टोपी शुक्ला(संचयन पाठ-3)
लेखक परिचय
“टोपी शुक्ला ” के लेखक राही मासूम रज़ा किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं । सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार राही मासूम रज़ा का जन्म 1सितंबर 1927 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर के पास गंगोली गाँव में हुआ । उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी से उर्दू साहित्य में “तिलिश्म -ए-होशरुबा’ पर.एच. डी. की । उसके बाद वहीं कुछ समय तक अध्यापन कार्य किया ।1968 में राही जी मुम्बई चले गए और वहाँ रहते हुए सैंकड़ों फ़िल्मों के लिए पटकथा , संवाद लेखन और गीतलेखन किया । साथ ही साहित्य लेखन में भी जुड़े रहे ।प्रसिद्ध धारावाहिक महाभारत के पटकथा और संवाद लेखन का महती कार्य भी आपके हिस्से आया । इसी धारावाहिक के संवाद लेखन के कारण राही मासूम रज़ा जी भारत के घर- घर में अपनी पहचान बना सके ।
अपने लेखन द्वारा उन्होंने हिंदू-मुस्लिम के बीच की खाई को दूर करने का प्रयास किया । साथ ही जनता को उसके दोगले चेहरे का दर्पण भी दिखाया । आम हिंदुस्तानी की पीड़ा , दु:ख-दर्द और जीवन के संघर्ष राही मासूम रज़ा जी की लेखनी से उभर आए हैं ।उनके साहित्य में उनका धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण सामने आया और इसी कारण जनता का अपार समर्थन और प्रेम उन्हें मिला । समाज में व्याप्त कुरीतियों , और अंधविश्वासों, संकीर्ण धारणाओं , राजनैतिक स्वार्थ भरे गठजोड़ को राही मासूम रज़ा ने अपने लेखन द्वारा बेनकाब किया ।
इनकी प्रसिद्ध कृतियाँ आधा गाँव , टोपी शुक्ला , कटरा बी आरज़ू , असंतोष के दिन , नीम का पेड़ (सभी हिंदी उपन्यास) ; मुहब्बत के दिन (उर्दू उपन्यास); मैं फ़ेरी वाला (हिन्दी कविता संग्रह) ; नयासाल:मौजेसबा, रक्से-मय, अजनबी शहर (उर्दू कविता संग्रह ) अट्ठारह सौ सत्तावन (हिंदी-उर्दू महाकाव्य ) और छोटे आदमी की बड़ी कहानी (जीवनी ) आदि हैं । इसके अतिरिक्त अनेक फुटकर रचनाएँ हैं जो बहुत प्रसिद्ध रहीं ।
पाठ का सारांश
टोपी शुक्ला सुप्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार, पटकथा लेखक राही मासूम रज़ा जी का एक प्रसिद्ध उपन्यास है । कक्षा दसवीं में इसी उपन्यास के प्रारंभिक अंश दिया गया है । कथा नायक टोपी शुक्ला का परिचय देते हुए लेखक थोड़े से भावुक हो गए हैं । कथा के शुरुवात में ही उन्होंने हिंदू- मुस्लिम एकता का परिचय देते हुए बताया है कि हिंदी और उर्दू एक ही भाषा हिंदवी के दो नाम हैं। लेकिन नाम के चक्कर में ही बहुत घपले होते रहे हैं । लेखक के अनुसार हिंदुओं के भगवान कृष्ण और मुसलमानों के पैगंबर मुहम्म्द दोनों ही पशुपालक थे। नाम के कारण अनेक झगड़े होते रहे हैं और लोग आपसी एकता को भूल गए। प्रस्तुत कहानी टोपी शुक्ला का नायक भी एक रूढ़िवादी हिंदू ब्राहमण परिवार का बच्चा है तो उसका पहला और एकमात्र दोस्त इफ़्फ़न एक कट्टर मौलवी परिवार से है। लेखक के अनुसार इफ़्फ़न के बिना टोपी का सही परिचय नही दिया जा सकता, इसलिए वे पहले इफ़्फ़न का परिचय देना ज्यादा उचित समझते हैं ।

