हरिहर काका (संचयन) पाठ १
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लेखक परिचय :

“हरिहर काका” पाठ के लेखक मिथिलेश्वर हैं । इनका जन्म 31दिसंबर 1950 को बिहार के भोजपुर जिले के वैसाडीह गाँव में हुआ । इन्होंने हिंदी में एम.ए. और पीएच.डी. की थी । शिक्षण को इन्होंने अपनी आजीविका बनाया और पहले राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी प्राचार्य और बाद में आरा विश्वविद्यालय के रीडर के रूप में भी कार्यरत रहे।
मिथिलेश्वर के साहित्य में ग्रामीण जीवन का सुंदर चित्रण हुआ है । ग्रामीण जीवन की समस्याओं और अंतर्विरोधों को उन्होंने अपने साहित्य का मुख्य विषय बनाया था। ग्रामीन साहित्य लेखन में प्रेमचंद और फणीश्वर नाथ रेणु के बाद मिथिलेश्वर का नाम ही सर्वोपरि है । मिथिलेश्वर ने आजादी के बाद के ग्रामीण जीवन की जटिलताएँ , शोषण के नए तरीके पए प्रकाश डाला है ।
बाबूजी , मेघना का निर्णय, हरिहर काका ,चल खुसरो घर आपने , तिरिया जनम ,विग्रह बाबू आदि इनके प्रमुख कहानी संग्रह रहे । झुनिया, युद्धस्थल, प्रेम न बाड़ी ऊपजे और अंत नही इनके प्रमुख उपन्यास हैं । उस रात की बात , गाँव के लोग ,एक था पंकज इनके द्वारा रचित प्रसिद्ध बाल साहित्य है।
मिथिलेश्वर जन लेखक हैं और इसलिए साधारण बोलचाल की शैली में लिखा सरल और सहज साहित्य इनकी विशेषता है । अपने लेखन के लिए इन्हें सोवियत लैंड पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार , अखिल भारतीय पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कारों से मिथिलेश्वर का सम्मान किया गया है।
पाठ का सारांश
“हरिहर काका’ मिथिलेश्वर द्वारा रचित ग्रामीण जीवन पर आधारित एक कहानी है । कहानी के नायक हरिहर काका के माध्यम से लेखक ने बुढ़ापे में अकेले जीवन यापन करने वाले उन अनेकों लोगों की पीड़ा को दर्शाया है , जो आर्थिक रूप से सक्षम होने पर भी समाज में शोषित हैं । समाज के उस विकृत चेहरे को भी सामने लाने की कोशिश की है जो सामने अपनेपन और धार्मिकता का मुखौटा पहने रहते हैं किंतु उनका मुख्य उद्देश्य लोगों का आर्थिक व मानसिक शोषण ही है ।
कहानीकार मिथिलेश्वर ने कहानी की शुरूवात आत्मकथ्यात्मक रूप से करते हुए बताया है कि कहानी का नायक हरिहर काका उनके पड़ोसी हैं जो बहुत सरल हृदय व्यक्ति हैं । लेखक उनके साथ अपने निजी संबंध , उनसे मुलाकात और उन पर बीती यंत्रणा का परिचय देते हुए लेखक ने हरिहर काका की वह स्थिति दर्शाई है जहाँ वे समाज का भयावह स्वरूप देखकर जड़ समान स्तब्ध रह गए थे।
