करता है। समाचार पत्रों में जो भ्रष्टाचार के प्रति इतना आक्रोश है, वह यही साबित करता है कि हम ऐसी चीजों को गलत समझते हैं और समाज में उन तत्वों की प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं जो गलत तरीके से धन या मान संग्रह करते हैं।
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
भले ही समाज के ऊपरी वर्ग में अनैतिक चीजें हो रही हों, भारत के भीतर अब भी यह मान्यता बनी हुई है कि धर्म कानून से बड़ी चीज है। सेवा, ईमानदारी, सच्चाई और आध्यात्मिकता जैसे मूल्य अभी भी समाज में मौजूद हैं। वे भले ही कुछ समय के लिए दब गए हों, लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं। आज भी लोग एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, महिलाओं का सम्मान करते हैं, झूठ और चोरी को गलत मानते हैं, और किसी को तकलीफ देना पाप समझते हैं। इस तरह हर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में यह महसूस करता है। आज भी समाचार पत्रों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो गुस्सा दिखाई देता है, इससे पता चलता है कि लोग गलत चीजों को स्वीकार नहीं करते और वे ऐसे लोगों की इज्जत नहीं करते जो गलत तरीकों से पैसा या सम्मान कमाते हैं। इस गद्यांश के द्वारा लेखक प्रकट करना चाहता है कि यद्यपि ऊपरी तौर में भले ही भ्रष्टाचार दिखाई देता हो, लेकिन भारत के भीतर अभी भी नैतिकता और सच्चाई के मूल्य जिंदा हैं।
गद्यांश
दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है। बुराई यह मालूम होती है कि किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करके उसमें रस लिया जाता है और दोषोद्घाटन को एकमात्र कर्तव्य मान लिया जाता है। बुराई में रस लेना बुरी बात है. अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है। सैकड़ों घटनाएँ ऐसी घटती हैं जिन्हें उजागर करने से लोक-चित्त में अच्छाई के प्रति अच्छी भावना जगती है।
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
दूसरों की गलतियों को उजागर करना गलत नहीं है, लेकिन बुरी बात तब होती है जब हम केवल किसी के गलत कामों को सामने लाकर उसमें आनंद लेने लगते हैं। कुछ लोग सिर्फ गलतियों को ही उजागर करना अपना कर्तव्य समझ लेते हैं, जो सही नहीं है। बुराई में आनंद लेना गलत है, लेकिन अच्छाई की तारीफ न करना और उसे छिपाए रखना और भी बुरा है। समाज में बहुत सी अच्छी घटनाएँ होती हैं, जिन्हें उजागर करने से लोगों में अच्छाई के प्रति सकारात्मक भावनाएँ जाग सकती हैं।
लेखक कहता है कि हमें न केवल बुराइयों को दिखाना चाहिए, बल्कि अच्छाइयों को भी सामने लाकर उनकी सराहना करनी चाहिए।
गद्यांश
एक बार रेलवे स्टेशन पर टिकट लेते हुए गलती से मैंने दस के बजाय सौ रुपये का नोट दिया और मैं जल्दी-जल्दी गाड़ी में आकर बैठ गया। थोड़ी देर में टिकट बाबू उन दिनों के सेकंड क्लास के डिब्बे में हर आदमी का चेहरा पहचानता हुआ उपस्थित हुआ। उसने मुझे पहचान लिया और बड़ी विनम्रता के साथ मेरे हाथ में नब्बे रुपये रख दिए और बोला, “यह बहुत गलती हो गई थी। आपने भी नहीं देखा, मैंने भी नहीं देखा।” उसके चेहरे पर विचित्र संतोष की गरिमा थी। मैं चकित रह गया।
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