इफ़्फ़न की कहानी भी लंबी है किंतु लेखक इफ़्फ़न के बारे में उतना ही बताना उचित समझते हैं जितना टोपी की कहानी के लिए जरूरी है। इफ़्फ़न और टोपी दोनों की पारिवारिक परिस्थितियाँ लगभग समान हैं ।टोपी का पूरा नाम बलभद्र नारायण शुक्ला है अर इफ़्फ़न का नाम्सय्यद ज़रगाम मुरतुज़ा है। जहाँ इफ़्फ़न एक परंपरावादी मुस्लिम परिवार का बच्चा है वहीं टोपी भी एक रूढ़िवादी हिंदू ब्राहमण परिवार से संबंध रखता है। दोनों घरों में तीन- तीन बच्चे हैं । इफ़्फ़न के घर में दादी, माँ, पिता, बाज़ी और एक छोटी बहिन नुज़हत है । अक्सर इफ़्फ़न को दादी के अतिरिक्त सबसे डाँट पड़ती रहती रहती है, यहाँ तक कि उसकी छोटी बहन नुज़हत तक उसे परेशान करती थी अर उसकी किताबों में तसवीर बना दिया करती थी। वे पूरब की रहने वाली थी और वहीं की बोली बोलती थी। इफ़्फ़न को दादी की बोली पसंद थी। जबकि उसके घर में सब दादी की बोली का मज़ाक बनाते थे। इफ़्फ़न के दादा- परदादा प्रसिद्ध मौलवी थे। वे लखनऊ के रहने वाले थे। लेकिन भारत को अपना देश नहीं समझते थे हालांकि वे इसी देश में पैदा हुए, पले-बढ़े और मर गए। वे लोग हिंदुस्तान को काफ़िरों का देश समझते थे। वे करबला में दबाए जाने की वसीयत लिख गए और मरने के बाद वहीं दबाए गए। इफ़्फ़न की परदादी भी बड़ी नमाज़ी थीं लेकिन बहुत से भारतीय रीति -रिवाज़ मानती थीं। इफ़्फ़न की दादी पूरब से थीं वे जमींदार की बेटी थीं और खूब दूध- दही खाई हुई थीं।उन्हें शादी-ब्याह आदि के अवसर पर नाच गाने का शौक था। वे हमेशा अपने गाँव के दिन याद करती थी। लखनऊ में उन्हें कट्टर मौलवी परिवार के अनुशासन में रहना पड़ा। जहाँ वे अपनी मर्जी का जीवन जीने के लिए तरस गईं थीं। यहाँ तक कि वे अपने बेटे की शादी में भी नाच गा न सकी थी। हालाँकि इफ़्फ़न के जन्म के अवसर तक इफ़्फ़न के दादा जी मर चुके थे और दादी ने खूब नाच गाना करवा कर अपनी इच्छा पूरी कर ली थी। इफ़्फ़न की दादी बहुत प्यार करने वाली थीं । वे टोपी को भी बहुत प्यार करती थीं । टोपी भी दादी से बहुत प्यार करता था। जब वे अपनी पूरबी बोली में बोलती तो टोपी को बहुत अच्छा लगता। टोपी की माँ भी यही बोली बोलती थी जिसे टोपी की दादी पसंद नहीं करती थीं।

टोपी की दादी अपने घर में काफ़ी प्रभावशाली थी। वे कठोर व्यवहार वाली थीं और अकसर दादी टोपी को डाँटती रहती थी। टोपी भी दादी को चिढ़ाने में कोई कसर न रखता। इफ़्फ़न से दोस्ती रखने और उसके घर जाने में दादी को ऐतराज है। वे उसे उर्दू बोलने और इफ़्फ़न के घर जाने को मना करती हैं टोपी इस बात को मानने से इनकार कर देता है। हालांकि दादी खुद उर्दू के शब्द प्रयोग करती हैं। टोपी का बड़ा भाई झूठ बोल कर उसे पिटवाता है। छोटा भाई भी उसे परेशान करता है। परिवार में टोपी उपेक्षित बच्चा है । कोई उसकी भावनाएँ नहीं समझता।टोपी के पिता भी उसे इफ़्फ़न से दोस्ती रखने पर डाटते हैं लेकिन जैसे ही उन्हें पता चलता है कि इफ़्फ़न के पिता कलेक्टर हैं तो दूसरे दिन ही बेटे की दोस्ती का हवाला देकर राशन कार्ड बनवा लेते है। इस तरह कहानी में यह परिवार दोहरे मानदंड जीता हुआ दिखता है। टोपी अपनी दादी को इफ़्फ़न की दादी से बदल लेना चाहता है । तभी उसे दादी की मृत्यु की खबर मिलती है। इस खबर से टोपी को बहुत दुख होता है। वह इफ़्फ़न के घर शोक मनाने जाता है । दादी के बिना उसे वह घर सूना ही लगता है और वह इफ़्फ़न से कहता है कि अच्छा होता कि तेरी दादी की जगह मेरी दादी मर गई होती।

