सपनों के से दिन (संचयन)
लेखक परिचय :

लेखक गुरु दयाल सिंह का जन्म 10 जनवरी 1933 को पंजाब के जैतो कस्बे में एक बढ़ई परिवार में हुआ था । एक साधारण दस्तकार परिवार में जन्मे गुरु दयाल ने जीवन के कठोर अनुभवों के बीच अपनी शिक्षा पूरी की ।1954से लेकर 1970 तक वे स्कूल अध्यापक रहे । बाद में कॉलेज के प्राध्याक हुए और युनीवर्सिटी के पद से अवकाश ग्रहण किया ।16अगस्त 2016 को इनका निधन हो गया ।
गुरदयाल सिंह जी ने अपने लेखन में ग्रामीण परिवेश का वर्णन किया है । मज़दूर वर्ग , खेतिहर मज़दूर , पिछड़े और दलित वर्ग समाज के शॊषित वर्ग के लोग इनके साहित्य के विशेष पात्र हैं । समाज की दूषित व्यवस्था और मानसिकता पर इनकी लेखनी चली है ।इन्होंने अपने साहित्य द्वारा समाज की थोथी व्यवस्था और उसके शिकार लोगों के मनोभावों को सामने लाने का प्रयास किया ।
मढी का दीवा , अथ-चाँदनी रात, पाँचवा पहर , सब देश पराया , साँझ-सबेरे और क्या जानूँ मैं (आत्मकथा) इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं । इन्होंने कुल मिला कर दस कहानी संग्रह, एक नाटक , एक एकांकी संग्रह , बाल-साहित्य की दस पुस्तकें तथा विविद्ज गद्य की दो पुस्तकों की रचना की है ।
इन्हें अपने साहित्य के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार आदि से सम्मानित किया जा चुका है ।
’सपनों के से दिन’ पाठ का सारांश
” सपनों के से दिन ” पाठ में लेखक गुरदयाल सिंह जी ने अपने स्कूली जीवन के कुछ खट्टे-मीठे दिनों को याद किया है ।लेखक और उनके साथ खेलने वाले बच्चों को खेलना बहुत पसंद था ,किंतु खेलने वक्त चोट आदि लगने पर बच्चों को सहानुभूति के स्थान पर मारपीट मिलती थी । बुरी तरह पिटने के बाद भी बच्चे खेलने के लिए अगले दिन फ़िर आ जाते थे। अधिकांश बच्चों के माता-पिता शिक्षा की ओर जागरूक न थे । वे बच्चों को स्कूल भेजना आवश्यक नहीं समझते थे । साथी बच्चे राजस्थान या हरियाणा के गाँवों से आए थे । जिनकी भाषाओं में विविधता थी ।किंतु इस कारण आपसी व्यवहार में कभी बाधा नहीं आई । स्कूली जीवन में लेखक को अपने अध्यापकों द्वारा मारपीट और कठोर अनुशासन का सामना करना पड़ा। यही कारण था कि उनके साथ के अधिकाँश बच्चे अपने बस्ते रास्ते या तालाब में फ़ेंक आए थे और कभी वापस स्कूल नहीं गए । लेखक को भी पढ़ाई करना और स्कूल जाना पसंद नहीं था । नई कक्षा में जाने पर आनंद के स्थान पर उदासी का अनुभव होता था ।
गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर की मधुर यादें और वहाँ मिलने वाला विशेष सत्कार लेखक को आनंद देता था । साथ ही छुट्टियाँ खत्म होने और गृहकार्य पूरा न होने की चिंता सताने लगती। विद्यालय खुलने के दिन निकट आते तो दिन छोटे पड़ने लगते । ऐसे में लेखक को वे साथी याद आते जो छुट्टियों का काम पूरा करने के स्थान पर मार खा लेना सस्ता सौदा समझते थे। इनमें ’ओमा” नाम का एक लड़का भी लेखक को याद आता है जो अपने बड़े सिर और छोटे शरीर के कारण अजीब- सा लगता था । ओमा अपने सिर से दूसरे के पेट या छाती में वार करता था जिससे अच्छे-अच्छे की भी चीख निकल जाती थी । ओमा का नाम दूसरे बच्चों ने रेल बंबा रखा हुआ था ।