लेखक अपने साथ घटित एक अनुभव साँझा करते हुए कहते हैं कि एक बार जब वे ट्रेन से जा रहे थे , तब टिकट खरीदते समय उन्होंने गलती से दस रुपये की जगह सौ रुपये का नोट दे दिया और जल्दबाजी में ट्रेन में बैठ गए। कुछ समय बाद, टिकट बाबू, जो उन दिनों सेकंड क्लास के डिब्बे में उपस्थित सभी लोगों में लेखक को ढूँढता हुआ आया। उसने लेखक को पहचानकर बड़े सम्मान के साथ नब्बे रुपये वापस कर दिए और कहा, “यह बड़ी गलती थी, न आप ने देखा, न मैंने।” ऐसा करते हुए उसके चेहरे पर आई ईमानदारी और संतोष की भावना देखकर लेखक हैरान रह गया।
इस घटना के द्वारा लेखक टिकट बाबू की ईमानदारी और निष्ठा को दर्शाना चाहता है, जिसने लेखक की भूल होने पर भी बेईमानी नहीं की।

गद्यांश
कैसे कहूँ कि दुनिया से सचाई और ईमानदारी लुप्त हो गई है, वैसी अनेक अवांछित घटनाएँ भी हुई हैं, परंतु यह एक घटना ठगी और वंचना की अनेक घटनाओं से अधिक शक्तिशाली है।
एक बार मैं बस में यात्रा कर रहा था। मेरे साथ मेरी पत्नी और तीन बच्चे भी थे। बस में कुछखराबी धी, रुक-रुककर चलती थी। गंतव्य से कोई आठ किलोमीटर पहले ही एक निर्जन सुनसान स्थान में बस ने जवाब दे दिया। रात के कोई दस बजे होंगे। बस में यात्री घबरा गए। कंडक्टर उत्तर गया और एक साइकिल लेकर चलता बना। लोगों ये को संदेह हो गया कि हमें धोखा दिया जा रहा है।
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
यहां लेखक कहते है कि यह कहना ठीक न होगा कि दुनिया से पूरी तरह सच्चाई और ईमानदारी खत्म हो गई है। हालांकि वे स्वयं कई बार ठगी और धोखाधड़ी की घटनाओं का शिकार हुए हैं, लेकिन कुछ अच्छी घटनाएँ भी होती हैं जो इन बुरी घटनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रभावशाली होती हैं। इसका उदाहरण एक बार लेखक अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ बस में यात्रा कर रहे थे। बस में कुछ खराबी थी, और वह रुक-रुक कर चल रही थी। गंतव्य से आठ किलोमीटर पहले बस एक सुनसान जगह पर रात के 10 बजे बंद हो गई। बस में यात्री घबरा गए। कंडक्टर बस से उतरकर साइकिल लेकर चला गया। इस पर यात्रियों को शक हुआ कि उनके साथ धोखा किया जा रहा है। और लोगों के मन में संदेह पैदा उत्पन्न हो गया।
गद्यांश
बस में बैठे लोगों ने तरह-तरह की बातें शुरू कर दीं। किसी ने कहा, “यहाँ डकैती होती है, दो दिन पहले इसी तरह एक बस को लूटा गया था।” परिवार सहित अकेला मैं ही था। बच्चे पानी-पानी चिल्ला रहे थे। पानी का कहीं ठिकाना न था। ऊपर से आदमियों का डर समा गया था।
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
बस में लोगों के भीतर आपस में कई बातें होने लगी। कुछ लोगों ने बतया कि इस जगह पर डकैती आदि की घटनाएँ होती हैं और अभी कुछ दिन पहले ही यहाँ पर चोरी की वारदात को अंजाम दिया गया था। बस में मात्र लेखक ही सपरिवाए थे और उनके बच्चे प्यास के कारण रो रहे थे।
गद्यांश
कुछ नौजवानों ने ड्राइवर को पकड़कर मारने-पीटने का हिसाब बनाया। ड्राइवर के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। लोगों ने उसे पकड़ लिया। वह बड़े कातर ढंग से मेरी ओर देखने लगा और बोला, “हम लोग बस का कोई उपाय कर रहे हैं, बचाइए, ये लोग मारेंगे।” डर तो मेरे मन में था पर उसकी कातर मुद्रा देखकर मैंने यात्रियों को समझाया कि मारना ठीक नहीं है। परंतु यात्री इतने घबरा गए कि मेरी बात सुनने को तैयार नहीं हुए। कहने लगे, “इसकी बातों में मत आइए, धोखा दे रहा है। कंडक्टर को पहले ही डाकुओं के यहाँ भेज दिया है।”