इसी बीच दस अक्तूबर 1945 में इफ़्फ़न के पिता का तबादला मुरादाबाद हो जाता है और वे बनारस छोड़ कर चले जाते हैं।टोपी अकेला हो जाता है। नए कलेक्टर के बेटे थोड़े अभिमानी स्वभाव के थे। वे न केवल टोपी के साथ दुर्व्यवहार करते हैं बल्कि अपने कुत्ते को भी उसे काटने के लिए छोड़ देते हैं। टोपी अकेला हो जाता है। परिवार की डाँट और उपेक्षा का शिकार हो कर नौकरानी सीता की शरण लेता है। नौकरानी के साथ रह कर उसके व्यक्तित्व में भी छोटापन और हीनता आ जाती है।घर में उसे कोई पढ़ने नहीं देता है। कोई न कोई कारण से उसकी पढ़ाई में व्यवधान पैदा किया जाता है जिस कारण वह नवीं में फ़ेल हो जाता है। जबकि उसका बड़ा भाई और छॊटा भाई अव्वल आते हैं। टोपी को परिवार की नाक डुबाने का आरोप लगाया जाता है। दूसरे वर्ष उसे टायफ़ाइड हो जाता है। जिस कारण वह नवीं पास नहीं हो पाता। वह घर में उपेक्षित तो था ही अब स्कूल में भी कभी अध्यापकों से अपमानित होता है तो कभी छात्रों और सहपाठियों से। उसके साथ के बच्चे भी स्कूल से निकल चुके थे।अब टोपी निपट अकेला रह जाता है। तीसरे वर्ष टोपी के पिता चुनाव में खड़े हो जाते हैं और घर में लोगों का आना-जाना बढ़ जाता है। जिस से पढ़ाई का महौल ही नहीं रहता। इसी बीच टोपी के पिता की चुनाव में जमानत जब्त हो जाती है। घर का माहौल बदल जाता है और सन्नाटा छा जाता है तभी परीक्षा शुरु हो जाती हैं । ऐसे माहौल में भी टोपी मेहनत कर के तीसरे दर्ज़े में पास हो जाता है। जिन परिस्थितियों में टोपी गुजर रहा था ऐसे में पास हो जाना भी बड़ी बात थी किंतु टोपी की सराहना करने की अपेक्षा उसकी दादी व्यंग्य करने से पीछे नहीं रहती। इस तरह कठिन परिस्थितियों और परिवार की उपेक्षा सहते बालक टोपी की कहानी लेखक रोचक तरीके से प्रस्तुत करने में सफ़ल हुआ है।
प्रश्न उत्तर
प्रश्न 1 – इफ़्फ़न टोपी शुक्ला की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा किस तरह से है?
उत्तर – इफ़्फ़न टोपी का पहला दोस्त था। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे थे। दोनों एक दूसरे से कोई बात नहीं छुपाते थे। टोपी का न केवल इफ़्फ़न से भी बहुत गहरा नाता था बल्कि उसकी दादी से भी वह गहरा जुड़ाव महसूस करता था क्योंकि जो प्यार और अपनापन टोपी को उसके घर में नहीं मिला, वह इफ़्फ़न और इफ़्फ़न की दादी से मिला। इफ़्फ़न के बिना टोपी की कहानी और उसके व्यक्तित्व को अच्छी तरह समझ पाना संभव नहीं।इसलिए कहा जा सकता है कि इफ़्फ़न टोपी शुक्ला की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
प्रश्न 2 – इफ़्फ़न की दादी अपने पीहर क्यों जाना चाहती थीं?