आरा शहर के पास बसे अपने गाँव का परिचय देते हुए लेखक वहाँ की ठाकुरबारी के बारे में बताते हैं । किसी समय एक झोपड़ी से शुरु हुई यह ठाकुरबारी आज आस-पास के सभी ठाकुरबारियों से बड़ी है तथा बीस बीघा जमीन इसके नाम है जो कि गाँव के लोगों ने विभिन्न अवसरों पर स्वेच्छा से दान की है । ठाकुरबारी में निरंतर भजन कीर्तन होते हैं । लोगों के हृदय में भक्ति भावना का प्रसार करते हुए यह ठाकुर बारी बाढ़ या सूखे के अवसर पर गाँव वालों के लिए भंडारे का भी इंतज़ाम करती है । इसी कारण लोगों में ठाकुरबारी के प्रति बहुत श्रद्धा है । वे अपने सभी सुख-दुख के अवसरों पर ठाकुर बारी में दान-पुण्य करते हैं और अकसर वहाँ जाते हैं ।
हरिहर काका गाँव एक निःसंतान व्यक्ति अपनी दूसरी पत्नी की मृत्यु के बाद अपने भाइयों के साथ रहने लगते हैं । उनकी 15 बीघा जमीन का अनाज भी परिवार में ही आ रहा था किंतु फ़िर भी घर की महिलाएँ उनकी उपेक्षा करती हैं । जिससे आहत हो एक दिन वे खाने की थाली फेक देते हैं और वहाँ मौजूद स्त्रियों को खूब खरी-खोटी सुनाते हैं । इस घटना को मंदिर का पुजारी देख लेता है और महंत जी को बता देता है । महंत जी तुरंत हरिहर काका को ठाकुर बारी ले आते हैं । उनकी खूब सेवा होती है । अच्छा भोजन खिलाया जाता है । महंत जी हरिहर काका को उनके हिस्से की पंद्रह बीघा जमीन ठाकुरबारी के नाम लिख देने को कहते हैं । वे उन्हें जीवन भर अच्छी देखभाल और अच्छे भोजन का आश्वासन देते हैं । साथ ही भूमिदान के प्रतिफल लोक-परलोक में यश और बैकुंठ प्राप्ति का प्रलोभन देते हैं । यद्यपि हरिहर काका उनकी बातों से प्रभावित होते हैं किंतु भाइयों के प्रति उनके मन में व्याप्त मोह के कारण वे इतनी जल्दी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थे । इधर भाइयों को भी अपनी गलती का अहसास होता है और वे माफ़ी माँग कर हरिहर काका को घर वापस ले जाते हैं जहाँ अब उनकी खूब अच्छी देखरेख होती है ।
हरिहर काका इस परिवर्तन का कारण समझ रहे होते हैं ।लेकिन वे इस अवस्था का आनंद लेते हैं । इस विषय पर हरिहर काका ने बहुत सोचा और अंत में इस परिणाम पर पहुंचे कि अपने जीते-जी अपनी जायदाद का स्वामी किसी और को बनाना ठीक नहीं होगा। फिर चाहे वह अपना भाई हो या मंदिर का महंत। क्योंकि उन्हें अपने गाँव और इलाके के वे कुछ लोग याद आए, जिन्होंने अपनी जिंदगी में ही अपनी जायदाद को अपने रिश्तेदारों या किसी और के नाम लिखवा दिया था। उनका जीवन बाद में किसी कुत्ते की तरह हो गया था, उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं था। हरिहर काका बिलकुल भी पढ़े-लिखे नहीं थे, परन्तु उन्हें अपने जीवन में एकदम हुए बदलाव को समझने में कोई गलती नहीं हुई और उन्होंने फैसला कर लिया कि वे जीते-जी किसी को भी अपनी जमीन नहीं लिखेंगे।महंत जी भी कई बार हरिहर काका को जमीन ठाकुरबारी के नाम लिखने को कहते हैं किंतु वे स्पष्ट उत्तर नहीं देते । इधर किसी अज्ञात आशंका के डर से भाई भी हरिहर काका को जमीन भतीजों के नाम लिखवा देने के लिए जोर देने लगे थे । गाँव में लोगों के बीच इस विषय पर हर दिन चर्चाएँ चलने लगी थी ।महंत जी को भी हरिहर के माया-मोह में फ़ँस जाने का डर था । उन्हें लग रहा था मानो जाल में फँसीं चिड़िया पकड़ से बाहर हो गई हो । अतः उन्होंने हरिहर का अपहरण कर जबरदस्ती उनकी जमीन ठाकुरबारी के नाम लिखवाने का निर्णय लिया ।