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी कातर दृष्टि- sneaky glance |
व्याख्या:
कुछ नौजवान ड्राइवर को पकड़कर उसे मारने-पीटने की धमकी दे रहे थे। ड्राइवर डर के मारे घबराया हुआ था और मदद के लिए लेखक की ओर कातर दृष्टि से देख रहा था। उसने मदद की गुहार लगाई और कहा कि वह यात्रियों को सुरक्षित ले जाने के बारे में उपाय कर रहा है और उसे बचाया जाए।
लेखक ने सहयात्रियों को समझाया कि ड्रायवर को मारना सही नहीं है, लेकिन यात्री इतना घबराए हुए थे कि उन्होंने लेखक की बात मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ड्राइवर धोखा दे रहा है और वह कंडक्टर को पहले ही डाकुओं के पास भेजा जा चुका है।
गद्यांश
मैं भी बहुत भयभीत था पर ड्राइवर को किसी तरह मार-पीट से बचाया। डेढ़-दो घंटे बीत गए। मेरे बच्चे भोजन और पानी के लिए व्याकुल थे। मेरी और पत्नी की हालत बुरी थी। लोगों ने ड्राइवर को मारा तो नहीं पर उसे बस से उतारकर एक जगह घेरकर रखा। कोई भी दुर्घटना होती है तो पहले ड्रावइर को समाप्त कर देना उन्हें उचित जान पड़ा। मेरे गिड़गिड़ाने का कोई विशेष असर नहीं पड़ा। इसी समय क्या देखता हूँ कि एक खाली बस चली आ रही है और उस पर हमारा बस कंडक्टर भी बैठा हुआ है। उसने आते ही कहा, “अड्डे से नई बस लाया हूँ, इस बस पर बैठिए। वह बस चलाने लायक नहीं है।” फिर मेरे पास एक लोटे में पानी और थोड़ा दूध लेकर आया और बोला, “पडित जी ! बच्चों का रोना मुझसे देखा नहीं गया। वहीं दूध मिल गया, थोड़ा लेता आया।” यात्रियों में फिर जान आई। सबने उसे धन्यवाद दिया। ड्राइवर से माफ़ी माँगी और बारह बजे से पहले ही सब लोग बस अड्डे पहुँच गए।

Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
लेखक खुद भी बहुत भयभीत था, लेकिन उसने ड्राइवर को बचाने का प्रयास किया। ड्राइवर को मार-पीट से तो बचा लिया गया, लेकिन यात्रियों ने उसे बस से उतारकर एक जगह पर घेर लिया। इसकी वजह यह थी कि यात्री स्वयं को सुरक्षित रखना चाहते थे। उनका विचार था कि यदि जरा भी गड़बड़ होती है तो पहले ड्राइवर को मार देंगे। भय के कारण यात्री उसे पहले ही दंडित करने के लिए तैयार थे।
इसी बीच, एक नई खाली बस आई जिसमें लेखक की बस का कंडक्टर भी था। कंडक्टर ने बताया कि नई बस लाया है,क्योंकि पुरानी बस चलाने लायक नहीं है। वह लेखक के बच्चों के लिए पानी और दूध भी लाया, क्योंकि उसने देखा था कि बच्चे भूखे और प्यासे थे। यात्रियों को यह देखकर राहत मिली और उन्होंने कंडक्टर को धन्यवाद दिया और ड्राइवर से माफी माँगी। इसके बाद, सभी लोग रात 12 बजे से पहले बस अड्डे पहुँच गए।

गद्यांश
कैसे कहूँ कि मनुष्यता एकदम समाप्त हो गई! कैसे कहूँ कि लोगों में दया-माया रह ही नहीं गई! जीवन में जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिन्हें मैं भूल नहीं सकता। ठगा भी गया हूँ, धोखा भी खाया है, परंतु बहुत कम स्थलों पर विश्वासघात नाम की चीज मिलती है। केवल उन्हीं बातों का हिसाब रखो, जिनमें धोखा खाया है तो जीवन कष्टकर हो जाएगा, परंतु ऐसी घटनाएँ भी बहुत कम नहीं हैं जब लोगों ने अकारण सहायता की है, निराश मन को ढाँढ़स दिया है और हिम्मत बँधाई है। कविवर रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने प्रार्थना गीत में भगवान से प्रार्थना की थी कि संसार में केवल नुकसान ही उठाना पड़े, धोखा ही खाना पड़े तो ऐसे अवसरों पर भी हे प्रभो! मुझे ऐसी शक्ति दो कि मैं तुम्हारे ऊपर संदेह न करूँ।