उत्तर – इफ़्फ़न की दादी एक जमींदार की बेटी थी। वे अपने पीहर में दूध-घी खाती हुई बड़ी हुई थी ,परन्तु लखनऊ आ कर वह घी पिलाई हुई हाँडियों में जमाए हुए दही के लिए तरस गई थी। जब भी वह अपने मायके जाती तो जितना उसका मन होता, जी भर के खा लेती थीं। ससुराल में मौलवी परिवार का वातावरण उन्हें कभी रास नहीं आया क्योंकि यहाँ उन्हें कई तरह की बंदिशों का पालन करना होता था और एक पक्की मौलविन की तरह रहना पड़ता था। यही कारण था कि इफ़्फ़न की दादी अपने पीहर जाना चाहती थीं।
प्रश्न 3 – दादी अपने बेटे की शादी में गाने-बजाने की इच्छा पूरी क्यों नहीं कर पाई?
उत्तर – दादी की शादी एक मौलवी परिवार में हुई थी इफ़्फ़न के दादा एक कट्टर मौलवी थे और मौलवियों के घर में शादी-ब्याह के अवसर पर कोई गाना-बजाना नहीं होता। इसी वजह से दादी अपने बेटे की शादी में गाने-बजाने की इच्छा पूरी नहीं कर पाई।
प्रश्न 4 – ‘अम्मी’ शब्द पर टोपी के घरवालों की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर – “अम्मी!” यह शब्द सुनते ही खाने की मेज़ पर बैठे सभी लोग चौंक गए, उनके हाथ खाना खाते-खाते रुक गए। वे सभी लोग टोपी के चेहरे की ओर देखने लगे। टोपी एक कट्टर रूढ़िवादी हिन्दू परिवार का बच्चा था ।’अम्मी’ शब्द उर्दू का था और टोपी के मुँह से यह शब्द सुन कर ऐसा लग रहा था मानो परंपराओं की दीवार हिलने लगी हो। यद्यपि टोपी की दादी भी कई उर्दू लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करती थीं फ़िर भी अम्मी बोलते ही वे नाराज हो गई ।उन्होंने इसे घर की परंपराओं और संस्कारों का अपमान समझा और उसी वक्त खाने की मेज़ से उठ गई ।हालांकि टोपी ने भी दादी को चिढ़ाने में कोई कसर न छोड़ी। टोपी की माँ रामदुलारी ने टोपी को बहुत मारा।
प्रश्न 5 – दस अक्तूबर सन पैंतालीस का दिन टोपी के जीवन में क्या महत्त्व रखता है?
उत्तर – दस अक्तूबर सन पैंतालीस का ऐसे तो कोई महत्त्व नहीं है परन्तु टोपी के जीवन के इतिहास में इस तारीख का बहुत अधिक महत्त्व है, क्योंकि इस तारीख को इफ़्फ़न के पिता बदली पर मुरादाबाद चले गए। इफ़्फ़न की दादी के मरने के थोड़े दिनों बाद ही इफ़्फ़न के पिता की बदली हुई थी। टोपी दादी के मरने के बाद तो अपनेआप को अकेला महसूस कर ही रहा था ।अब, इफ़्फ़न के चले जाने पर वह और भी अकेला हो गया था। इसीलिए टोपी ने दस अक्तूबर सन पैंतालीस को कसम खाई कि अब वह किसी भी ऐसे लड़के से कभी भी दोस्ती नहीं करेगा जिसके पिता कोई ऐसी नौकरी करते हो जिसमें बदली होती रहती हो।
प्रश्न 6 – टोपी ने इफ़्फ़न से दादी बदलने की बात क्यों कही?
उत्तर – इफ़्फ़न के घर में टोपी का सबसे अधिक करीब उसकी दादी से था। दादी की बोली उसे बहुत पसंद थी और टोपी की माँ की बोली और इफ़्फ़न की दादी की बोली एक ही थी। इसलिए भी तॊपी को इफ़्फ़न की दादी की बोली बोलना पसंद था। टोपी को इफ़्फ़न की दादी का हर एक शब्द शक़्कर की तरह मीठा लगता था। पके आम के रस को सूखाकर बनाई गई मोटी परत की तरह मज़ेदार लगता। तिल के बने व्यंजनों की तरह अच्छा लगता ।टोपी की दादी कठोर व्यवहार वाली अनुशासन प्रिय थी । वह अक्सर उसकी माँ की पूरबी भाषा का मज़ाक बनाती थी।इसलिए वह अपनी दादी की डाँट सुन कर चुपचाप उनके पास चला आता। टोपी को अपनी दादी बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती थी। इसीलिए टोपी ने इफ़्फ़न से दादी बदलने की बात कही।
प्रश्न 7 – पूरे घर में इफ़्फ़न को अपनी दादी से ही विशेष स्नेह क्यों था?