लेखक को विद्यालय के पीटी मास्टर प्रीतम चंद याद आते हैं जो बहुत ही कठोर स्वभाव के थे । वे छात्रों को अनुशासन में रख कर परेड करवाते और जरा सी गलती होने पर उनकी खाल खींच देने को तैयार रहते थे । स्कूल में सभी छात्र पीटी साहब से डरते थे । उनके समान सख्त कोई अन्य मास्टर न था । हैड मास्टर साहब बहुत नरम स्वभाव के थे। उनकी मार भी लेखक को मज़ेदार लगती थी ।हैड मास्टर साहब विद्यार्थियों का व्यक्तिगत ध्यान रखते थे । इसलिए गरीब परिवार के बालक गुरुदयाल के लिए वे पुरानी पुस्तकों का इंतजाम स्वयं कर देते थे । यही कारण था कि आर्थिक समस्या वाले परिवार से होने के बावजूद भी लेखक को पढ़ाई में कभी बाधा न आई । हालांकि पढ़ने के लिए मिलने वाली नई कॉपियाँ और पुरानी किताबें लेखक को उदास कर देती थीं । लेखक इसका कारण नई कक्षा की कठिन पढ़ाई और अध्यापकों द्वारा जरा सी गलती पर मारपीट करना और छात्रों से अत्यधिक अपेक्षा रखना बताते थे ।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय लेखक के गाँव में फ़ौज की ओर से कैंप लगते थे और वे लोगों को सेना में भरती होने के लिए विज्ञापन करते थे । जिस से आकर्षित हो कर कई लोग फ़ौज में भरती हो जाते थे । जब सभी बच्चे बिना गलती किए परेड करते तो प्रीतम चंद छात्रों को शाबाशी देते थे । प्रीतम चंद सर से शाबाशी छात्रों को फ़ौज़ के तमगों जैसी लगती थी ।प्रीतम चंद भी छात्रों को शाबाशी देते थे । प्रीतम चंद सर से शाबाशी छात्रों को फ़ौज़ के तमगों जैसी लगती थी ।हालांकि लेखक मास्टर प्रीतम चंद से न केवल डरते थे ,अपितु उनसे घृणा भी करते थे किंतु कहीं न कहीं उनसे प्रभावित भी लगते हैं और अपने माता- पिता से उन्हीं के जैसे जूतों की माँग भी करते हैं । इसी बीच पीटी सर लेखक की कक्षा में फ़ारसी पढ़ाने लगे । छात्रों द्वारा शब्दरूप याद न कर पाने पर उनको मुर्गा बनाकर सज़ा दे रहे थे कि हैड मास्टर साहब वहाँ आ गए। प्रीतम चंद द्वारा किए जा रहे इस कृत्य को देख कर वे आग बबूला हो उठे और तुरंत पीटी सर को मुअत्तल कर दिया । फ़िर भी पीटी सर का खौफ़ लेखक के मन में कई दिन तक बना रहा। इधर पीटी सर ने बाज़ार में एक दुकान के ऊपर एक कमरा किराए में ले लिया था । उन्हें अपने निलंबित होने की जरा भी चिंता नहीं थी । पीटी सर आराम से वहाँ रहते थे । ुन्होंने वहाँ तोते पाल रखे थे । जिन्हें वे प्यार बादाम की गिरी खिलाते थे और मीठी- मीठी बातें किया करते थे । मास्टर प्रीतम चंद का यह रूप लेखक के लिए नया था । लेखक आश्चर्यचकित होते हैं कि इतने सख्त व्यवहार वाला व्यक्ति इतना कोमल हृदय रखता है ।
प्रश्न उत्तर:
प्रश्न 1 – कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती-पाठ के किस अंश से यह सिद्ध होता है?