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
लेखक ने एक गहरी भावना व्यक्त की है कि उनका मन यह स्वीकार नहीं करता कि लोगों में मनुष्यता और दयालुता की भावनाएँ कम हो गई है, यद्यपि जीवन में कई बार धोखा और ठगा गया है।लेखक ने स्वीकार किया है कि विश्वासघात की घटनाएँ कम ही मिलती हैं, लेकिन वे भी होती हैं। लेखक यह भी मानते हैं कि जीवन में केवल धोखा और कष्ट ही नहीं होते; कई बार लोग बिना किसी वजह के मदद भी करते हैं, निराश मन को सहारा देते हैं, और हिम्मत बढ़ाते हैं। लेखक ,रवींद्रनाथ ठाकुर के एक प्रार्थना गीत का उदाहरण हैं । रवींद्रनाथ ठाकुर ने भगवान से कि भगवान से यह प्रार्थना की थी कि अगर जीवन में केवल नुकसान और धोखा ही मिलें, तो भी हमें इतनी शक्ति दें कि हम भगवान पर संदेह न करें।
गद्यांश में, लेखक यह संदेश देना चाहते हैं कि जीवन में हर स्थिति का सामना हिम्मत और विश्वास के साथ करना चाहिए, और विश्वासघात और धोखे के बावजूद अच्छाई और मदद की उम्मीद बनाए रखनी चाहिए।
गद्यांश
मनुष्य की बनाई विधियाँ गलत नतीजे तक पहुँच रही हैं तो इन्हें बदलना होगा। वस्तुतः आए दिन इन्हें बदला ही जा रहा है, लेकिन अब भी आशा की ज्योति बुझी नहीं है। महान भारतवर्ष को पाने की संभावना बनी हुई है, बनी रहेगी।
मेरे मन! निराश होने की जरूरत नहीं है।
Difficult words :
| तय किया-fixed/ decided हाज़िर होना- to attend डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी |
व्याख्या:
लेखक ईश्वर के बनाए विधान पर भरोसा व्यक्त करते हैं और मानते हैं कि मनुष्य के बनाये नियम गलत भी हो सकते हैं।जरूरत पड़ने में इन्हें बदलना चाहिए , लेकिन अभी भी उम्मीद खत्म नहीं हुई है। और बदला भी जा रहा है । अंत में, लेखक अपने मन को यह संदेश दे रहे हैं कि निराश होने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि भारत के महान भविष्य की संभावना अभी भी बनी हुई है और हमेशा बनी रहेगी। आशा की किरण अभी भी मौजूद है।
लेखक: हजारी प्रसाद द्विवेदी
‘क्या निराश हुआ जाए’ पाठ का सारांश
प्रस्तुत पाठ में केखक हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी ने वर्तमान में समाज के गिरते हुए मूल्यों पर चर्चा करते हुए चिंता व्यक्त की है। पाठ में विभिन्न तथ्यों पर विवेचना करते हुए लेखक ने बताया है कि यद्यपि समाज के नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है किंतु वे पूरी तरह नष्ट नहीं हुई हैं । यह सही है कि आजकल ईमानदारी से मेहनत करके जीविका चलानेवाले निरीह और भोले-भाले श्रमजीवी पिस रहे हैं और झूठ तथा फ़रेब का रोजगार करनेवाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है, सचाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। ऐसी स्थिति में जीवन के महान मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था ही हिलने लगी है। लेकिन आज भी सत्य, अहिंसा , अस्तेय और ईमानदारी के प्रति