उत्तर – इफ़्फ़न को अपनी दादी से बहुत ज्यादा प्यार था। प्यार तो उसे अपने अब्बू, अम्मी, बड़ी बहन और छोटी बहन नुज़हत से भी था, परन्तु दादी से वह सबसे ज्यादा प्यार किया करता था। अम्मी तो कभी-कभार इफ़्फ़न को डाँट देती थी और कभी-कभी तो मार भी दिया करती थी। बड़ी बहन भी अम्मी की ही तरह कभी-कभी डाँटती और मारती थी। अब्बू भी कभी-कभार घर को न्यायालय समझकर अपना फैसला सुनाने लगते थे। नुजहत को जब भी मौका मिलता ,वह उसकी कापियों पर तस्वीरें बनाने लगती थी। बस एक दादी ही थी, जिन्होंने कभी भी किसी बात पर उसका दिल नहीं दुखाया था। यही कारण था कि पूरे घर में इफ़्फ़न को अपनी दादी से ही विशेष स्नेह था।
प्रश्न 8 – इफ़्फ़न की दादी के देहांत के बाद टोपी को उसका घर खाली-सा क्यों लगा?
उत्तर – टोपी और दादी में प्रेम का ऐसा सम्बन्ध हो चुका था, जिसे समझ पाना कठिन था। तोपी अपने घर का उपेक्षित बच्चा था जिसे जब चाहे कोई भी डाँठ लगा देता था। बड़े भाई की घर में विशेष स्थिति थी उसकी हर बात को सही समझा जाता था जबकि छोटे भाई को लाड़-प्यार किया जाता था। इन दोनों के बीच टोपी पारिवारिक उपेक्षा का शिकार और दादी की अनावश्यक डाँट-फ़टकार सहन करने को मज़बूर था। वहीं इफ़्फ़न की दादी भी अकेलेपन से जूझ रही थी। इफ़्फ़न की माँ और बहिन उनकी बोली को गाँव की बोली समझ कर हँसती थी। दोनों अधूरे और अकेले थे। दोनों ही प्यार के प्यासे थे इसीलिए उन्होंने एक दूसरे को काफ़ी निकट पाया। इफ़्फ़न की दादी बहुत ममतामयी थीं। वे टोपी को भी इफ़्फ़न की ही तरह प्यार करती और कहानियाँ सुनाती थी। इसलिए टोपी अपनी दादी की अपेक्षा इफ़्फ़न की दादी को बदल कर लाना चाहता था। दादी के देहांत के बाद टोपी को उसका घर खाली-सा लगा क्योंकि अब वहाँ उसे दादी की तरह प्यार करने वाला कोई न रहा था। टोपी इफ़्फ़न के घर में केवल दादी से ही मिलने जाया करता था।
प्रश्न 9 – टोपी और इफ़्फ़न की दादी अलग-अलग मज़हब और जाति के थे पर एक अनजान अटूट रिश्ते से बँधे थे। इस कथा के आलोक में अपने विचार लिखिए।
उत्तर – बच्चा कोमल और निष्कपट स्वभाव का होता है । उसके लिए जाति और मजहब का कोई महत्त्व नहीं होता है ।उसे तो जहाँ भी प्यार और ममता मिलती है , वहीं खिंचा चला जाता है ।इसीलिए इफ़्फ़न की दादी का स्नेह , और ममता टोपी को बरबस ही अपनी ओर खींच लेती है और भिन्न –भिन्न धर्म के होने के बावजुद वे दोनों एक अटूट रिश्ते में बँध जाते हैं । यहाँ तक कि टोपी को इफ़्फ़न के घर जाने के लिए मार भी पड़ी थी, परन्तु टोपी दादी से मिलने, उनकी कहानियाँ सुनने और उनकी मीठी पूरबी बोली सुनने रोज इफ़्फ़न के घर जाता था। टोपी को तो दादी का हर एक शब्द गुड़ की डली की तरह लगता था। टोपी और इफ़्फ़न की दादी अलग-अलग मज़हब और जाति के थे पर एक अनजान अटूट रिश्ते से बँधे थे। दोनों एक दूसरे को खूब समझते थे।
प्रश्न 10 – टोपी नवीं कक्षा में दो बार फेल हो गया। बताइए –
(क) ज़हीन होने के बावजूद भी कक्षा में दो बार फ़ेल होने के क्या कारण थे?