एक रात घर जब घर के दालान पर हरिहर काका सो रहे थे तो ठाकुरबारी के कुछ लोग भाला , गंडास, बंदूक आदि से लैस होकर वहाँ आये और हरिहर काका को पीठ में लादकर चंपत हो गए । इस अप्रत्याशित घटना के बारे में परिवार के कुछ लोगों ने कभी सोचा न था अतः वे कुछ जवाबी कर्यवाही न कर सके । गाँव के सभी लोगों के साथ जब वे ठाकुरबारी की ओर गए तो वहाँ हमेशा की तरह शांति नज़र आई । लोगों को लगा कि यह डाकुओं का काम है किंतु इसी वक्त ठाकुरबारी की ओर से कुछ आवाजें आई । जब लोग ठाकुरबारी का दरवाजा पीटने लगे तो उसी समय ठाकुरबारी की छत से पत्थर और रोदए गिरने लगे और फ़ायरिंग शुरु हो गई । एक नौजवान लड़का घायल हो गया । यह देखकर गाँव वाले भाग गए । हरिहर काका के भाई र पुलिस को बुलाने चले गए ।
इधर ठाकुरबारी के भीतर महंत और उनके विश्वस्त संत अनपढ़ हरिहर काका से जबरन अँगूठे के निशान ले रहे थे । महंत का यह घृणित चेहरा देखकर हरिहर काका के मन से उनके प्रति सब सम्मान और आदर खत्म हो गया । महंत की तुलना में उन्हें अपने भाई ज्यादा नेक और पवित्र लगने लगे । इधर पुलिस साथ लेकर जब हरिहर काका के भाई ठाकुरबारी के भीतर पहुँचे तो वहाँ एक अत्यधिक वृद्ध साधु के अलावा कोई भी न मिला ।सब तरफ़ जाँच करने के बाद जब वह लौट रहे थे तो उन्होंने एक कमरे से आवाजें आती सुनी । ताला तोड़कर जब भीतर देखा तो हरिहर काका को कमरे में हाथ और पाँव बाँध कर रखा था और साथ ही साथ उनके मुँह में कपड़ा ठूँसा गया था ताकि वे आवाज़ न कर सकें। परन्तु हरिहर काका दरवाज़े तक लुढ़कते हुए आ गए थे और दरवाज़े पर अपने पैरों से धक्का लगा रहे थे ताकि बाहर खड़े उनके भाई और पुलिस उन्हें बचा सकें।हरिहर काका ने पुलिस को बताया कि वे लोग उन्हें उस कमरे में इस तरह बाँध कर कही गुप्त दरवाज़े से भाग गए हैं और उन्होंने कुछ खली और कुछ लिखे हुए कागजों पर हरिहर काका के अँगूठे के निशान जबरदस्ती लिए हैं।
इस घटना के बीत जाने के बाद हरिहर काका फिर से अपने भाइयों के परिवार के साथ रहने लग गए थे। उनकी सुरक्षा के लिए वौबीसों घंटे पहरे दिए जाने लगे। अगर हरिहर काका किसी काम के कारण गाँव में जाते तो हथियारों से लैस चार-पाँच लोग हमेशा ही उनके साथ रहते । इन सब घटनाओं ने हरिहर काका को एक सीधे-सादे और भोले किसान की तुलना में चालाक और बुद्धिमान बना दिया। उन्हें अब स्पष्ट समझ में आ गया था कि उनके भाइयों का अचानक से उनके प्रति जो व्यवहार परिवर्तन हो गया था, और जो आदर-सम्मान और सुरक्षा वे प्रदान कर रहे थे, उसके पीछे सगे भाइयों का प्यार न होकर उनकी जमीन हड़प लेने की इच्छा थी । अन्यथा तो वे हरिहर काका को पूछते तक नहीं। अपहरण की इस घटना के बाद से ही हरिहर काका के भाई और उनके दूसरे नाते-रिश्तेदार हरिहर काका को क़ानूनी