लोगों में सम्मान है और छल, कपट, निंदा और भ्रष्टाचार के प्रति आक्रोश और अनादर है। लेखक ने अपने जीवन के अनुभव भी बताए हैं । वे कई बार छले गए और धोखा खाया । किंतु रेलगाडी में सफ़र करते हुए ईमानदार टिकट बाबू और रात के समय बस के खराब होने पर कडक्टर के द्वारा दिखाई गई सुहृदयता के कृत्य जैसे अनुभव लेखक के मन में भलाई, परोपकार, ईमानदारी आदि के प्रति विश्वास को मज़बूत करते हैं और वे अनुभव करते हैं कि अभी निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
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I . प्रश्न -उत्तर
प्रश्न1.लेखक ने स्वीकार किया है कि लोगों ने उन्हें धोखा दिया है फिर भी वह निराश नहीं है। आपके विचार से इस बात का क्या कारण हो सकता है?
उत्तर: लेखक ने यह स्वीकार किया है कि लोगों ने उन्हें धोखा दिया है फिर भी वह निराश नहीं है, इसका कारण यह है कि लेखक आशावादी हैं । उनके लिए वे घटनाएँ अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, जिनमें दूसरों ने उनकी अकारण सहायता की अथवा ईमानदारी दिखाई। ऐसा इसलिए , क्योंकि लेखक का मानना है कि मानवीय गुणों को दिखाने वाली ये घटनाएँ साबित करती हैं कि अभी भी सेवा, ईमानदारी, सचाई और आध्यात्मिकता को पोषित करने वाले हमारे आदर्श और उत्तम मूल्य जीवित हैं। वे भले ही कम हो गए हों, किंतु पूरी तरह नष्ट नहीं हुए हैं। अतः अब भी यह गुंजाइश भी है कि हम अपने सपनों का भारत को वापिस पा सकते हैं।
प्रश्न 2: समाचार-पत्रों ,पत्रिकाओं और टेलीविज़न पर आपने ऐसी अनेक घटनाएँ देखी-सुनी होंगी जिनमें लोगों ने बिना किसी लालच के दूसरों की सहायता की हो या ईमानदारी से काम किया हो। ऐसे समाचार तथा लेख एकत्रित करें और कम-से-कम दो घटनाओं पर अपनी टिप्पणी लिखें।
उत्तर : नीचे दो समाचार पत्रों के नमूने दिए गए हैं जिनमें ईमानदारी और नैतिकता के जीवित होने की घटना का उल्लेख किया गया है।


उपरोक्त समाचारों के आधार पर टिप्पणी:
SAMPLE 1 यह घटना ईमानदारी और मानवता का एक बेहतरीन उदाहरण है। आज के समय में जहां थोड़े से पैसों के लिए रिश्तों में दरार आ रही है, वहीं ¨रपी फौगाट जैसे लोग समाज में सच्चाई और भरोसे की मिसाल कायम कर रहे हैं। उन्होंने न सिर्फ गुम हुए पर्स को उसके असली मालिक तक पहुँचाया, बल्कि अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए ईमानदारी का परिचय दिया। लक्खी राम का पर्स और महत्वपूर्ण दस्तावेज अगर गलत हाथों में चले जाते, तो उनके दुरुपयोग की संभावना थी। ऐसे लोगों की वजह से ही आज भी समाज में ईमानदारी और नैतिकता जीवित हैं।
SAMPLE2: अनुज की इस ईमानदारी की घटना समाज के लिए प्रेरणादायक है। 15 वर्षीय बालक को सड़क पर रुपए से भरा पर्स मिला, लेकिन उसने बिना लालच के उसे लौटाने का फैसला किया। अनुज ने न केवल पर्स के मालिक का पता लगाया, बल्कि अपने नाना की मदद से पर्स को सही व्यक्ति तक पहुँचाया। आज के समय में जब लोग थोड़े से पैसे के लिए गलत रास्ता चुन लेते हैं, अनुज की यह ईमानदारी हमें सिखाती है कि नैतिकता और सच्चाई को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए। ऐसी घटनाएँ समाज में विश्वास और ईमानदारी की भावना को जीवित रखती हैं।
पर्दाफ़ाश
प्रश्न 2: दोषों का पर्दाफ़ाश करना कब बुरा रूप ले सकता है?