उत्तर – कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती। यह बात पाठ के इस अंश से सिद्ध होती है कि लेखक गुरुदयाल जी के बचपन के दिनों में उनके मुहल्ले में अधिकांश परिवारआसपास के गाँवों से ही आकर मंडी में बसे थे। उनके साथ खेलने वाले अधिकांश साथी राजस्थान या हरियाणा से आए थे। लेखक जब छोटे थे तो अलग-अलग राज्यों से आए बच्चो की बातों को बहुत कम ही समझ पाते थे और उनके कुछ शब्दों को सुन कर तो लेखक को हँसी आ जाती थी। परन्तु जब सभी खेलना शुरू करते तो सभी एक-दूसरे की बातों को बहुत अच्छे से समझ लेते थे। आपसी व्यवहार में भाषा कभी आड़े नहीं आई ।
प्रश्न 2 – पीटी साहब की ‘शाबाश‘ फ़ौज के तमगों-सी क्यों लगती थी? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – मास्टर प्रीतम चंद स्कूल के ‘पीटी’ साहब थे। वे बहुत ही अनुशासन प्रिय थे। सभी लड़के पीटी साहब ‘ से बहुत डरते थे । लड़कों की पंक्तियों के पीछे खड़े-खड़े यह देखते रहते थे कि कौन सा लड़का पंक्ति में ठीक से नहीं खड़ा है। उनके द्वारा दी जाने वाली घुड़कियों और ठुड्डों के भय से छात्र कतार में बने रहने का प्रयास करते थे। किसी भी छात्र द्वारा जरा सी भी कोताही होने पर वह उसकी ओर बाघ की तरह झपट पड़ते और ‘खाल खींचने’ के मुहावरे को सच करके दिखा देते।ऐसे सख्त स्वभाव के अध्यापक से तारीफ़ मिलना छात्रों को किसी चमत्कार से कम नहीं लगता था। यही कारण था कि जब स्कूल में स्काउटिंग का अभ्यास करते हुए कोई भी विद्यार्थी कोई गलती नहीं करता, तो पीटी साहब अपनी चमकीली आँखें हलके से झपकाते हुए सभी को शाबाश कहते।लड़कों को यह शाबाशी कॉपियों में पूरे साल भर मेहनत से पाए गए “गुड” से ज्यादा मूल्यवान लगती ।उनकी एक शाबाशी लेखक और उसके साथियों को ऐसे लगने लगती मानो उन्होंने किसी फ़ौज के पदक जीत लिए हों। साथ ही छात्रों के मन में पीटी अध्यापक के प्रति प्रेम की भावना जग जाती ।
प्रश्न 3 – नयी श्रेणी में जाने और नयी कापियों और पुरानी किताबों से आती विशेष गंध से लेखक का बालमन क्यों उदास हो उठता था?
उत्तर – लेखक के घर के आर्थिक हालात अच्छे नहीं थे ।इसलिए हर साल जब लेखक अगली कक्षा में प्रवेश करता तो उसे पुरानी पुस्तकें मिला करतीं थी। उसके स्कूल के हेडमास्टर शर्मा जी एक बहुत धनी लड़के को उसके घर जा कर पढ़ाया करते थे। हर साल अप्रैल में जब पढ़ाई का नया साल आरम्भ होता था तो शर्मा जी उस लड़के की एक साल पुरानी पुस्तकें लेखक के लिए ले आते थे। उसे नयी कापियों और पुरानी पुस्तकों में से ऐसी गंध आने लगती थी कि उसका मन बहुत उदास होने लगता था। इसका कारण नई कक्षा की पढ़ाई की मुश्किलें और मास्टरों की मार-पीट का डर था। इसका एक अन्य कारण यह भी था कि उनके मन में इस प्रकार की धारणा हो गई थी कि अध्यापक छात्रों से ये उम्मीद करते थे कि जैसे बड़ी कक्षा में आते ही छात्र हरफ़नमौला हो जाएंगे।किंतु जब छात्र उन अध्यापकों की आशाओं पर पूरे नहीं हो पाते तो ये अध्यापक तो विद्यार्थियों के साथ मारपीट तैयार रहते’ थे। इन्हीं सब कारणों से लेखक का बालमन उदास हो जाता था ।
प्रश्न 4 – स्काउट परेड करते समय लेखक अपने को महत्वपूर्ण ‘आदमी‘ फ़ौजी जवान क्यों समझने लगता है?
उत्तर – यह द्वितीय विश्व युद्ध का समय था जब लेखक स्कूली शिक्षा प्राप्त कर रहे थे । उस वक्त अधिकतर भारतीय गरीब थे । युवकों को फ़ौज़ में भरती होने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु ब्रिटिश सेना विभिन्न नाटकों ,नौटंकियों और मसखरों द्वारा गाने गवाकर विज्ञापन आदि का सहारा लेती थी जिससे कुछ युवक फ़ौज में भरती हो जाएँ । लेखक भी फ़ौजी अफ़सरों द्वारा पहने जाने वाली वर्दी और बूट से आकर्षित थे ।इसलिए जब लेखक परेड करते समय धोबी द्वारा धोई गई वर्दी और पालिश किए चमकते जूते और जुराबों को पहनकर स्काउटिंग की परेड करते या पीटी मास्टर साहब के आदेशानुसार मार्च करते हुए अकड़कर चलते, तो उन्हें लगता कि वे भी बहुत महत्वपूर्ण ‘आदमी’ हैं , और वे अपने-आप को फौजी जवान समझते थे।
प्रश्न 5 – हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को क्यों मुअत्तल कर दिया?