तरीके से उनकी जायदाद को उनके भतीजों के नाम कर देने के लिए जोर देने लगे । उनके अनुसार यदि हरिहर काका ऐसा नहीं करेंगे तो महंत की गिद्ध दृष्टि उन पर टिकी रहेगी। जब हरिहर काका के भाई हरिहर काका को समझाते-समझाते थक गए, तो उन्होंने हरिहर काका को डाँटना और उन पर दवाब डालना शुरू कर दिया। एक रात हरिहर काका के भाइयों ने भी उसी तरह का व्यवहार करना शुरू कर दिया जैसा महंत और उनके सहयोगियों ने किया था। उन्हें धमकाते हुए कह रहे थे कि ख़ुशी-ख़ुशी कागज़ पर अपने अँगूठे के निशान लगते जाओ, नहीं तो वे उन्हें मार कर वहीँ घर के अंदर ही गाड़ देंगे और गाँव के लोगो को इस बारे में कोई सूचना भी नहीं मिलेगी। हरिहर काका के साथ अब उनके भाइयों की मारपीट शुरू हो गई। जब हरिहर काका अपने भाइयों का मुकाबला नहीं कर पा रहे थे, तो उन्होंने ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर अपनी मदद के लिए गाँव वालों को आवाज लगाना शुरू कर दिया। तब उनके भाइयों को ध्यान आया कि उन्हें हरिहर काका का मुँह पहले ही बंद करना चाहिए था। उन्होंने उसी पल हरिहर काका को जमीन पर पटका और उनके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। लेकिन तब तक बहुत देर हो गई थी, हरिहर काका की आवाजें बाहर गाँव में पहुँच गई थी। हरिहर काका के परिवार और रिश्ते-नाते के लोग जब तक गाँव वालों को समझाते कि यह उनके परिवार का निजी मामला हैऔर गाँव के लोग इससे दूर रहें, तब तक महंत जी बड़ी ही दक्षता और तेज़ी से वहाँ पुलिस की जीप के साथ आ गए। पुलिस ने पुरे घर की अच्छे से तलाशी लेना शुरू कर दिया। फिर घर के अंदर से हरिहर काका को इतनी बुरी हालत में हासिल किया गया जितनी बुरी हालत उनकी ठाकुरबारी में भी नहीं हुई थी। हरिहर काका ने बताया कि उनके भाइयों ने उनके साथ बहुत ही ज्यादा बुरा व्यवहार किया है, जबरदस्ती बहुत से कागजों पर उनके अँगूठे के निशान ले लिए है, उन्हें बहुत ज्यादा मारा-पीटा है।
इसी बीच गाँव का एक नेता हरिहर काका को उनकी जमीन पर हरिहर उच्च विद्यालय बनाने की सलाह देता है । जिससे गाँव के बच्चों को शिक्षा मिले और उनकी जमीन का सही उपयोग हो । इसके साथ हीइस काम से हरिहर काका का नाम अमर हो जाने की बात कहता है । किंतु अब इन सब घटनाओं के कारण हरिहर काका इन बातों से विरक्त हो गए थे और उन पर इन बातों का कोई असर न हुआ ।
इस घटना के बाद हरिहर काका अपने परिवार से एकदम अलग रहने लगे थे। उन्हें उनकी सुरक्षा के लिए चार राइफलधारी पुलिस के जवान मिले थे। आश्चर्य की बात तो यह है कि उनकी सुरक्षा के उनके भाइयों और महंत की ओर से काफ़ी प्रयास किए गए थे। अब हरिहर काका पूरी तरह मौन हो चुके थे और उनकी सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मी हरिहर काका के खर्च पर मौज कर रहे थे।
बोध-प्रश्न
प्रश्न 1 – कथावाचक और हरिहर काका के बीच क्या सम्बन्ध है और इसके क्या कारण है?