उत्तर: दोषों का पर्दाफ़ाश करना तब बुरा रूप ले सकता है जब हम किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करके उसमें रस लेते है या जब हम दोषों का पर्दाफ़ाश करना ही अपना कर्तव्य मान लेते हैं उनके निराकरण के कोई उपाय नहीं सुझाते। जब दोषों का पर्दाफ़ाश करने का उद्देश्य उस व्यक्ति को सही मार्ग पर लाने की अपेक्षा, उसे अपमानित हो तो दोषों का पर्दाफ़ाश करना बुरा रूप ले सकता है।
प्रश्न 4:आजकल के बहुत से समाचार पत्र या समाचार चैनल ‘दोषों का पर्दाफ़ाश’ कर रहे हैं। इस प्रकार के समाचारों और कार्यक्रमों की सार्थकता पर तर्क सहित विचार लिखिए?
उत्तर: समाचार पत्र या समाचार चैनल द्वारा ‘दोषों का पर्दाफ़ाश’ कर से जनता समाज में व्याप्त बुराईयों से, अपने आस-पास के वातावरण तथा लोगों से गलत गतिविधियों से अवगत हो जाते हैं और इसके कारण समाज में जागरूकता भी आती है साथ ही समाज समय रहते ही सचेत और सावधान हो जाता हैं। समाचार पत्र या समाचार चैनल ‘दोषों का पर्दाफ़ाश’ कर ही समाज को बुराइयों, भ्रष्टाचार और अनैतिक आचरण से बचाते हैं। साथ ही समाज में उन तत्वों की प्रतिष्ठा कम कराते हैं, जो गलत तरीके से धन या मान संग्रह करना चाहते हैं। समाज में नैतिक मूल्य यथा- ईमानदारी, सेवा, सचाई और आध्यात्मिकता के मूल्य बनाए रखने में सहायता मिलती है।
कारण बताइए-
निम्नलिखित के संभावित परिणाम क्या-क्या हो सकते हैं? आपस में चर्चा कीजिए, जैसे – ”ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है।” परिणाम-भ्रष्टाचार बढ़ेगा।
1. ”सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है।” …..
उत्तर:” परिणाम – बेईमानी बढ़ेगी
2. ”झूठ और फरेब का रोज़गार करनेवाले फल-फूल रहे हैं।” …..
उत्तर: परिणाम – धोखेबाज़ी बढ़ेगी।
3. ”हर आदमी दोषी अधिक दिख रहा है, गुणी कम।” …..