उत्तर – मास्टर प्रीतमचंद लेखक की चौथी कक्षा को फ़ारसी पढ़ाने लगे थे। अभी मास्टर प्रीतमचंद को लेखक की कक्षा को पढ़ाते हुए एक सप्ताह भी नहीं हुआ होगा कि प्रीतमचंद ने उन्हें एक शब्दरूप याद करने को कहा और आज्ञा दी कि कल इसी घंटी में जुबानी ही सुनेंगे। दूसरे दिन मास्टर प्रीतमचंद ने बारी-बारी सबको सुनाने के लिए कहा तो एक भी लड़का न सुना पाया। मास्टर जी ने गुस्से में चिल्लाकर सभी विद्यार्थियों को कान पकड़कर और पीठ ऊँची रखकर मुर्गा बनने को कहा। जब लेखक की कक्षा को सज़ा दी जा रही थी तो उसके कुछ समय पहले शर्मा जी स्कूल में नहीं थे। स्कूल आते ही उन्होंने प्रीतमचंद द्वारा छात्रों को इस प्रकार शारीरिक दंड देते देखा। जिसे वह सहन नहीं कर पाए और वह भड़क गए थे।छोटे बच्चों को इस तरह कठोर दंड देने की वज़ह से हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को मुअत्तल कर दिया।
प्रश्न 6 – लेखक के अनुसार उन्हें स्कूल खुशी से भागे जाने की जगह न लगने पर भी कब और क्यों उन्हें स्कूल जाना अच्छा लगने लगा?
उत्तर -यद्यपि बचपन में लेखक गुरदयाल सिंह को स्कूल जाना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था परन्तु कुछ अवसर पर उन्हें स्कूल जाना बहुत अच्छा भी लगता था। जब मास्टर प्रीतमसिंह मुँह में सीटी ले कर लेफ्ट-राइट की आवाज़ निकालते हुए मार्च करवाया करते थे और सभी विद्यार्थी हाथों में नीली-पीली झंडियाँ लेकर अपने छोटे-छोटे जूतों की एड़ियों पर दाएँ-बाएँ या एकदम पीछे मुड़कर जूतों की ठक-ठक करते और ऐसे घमंड के साथ चलते जैसे वे सभी विद्यार्थी न हो कर, फौज़ी जवान के समान बहुत महत्वपूर्ण ‘आदमी’ हों। स्काउटिंग करते हुए मिलने वाली पीटी साहब की शाबाशी लेखक और उसके साथियों को ऐसे लगती मानो उन्हें शाबाशी नहीं फ़ौज़ के तमगे मिल गए हों । विद्यार्थी जीवन में पढ़ाई के दौरान मिलने वाली मार-पीट के कारण यदयपि लेखक को स्कूल कभी भी खुशी से भागे जाने की जगह न लगी, पर स्काउटिंग और परेड के दौरान अनुशासन बनाए रखने पर मिलने वाली तारीफ़ के कारण लेखक को स्कूल जाना अच्छा व सुखद प्रतीत होता था ।
प्रश्न 7 – लेखक अपने छात्र जीवन में स्कूल से छुटियों में मिले काम को पूरा करने के लिए क्या-क्या योजनाएँ बनाया करता था और उसे पूरा न कर पाने की स्थिति में किसकी भाँति ‘बहादुर’ बनने की कल्पना किया करता था?