उत्तर – हरिहर काका लेखक के पड़ोसी थे । वे लेखक को बचपन से ही बहुत ज्यादा प्यार करते थे। वे लेखक को अपने कंधे पर बैठा कर घुमाया करते थे।हरिहर काका लेखक से एक पिता के प्यार से भी अधिक प्यार करते थे । लेखक के वयस्क और थोड़ा समझदार होने पर उसकी पहली दोस्ती भी हरिहर काका के साथ ही हुई थी। उससे पहले हरिहर काका की गाँव में किसी से इतनी गहरी दोस्ती नहीं हुई थी।ऐसा लगता था कि जैसे हरिहर काका ने भी लेखक से दोस्ती करने के लिए इतनी लम्बी उम्र तक इन्तजार किया हो। हरिहर काका लेखक से कभी भी कुछ नहीं छुपाते थे, वे उससे सब कुछ खुल कर कह देते थे। इस तरह हम कह सकते हैं कि लेखक और हरिहर काका का बहुत ही घनिष्ठ सम्बन्ध था।
प्रश्न 2 – हरिहर काका को महंत और अपने भाई एक ही श्रेणी के क्यों लगने लगे?
उत्तर – हरिहर काका एक सरल हृदय व्यक्ति थे वे ठाकुरबारी के महंत के प्रति श्रद्धा और आदर के विचार रखते थे वे अपने भाइयों के परिवार से भी स्नेह रखते थे , इसलिये अपनी दूसरी पत्नी की मृत्यु के बाद वे अपने भाइयों के परिवार के साथ प्रेम पूर्वक रहने लगे, परन्तु वहाँ हरिहर काका को कोई पूछने वाला नहीं था। हरिहर काका के सामने जो कुछ बच जाता था वही परोसा जाता था। बरामदे के कमरे में पड़े हुए हरिहर काका को अपनी जरुरत की हर वस्तु के लिए खुद ही उठना पड़ता।
एक बार अच्छा भोजन न मिलने पर हरिहर काका बहुत नाराज हो गए ।इस बात की खबर मिलते ही मंदिर के महंत उन्हें अपने साथ ठाकुरबारी ले गए। महंत ने हरिहर काका को समझाया कि उनके हिस्से में जितने खेत हैं वे उनको भगवान के नाम लिख दें। ऐसा करने से उन्हें सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होगी। तीनों लोकों में उनकी प्रसिद्धि का ही गुणगान होगा। किंतु हरिहर काका ने भाइयों के प्रति मोह वश ऐसा नहीं किया । इस पर महंत ने हरिहर काका का अपहरण करवा लिया । उन से मारपीट की और सादे और लिखे काग़जों मे उनके अँगूठे के निशान बल पूर्वक ले लिये । इस घटना से महंत का असली चेहरा हरिहर काका के सामने आ गया था। उन्हें महंत अब घृणित, दुराचारी और पापी नज़र आने लगा और उसकी तुलना में अपने भाई पवित्र, और नेक लगने लगे ।
अपहरण की घटना के बाद हरिहर अपने भाइयों की सुरक्षा में रहने लगे , किंतु वे उन पर ज़मीन भतीजों के नाम लिख देने का दबाव बनाने लगे।मना करने पर हरिहर काका के भाइयों ने ज़मीन के काग़जों मे उनके अँगुठे के निशान बल पूर्वक ले लिये ।उनके साथ मारपीट भी की । उनपर जानलेवा हमला भी किया। इन दोनों घटनाओं के कारण हरिहर काका को महंत और अपने भाई एक ही श्रेणी के वहाँ लगने लगे थे।
प्रश्न 3 – ठाकुरबारी के प्रति गाँव वालों के मन में अपार श्रद्धा के जो भाव हैं उससे उनकी किस मनोवृति का पता चलता है?