उत्तर: परिणाम- अविश्वास और संदेह बढ़ेगा ।
दो लेखक और बस की यात्रा:
आपने इस लेख में एक बस की यात्रा के बारे में पढ़ा । इससे पहले भी आप एक बस यात्रा के बारे में पढ़ चुके हैं । यदि दोनों बस- यात्राओं के लेखक आपस में मिलते तो एक-दूसरे को कौन-कौन सी बातें बताते? अपनी कल्पना के अनुसार उनकी बातचीत लिखिए-
यहाँ पर हम कल्पना करते हैं कि पाठ ’बस की यात्रा’ के लेखक ”हरिशंकर परसाईं ” और ’क्या निराश हुआ जाए’ पाठ के लेखक ” हजारी प्रसाद द्विवेदी’ आपस में मिल कर अपनी-अपनी बस यात्राओं का अनुभव साँझा करते तो वे संभवतः इस प्रकार बात-चीत करते।
हरिशंकर परसाईं: नमस्ते द्विवेदी जी ! कैसे हैं आप ? कुछ परेशान से लग रहे हैं?
हजारी प्रसाद द्विवेदी: नमस्ते परसाईं जी! बिल्कुल ठीक कहा। थोड़ा थका हुआ हूँ और थोड़ा परेशान भी । मुझे लगता है कि इस देश का कुछ नही होना। हम आज भी पिछली सदी में ही जी रहे हैं ।
हरि: आखिर हुआ क्या है? इतने निराश होना अच्छी बात नहीं ! कृपया बताएँ समस्या क्या है?
हजारी : क्या बताऊँ द्विवेदी जी ! कल ही वापस आया हूँ । जिस बस से वापस आया था वह बीच रास्ते में ही खराब हो गई। पहले ही एक खटारा बस को चलाने का परमिट मिला हुआ है। कंपनी के मालिक थोड़े से रुपए बचाने के लिए लोगों की जिंदगी दाँव पर रखे हुए हैं और बस की मरम्मत नहीं कराते।
हरि: ओह! फ़िर तो आपको बस में काफ़ी समस्या आ रही होगी।
हजारी : जी बिलकुल! बस में बैठने पर मालूम होता था कि मानो इंजन में ही बैठे हों। बस का पुर्जा-पुर्जा हिल रहा था । अंत में बस खराब ही हो गई और हमने कहीं भी पहुँचने की आशा ही छोड़ दी थी। रात के समय अगर रास्ते में बस खराब हो जाए तो परे्शानी ही परेशानी है।
हरि: ठीक कह रहे हैं आप। ऐसा ही कुछ अनुभव मेरा भी हुआ। पत्नी और बच्चों के साथ रात के समय बस से यात्रा कर रहा था कि बस खराब हो गई। बच्चे पानी के लिए चिल्ला रहे थे। तभी बस का कंडक्टर सायकल ले कर निकल गया।
हजारी : ओह! फ़िर तो बहुत समस्या हुई होगी?

हरि: हाँ जी! ऊपर से सभी लोगों ने बताया कि दो दिन पहले ऐसे ही वीरान जगह पर एक बस लूट ली गई थी । लोगों को अनुमान था कि कंडक्टर सायकल ले कर डकैतों को बुलाने गया होगा। इसलिये वे ड्रायवर को मारने वाले थे , बड़ी मुश्किल से उसे बचाया।
हजारी : अच्छा! फिर क्या हुआ।
हरि: हाँ तभी कंडक्टर बस अड्डे से नई बस ले आया साथ ही बच्चों के लिए दूध और पानी भी। उसकी सुहृदयता से मन भर आया। मुझे अनुभव हुआ कि दुनिया इतनी बुरी भी नहीं है। समस्याएँ तो हैं किंतु सच्चाई , परोपकार की भावनाएँ और ईमानदारी की भावनाएँ अभी मरी नहीं हैं। अभी निराश होने की आवश्यकता नहीं।
हजारी : शायद आप ठीक कहते हैं। हमें सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए।
सार्थक शीर्षक
1.लेखक ने लेख का शीर्षक ‘क्या निराश हुआ जाए’ क्यों रखा होगा? क्या आप इससे भी बेहतर शीर्षक सुझा सकते हैं?