उत्तर -लेखक अपने छात्र जीवन में स्कूल से छुट्टियों में मिले काम को पूरा करने के लिए तरह-तरह की योजनाएँ बनाया करता था।। हर दिन के ख़त्म होते-होते उसका डर भी बढ़ने लगता था। छुट्टियाँ खत्म होने के एक महीने पहिले लेखक काम खत्म करने के तरीके सोचने लगता ।लेकिन खेल-कूद में छुट्टियाँ भागने लगतीं, तो मास्टर जी की पिटाई का डर सताने लगता।फिर वह अपना डर भगाने के लिए सोचता कि दस क्या, पंद्रह सवाल भी आसानी से एक दिन में किए जा सकते हैं। तब उसे छुट्टियाँ भी बहुत कम लगने लगतीं और दिन बहुत छोटे लगने लगते तथा स्कूल का भय भी बढ़ने लगता। ऐसे में लेखक ओमा की भाँति बहादुर बनने की कल्पना करने लगता, जो छुट्टियों को काम पूरा करने की बजाय अध्यापकों की पिटाई को अधिक ‘सस्ता सौदा’ समझता था। यद्यपि लेखक पिटाई से बहुत डरते थे किंतु ऐसे समय में ओमा ही लेखक का नेता हुआ करता और वे उसके जैसे ‘बहादुर’ बनने की कल्पना करने लगता था।
प्रश्न 8 – पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर पीटी सर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर – पीटी सर की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार थीं :–
- वे कभी स्कूल के समय में मुस्कुराते या हँसते नहीं थे ।वे बहुत सख्त मिज़ाज़ के थे ।
- वे छोटे कद के , दुबले-पतले किन्तु पुष्ट शरीर वाले थे ।
- उनका चेहरा माता के दानों से भरा यानि चेचक के दागों से भरा हुआ और बाज़ सी तेज़ आँखें थीं ।वे खाकी वर्दी, चमड़े के चौड़े पंजों वाले जूते पहनते थे ।
- वे बहुत अनुशासन प्रिय थे ।यदि बच्चे उनके अनुसार न चलते तो वे कठोर दंड देने में भी हिचकते न थे।
- वे बहुत स्वाभिमानी भी थे क्योंकि जब हेडमास्टर शर्मा ने उन्हें निलंबित कर दिया तो वे गिड़गिड़ाए नहीं, चुपचाप चले गए ।
- यद्यपि विद्यालय में वे सख्त मिज़ाज दिखते थे , किंतु वे तोतों से प्यार भरी बातें करते और उन्हें बादाम की गिरी भी खिलाते थे । इससे पता चलता है कि वे एक कोमल हृदय भी रखते थे।
प्रश्न 9 – विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए पाठ में अपनाई गई युक्तियों और वर्तमान में स्वीकृत मान्यताओं के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर – ’सपनों के से दिन” पाठ में लेखक गुरदयाल सिंह जी ने तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का चित्रण किया है । जिसमें विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए मारना-पीटना और शारीरिक दंड देना आदि शामिल हैं। तीसरी और चौथी कक्षाओं के छात्रों को भी थोड़ा सा अनुशासन भंग करने पर कठोर सजा मिलती थी । प्रोत्साहित करने के लिए शाबाशी यदा-कदा ही मिलती थी । कठोर दंड व्यवस्था के कारण बहुत से बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, अथवा स्कूल जाना बंद कर देते थे । परन्तु वर्तमान समय में इस तरह मारना-पीटना और शारीरिक दंड देना बिलकुल मना है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली छात्र केंद्रित है। आज बच्चों की भावनाओं को प्रमुखता दी जाती है । यदि छात्र कोई गलती करे तो उसका मनोवैज्ञानिक कारण ढूँढने के प्रयास किए जाते है। गलतियों के लिए दंड न देकर छात्र को गलती का एहसास करवाया जाता है ।शिक्षा में रोचक तरीके अपना कर पढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं । मेरी दृष्टि में नया तरीका ज्यादा उचित है।
प्रश्न 10 : छात्र अपने अनुभव स्वयं लिखें ।
प्रश्न 11 – प्रायः अभिभावक बच्चों को खेल-कूद में ज्यादा रूचि लेने पर रोकते हैं और समय बर्बाद न करने की नसीहत देते हैं। बताइए –
(क) खेल आपके लिए क्यों जरुरी है?
उत्तर – खेल मनोरंजक होता है खेलने से शरीर का उचित व्यायाम भी हो जाता है। अत: खेल सेहत के लिए आवश्यक होता है। कहा भी जाता है कि ‘स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है।’ । साथ ही खेलने से नैतिक मूल्यों तथा भाईचारे की भावना का विकास होता है और सामाजिकता की भावना बलवती होती है ।स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ती है। साथ ही वर्तमान समय में खेलों को जीविका का साधन भी बनाया जा सकता है ।
(ख) आप कौन से ऐसे नियम-कायदों को अपनाएँगे जिनसे अभिभावकों को आपके खेल पर आपत्ति न हो?
उत्तर – जीवन में समन्वय बहुत आवश्यक है । खेल जीवन में जरुरी है, उतने ही जरुरी पढाई भी है । खेल हमारे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, साथ ही खेलने से हमारा मनोरंजन भी होता है तो बच्चों को हमेशा खेलते रहने की इच्छा रहती है । किंतु पढाई जीवन में कामयाबी पाने का माध्यम होती है। अतः प्यरत्दियेक माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे शिक्षित हो और उनका भविष्य सुरक्षित रहे
अतः यदि हम खेल के साथ-साथ लगन से पढ़ाई भी करें तो अभिभावकों को कभी भी खेल से आपत्ति नहीं होगी। इसलिए हम खेल और पढ़ाई के बीच समन्वय का मार्ग अपनाएंगे ।
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