उत्तर – गाँव के लोगों में- ठाकुरबारी के लिए श्रद्धा का भाव है । लोग ठाकुरबारी से गहराई से जुड़े हैं। गाँव के हर पर्व त्योहार की शुरुवात ठाकुरबारी से होती है। लोग फ़सल आने पर सबसे पहले ठाकुरबारी के लिए अगउम निकालकर ही अनाज घर ले जाते हैं। किसी की मुक़दमे में जीत होती है, तो भगवान को चढ़ावा चढ़ाया जाता है। लड़की की शादी अगर जल्दी तय हो जाती है तो भी माना जाता है कि भगवान से मन्नत माँगने के कारण ऐसा हुआ है। अपनी ख़ुशी से गाँव के लोग भगवान को बहुत कुछ दान में देते हैं, कुछ लोग तो अपने खेत का छोटा-सा भाग भगवान के नाम कर देते हैं। लोग सेवा करने के लिए ठाकुरबारी में काम करते हैं। लोग ठाकुर बारी को पवित्र, निष्कलंक और ज्ञान का प्रतीक मानते हैं। इस प्रकार लोगों के व्यवहार से पता चलता है कि लोग ठाकुरबारी के प्रति भक्ति- भावना , आस्तिकता , प्रेम और विश्वास का भाव रखते हैं इस से गाँव के लोगों की सरल और आस्तिक मनोवृत्ति का पता चलता है।
प्रश्न 4 – अनपढ़ होते हुए भी हरिहर काका दुनिया की बेहतर समझ रखते हैं? कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – जब भाइयों ने हरिहर काका को उनके हिस्से की जमीन को भतीजों के नाम लिखवाने के लिए कहा, तो हरिहर काका बहुत सोचने के बाद अंत में इस परिणाम पर पहुंचे कि अपने जीते-जी अपनी जायदाद का स्वामी किसी और को बनाना ठीक नहीं होगा। फिर चाहे वह अपना भाई हो या मंदिर का महंत। हरिहर काका को अपने गाँव और इलाके के वे कुछ लोग याद आए, जिन्होंने अपनी जिंदगी में ही अपनी जायदाद को अपने रिश्तेदारों या किसी और के नाम लिखवा दिया था। बाद में उनका जीवन किसी कुत्ते की तरह हो गया था। उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं था। हरिहर काका जरा भी पढ़े-लिखे नहीं थे, परन्तु उन्होंने जीवन के अनुभवों से सीख ली थी । अपने जीवन में आए इस बदलाव और उसके कारण को समझने में उन्होंने कोई गलती नहीं की और अपने जीते-जी किसी के भी नाम अपनी जमीन नहीं लिखने फैसला लिया । इससे पता चलता है कि अनपढ़ होते हुए भी हरिहर काका दुनिया की बेहतर समझ रखते थे।
प्रश्न 5 – हरिहर काका को जबरन उठा ले जाने वाले कौन थे? उन्होंने उनके साथ कैसा बर्ताव किया?
उत्तर – हरिहर काका को जबरन उठा ले जाने वाले महंत के आदमी थे। उन्होंने हरिहर काका को ठाकुरबारी के एक कमरे में हाथ – पाँव बाँध कर रखा था । साथ ही उनके मुँह में कपड़ा ठूँसा गया था ताकि वे आवाज़ न कर सकें। उन्होंने हरिहर काका को बुरी तरह मारा -पीटा । हरिहर काका के अँगूठे के निशान कुछ खाली और कुछ लिखे हुए कागजों पर जबरदस्ती ले लिए थे । जब पुलिस और हरिहर काका के भाई उन्हें ढूँढते हुए ठाकुरबारी आए तो महंत के लोग काका को एक कमरे में बाँध कर गुप्त दरवाज़े से कहीं भाग गए ।
प्रश्न 6 – हरिहर काका के मामले में गाँव वालों की क्या राय थी और उसके क्या कारण थे?