उत्तर: लेखक ने इस पाठ में अच्छी और बुरी घटनाओं पर चर्चा करते हुए प्रश्नात्मक शीर्षक रखा है “क्या निराश हुआ जाए?” पाठ के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यह शीर्षक बहुत ही सटीक और सार्थक है। यह पाठ के भाव को स्पष्ट करते हुए अपने आप में एक उत्तर भी प्रकट करता है और पाठक को सोचने में मज़बूर कर देता है। मैं इस शीर्षक से पूरी तरह सहमत हूँ लेकिन फिर भी यदि कोई अन्य शीर्षक चुनना पड़े तो प्रस्तुत पाठ के निम्नलिखित शीर्षक हो सकते हैं-
1. वर्तमान समय में भारतीय मूल्य 2. उम्मीद की किरण अभी बाकी है।3. मेरे मन निराश न हो 4. सकारात्मकता 5. बुराई और भलाई 6. मूल्यों का विघटन और भविष्य आदि ।
2.यदि ‘क्या निराश हुआ जाए’ के बाद कोई विराम चिह्न लगाने के लिए कहा जाए तो आप दिए गए चिह्मेंनों में से कौन-सा चिह्न लगाएँगे? अपने चुनाव का कारण भी बताइए।-,।, !,?,;-, …. ।
उत्तर: उपरोक्त में से हम प्रश्न सूचक चिह्न (?) लगाएंगे क्योंकि शीर्षक प्रश्नात्मक ही है।
”आदर्शों की बातें करना तो बहुत आसान है पर उन पर चलना बहुत कठिन है।” क्या आप इस बात से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर: ”आदर्शों की बातें करना तो बहुत आसान है पर उन पर चलना बहुत कठिन है।” – हम इस कथन से सहमत है क्योंकि व्यक्ति जब आदर्शों के मार्ग पर चलता है तब उसे कई परेशानियों और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है | आदर्श अर्थात अच्छे विचार या मूल्य। जैसे – सच बोलना, धोखा न देना, अपशब्दों का प्रयोग न करना आदि। किन्तु जीवन में छोटी सी परेशानी अथवा कठिनाई के आने पर हम आदर्शो को भूल जाते हैं और सरलता से मिलने वाले समाधान की ओर आकर्षित हो जाते हैं। इस प्रकार आदर्श की बातें सिर्फ़ किताबों या उपदेशों तक सीमित रह जाती हैं व्यवहारिक नहीं हो पाती। कई बार विपरीत स्थितियों में उच्च आदर्श वाले व्यक्ति को समाज विरोधी तत्वों का भी सामना करना पड़ता है और मानसिक कष्ट भी झेलना पड़ सकता है।
भाषा की बात
1. दो शब्दों के मिलने से समास बनता है। समास का एक प्रकार है – द्वंद्व समास । इसमें दोनों शब्द प्रधान होते हैं। जब दोनों भाग प्रधान होंगे तो एक-दूसरे में द्वंद्व (स्पर्धा, होड़) की संभावना होती है। कोई किसी से पीछे रहना नहीं चाहता, जैसे – चरम और परम = चरम-परम, भीरु और बेबस = भीरू-बेबस। दिन और रात = दिन-रात।
‘और’ के साथ आए शब्दों के जोड़े को ‘और’ हटाकर (-) योजक चिह्न भी लगाया जाता है। कभी-कभी एक साथ भी लिखा जाता है। द्वंद्व समास के बारह उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर: द्वंद्व समास के उदाहरण –
| कायदे और क़ानून | कायदे – क़ानून |
| पाप और पुण्य | पाप – पुण्य |
| लेन और देन | लेन – देन |
| आना और जाना | आना – जाना |
| लोभ और मोह | लोभ – मोह |
| स्त्री और पुरुष | स्त्री – पुरुष |
| दया और माया | दया – माया |
| आरोप और प्रत्यारोप | आरोप – प्रत्यारोप |
| भोजन और पानी | भोजन – पानी |
| सच्चाई और ईमानदारी | सच्चाई – ईमानदारी |
| गुण और दोष | गुण – दोष |
| झूठ और फरेब | झूठ – फरेब |
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