उत्तर – वह पढ़ाई में बहुत तेज़ था, परन्तु उसे कोई पढ़ने ही नहीं देता था। पहले साल टोपी इसलिए फ़ेल हुआ क्योंकि जब भी टोपी पढ़ाई करने बैठता, तो कभी उसके बड़े भाई मुन्नी बाबू को कोई काम याद आ जाता या उसकी माँ को कोई ऐसी चीज़ मँगवानी पड़ जाती, जो नौकरों से नहीं मँगवाई जा सकती थी।इन सब कामों को निबटा कर जब टोपी वापस आता तो देखता कि उसका छोटा भाई भैरव उसकी कापियों के पन्नों को फाड़ कर उनके हवाई जहाज़ बना कर उड़ा रहा है। दूसरे साल टोपी इसलिए फ़ेल हो गया था क्योंकि उसे टाइफ़ाइड हो गया था। जिसके कारण वह पढ़ाई नहीं कर पाया था।
(ख) एक ही कक्षा में दो-दो बार बैठने से टोपी को किन भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर – एक ही कक्षा में दो-दो बार बैठने से टोपी को बहुत –सी भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मास्टरों ने उसकी ओर ध्यान देना बिलकुल ही छोड़ दिया था, कोई सवाल किया जाता और जवाब देने के लिए जब टोपी भी हाथ उठाता, तो कोई मास्टर उससे जवाब नहीं पूछता था। टोपी को न केवल शिक्षकों के द्वारा फेल होने के लिए अपमानित होना पड़ता था, अपितु उसके सहपाठी भी जो कभी उससे निचली कक्षाओं में पढ़ते थे अब मौका मिलते ही उसका उपहास करने से न चूकते थे । टोपी ने किसी न किसी तरह एक साल को झेल लिया। परन्तु जब सन इक्यावन में भी उसे नवीं कक्षा में ही बैठना पड़ा तो वह बिलकुल गीली मिट्टी का लौंदा हो गया, क्योंकि अब तो दसवीं में भी कोई उसका दोस्त नहीं रह गया था। जो विद्यार्थी सन उनचास में आठवीं कक्षा में थे वे अब दसवीं कक्षा में थे। जो सन उनचास में सातवीं कक्षा में थे, वे टोपी के साथ पहुँच गए थे। उन सभी के बीच में वह अच्छा-ख़ासा बूढ़ा दिखाई देने लगा था।विद्यालय के साथ-साथ टोपी को घर में भी दादी, माँ और भाईयों के कटाक्ष सहन करने पड़ते थे ।
(ग) टोपी की भावनात्मक परेशानियों को मद्देनज़र रखते हुए शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक बदलाव सुझाइए।
उत्तर – बच्चे फ़ेल होने पर मानसिक रूप से परेशान हो जाते हैं। वे उसी कक्षा में अपने से छोटे विद्यार्थियों के साथ बैठने में शर्म महसूस करते हैं। अध्यापकों को चाहिए कि वे फेल हुए बच्चों पर भी उतना ही ध्यान दें, जितना दूसरे बच्चों पर दिया जाता है। बच्चों को केवल किताबी ज्ञान पर ही नहीं परखना चाहिए।“फ़ेल हुए बच्चे बिल्कुल नकारा और प्रतिभाहीन होते है ,” ऐसी मानसिकता से हट कर उन्हें सफ़ल बनाने और अच्छे अंक प्राप्त कर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
प्रश्न 11 – इफ़्फ़न की दादी के मायके का घर कस्टोडियन में क्यों चला गया?
उत्तर – कस्टोडियन अर्थ है सरकारी कब्ज़ा। देश के विभाजन के बाद इफ़्फ़न की दादी के मायके वाले कराची में रहने चले गए । उनके पुराने घर की देखभाल के लिए कोई नहीं रह गया था। तब उनका उस घर पर किसी का मालिकाना हक़ भी नहीं रहा था। इसी कारण इफ़्फ़न की दादी के मायके का घर कस्टोडियन में चला गया।
यह भी देखें–



Leave a Reply