उत्तर – हरिहर काका के मामले में गाँव के लोगों की दो तरह की राय बन गई थी। इस बारे में गाँव के लोग दो वर्गों में बाँट गए थे। एक वर्ग चाहता था कि हरिहर काका को अपनी जमीन भगवान के नाम लिख देनी चाहिए। इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। इससे हरिहर काका को कभी न ख़त्म होने वाली प्रसिद्धि प्राप्त होगी ।वहीं दूसरा वर्ग जमीन भाइयों के परिवार के नाम लिख देने का हिमायती था उनकी यह राय थी कि भाई का परिवार भी तो अपना ही परिवार होता है। अपनी जायदाद उन्हें न देना उनके साथ अन्याय करना होगा। खून के रिश्ते के बीच दीवार बन सकती है। ये लोग पारिवारिक संबंधों को अधिक महत्त्व देते थे ।इन लोगों की इस तरह की सोच का कारण यह था कि गाँव के लोग जानते थे कि हरिहर काका के परिवार वाले हरिहर काका का ध्यान नहीं रखते और इसी वजह से महंत जी हरिहर काका को आराम की जिंदगी देने का लालच दे कर जमीन ठाकुरबारी के नाम करवाना चाहते थे।
प्रश्न 7 – कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि लेखक ने यह क्यों कहा, “अज्ञान की स्थिति में ही मनुष्य मृत्यु से डरते हैं। ज्ञान होने के बाद तो आदमी आवश्यकता पड़ने पर मृत्यु को वरन करने के लिए तैयार हो जाता है।“
उत्तर – जब हरिहर काका के भाई हरिहर काका को धमका रहे थे तो वे बिलकुल नहीं डरे, अगर वे हरिहर काका के अपहरण से पहले उन्हें डराते तो शायद वे डर जाते। हरिहर काका समझ गए थे कि जब मनुष्य को ज्ञान नहीं होता तभी वह मृत्यु से डरता है। परन्तु जब मनुष्य को ज्ञान हो जाता है तब वह जरूरत पड़ने पर मृत्यु का सामना करने के लिए भी तैयार हो जाता है। हरिहर काका ने सोच लिया था कि उनके भाई उन्हें एक बार ही मार दें तो सही है, लेकिन वे जमीन उनके नाम लिख कर अपनी पूरी जिंदगी घुट-घुट कर नहीं मरना चाहते, यह उन्हें ठीक नहीं लग रहा था। हरिहर काका को अपने गाँव और इलाके के वे कुछ लोग याद आए, जिन्होंने अपनी जिंदगी में ही अपनी जायदाद को अपने रिश्तेदारों या किसी और के नाम लिखवा दिया था। पहले-पहले तो रिश्तेदार बहुत आदर-सम्मान करते हैं, परन्तु बुढ़ापे में परिवार वालों को दो वक्त का खाना देना भी बुरा लगने लगाता है। बाद में उनका जीवन किसी कुत्ते के जीवन की तरह हो जाता है, उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं होता। हरिहर काका अपनी इस तरह की हालत से अच्छा एक बार ही मर जाना सही समझते थे।हरिहर काका पारिवारिक माया-मोह के अज्ञान से दूर हो गए थे।
प्रश्न 8 – समाज में रिश्तों की क्या अहमियत है? इस विषय पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर – समाज में सुखी जीवन जीने के लिए रिश्तों-नातों का बहुत अधिक महत्त्व है। इन सामाजिक रिश्तों के ताने -बाने में गुँथ कर व्यक्ति अकेलेपन और अवसाद से दूर आनंद भरा जीवन जीता है । मजबूत परिवार व्यवस्था के कारण ही समाज में बच्चे ,बूढे, बीमार, अशक्त, और विकलांग सभी आसानी से जीवन व्यतीत कर पाते हैं । असहाय व्यक्तियों की भी देखभाल हो जाती है । कम सुविधाओं में भी प्रत्येक व्यक्ति परिपूर्ण जीवन जीता है । परन्तु आज के समाज में सभी मानवीय और पारिवारिक मूल्यों और कर्तव्यों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। आज का व्यक्ति स्वार्थी मनोवृति का हो गया है। वह केवल अपने मतलब के लिए ही लोगों से मिलता है। ज्यादातर लोग केवल स्वार्थ के लिए ही रिश्ते निभाते हैं। लालच के वशीभूत ही किसी की सेवा करना चाहते हैं ।आज सामाजिक संबंध व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को देखकर निभाए जाते हैं । एकल परिवारों के कारण वृद्धावस्था में लोगों की देखभाल करने वाला कोई नहीं रह गया है । आज लोग रिश्तों से ज्यादा अहमियत धन-दौलत को दे रहे हैं। रिश्तों में आत्मीयता की बजाय आडंबर ज्यादा हो गया है ।
प्रश्न 9 – यदि आपके पास हरिहर काका जैसी हालत में कोई हो तो आप उसकी किस तरह मदद करेंगे?
उत्तर – यदि हमारे आस-पास हरिहर काका जैसी हालत में कोई व्यक्ति होगा तो हम उसकी मदद करने की पूरी कोशिश करेंगे। हम उनके लिए निम्न प्रकार से मदद करने की कोशिश करेंगे:-
१.आज कल बहुत सी स्वयंसेवी संस्थाएँ हैं जो इस तरह से पीड़ित व्यक्तियों की मदद करती हैं, हम उनसे मदद लेंगे।
२.उस व्यक्ति से खुद भी बात करेंगे और कारण का पता करने की कोशिश करेंगे। हम उस व्यक्ति को ख़ुशी से अपनी बाकी जिंदगी गुजारने के लिए प्रेरित करेंगे और अगर संभव हो तो उसके परिवार वालो से भी बात करके उनके बिगड़े हुए रिश्तों को सुधारने का प्रयास करेंगे।
३.परिवार के सदस्यों को परोक्ष रुप से समझाएंगे कि असहाय व्यक्ति की सेवा करने से उनकी संपत्ति के उत्तराधिकारी वे ही बनेंगे।
४.धूर्त महंत / रिश्तेदार आदि के गलत कृत्य की पुलिस मे रिपोर्ट करेंगे और लोगों को वास्तविक स्थिति की जानकारी देंगे।
५. मीडिया की मदद लेंगे ताकि दोषियों का पर्दाफ़ाश हो और पीड़ित व्यक्ति को मदद मिले।
६. अन्य कोई उपाय न होने पर उस व्यक्ति को वृद्धाश्रम में रहने और सम्मानपूर्ण जीवन जीने की सलाह देंगे।
प्रश्न 10 – हरिहर काका के गाँव में यदि मिडिया की पहुँच होती तो उनकी क्या स्थिति होती? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर – हरिहर काका के गाँव में यदि मिडिया की पहुँच होती तो शायद अलग स्थिति होती । महंत और उसके साथियों की सच्चाई सामने आ जाती । मीडिया हरिहर काका के साथ हुए अत्याचारों को दुनिया के सामने लाती। जिससे दोषियों को सज़ा दिलाने में मदद मिलती। भाइयों के बुरे व्यवहार को भी उजागर किया जा सकता था। ।इसके अतिरिक्त हरिहर काका को समाज की सहानुभुति मिलती और सरकार उनके शेष जीवन के लिए उचित व्यवस्था करने को बाध्य होती । वे लोग जो बेसहारा बुजुर्गों पर अत्याचार करते हैं, उनकी सम्पति को हड़पने के लिए उनके ही लोग स्वार्थ की पराकाष्ठा पार कर देते हैं और यहाँ तक की उन्हें दो वक्त का खाना भी ठीक से नहीं देते । ऐसे लोगों की असहाय अवस्था पर मीडिया जागरूकता फ़ैला कर उनकी मदद कर सकती है ।अत: अनुमान लगाया जा सकता है कि मीडिया की पँहुच होती तो हरिहर काका को इतने कष्ट न झेलने पड़ते ।
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